लो मुम्बई में भी बारिश हो गई। जम के हुई। पानी-पानी हो गया। वैसे यह सच है कि मुम्बई का मानसून किसी भी हिस्से से अनोखा होता है। यहां मानसून का अलग ही मज़ा है। अब यह भी अलग बात है कि कितने लोग इसका मज़ा लेते है? क्योंकि मुम्बई मे मज़ा कम सज़ा ज्यादा है। बादलो से बरस रही बरखा रानी भी सज़ा बन बरसती है। सज़ा कैसी? सुबह-शाम दफ्तर जाने-आने वालों से पूछिये। सडकों पर चलने वालों से पूछिये। झोपडी-चालों में रहनेवालों से पूछिये। वाहन सवारों से लेकर वाहन मालिकों तक सबके चेहरे पर बारिश की सज़ा का भीगा-भीगा रिसाव ब-आसान देखा जा सकता है। प्रशासन चौकस, व्यवस्था मुस्तैद किंतु फिर भी समस्यायें सुरसा के मुहं की तरह मुम्बई के जीवन को लीलना चाहती हैं। हर कोई परेशानियो में भीगा-भीगा सा। बावज़ूद मुस्कान लिये। यह सब तो मुम्बई के लोगों के लिये रोज़ का काम, आदत हो गई है, लिहाज़ा मुस्कान लिये वो परिस्थितियों से लडना जानते हैं। इस बात पर मुम्बईवासियों की जितनी तारीफ की जाये कम है। इस तारीफ को भी सरकार अपना श्रेय बना कर प्रचारित कर देती है, ये उसका साहस है और मुम्बईवालों का दुर्भाग्य। राजनीति इसीका नाम है। खैर..।
मुम्बई भीग उठी। सबसे पहला असर यातायात पर पडता है, सो लोकल ट्रेनें अनियमित, सड्कों पर ज़ाम, उपर से बरसात, नीचे भरे पानी से मुश्किलें आम। मैं भी अपने दफ़्तर, जो कि अपने घर से पौने दो घंटे की दूरी पर है, चार घंटों मे पहुंचा। तरबतर वातावरण में नौकरी पर जाना सिवाय मज़बूरी के और कुछ नही होता। वैसे भी इन नौकरियों मे अब इंसानियत खत्म हो चुकी है। कौन कैसे आ रहा है? कितनी मुसीबतों में? क्या-क्या जतन करके? किसे फिक्र? क्या करे बोस को काम निकलवाना है, 'उपर' उसे भी बताना है। सो कर्मचारियों कि ऐसे हालात मे पूछ कर लेना उनके लिये मुसीबत बन सकती है इसलिये कोई मानवता नहीं सिर्फ नौकरीयता। यानी आप चाहे इस बारिश मे मुश्किलों मे फंसे हों या दफ्तर नही पहुंच सकते, उन्हे इससे कोई मतलब नहीं। आपको आना है तो बस आना है। बेचारा कर्मचारी॥जाता है। अब प्रशासन चेताता है, एसएमएस करता है कि आवश्यकता हो तब ही घर से निकलें...। हास्यास्पद नही लगता ये? वैसे देखा जाये तो अब मुम्बई हास्यास्पद ही ज्यादा हो गई है। यही मज़ा है। इसे आप बारिश का मज़ा कह लीजिये या मौसम की मार का, जो भी हो मुम्बई मे मानसून का अपना ही मज़ा है। सागर किनारे उसकी उत्ताल लहरों से भीगना, गरमागरम भुट्टों पर नमक-नींबू लगवा कर खाना, कभी चाय की चुस्की तो कभी वडा पाव का मज़ा। कुछ आवारा हो जाने का मन करता है। कभी तो लगता है पानी भरी सडक पर दौड लगा दूं, जोर से चिल्लाते हुए भागूं। हो हो ..$$$$$,,,,,,। आते जाते लोगों को छेड्ते हुए निकल जाऊं..बस आज़ाद पंछी की तरह ..कोई तनाव ना हो, कोई काम ना हो...बस हो तो ये बरसता हुआ आसमान और मैं....। किंतु....मुश्किल है अब। खासतौर पर मेरे लिये, या मुझ जैसे इंसानों के लिये जिसे पद-प्रतिष्ठा के फेरे मे फंसे छटपटाते ही रहना है। आह, कैसी बनावटी जिन्दगी? खैर..। पर मन तो चौकडी भरता ही है। बारिश के साथ भीगता ही है। बंजर सी हो चली स्म्रतियों की ज़मीन को खाद पानी मिल ही जाता है। फिर कोपलें फूट पडती हैं, फिर एक एक कर यादें बाहर निकल आतीं हैं। तन-मन सब तर हो जाता है। ऐसे में शब्द किसी गीत की रचना करते हैं या कोई कविता की। कुछ इसी तरह के आलