बुधवार, 21 अक्टूबर 2009
365 गेंदो में 93 रन
सच पूछिये तो ये 365 दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला। इस बीच कुछ ऐसे बेहतरीन मित्र बन गये जिनकी तलाश मेरे स्वप्न में थीं। ब्लोग मेरे रोज़मर्या जीवन का हिस्सा बन गया। जब भी उदास हुआ और ब्लोग सफर किया तो उदासी भाग गई। थकान से टूटते शरीर की 'आरोमा थैरेपी' इसी ब्लोग ने की। विचारों के तूफान को यहीं शांत किया। अपनी अल्प मतिनुसार शब्दों के साथ यहीं खेला। हां, मुझे ब्लोग पर देख कइयों ने इसे बकवास कहा। क्यों टाइम पास करता है? इससे तुझे क्या मिल जायेगा? समय क्यों खर्च करता है? अरे दुनिया कितनी आगे बढ गई है, लोग पैसा कमाने की सोचते हैं, तू इसमे अपना समय बिगाड रहा है। इससे क्या तुझे कोई पुरस्कार मिल जायेगा या कोई ज्ञानपीठ सम्मान दे देगा? आखिर होगा क्या इससे? आदि आदि...। मैं चुप रहा क्योंकि बचपन में सुना था कि अच्छे कार्यों के बीच कई सारे व्यवधान आते हैं"। पिताजी कहा करते हैं कि "अच्छा साहित्य पढना और लिखना समय का कतई दुरुपयोग नहीं होता।" वे कहते हैं कि- "आप कोई कर्म कर लेने के बाद कैसा अनुभव करते है? थकान का या प्रसन्नता का? आपको प्रसन्नता हो तो समझो आपने अच्छा कर्म किया। ग्लानि हो तो समझिये आपका वो काम अच्छा नहीं।" वैसे भी हमारी मनुस्म्रुति में यह कहा गया है कि-
"यत्कर्म कुर्वतोस्य ंस्यात्पारतोषा चांतरात्मन।
तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत॥" ( मनुस्म्रुति 4.161)
"यानी कर्म के साथ आत्मतुष्टि अवश्य होनी चाहिये। कर्म करते समय यदि अंतरात्मा को संतुष्टी का अनुभव हो तो उसे प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। जिस कर्म में आत्मग्लानि या पश्चाताप हो वो नहीं करना चाहिये।" मुझे तो पढने-लिखने में आत्मसंतुष्टि का अनुभव होता है इसलिये मैं यह करता हूं। ब्लोग तो आज है, कल तक मैं अपनी डायरी मेंटेन किया करता था। अखबार की नौकरी, और वह भी बगैर किसी ज्यादा उपरी दबाव के, तो लिखने में मज़ा आता रहा। साहित्यिक पारिवारिक माहौल व पिताजी की अपनी लाइब्रेरी में किताबें भी खूब मिली पढते रहने के लिये, तो उसमे मगन रहा, फिर नई किताबें खरीदने का शौक रहा, अब जब ब्लोग है तो क्यों न अपनी फितरत को इसके माध्यम से दिशा देता रहूं। लिहाज़ा इस ब्लोग सुख की नदिया में गोता लगाते हुए और मोतियां बिनते हुए एक वर्ष हो गया। मैं उन सब का अभिनन्दन करता हूं जिन्होने मुझे सराहा। मेरे साथ बने रहे। अब यह स्नेह बना रहे, या यह कहूं कि स्नेह बढ्ता रहे। यही आकांक्षा है।
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009
एक ये भी दीवाली है...
पसीने से लथपथ
बदहवास कहां दौडा जा रहा है,
रुक...
अबे रुक जा...।
बच के कहां जायेगा बे
बोल...क्यों भाग रहा है
और ये तेरे हाथ में....
क्या है, बता....
चोर कहीं के।
पकडे रखना
मुंडेर पर चढा था ये
वो तो अच्छा हुआ कि
दीये जल रहे थे
दिख गया...।
बोल बे..चुप क्यों है?
तेरे हाथ में क्या है?
अच्छा तेल सने हाथ...
कोई पकडे तो फिसल जाये
और भाग जाये...ऐं..।
तमाच...तमाच..तमाच
बता...
रो रहा है..दो और पडेंगे
तब बतायेगा क्या....।
दीया ?????.........?
"-सुना था
आज के दिन
दीया जला आंगन में रखते हैं...
लक्ष्मी आती है...
मां बीमार है, बाप का पता नहीं..
खाने को कुछ नहीं..
इतने सारे दीये जल रहे थे
सोचा एक उठा ले जाऊं..
माफ कर दे
हवलदारसाब....
और
ये ले बाबू तेरा दीया....।"
तमसो मा..ज्योतिर्गमय...........।
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ले तू भी
फेंक पत्ता..
पी ले कल का क्या भरोसा..
उपर क्या बतायेगा?
ऐं..
पी भी नहीं...।
पैसा क्या उपर ले जायेगा...?
पूजन...
किटी पार्टी में देर हो रही है
ओह ये लिपिस्टिक...
वाव..क्या लग रही है तू।
हां दीवाली है न।
ऐ...हम जा रहे हैं
घर की बत्तियां बुझा दे।
जी मेमसाब।
तमसो...मा..ज्योतिर्गमय.....।
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बुधवार, 14 अक्टूबर 2009
रात हवा ने बहुत बात की
रग-रग, छू-छू मुलाकात की।
ऐसे कोई बौराता है
जीना मुश्किल हो आता है,
ठन्डा,भीना मादक अंचल
परस-परस मन बहकाता है।
ऐसी बैरिन कौन जात की
रात हवा ने बहुत बात की।
खिलतीं कलियां शर्माती हैं
झूम,लचक झुक झुक जाती हैं,
बे-मौसम, बे-वक़्त, करकशा
हवा अगन सुलगा जाती है।
लज्जा उघरे गात गात की
रात हवा ने बहुत बात की।
अर्पित मान हुआ जाता है
मंत्र-मुग्ध मन झुक आता है,
नस-नस में बस पवन हठीला
सन-सन सी सरसा जाता है।
बात करे अब कौन प्रात की
रात हवा ने बहुत बात की।
शनिवार, 10 अक्टूबर 2009
शांति के नये 'बाबा', जय हो ओबामा
शनिवार, 3 अक्टूबर 2009
आंख
गुरुवार, 24 सितंबर 2009
वाह रे समर्पण।
आखिर लुढक ही गई
आंखों के अन्दर
और
रैटीना में फैल गई
अपने पूरे विस्तार के साथ
मेरी तस्वीर।
मैं कुछ समझ पाता कि
उसने पलक बन्द कर
निगल लिया मुझे
ह्रदय के अंतरतम तक
और बुदबुदाई
अब तुम जा सकते हो।
मैं
दुनियाई बवंडर में
उलझा
अपने दायित्व, कर्म
धर्म निभाता
लगभग बूढा हो गया,
वो कभी याद नहीं आई,
क्योकि उसे कभी
भूला ही नहीं।
फिर यह विश्वास कि
मैं तो उसके
ह्रदय में ही हूं।
सोच बुदबुदाता हूं
वाह रे समर्पण।
शनिवार, 19 सितंबर 2009
"प्राणांतक सुख"
" हिन्दी पखवाडा चल रहा है, वैसे मेरे लिये तो हिन्दी हर क्षण रगों में बहती है, इसलिये पखवाडा चले या सालवाडा मुझे इससे कोई मतलब नहीं रहता। लिहाज़ा हिन्दी की ही एक रचना जो मुझे बेहद पसन्द है, सादर कर रहा हूं। "
अप्रतिक्रियोद्भुत
एक अहेतुकी कर्म का
अविनाशी प्रदर्शन
अग-जग में परिव्याप्त
सहज कौशल का मार्जित प्रकर
अतल गव्हरों में झंझायित
आलोडित कंदराओं का
प्रसादांत क्रन्दन
अनावरित अवतरण की
दुस्तर भूमिका
अंजुलि भर
गुम्फित वन्दन के स्वर
श्रद्धा विगलित प्रेम-पेलव
संसार का अपहरण
डूब उतरता
सहज-सिन्धु विक्षुब्ध
प्रलय जनमाता
अंतरतर कातर मन
आह..
टूटन का म्रुत्योधिक सुख
आह...
अनस्तित्व का प्राणांतक सुख।
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
पर्वत को छू पाकर बदली बरस गई।
बैरिन लट गुंथने के पहले औचक उलझ गई।
माना मूल्य समर्पण का है
यह तन बस अर्पण का है
किंतु देव-पूजन से पहले
सिर का घूंघट क्यों सरका है?
पद-प्रक्षालन से पहले यह कैसी झिझक हुई
चरण पकड कर बैठ गई मैं अन्यमनस्क हुई।
बून्दों के गिरने से पहले
खुली सीप से कुछ तो कह ले
बन्धन से मोती है फिर भी
अच्छी खोटी सीप परख ले।
गिरने से पहले ही क्यों यों चकनाचूर हुई,
दरपण के सम्मोहन में मैं खुद से दूर हुई।
जीवन में बन्धन का स्वर है
मिलन-बन्ध में जीव अमर है
यम की पूजा के पहले ही
ब्रह्माराधन सर्व अजर है।
मिलने से पहले ही बावरी यों मदहोश हुई
जन्मों की उलझी गुत्थी ज्यों पल में सुलझ गई।
आओ तो मैं चांद सितारे
गोदी भर लूं सारे सारे
यही समर्पण बने विसर्जन
अनजानी पहिचान पुकारे।
जैसे सागर की सीमा लख नदिया उमग गई
जैसे पर्वत को छू पाकर बदली बरस गई।
सोमवार, 14 सितंबर 2009
बुढिया हिन्दी
नहीं..नहीं
उसे रुलाया गया।
रुलाया जाता रहा।
60 वर्ष की
बूढी के आंसू
पोछ्ने के नाम पर
देखो कितने
मज़में लगे हैं,
मेले लगे हैं,
सज़ी हैं दुकानें
और बिक रहे हैं
आंसू।
उसके आंसू
बेच कर
देखो तो कितने
महल खडे हो गये,
लोग कितने बडे हो गये,
पीठाधीश बन गये।
बावजूद
आंसू बेचे जा रहे हैं
खरीदने वाले
बन्द आंखे किये
खरीदे जा रहे हैं।
कोई माई का लाल नहीं
जो कोने में
पडी
रो रही उस बुढिया को
सम्भाले,
उसके आंसू पोछे
और कहे
जिसके बूते
मैं चला, जमा, खडा हुआ
जिसके बूते मैं
देशधारा में बहा,
जिसकी छाती से
दूध पिया,
उसे उसका मान सम्मान
पूरे-पूरे हक़ के साथ
यदि ना भी दिलवा पाऊं
किंतु उसे आजन्म
निसंकोच अपने
साथ रख,
ता-उम्र सेवा करता रहुंगा....।
अरे मां है वो
इतने से ही मान जायेगी
आंसू अपने पौछ डालेगी।
और गोद में उठा
पूरे आंगन में
दौड लगायेगी।
बस इतना ही तो चाहती है।
शनिवार, 12 सितंबर 2009
सुख

मेरे चेहरे के भाव
वो खूब पढ लेती है।
उसका नन्हा दिमाग
मेरे दिमाग से
कहीं तेज चलता है।
वो मेरे अनुसार अपने
कार्य ढालती है,
मुझे क्या अच्छा लगता है
क्या नहीं.
वो बारिकी से जानती है।
यहां तक कि
मुझे भी कभी पता नहीं चलता कि
मैं "ऐसा कुछ चाह" रहा था।
थकान होती है
तो सिर के पास बैठ
अपने नन्हें, कोमल हाथों से
सहलाने लगती है।
मैं
मना करता हूं
तो सीधे कुछ किताबें उठा
पढ्ने लगती है,
मुझे दिनभर की
बातें बताती है।
और जब देखती है कि
मैं हंसा तो
झट उठ कर भाग जाती है।
या फिर
कह उठ्ती है-
पापा
चलो आपको घुमा लाऊं।
मैं पूछ्ता हूं
कहां?
तो कहती है
कहीं भी बाहर,
जैसे मार्केट-वार्केट
होटल-वोटल,
मेरे लिये कुछ
खरीद वरीद लेना
कुछ खा-वा लेंगे
और क्या।
मैं हंस देता हूं और
प्यारी सी चपत
देते हुए
कहता हूं
शैतान।
बस यही तो है
जीवन के सुख।
सोमवार, 7 सितंबर 2009
और सुबह हो गई
निर्मोही दोपहर को
धकेलते हुए
मेरे आंगन में
प्रवेश किया
और मुझे
चांदनी सौंप
खुद धीरे से
खिसक गई।
-आसमान पे चढ
आंखे फाड कर
ढूंढ रहा है चांद,
किंतु रात के मदभरे
सन्नाटे में
नव वधु की तरह
चांदनी सकुचाते हुए
मेरे अंक में
समा गई।
-सांय-सांय करती
मेरे बंद कमरे के
दरवाजे-खिडकियों पर
लात मार
दस्तक देती
चिल्ला रही है हवा,
लौटा चांद की चांदनी।
पर स्म्रतियों की
सुरा पी चांदनी
मेरे संग नशे में
खो गई।
-स्वप्न मधुबन मे
बिछी तारों की सेज़ पे
मेरी देह से लिपटी
मखमली स्पर्श
और प्रेम के परम सुख्
का रसास्वादन
देती चांदनी,
लो समर्पित
हो गई।
-ना देह की सुध रही
ना दीन-दुनिया की,
जब पक्षी चहके और
भौर की किरण ने
दरवाजे की दरार से
लुढक कर
मेरे कमरे में प्रवेश किया,
तो चांदनी के चेहरे पर
देखो कुटील हंसी
छा गई।
-मेरे गाल पे
चूमते हुए वो उठी
धीरे से बोली
सिर्फ 'चांद' ही दागदार नहीं है,
और न सिर्फ 'चांदनी' ही
परगमनिया है,
अब तुम भौर की
किरण को
सम्भालो, ऐसा कह
वो गई।
-कुछ समझ पाता
इतने में
आंखों में समा गई
किरण,
चादर की सिलवटे मिटा
चांदनी को विदा
किया ही था कि
धम्म से पलंग पर
अब किरण
पसर गई।
-और सुबह हो गई।
गुरुवार, 3 सितंबर 2009
आग सिर्फ भस्म करती है
आग लगा दी,
मेरे तन में भी और
अपने तन में भी।
अब जलो...।
ये पद-प्रतिष्ठा की
प्रदक्षिणा,
खोने-पाने की
प्रतिस्पर्धा,
लूटने-खसोट्ने की
प्रलोभना,
बढती भूख का
प्रलाप,
प्राप्त प्रक्रुति का
प्रकोप,
चहूंओर सिर्फ और
सिर्फ आग का प्रमाण,
जलते रहो।
जीवन आग है,
जिसकी जितनी ऊंची
लपटें,
उसकी उतनी प्रतिभा।
जो जितना जला सके
उसका उतना प्रकाश।
जो ना जला सके
उसमे भी जलन,
वाह,
हर् कोई जल रहा,
इस दावानल मे।
आग सिर्फ
भस्म करती है,
भस्म।
चाहे जलो या जलाओ।
( ढेर सारे विचार गुत्थमगुत्था थे। मैंने उन्हें एकत्रित नहीं किया और उतार दिया। या यूं कहूं कि समय का अभाव है, और 'पोस्ट' करने की जल्दी। निश्चित रूप से बिखराव का आभास होगा। किंतु इतना तय है कि शब्दों के नेपथ्य में छुपा जीवन का गूढ् आपकी पैनी नज़रों से बचेगा नहीं।)
सोमवार, 31 अगस्त 2009
अगर तुम साथ दो

हौसला है मुझमें
पार कर लूंगा इस दर्द से
भरी बदरंगी नदी को,
उसकी आगत
उछाल मारती
लहरों पे नाचूंगा,
और इस चौडे दर्प से भरे
पर्वत को
चूर-चूर कर दूंगा
अपने कदमों तले,
अगर तुम साथ दो।
यूं तो क्षितिज कुछ होता नहीं
महज मरिचिका की तरह
प्रतीत होता है,
किंतु मैं
उस आकाश को
पकङ खींच लूंगा,
इस धरा पर ला पटकूंगा,
और यदि तुम
चाहो तो,
कदमों में तुम्हारे
उसे झुका दूंगा,
अगर तुम साथ दो।
जरूरी नहीं कि
प्रेम में करीब ही रहा जाए,
सांसो को आपस में
टकराया जाए,
अधरो की कंपन को
अधरों से मिटाया जाए,
मैं हवाओं के सहारे
आलिंगन कर लूंगा,
तुम्हें अपने अंतस में
बसा लूंगा,
अपनी गर्म सांसों को
सूरज की किरणों से मिला
तन तुम्हारा तर दूंगा
अगर तुम साथ दो।
गुरुवार, 20 अगस्त 2009
न जाने कब ?
पटा रख
उस पर आसन बिछा कर
बैठाती थी मां,
आरती उतार कर
तिलक लगा
ढेर सारे अशीर्वाद बुदबुदाती,
मुंह में मीठाई रख देती,
फिर चारों दिशा में
धोक (प्रणाम) दिला
पीठ पर हाथ धर
अपने भगवान से
मेरे लिये कितनी
दुआयें मांगती,
मुझे नही पता।
कहती
आज के दिन
कोई संकल्प लो
और अपनी कोई भी
बुरी आदत छोड दो।
उसके आशीर्वाद
लिये मैं
बढता रहा,
लडता रहा,
जीतता रहा।
मगर न कोई
संकल्प ले पाया
न बुरी आदतें छोड पाया।
अब
जब वर्षों से दूर हूं
हर बार 'आज' उनकी
ज्यादा याद आती है,
बहुत ज्यादा
बहुत ही ज्यादा
याद आती है।
यहां रहने की
कैसी मज़बूरी है,
और क्या ये जरूरी है?
पता नहीं।
सोचता हूं,
ज्यादा सोचता ही हूं कि
दौड कर चला जाऊं
उनके पास।
कम से कम 'आज़' के दिन।
फोन पर और उनके मन मे
हर-हमेश आशीर्वाद
रहते ही हैं,
पर आज़ का विशेष दिन है,
आज फिर वो मुझे अशीर्वाद देंगी
और संकल्प व बुरी आदत
छोडने को कहेगी,
मैं भी चाहता हूं
अब संकल्प ले ही लूं,
अपनी कोई बुरी आदत
छोड ही दूं,
उनके साथ रहने का संकल्प
और छोडने में
मुम्बई रहने की
बुरी आदत।
किंतु...
न जाने कब
मेरी ये मुराद
पूरी होगी?
न जाने कब?
( जब घडी में रात के 12 बजे थे यानी 19 अगस्त शुरू हो गया था कि फोन की रिंग चहक उठी। मेरी अज़ीज़... ममता की बधाई, फिर तुरंत सुशील छोक़्कर जी की शुभकामनायें...सुधीर महाजन का एसएमएस.....मेरे इस दिन को खुशनुमा कर गये। घर से माता-पिता-बहन-भाईयों के आशीर्वाद प्राप्त हुए जो मेरी शक़्ति हैं।
मेरी बिटिया अपनी मम्मी के साथ एक दिन पहले से इस दिन की तैयारी में लग जाती है। बिटिया के लिये तो मानों कोई उत्सव हो। मुझसे छुपाकर अपने हाथों से ग्रीटिंग बनाना, मेरी जरूरत के हिसाब से कोई गिफ्ट लाना, और सोकर उठूं इसके पहले मेरे कान में अपनी आवाज़ में रिकार्ड की हुई बधाई लगा देना....., फिर ग्रीटिंग ...फिर गिफ़्ट..फिर मीठाई....फिर...., सच तो यह है कि माता-पिता के आशीर्वाद ही इस रूप में फलते हैं। और जब कोई मुझसे पूछ्ता है कि जीवन में तुमने कमाया क्या? तो मैं अपने अज़ीज़, मित्रों के नाम ले लेता हूं, यही सब तो मेरी पूंजी है।)
गुरुवार, 13 अगस्त 2009
कौन दे गया शाप
" न बाढ
न चिलचिलाती धूप
न कोई आकाल
न कोई भूचाल।
न खबर
न आतंक
और न ही कोई आहट,
बस, चुपचाप-दबे पांव
धडाम से फट पडा
खौफ का बादल,
टूट पडा
कोने-कोने पसर गया।
हाय,
शहर मेरा फिर डर गया।
शरारत
अणु से शैतान की,
जो फैला गया
शंका, शक़ और शोक।
वो प्रेम मिलन
होठों का चुम्बन
गलबहियां
सब शूल बन गई,
चुभने लगीं।
दूर होने लगे
लोग आपस में
शनै-शनै,
बहने लगी
बदहवासी।
हाय,
शहर में मेरे बसने लगी खामोशी।
हां,
नथूनों से होकर
गले में घुस
सीधे मस्तिष्क पर
करता वार।
लाचार, बीमार
बिलखता परिवार
परेशां सरकार
करती उपचार।
फिर भी
बढता जाता है ताप,
भोग रहे बच्चे, बूढे और जवान
न जाने किसका पाप?
हाय,
शहर को मेरे कौन दे गया शाप।"
मंगलवार, 11 अगस्त 2009
हाज़िर हूँ जनाब
बीमार मन आखिर क्या लिख सकता है? किंतु हां, इस अवस्था का भी अपना अनुभव होता है और जो सबसे अलग होता है। मुझे लगता है ये अवस्था खुद को देखने के लिये सबसे बेहतर अवस्था है। हम कम से कम ये तो जान लेते हैं कि हमारा 'शरीर' भी है। अन्यथा इतने व्यस्त जीवन मे इस शरीर का भान रह ही कहां पाता है? वैसे शरीर है तो रोग भी हैं। पर ईश्वर से यही दुआ करता हूं कि किसी को भी रोगी न होने दे। आदमी की सारी रचनात्मकता रोग की वजह से रुक जाती है। कैसा भी रोग हो, आदमी तो भुगतता ही है साथ ही साथ उससे जुडे लोगों को भी वो परेशान कर देता है। मुझ जैसा व्यक्ति कुछ ज्यादा सोचता है,पर यह भी उतना ही सच है कि बीमारी में आदमी जीवन के कुछ ज्यादा करीब चला जाता है। तब उसे नज़र आता है अपने आसपास का माहौल। कभी कभी वो स्वयं को बहुत बौना समझने लगता है और दुनिया उसे बहुत बडी दिखाई देने लगती है। उसे लगता है..जिस दुनिया को उसने अपने तलवो के नीचे दबाये रखने का घमन्ड पाला हुआ था ऐसा यथार्थ में है नही। सारे लोग उसे अपने से लम्बे..आदमकद जान पडते है। आकाश ऐसा प्रतीत होता है मानो उसे बस निगलने ही वाला है। धरती पर पैर रखने मे घबराने लगता है। वो खुद एक बौना, असहाय सा जान पडता है। यानी बीमारी में आदमी अपनी अस्लियत को बहुत करीब से देखता है। मैं तो सम्भल जाता हूं..इसलिये कि कुछ याद आ जाता है जो दिल को तसल्ली दे जाता है, अब देखिये न, जौक़ साहेब ने शायद मुझ जैसों के लिये ही तो यह लिखा होगा कि-
'देख छोटों को है अल्लाह बडाई देता
आस्मां, आंख के तिल में है दिखाई देता'
खैर.. ठीक हो रहा हूं, जल्दी ही अपने छूटे हुए खास ब्लोग्स पर भ्रमण करुंगा। इन दिनो मगर मज़ा भी रहा, अपनी कुछ यादों में सफर कर आया, तो बहुत कुछ आत्मिक अनुभव भी प्राप्त किये। ये समय खुद के लिये बना होता है शायद, खुद को पहचानने के लिये। जब आप अपने कामकाज से दूर, बस अपने बारे में सोचते होते हैं। लगता तो ये है कि डोक्टर कहता भी इसीलिये है कि- कम्प्लीट्ली रेस्ट लो। जो भी हो, इस अज़ीब से रेस्ट' का मज़ा भी है। हालांकि ये मेरे मानने से थोडा परे हट कर है ,मेरा मानना है कि व्यस्त रहना ज्यादा सुखकर है। आप अकेले पडे नहीं कि तमाम तरहो की बातों मे दिमाग उलझने लगता है। व्यस्तता बान्ध कर रखती है, अच्छी नींद देती है और आपको अपने उद्देश्य की और हमेशा अग्रसर रखती है। पर बीमारी में? उफ्फ, इंसान की फितरत भी क्या चीज़ बना दी। खैर.. वो शायर 'मुश्फिक' का शे'र है न कि-
' इंसा भी मसीयत का अनमोल खिलौना है
हर खेल का आखिर है और खेल भी होना है'
जनाब मुश्फिक़ से शायद आपका परिचय नहीं होगा, इनके बारे में कभी लिखुंगा जरूर, कमाल के शायर थे, फिलहाल इस अनमने लेखन को झेलिये, दरपणजी का बुलावा मैं टाल नहीं सकता था इस्लिये जो मन में आया वो लिख दिया। उन्हीं को समर्पित-
"लो सूरज भी डूब गया
बेचारा दिन ऊब गया
मटमैली सी ये
शाम का पल्लू झट उलट गया।
'साथी' की मुस्कुराहट लिये
लो खिल आई चांदनी
रात की गोद मे बैठ
'उसके' लिये मैं कुछ लिख गया।
सोमवार, 27 जुलाई 2009
कारगिल की कसक
महाराष्ट्र और इसके आसपास शहीदों के परिवार, उनका परिवेश, गांव आदि का सम्पूर्ण ब्यौरा कैमरा टीम अपने कैमरे में कैद करती, साक्षात्कार लेती और मैं उन्हे देख कर, पढ कर कमेंट्री लिखता। उफ्फ, बहुत कठिन और असहनीय कार्य था। इसके पहले कई व्रतचित्र लिखे, कई कहानियां लिखीं कभी इतना कठिन नहीं लगा। मैरे शब्द गुम हो जाते, मेरा हाथ ठिठक कर रुक जाता। किंतु मैं किससे कहूं? एक अति सम्वेदनशील और अति भावुक व्यक्ति तमाम द्र्श्य और कल्पनायें कर सिवाये कन्धे झुका, सिर और गर्दन को अपने घुटनों में फंसा कर उकडू बैठ रो लेता। दीवारों पर घूंसे बरसा देता। चट्टानों पर जोर से पैर पटकता। सरकार की निर्वीयता पर झीकता। वैसे आज भी हालात जस के तस हैं। क्या बदलाव आया? कौनसी अत्याधुनिक सुविधाओं से हमारे वीर सैनिक लैस हो गये हैं? राजनीति ने कौनसा तीर मार लिया है? कौनसी प्रशासनिक श्रद्धाजंलि स्वर्ग में बैठे शहीदों के गले उतरती है? चारों तरफ ढ्कोसले ही ढकोसले, मुर्दुस चेहरों से लिपी-पुती बयान बयार ही तो बह रही है। विजय दिवस के नाम पर नेतागण औपचारिकतायें ही तो पूरी करते है। ओह, सत्य कैसे लिखुं? फिर आंखे नम होती जाती है। और अफसोस अटटाहास करते हुए दिल्ली के लाल किले की प्राचीर पर चढ विराज जाता है। हम उन शहीदों के प्रति कभी ईमानदार हो सकते हैं? हम उनके बलिदान को सही अर्थों में कभी साकार कर सकते हैं? फिलवक्त ऐसा होना दूर की कौढी नज़र आता है। खैर।
मुझे लिखना ही था। कभी फूट-फूट कर रो लेता तो कभी आंसू आंखों में कैद कर चुपचाप शब्दों को आकार देता। शब्द भी पूर्ण सत्य कैसे हो सकते थे? क्या मैं किसी शहीद के आंगन में बिखरी गर्वीली विरानी को लिख सकता हूं? क्या उस मां के दर्द को हूबहू उकेर सकता हूं, जिसकी गोद में कभी वो जवान किलकारियां मार हंसता था? क्या उस पिता के गर्वीले चेहरे के पीछे छुपी पीडा को लिख सकता था, जिसके कन्धों पर चढ कर ही शायद उसने बर्फीली पहाडियों को फान्दना सीखा था? जिसकी उंगली पकड कर गांव की गली नुक्कड पर मदमस्त हो वो नाचता फिरता था? क्या घर के उन कोनों में छिपी पीडादाई कमी को सचित्र कर सकता था जहां कभी उसके कदमों की आहट और उसके होने के भाव बिखरे पडे थे? क्या उस बहन की वेदना लिपिबद्ध कर सकता था जो बाज़ार में सज़ी राखी की दुकानों पर बहनों की भीड तो देखती है पर खुद राखी नही खरीद पाती? क्या मैं उस औरत के घूंघट के अन्दर आंसुओं से भीगा चेहरा लिख सकता हूं जिसे अभी कल ही तो वो कह कर गया था तेरे इस जन्मदिन पर साडी जरूर लाकर दूंगा? क्या आंगन में खेल रहे उस छोटे बच्चे की अनभिज्ञता को लिख सकता हूं जिसकी किलकारी से अब घर खुश नही बल्कि दुखी होता है कि काश वो इसे देख पाता? नहीं मैं कुछ भी लिख नही सकता था। मेरी हालत तो उस पिता के समान थी जिसके चेहरे पर देशाभिमान और बेटे के खोने का गर्व तो था किंतु अन्दर ही अन्दर उसकी कमी का जो ज़ख्म था, जो दर्द था वो चाह कर भी उसे ना तो व्यक्त कर पाता ना ही जी खोल कर रो पाता। क्या मैं इस अनुभव को इस आंतरिक पीडा को शब्दाकार दे सकता था? हाँ, लिख लेता यदि मैं इस परिवेश की सिर्फ कल्पना करता। अपनी नंगी आंखों से मैने सच देखा है। बहुत करीब से दर्द का अनुभव किया है। और जब बाहर की दुनिया में पैर रखा तो सिर्फ यही पाया कि इस जंग के बाद, शहीद हो जाने के बाद हाथ आता क्या है? सिर्फ यह जो मैने देखा? सोचता हूं आखिर जंग किसलिये? क्या दिल्ली के तख्तोताज़ पर बैठे लोगो के भाषणों के लिये? खैर। डाक्युमेंट्री बनी, डीडी वन पर प्रसारित भी हुई। मगर उसमे आने वाले मेरे नाम ने मुझे सुख नही दिया। जैसा किसी अन्य शार्ट फिल्मों या धारावाहिक में आया देख में खुश हो जाया करता था। कुछ कर गुजरने की मेरी लपलपाती इच्छा को विराम आज तक नहीं मिला है।
ज़ौक साहब का शे'र आज़ भी उसी हालात को बयां करता है जो उन दिनो थे-
" रात ज़ूं शमअ कटी हमको जो रोते रोते
बह गये अश्को में हम सुबह होते होते"
मेरा सैल्यूट अपने देश के सैनिकों को। मेरे आंसू किसी कायरता के प्रतीक कभी नही रहे, बल्कि वो तो सिर्फ इसलिये बहते रहे कि उन सैनिकों के सामने मैं नही आ सका जिनके सीने मे गोलियां धंस गई। कारगिल की कसक आज भी है। आज हालात दूसरे रूप में सामने हैं। शहीद होने का क्रम भी बना हुआ है। और दिल्ली में ???????
शुक्रवार, 24 जुलाई 2009
उधडन
कोई कमीज़ थी एक
शानदार कलप लगी
इस्त्री से सज्ज
दमकती हुई।
समय के कांटे में
उलझ वो
कहीं से उधडी तो
धीरे-धीरे उधड्ती चली गई।
उसकी बाहें अलग-अलग हो
कहीं बह गई,
जेब कहीं जाकर जम गई,
कालर डालर की
आड में खडी हो गई,
बटनें टूट कर
छिटक गई,
पिछ्ला सपाट हिस्सा
पीठ दिखा दूर हो गया,
अग्र भाग के दो हिस्से
वैसे भी बटनों से
एक होते थे किंतु अब
वे सिर्फ फड्फडाते
मिलने की आस में
बस कभी-कभी टकरा जाते हैं
फूट-फूट रोते हैं।
मैं सोचता हूं
सब को एकत्र कर
तुरपई कर दूं,
उसे फिर कमीज़ का
आकार दे दूं।
किंतु
न तो मेरे पास
मज़बूत धागा है
न वो सुई
जिसकी चुभन को
सहते हुए भी
एक होने का भाव
इस कमीज़ को कभी
गर्व महसूस कराता था।
अब तो यह
उधड गई है,
बिखर गई है,
बदली हवा के झौकों में
बह कर उसके भाग
इतनी दूर हो गये हैं
कि ढूंढना मुश्किल,
एक करना मुश्किल।
और
मज़ा देखो कि
बिखरे, उधडे,
फटे,चिथडे होने के बावज़ूद
जिस पर अब वो
'टुकडे' गर्व करते हैं
21 वीं सदी ने उसे
एक ब्रांड नाम भी दे दिया-
"न्यूक्लियर फैमेली"
गुरुवार, 16 जुलाई 2009
तर-ब-तर मुम्बई, दर-ब-दर मन
मुम्बई भीग उठी। सबसे पहला असर यातायात पर पडता है, सो लोकल ट्रेनें अनियमित, सड्कों पर ज़ाम, उपर से बरसात, नीचे भरे पानी से मुश्किलें आम। मैं भी अपने दफ़्तर, जो कि अपने घर से पौने दो घंटे की दूरी पर है, चार घंटों मे पहुंचा। तरबतर वातावरण में नौकरी पर जाना सिवाय मज़बूरी के और कुछ नही होता। वैसे भी इन नौकरियों मे अब इंसानियत खत्म हो चुकी है। कौन कैसे आ रहा है? कितनी मुसीबतों में? क्या-क्या जतन करके? किसे फिक्र? क्या करे बोस को काम निकलवाना है, 'उपर' उसे भी बताना है। सो कर्मचारियों कि ऐसे हालात मे पूछ कर लेना उनके लिये मुसीबत बन सकती है इसलिये कोई मानवता नहीं सिर्फ नौकरीयता। यानी आप चाहे इस बारिश मे मुश्किलों मे फंसे हों या दफ्तर नही पहुंच सकते, उन्हे इससे कोई मतलब नहीं। आपको आना है तो बस आना है। बेचारा कर्मचारी॥जाता है। अब प्रशासन चेताता है, एसएमएस करता है कि आवश्यकता हो तब ही घर से निकलें...। हास्यास्पद नही लगता ये? वैसे देखा जाये तो अब मुम्बई हास्यास्पद ही ज्यादा हो गई है। यही मज़ा है। इसे आप बारिश का मज़ा कह लीजिये या मौसम की मार का, जो भी हो मुम्बई मे मानसून का अपना ही मज़ा है। सागर किनारे उसकी उत्ताल लहरों से भीगना, गरमागरम भुट्टों पर नमक-नींबू लगवा कर खाना, कभी चाय की चुस्की तो कभी वडा पाव का मज़ा। कुछ आवारा हो जाने का मन करता है। कभी तो लगता है पानी भरी सडक पर दौड लगा दूं, जोर से चिल्लाते हुए भागूं। हो हो ..$$$$$,,,,,,। आते जाते लोगों को छेड्ते हुए निकल जाऊं..बस आज़ाद पंछी की तरह ..कोई तनाव ना हो, कोई काम ना हो...बस हो तो ये बरसता हुआ आसमान और मैं....। किंतु....मुश्किल है अब। खासतौर पर मेरे लिये, या मुझ जैसे इंसानों के लिये जिसे पद-प्रतिष्ठा के फेरे मे फंसे छटपटाते ही रहना है। आह, कैसी बनावटी जिन्दगी? खैर..। पर मन तो चौकडी भरता ही है। बारिश के साथ भीगता ही है। बंजर सी हो चली स्म्रतियों की ज़मीन को खाद पानी मिल ही जाता है। फिर कोपलें फूट पडती हैं, फिर एक एक कर यादें बाहर निकल आतीं हैं। तन-मन सब तर हो जाता है। ऐसे में शब्द किसी गीत की रचना करते हैं या कोई कविता की। कुछ इसी तरह के आलम में चंद पंक्तियां रचा गई।
" घुमड-घुमड के बादल आये
सावन बरसे, मन तरसाये।
दिल में छुपी बतिया को जगाये,
कैसे अब हम मन समझायें॥
घुमड-घुमड के .......
झूले पडे हैं डाली-डाली
रुत भी कितनी है मतवाली।
चारों ओर खिली हरियाली
फिर भी मन है खाली-खाली॥
घुमड-घुमड के..........
भीगी आंखे, भीगा तन है
लागी कैसी ये अगन है।
क्या कभी होगा मिलन है?
दूर बहुत मेरे सजन हैं॥
घुमड-घुमड के.......
तेरे लिये मैं रूप संवारूं
टक-टकी बांधे राह निहारूं।
ओ निर्मोही तूझे पुकारूं
मादक पल ये कैसे गुजारूं?
घुमड-घुमड के बादल आये
सावन बरसे, मन तरसाये॥
शनिवार, 11 जुलाई 2009
अफसोस
वो
मेरी चिंता में
दुबली हो चली है।
किसी अज्ञात भय से
घिरी दिनरात वो
मेरे कुशल क्षेम के
लिये अपने भगवान से
मनौतियां मांगती रहती है।
और फोन पर
मेरे हाल चाल जान
उसका अपने भगवान पर
विश्वास और द्रढ हो जाता है।
वो कुछ और मनौतियां
व्रत जैसे उपक्रम कर
मेरी स्वस्थ कामना मे रत हो जाती है।
उसका
प्रतिदिन होता है
कुछ इसी तरह......
2-
मैं
अपनी चिंता में
बहुत कुछ भूल चला हूं।
पद प्रतिष्ठा के फेरे में
दिनरात उठापटक
इसका-उसका करता
रहता हूं।
अपने दमकते
आभामंडल को अपनी
जीत मान
इतराता फिरता हूं।
उसके फोन मेरे काम
मे अड्चन डालते हैं,
मै ठीक हूं इसका टेप लगा
व्यस्त हो जाता हूं।
मेरा
प्रतिदिन होता है
कुछ इसी तरह.....
3-
अफसोस
आखिर क्युं नही
समझ पाते
हम बेटे,
अपने पीछे की
उस अद्रष्य शक्ति को
जो उनकी तमाम हार को
जीत मे तब्दिल कर
उन्हें इतराने का
मौका देती रहती है.......
मंगलवार, 7 जुलाई 2009
फिर मुस्कुराने के लिये
साथ ही आप सबके गुरुओं को मेरा स-आदर चरण् स्पर्श।
" जिनके चरणों मे झुका ये शीश है
पिता ही मेरे गुरु, मेरे ईश हैं,
है ये सौभाग्य मेरा कि मेरे
कदम-कदम उनके आशीष हैं.. "
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"मुस्कुराते हुए
चेहरों के
नेपथ्य में जो
'खेल' रहे दर्द हैं
उनसे मेरी प्रियता है,
मैं इनके साथ
विचरता हूं, झूमता हूं
गाता हूं, जीता हूं।
इनके मौन प्रदेश में
गज़ब की विरानी है
सन्नाटा है।
यहां
सांय-सांय चल रही
हवाओं में घुली
गमगीन मदहोशी है,
तो निछ्चल-पावन-निरापद
गंगा की तरह बह रही
अश्रु सरिता है
जिसमें डुबकी लगा
मैं तर जाता हूं।
इस स्थल की भूमि
कठोर नहीं, बेहद उपजाऊ है
नरम,मुलायम,संवेदनशील।
यहां विरह अग्नि के
तमतमाते सूर्य से
ऊष्मा ले खिलने वाले
पुष्पों पर बैठ रहे
आस व प्रतिक्षा के
भौरों की गुनगुनाहट
ह्रदय के स्पन्दन को
थामे रखती है।
मैं प्रतिदिन इन दर्दों को
संवारता हूं, सजाता हूं
और तैयार करता हूं
दुनियाई मंच पर
पेश करने के लिये
एक के बाद एक
नाटक के मंचन के लिये
फिर मुस्कुराने के लिये। "
शनिवार, 27 जून 2009
डांस 'ब्रेक'
बात बहुत पुरानी है, जब मै कालेज का छात्र हुआ करता था. उन दिनो हमारा शहर आधुनिकता मे बहुत पीछे था, पास ही इन्दोर जैसा बडा शहर जरूर था किंतु हमारे शहर मे उसकी हवा बहुत बाद मे पहुचती थी. मुझे फैशन भाती थी, कुछ नया करने व करते रहने की धुन बलवती रही. मै जानता हू उन दिनो घर की माली हालत. ऐसे मे मैरे शौक पूरे होना सम्भव नही थे, मुझसे बडे भाईसाहब की नौकरी जब मुम्बई मे लगी तो उनके माध्यम से मेरे पहनावे इत्यादि के शौक भी पूरे होने लगे.यानी मुम्बइया होने लगे. घर मे यदि फैशन आई तो सिर्फ मेरी ही वजह से, और ये भी यकीन के साथ कह सकता हूं कि शहर मे भी मै ही नई फैशन लाया था. दरअसल सिर्फ पहनावे से ही नही बल्कि मुझे हमेशा से ही आकर्षक दिखने की ललक रही थी, और इसके लिये मै खुद ही कुछ न कुछ ऐसा किया करता था कि वो सबसे अलग हो. उन दिनो फेशन का एक्मात्र स्त्रोत सिनेमा हुआ करता था, जबकी सिनेमा ने मुझे कभी अपनी ओर लुभाया नही. आज भी फिल्म से बहुत दूर हूं, हीरो-हीरोइने मुझे आकर्षित नही करते, फिर भी पता नही क्यों मेरे अन्दर अच्छा दिखने की ललक रही थी. खैर.. 'हिप्पी पना' न पिताजी को अच्छा लगता था न मां को. पर इतना जरूर कहूंगा कि मुझे कभी किसी ने रोका नही, शायद मै बहुत लाड का रहा. मेरे शहर मे उन इक्के दुक्के लोगो मे मै भी शरीक था जिन्हे बेहतरीन फेशनेबल कहा जाता था. दोनो भाई मेरे लिये मै जैसी मांग करता, वैसे परिधान लेकर आते,, 'ज़िंस' का शौकीन था, आज भी हूं, आज हालत ये है कि 'ज़िंस' पैंट के अलावा मुझे दूसरा कोई कपडा अच्छा नही लगता. किंतु तब 'ज़िंस' पैंट पहनना या खरीदना कठिन था. बावजूद इसके एक दिन जब पिताजी ने किसी व्यक्ति के माध्यम से 'जिंस' का कपडा बुलवाया तो मुझे हैरत हुई थी. मैरे लिये पिताजी की और से 'जिंस'?? वो पहला 'जिंस' का पैंट था, जिसे अपने मित्र बने टेलर से सिलवाया था, टेलर भी मुझसे खुश रहता क्योकि मै उससे अपने अन्दाज़ मे कपडे सिलवाता फिर वो उसी अन्दाज़ के ओरों को सिल के देता. बहरहाल वो जिंस का पैंट मेरे लिये बहुत कीमती था. कालेज मे मेरा जिंस पहनना भी एक अलग ही शान थी. शौको मे फेशन ही नही गीत-संगीत भी था. खेलकूद तो मुझे मानो विरासत से मिला ही था. मैं सोचता हूं यदि शहर पिछ्डा हुआ नही होता तो उन्नति के नाम पर बहुत कुछ पा जाता. विशेषतौर पर मेरे बडे भाई, जो टेनिस और टेबल-टेनिस के उन दिनो राज्य के बेहतरीन खिलाडी हुआ करते थे. खैर... बांसूरी बजाना, सिंथेसाईज़र बजाना मेरे शौक थे और ये शौक पूरा करते थे मेरे मुम्बई वाले भाई साहब. तब एक दिन मुझे ज्ञात हुआ कि कोई मायकल जैक्सन नामक प्राणी भी है जो गाता और नाचता जबरदस्त है. बस फिर क्या था, मुम्बई वाले भाईसाहब से पूछा, और उन्होने मुझे जैक्सन की कुछ किताबे व कैसेट भिजवा दी. तब मेने जाना जैक्सन को. फिर क्या था, मेरे शहर मे जैक्सन और उसका ब्रेक डांस अपने दोस्तो के माध्यम से फैलने लगा. मै उसकी दो कैसेट 'बेड' और 'थ्रीलर' बजाता, डांस करता. यकीन मानिये कुछ स्टेप तो मै बहुत ही जानदार करने लगा था. पर ये सब अपने घर मे पता नही चलने दिया था, क्योकि डर था कि डांट पडेगी. हमारे शहर मे विशेष दिन जैसे गणेश उत्सव, नवरात्रि आदि पर खूब कर्यक्रम होते थे, कालेज के गेदरिंग तो थे ही, जिनमे मेरा हिस्सा लेना जरूरी होता था. इधर ब्रेक डांस जैसी नई विधा से शहर अभी परिचित नही हुआ था. एमपीईबी मे ऐसे ही एक उत्सव मे सांस्क्रतिक कार्यक्रम था, मुझे याद है मै उस दिन बीमार था, घर पर आराम कर रहा था, एक दोस्त ने मुझे बताया कि अमिताभ् तुम्हे वहां डांस करना है और वो भी तुम्हरा नया डांस.. मै मना नही कर पाया. शाम हुई, रात आठ बजे से कार्यक्रम शुरू होना था. इधर मुझे किसी भी तरह जाना था, मगर बुखार ने रोक रखा था. फिर भी ठीक होने, अच्छा लगने का झूठ बोल कर थोडा बाहर घूम आने की इच्छा मां से व्यक्त की. जवाब मे 'ना' ही था. दीदी को पटाया.और किसी तरह एक झोले मे जिंस पैंट, टी शर्ट, कमीज़ डाल कर भाग निकला सीधे एमपीईबी. ऐलान हुआ. मै जल्दी तैयार होकर स्टेज़ पर जा पहुंचा. कैसेट थ्रीलर की थी, जिसका कोई गाना जिसमे म्यूजिक ज्यादा था, बजना शुरू और मैरा थिरकना भी. तालियो की आवाज़ से मेरा बुखार हवा हो चुका था. जब डांस खत्म हुआ तो ' एक बार और, एक बार और की आवाज़े कानो मे पड रही थी..किंतु मुझे तो जल्दी घर भागना था अन्यथा डांट मिलती. मै घर पहुच गया था. सोचा मम्मी-पापा को पता नही चला है. वाकई पता नही था. वो तो दूसरे दिन पापा को शहर मे फैली मेरे डांस की चर्चा से ज्ञात हुआ. इधर मेरे दोस्त ने बताया था कि तूने बहुत अच्छा डांस कर दिया भाई..पर मुझे भय था कि पापा को पता चल गया होगा और अब डांट के लिये तैयार हो जाऊं. पर जब पिताजी घर आये तो कुछ नही बोले..मुझे लगा उन्हे पता नही चला है. मायकल जैक्सन की बुक उठा कर उन्होने मुझसे इतना ही कहा कि पढाई भी जरूरी होती है.
कहने का मेरा तात्पर्य यह है कि मायकल जैक्सन का बुखार तब से मुझ पर था, किंतु बाद के दिनो मे समय बदला, नौकरी की आपाधापी और भागादौडी ने मैरे तमाम शौको पर स्वतः ही ज़ंज़ीरे जकडना शुरू कर दी, और समय की रेत मे मेरा वो अलमस्त जीवन भी दबता रहा. मुम्बई आ गया, परिवेष बदला, भाषा बदली..रहन-सहन बदला. सोचने- समझने की शक़्ल बदली. गम्भीरता ने उस काल के उत्साह को हरा दिया. मै अपने कार्यो मे व्यस्त हो गया. पत्रकारिता के संघर्ष मे खुद को झोंक दिया. क्योकि यही जरूरी था. गाना-बजाना-नाचना सब बंद. एक अलग 'अमिताभ' बन गया.
मुझे पता चला कि शिवसेना मायकल जैक्सन को मुम्बई आमंत्रित कर रही है। बस उसे देखने-मिलने की इच्छा और उसके होने की याद 6 सालो बाद फिर कुलाचे मारने लगी. 30 अक्टूबर 1996 का वो दिन था, जब मेरा हीरो मुम्बई मे मुझे साक्शात दिखने वाला था. वो आया. मैने देखा, मिला. और मह्सूस किया कि आज भी अपने शहरवासियो से पहले उसे मेने देखा, जिसके नाम से मै चर्चित हुआ था कभी. दुनिया को जिसने अपने गीत संगीत से झूमने पर मज़बूर कर दिया हो ऐसा व्यक्ति साधारण तो हो नही सकता॥सचमुच जैक्सन साधारण नही था. उसका महज़ 50 वर्ष की आयु मे चला जाना मुझे अटपटा सा लग रहा है. मै जानता हूं मेरी तरह इस देश मे भी कितने होंगे जिन्हे जैक्सन भाता होगा..../ ऐसे जादूगर को कौन भूला सकता है.
शुक्रवार, 19 जून 2009
असल साहित्य क्या है ?
गौतमजी के ब्लोग पर राजेन्द्र यादव के प्रति स्वस्थ आलोचना मन को भायी, स्वस्थ आलोचना साहित्य को तराशने का काम करती है/ हालांकि राजेन्द्रजी जैसे जीव का पाचन तंत्र कितना बलिष्ठ है इसका पता नही किंतु साहित्य के 'आका' कहलाने का उनका मोह 'हंस' मे दीखता है/ उनका साहित्य और साहित्य के लिये उठा पट्क वाला जो आभा मन्डल है वो उन लोगो की आंखे भले ही चौन्धीयाता रहे जिन्हे उनसे स्वार्थ हो, मेरी आंखो मे वे और उनका सहित्य कभी आकर्षण का पात्र नही बन सका। अपना अपना द्रष्टिकोण ठहरा. सौभाग्यवश मेरी उनसे कभी मुलाकात नही हुई, दुर्भाग्यावश मेने उनकी कुछ रचनाओ को पढा है। खैर जहा तक बात कहानी को ही साहित्य मानने की है तो मै इसे ठीक नही मानता। साहित्य की उपज राग से है, राग पध्य रूप मे ज्यादा स्पष्ट होता है। लिहाज़ा साहित्य का जन्म ही मै पध्य से हुआ मानता हू/ आप यदि गम्भीरता से विचार करे या साहित्य की मूल गहराई मे उतरे तो पहले काव्य के रूपो को जानने व समझने के लिये थोडा पाश्चात्य व भारतीय परम्परा को खंगाल लेना आवश्यक है। काव्य के भेदो मे यूरोपीय समीक्षको ने व्यक्ति और संसार को प्रथक करके काव्य के दो भेद किये है, एक विषयीगत दूसरा विषयागत. विषयीगत यानी सब्जेक्टिव, जिसमे कवि को प्रधानता मिलती है और दूसरा विषयागत यानी आब्जेक्टिव जिसमे कवि के अतिरिक्त शेष स्रष्टि को मुख्यता दी जाती है. यानी पहला प्रकार काव्य 'लिरिक' हुआ। यूनानी बाज़ा 'लाइर' से सम्बन्ध होने के कारण इसका शाब्दिक अर्थ तो वैणिक होता है किंतु इसे प्रायः प्रगति या भाव- प्रधान काव्य कहते है। इसमे गीत तत्व की प्रधानता रह्ती है. दूसरे प्रकार के काव्य को अनुक्रत या प्रक्थनात्मक कहा गया है। महाकाव्य और खंड काव्य इसके उपविभाग है. किंतु पाश्चात्य देशो मे प्रायः महाकाव्य ही इस प्रकार के काव्य का प्रतिनिधित्व करता है. वहा खंड काव्य जैसा कोई विशेष उपविभाग नही है. ये विभाग पध्य के ही है। अब यदि गध्य की बात करे तो इसके विभाजन मे गध्य काव्य की महिमा है. जहा भाव-प्रधान काव्य मिलेगा. और उपन्यास महाकाव्य का तथा कहानी खंड्काव्य का प्रतिनिधित्व करेगा/ गद्य मे निबन्ध, जीवनी आदि अनेक ऐसे रूप है जिनको इस विभाजन मे अच्छी तरह बान्ध नही सकते. पर गध्य काव्य के शेत्र से बाहर नही है। गद्य का उलट ही पद्य है. जिसको आप अंगरेज़ी मे (Verse) कहते है।
आप जानते है कि भारतीय परम्परा मे नाटक को प्रधानता मिली है। जो काव्य अभिनीत होकर देखा जाये तो द्रष्य काव्य है और जो कानो से सुना जाये तो श्रव्य काव्य कहलाता है। यध्यपि श्रव्य काव्य पढे भी जाते है। रामायण का उदाहरण लिया जा सकता है जिसे पढने व गाने के लिये उपयुक्त माना जाता है।
उपन्यास महाकाव्य का स्थानापन्न होकर और कहानी खन्डकाव्य के रूप मे गद्य के प्रबन्ध काव्य कहे जाते है। गद्य काव्य तो मुक्तक है ही, पत्र भी मुक्तक की कोटि मे आयेंगे. उनकी निबन्ध और जीवनी के बीच की सी स्थिति है। समस्त संग्रह की द्रष्टि से एक एक निबन्ध मुक्तक कहा जा सकता है। किंतु निबन्ध के भीतर एक बन्ध रहता है. ( हालांकि उनमे निजीपन व स्वछन्दता भी होती है) वैयक्तिक तत्व की द्रष्टि से गद्य के विभागो को इस प्रकार श्रेणी बद्ध कर सकते है, उपन्यास, कहानी ( काव्य के इस रूप मे उपन्यास की अपेक्षा काव्य तत्व और निजी द्रष्टिकोण अधिक रहता है.) जीवनी यह इतिहास और उपन्यास के बीच की चीज है। इसका नायक वास्तविक होने के कारण अधिक व्यक्तिपूर्ण होता है) निबन्ध (इसमे विषय की अपेक्षा भावना का आधिक्य रहता है) गद्य काव्य तो ये सभी रूप है। किंतु गद्य काव्य के नाम की विधा विशेष रूप से गद्य काव्य है।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो यह समझते है कि साहित्य कहानी या गद्य को ही कहा जाता है वे मेरी समझ मे ना समझ है। गद्य का जन्म ही कविता से हुआ है। मुझे अच्छा यह लगा कि गौतमजी न सिर्फ गज़ल या संस्मरण के महारथी है बल्कि वे वैचारिक स्तर पर साहित्य की परख करने से भी नही हिचकिचाते है। सम्भव है इसीलिये मुझे उनका ब्लोग रुचिकर लगता है।
बहुत दिन हुये मेने कोई रचना उकेरी नही.तो कोशिश करता हूं-
" मासूम हूं
इसलिये
छला जाता हूं,
हर बार बस
यू ही
अकेला
रह जाता हूँ ।
निजत्व जो है
नीरा पवित्र है,
किंतु, ठीक है
गंगा की तरह
मैला कर
दिया जाता हूं,
तो कर दिया जाता हूं।
अब वो माने
या ना माने
समर्पण करे
या ना करे
मुझे प्राथमिकता दे
या ना दे
मै तो उन्हे सिर्फ
प्रेम किये जाता हूं।
अपना लेखा-जोखा
पायथोगोरस का
सिद्धांत भी नही,
जितने जोड
बनाता हूं
उतने ही
घटाव किये
जाता हूं।
क्योकि
मासूम हूं।
हर बार
छलने के
लिये ही हूं। "
गुरुवार, 28 मई 2009
किसी बिरले को खो दे
आदमी जो कहता है
उसके अर्थ को अपने आस-पास के
परिवेश के कारण
बदल कर गाह्य कर लिए जाते है
और इस तरह शब्दों के
ईमान की हत्या हो जाती है।
शंकाओ के भेडिए
सच की लाश को
नोच-नोच कर खाने लगते है,
आदमी की आदमियत पर
और उसके स्नेह पर
जटिल मानसिकता आक्रमण
करने लगती है,
रिश्ते-नाते टूट कर बिखरने लगते है,
होता कुछ नही है
बस आदमी आदमी
नही रहता
उसका पवित्र नाता
किसी ग़लत फहमी के जाल में
उलझ कर तड़पता है।
बार-बार यदि वो अपनी
सफाई भी पेश करे
तो भी मन के अन्दर पेठी
विरूध्द भावना उसके रास्ते की
रुकावट बनती है,
और यह मान्य कर लिया जाता है
की जिस पर भरोसा किया
उसने, उसकी भावनाओ ने
सिर्फ़ लूटा या लूटना चाहा।
कैसी मानवता है ये ?
कैसी विचारशक्ति है ?
शायद इसी वजह से इस समाज में
प्रेम नही टिकता , नाते टूटते है,
रिश्ते बिखरते है,
और सात्विक हृदय की
पूछ नही होती,
उसे समझा नही जाता
और बहुत जल्द उसके ख़िलाफ़
एक घिनौनी मानसिकता
तैयार कर ली जाती है।
जबकि होना यह चाहिए की
किसी के प्रति कोई धारणा
बनाने से पूर्व
उसके सच को खंगालना
परम जरूरी है।
हम सबको एक द्रष्टिकोण से
नही देख सकते।
और यदि देखते है तो
हो सकता है
किसी बिरले को
खो दे।
बुधवार, 20 मई 2009
मन मत्स्य

जिस पर मन बार- बार फिसल जाता है,
फिसलकर भाव सरिता में बहने लग जाता है।
भावो की लहरों संग खूब तो उछलता है
डुबकिया लगाता है और किनारे आ-आ कर
साधु हृदय को चिढ़ाता है।
कभी बिल्कुल निरापद
तो कभी शैतान होकर
उसका चैन उडाता है।
खिलखिलाते नृत्यरत
ऐसे मन को क्या साधना?
किंतु
शब्द अपना जाल बुनते है
उसे पकड़ने के लिए स्याही के कांटे का उपयोग करते है।
और चारे की तरह अक्षर को कांटो में फंसा
सरिता में डालते है।
घंटो इन्तजार के पश्चात
अंततः झांसे में आ ही जाता है मन
अक्षर शब्दों के साथ पंक्तिबध्द
खड़े होकर मन को चीरने लग जाते है
फाड़ते है,
उसकी आजाद जिंदगी को
कविता के नाम पे
बलि चढ़ा दिया जाता है।
भुना जाता है और
काव्य जगत के बाज़ार में
परोस कर फ़िर
रसास्वादन होता है।
बेचारा मन मत्स्य ।
बुधवार, 13 मई 2009
मंगलवार, 5 मई 2009
मेरा जीवन सार तुम्ही हो...
तुमसे मिलने ओ एकांत,
बता कहां है मागॅ जहां से
मिलता माँ का वो प्रांत।
याद मुझे है सबकुछ किंतु
राह विस्मृत सी हो चुकी
विदा हो रहा था जब मै
थी अश्रुरत पलके झुकी।
ये समय का फेर था कैसा
कालचक्र से छला गया,
अपने हृदय धर तुमको
दूर कैसे मै चला गया।
संग दल-बल, बना महल
किंतु न कभी चैन मिला,
भीड़ में भी रहा अकेला
एक अदद न मीत मिला।
कहा तुम्हे था कि रोना मत
यदि ध्यान कभी मेरा आए,
पर मै यहाँ बिन तुम्हारे
रहा नित दृग नीर बहाए।
अपने हृदय पर रख पत्थर
था केसे तूने विदा किया,
मेरा मन धरने को तूने
विष बिछोह का पी लिया।
वर्षो संघर्ष में लिप्त रहा
पर नही मिला ठोर ठिकाना,
मिले जो जग के वैभव सारे,
झूठे है सब मेने जाना।
मेरा सुख साम्राज्य तुम्ही
मेरा राज वैभव तुम्ही हो,
गोद तुम्हारी, प्यार तुम्हारा,
मेरा जीवन सार तुम्ही हो। "
रविवार, 26 अप्रैल 2009
यादे
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शनिवार, 18 अप्रैल 2009
अधरों से मै पी लूं
गुरुवार, 9 अप्रैल 2009
ऐसे कैसे लोग ?
कार में अंगूठा सवार हुआ है,
चाट- चाट तलुवो को बने है
देखो सांठ गाँठ वाले लोग।
देश हमारा महान हुआ
शुक्र है चाँद से नज़र ना आते
भूखे नंगे फिरते लोग।
आदत पड़ी जो 'खाने' की ,
रिश्वत - घूस ठूंस ठूंस कर
सेठ कहलाते पेट वाले लोग।
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009
मुफलिस जी की कविता से प्रेरित होकर लिखने का मन हुआ। इसके पूर्व प्रख्यात रचनाकार विजय देवनारायण साही की कुछ पंक्तिया स्मृति में आ रही है, उन्हें जरूर लिखूंगा , जिसके अर्थ तथा गंभीरता की गहराई में जाकर मेरी सीधी व सपाट कविता के संग आप किनारे लग सकते है।
" सच मानो प्रिय
इन आघातों से टूट- टूट कर
रोने में कुछ शर्म नहीं ,
कितने कमरों में बंद हिमालय रोते है।
मेजों से लग कर सो जाते कितने पठार
कितने सूरज गल रहे है अंधेरो में छिपकर
हर आंसू कायरता की खीझ नहीं होता। "
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क्या ऐसे ही प्रतिभाये
रोती रहेंगी?
चाटुकारों- चापलूसों की चांदी कटेगी?
शिक्षाये धंधे बाजों के खेत सींचती रहेंगी ?
कुर्सी पर मूर्खाधिराज का शासन होगा?
प्रिये मंज़र खौफनाक है ।
ऐसे में ईमान लहुलुहान होता दिख रहा है
तो कोई नई बात नही।
प्रतिभाये बिखरते बिखरते रेत बन चुकी है।
रेगिस्तान हो गई है आदमियत,
जिसपे मुह मारने वाले ऊँटो का काफिला
अट्टहास करते गुजरता है।
और बदनीयत मंजिल पा रही है।
किंतु प्रिये अभी भी उम्मीदे शेष है
अन्धकार के घटाटोप बादल छंटेंगे जरूर
क्योकि पचती नही है
हराम की कमाई।
जुलाब होता है और नासूर बन
रिसती है शरीर के हर कोने से।
सच्चाई है यह,
इससे मुह मोडे जो खड़ा है, खड़ा रहने दो।
बस तुम प्रतीक्षा करो।
सोमवार, 30 मार्च 2009
जैसे माँ का आँचल
मेरे तपते हुए जीवन को
बर्फ सी ठंडक देता है,
मै थोडा शांत होकर
अपने 'होने' के भाव को
महसूस करने लगता हूँ।
तुम्हारे शब्द सुमन
मेरे रेगिस्तानी पथ पर
मखमली गलीचे का
निर्माण करते है,
और दूर होने के बावजूद
लक्ष्य के करीब होने का
अहसास होने लगता है।
तुम्हारा दिया गया
अप्रत्यक्ष मान- सम्मान
इस भीड़ भरी
स्वार्थी दुनिया में
मस्तक को गर्व से
ऊंचा उठाने में
टेका देता है,
और दंभ से भरा
आकाश मेरे कदमो में
लिपटने लगता है।
एक सच कहू-
तुम्हारा व्यवहार
और तुम मेरे लिए
ठीक वैसी हो
जैसे माँ का आँचल।
शनिवार, 28 मार्च 2009
ह्रदय से धन्यवाद
आज ही लौटा हूँ, ब्लॉग देखा, अपने आदरणीय, प्रिय, मित्र, स्नेही, शुभचिंतक और कुछ नए पाठको ने अपना स्नेह बनाये रखा है, जो मेरे लिए सोभाग्य की बात है।
मै अपने ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ, और उम्मीद करता हूँ आप सबका स्नेह बना रहेगा। सुधीर, vijay kumaar, प्रवीण त्रिवेदी, sandhya guptaji , shyamkoriji, अनिल कान्तजी ,समीर सृज़नजी , ब्रजमोहन श्रीवास्तवजी ,कुमार धीरज, हेम पांडेजी, विनीता यशस्वी ,रंजनाजी, आदि सभी का आभारी हूँ जो आपने समय निकाल कर मेरी रचना पढ़ी और अपनी टिप्पणिया दी।
विशेषरूप से गौतम राज ऋषिजी , दिगंबर नासवाजी का ब्लॉग पर आना मेरे लिए हमेशा से ही सुखद अनुभूति रही है। और हां प्रिय काजल का मेरे शब्दों के संग सफ़र अलग ही अहसास दिलाता है। सबका आत्मीय आभार। आप सबका प्रेम बना रहे यही कामना है।
बुधवार, 4 मार्च 2009
मै सुख चुरा लाया हूँ
ग़मगीन रात में
चांदनी बिखेरता ये चाँद क्यो हंस रहा है?
लो प्रिये , उसकी मुस्कुराहट उधार लाया हूँ।
यकीन करो मै
उम्रभर काँटों के बीच जूझता रहा,
आज एक गुलाब खिला लाया हूँ।
मुझे पता नही
प्रेम का इजहार कैसे होता है?
जो दिल में था वो उगल आया हूँ।
है हाथ तुम्हारे
पतवार मेरी मासूम जिन्दगी की ,
मै नाव बीच मझधार छोड़ आया हूँ।
शनिवार, 28 फ़रवरी 2009
पिता
हवा संग, ऊंचे पर्वतो
उबड़- खाबड़ रास्तो
खेत-खलिहानों, नदी -तालो
वृक्षों, उनके झुरमुटों के
बीच से होकर
इस महानगर की
भागती- दौड़ती
जिंदगी को चीरती
समय की
आपाधापी को फाडती
थकी -हारी
सीधे मेरे हृदय में
जा धंसती है औऱ
मैं लगभग बेसुध सा
तत्क्षण उनके पास
पहुंचने के लिए
अधीर हो उठता हूं
कि तभी
महानगरीय मकडी
अपने पूरे तामझाम के साथ
दायित्वों, कर्मो,
नौकरी - चाकरी
का तामसी, स्वार्थी
राक्षसी जाल बुनने
लगती है,
जिसमे फंस कर में
छुट्टिया लेने
छुट्टिया मिल जाने की
याचनामयी सोच
के संग तडपने लगता हूँ।
जाल और सोच के
इस युद्ध के मध्य
मस्तिष्क सुन्न हो जाता है।
गीता का सार
कुरान की आयते
या बाइबिल, गुरुवाणी की शिक्षाये
सब निष्फल हो कर
मेरी इस जंग में
हाथ मलते दिखती है।
समय जाता रहता है,
मेरी जरूरत,
मेरे होने का भाव
सब कुछ शून्य में कहीं
खो जाता है।
राक्षसी मकड जाल
कस जाता है,
महानगरी मकडी
मुझे लानत भेजती है
और अपने पुत्र होने पर
मुझे कोफ्त होती है।
ह्रदय में धंसी वो
आवाज़ भी कही
विलीन हो जाती है,
कि फोन आता है,
मैं ठीक हूँ
तुम परेशान मत होना
मेरे बेटे।
............................
काश
हर पिता के
साथ उसका बेटा
आजीवन रह सके,
ऐसा कोई
ईश्वरीय वरदान
प्राप्त हो सकता है क्या?
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009
प्रेम
शनिवार, 21 फ़रवरी 2009
शान्ति
मेरी धरती पर
तुम्हारी पाश्चात्य सोच के
लाल गेहूं
नहीं बोए जाते।
यहां गोबर से लीपे
आँगन में फैली
सौंधी महक
पूरे शरीर को
पावन करती है।
तुम्हारे ऊंचे व मंहगे
परफ्यूम की तरह
शरीर में उत्तेजना व
मादकता का
संचार नहीं करती।
यहाँ गली- गली
खेत-खलिहानों में
कूदते - फांदते
धूल धूसरित बच्चे
वृक्षों की टहनियों पर
झूलते- लटकते
मस्ती भरी जिन्दगी
जीते है।
किसी एस्सेल वर्ल्ड के
कृतिम व यांत्रिक
झूलो में बैठ कर
भौतिक आनंद
में लिप्त क्षणभंगुर
उत्साह का अनुभव
नहीं करते।
हां, गंवार तो मैं हूं ही
मुझमें प्रेम का
वह भौतिक
रूप भी नहीं
जिसमे दैहिक योग
की अग्नि प्रज्ज्वलित होती है,
और जब शांत होती है तो
सिवाय दुःख के
हाथ कुछ नहीं लगता।
ऊंची- ऊंची अट्टालिकाओं के
मोह में फंस
चौंधियाती जिन्दगी में
जीने की जो ललक
तुममे है, शौक से जियो।
किन्तु हां,
जब इस शौक से उपजने वाला
'शोक' तुम्हे तंग
जिन्दगी का अहसास
कराये तो
वही ऊंची सी तुम्हारी छत
पर चढ़ कर चाँद को देखना
जो मेरे गाव के आसमान पर भी
चमकता है और
नदी- नहरों की लहरों पर
अठखेलिया
करती उसकी किरणे
मन को अद्भुत सी
शान्ति का अहसास कराती है।
ठीक मेरी भावनाओं की तरह
जिसे तुमने कभी तरजीह नहीं दिया।
शायद वो चाँद
तुम्हे कुछ शान्ति दे सके?
तुम देर न करो
गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009
इश्तहार
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009
इश्क ऐ ताक़त

" दिखता नही
खुदा , मगर
उसे सब जानते है,
शब्दों से जैसे
आपको हम
पहचानते है।
जरूरी नही
इश्क में
किसीका राज़ी होना,
नाम दिल में
सजाकर भी
लोग उम्र गुजारते है।
इबादत हमारी
सुनेगा वो एक दिन,
जो पाक- ऐ दिल से
उसे हम पुकारते है।
छोड़ दुनिया को
हमारे वास्ते
वो जरूर आयेंगे ,
इश्क -ऐ- ताक़त को
हमारी, हम
खूब जानते है। "
सोमवार, 16 फ़रवरी 2009
कभी- कभी
मस्तिष्क के
अतीत कोष से बहकर
मधुर स्मृतिया
ह्रदय के
खारेपन से जा मिलती है,
ओर किसी
लेमन जूस की तरह
जीवन की तपती
दोपहर में
ताजगी का
अहसास करा जाती है।
कभी - कभी
लगता है मानो
मेरे ही साथ
चलने वाली छाया भी
किसी साए का
हाथ थामे चल रही है,
ओर मे कुछ
ज्यादा देर तक
सूरज की तेज़
किरणों को सहन कर
चलता रहता हूँ।
कभी - कभी
मेरे अकेलेपन में
बर्फ सी ठंडी हवा
इन्द्रियों को बहलाकर
चुरा ले जाती है
ओर न जाने किस
ऊर्जा स्त्रोत में बहकर
में कुछ ज्यादा ही देर तक
अकेला बैठा रह जाता हूँ।
शायद ये वही
ह्रदय के खारेपन में
घुले लेमन जूस का कमाल है
जो मुझे
मेरी बिछड़ चुकी
यादो को ताज़ा कर
एकबार फिर
नया जीवन जीने को
प्रेरित कर रही है।
शायद
कभी -कभी
ऐसा हो जाता है।
शनिवार, 14 फ़रवरी 2009
प्रेम भोक्ताओ को दूर से राम राम
बाज़ार में बहुत सारी गिफ्ट आई है, तरह तरह की। पूरे सालभर थोडी रहती है ऐसी गिफ्ट ओर न ही ऐसा प्रेम। प्रेम तो उसे कहते है, जो गिफ्ट दे , ले।वैसे वेलेंटाइन महाराज जी का भी जवाब नहीं था। वेसे ये थे कौन भाई? होंगे तो कोई बड़े बाबा, क्योकि उनको लेकर देखिये कितना हो हंगामा चल रहा है। सब अपनी अपनी दुकाने लगाये बैठे है। कोई प्रेम कर रहा है, कोई प्रेम में बाधा बना फिर रहा है, किसी की राजनीति चल रही है, किसी का लेखन चल रहा है, कोई दोनों हाथो से लूट रहा है यानी कमा रहा है, तात्पर्य ये है कि इन महाराज जी ने सबको व्यस्त कर रखा है। पहुंचे हुए लगते है। उन्हें भी दूर से राम राम। तो प्रेम दिवस के भक्तो लगे रहो। खूब मज़ा लो, लुत्फ़ उठाओ। प्रेम तो इसीका नाम है। अपने लैला मजनू , सीरी फरहाद ....को भी वेलेंटाइन महाराज जी के दर्शन हो जाते तो शायद उन्हें पुण्य लग जाता। बदकिस्मत थे बेचारे। अरे प्रेमभोक्ताओँ की किस्मत देखो इम्पोर्टेड माल खरा होता है, ओर उन्हें वो मिल भी रहा है। लगे रहो भाई।
अफ़सोस बस इतना है, मेरे देश की मिटटी को भी मिलावटी करने का जो षडयंत्र रचा गया था वो सफल रहा है। पर नहीं हम जैसे षडयंत्र कहने ओर मानने वालो को क्या पता प्रेम क्या होता है? भाई हमने तो प्रेम किया नहीं है, हमारा नमस्कार पंहुचा देना उन वेलेंटाइन महाराज जी को॥ ओर आपको दूर से राम राम। मुबारक हो आज का दिन...कल क्या करोगे? अरे छोडो जाने दो..में भी क्या सोचने लग जाता हूँ।
गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009
वो भूमि बंज़र हो गई
मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009
अश्के खूं
रूह पता नही कहां खो गई ।
अब लडाई है, झगडे है, आशिके- महजूं है
दो जिस्म एक जान की तक़रीर बदल गई ।
उतारा था खुदा ने हमें इश्क के वास्ते
हिज्र की आस्मां पर क्यों बदली छा गई ।
तूने न जाना हमारी असलियतों को जाना
खामोश रहकर आँखे अश्के खूं पी गई ।
शनिवार, 7 फ़रवरी 2009
स्नेह आमंत्रण
बुधवार, 4 फ़रवरी 2009
प्रेम
दो शरीर से
निकली तरंगो का
मिलन नहीं ,
न ही
स्त्री - पुरुष के
संबंधो का
खेल है।
प्रेम तो वह
ह्रदय की कम्पन
धारा से बहने वाली
पावन पवन है ,
जो
कृष्ण के अधरों पर
रखी बंशी के
छिद्रों से प्रस्फुटित होकर
राग रूप में
जीवन रस घोलती है।
प्रेम सिर्फ
शब्दों से बुना मकड़
जाल भी नहीं ,
न ही
मायावी जगत का
सौदाई ताल है।
प्रेम तो
वो ओस की बूँद है
जो सुबह की
नई कोपलों से
ढुलकता हुआ ,
सूर्य किरणों संग
बेहद मासूमियत से
चमकता है ।
जिसे धरा की
भींगी भींगी
द्रूप
ईश्वरीय चरनामृत
मान आचमन कर
वायु में प्राण तत्व
प्रवाहित करता है।
किन्तु विडम्बना है॥
आज कहा है प्रेम ?
आज है तो
सिर्फ एक वादा है
एक सौदा है।
मेने किया
तूने किया का
लेखा- जोखा है।
शायद
यही वजह है की
आज बिछोह है
दुःख है, संताप है ,
प्रेम नहीं सिर्फ एक
धधकता
उत्ताप है ।
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009
मै
मगर कह नहीं सकता,
क्योकि
मै जब यह कहता हूँ की
मै इमानदार नहीं हूँ, तब भी
मै इमानदार नहीं होता।
सोमवार, 2 फ़रवरी 2009
१ बंधुआ, २ शून्य
जो दर्द सहे है
जिन दर्दो को सहना है
हिसाब नहीं होता आदमी के पास।
सिवाय इसके की
ब्याज चड़ता जाता है
ओर आदमी समझ नहीं पाता
की
वो दर्दो का बंधुआ
कैसे बन गया?
२,
आदमी अधुरा है।
जन्म से लेकर मृत्यु तक,
कितनी बार जिया ओर कितनी बार मरा?
इसका कोई गणित नहीं।
हां गणित होता है,
धन का, समाज का, लोक का,
लाज का, कर्तव्यो का,
उसका- मेरा ....
मगर जीवन का नहीं,
यानी
टोटल में शून्य है।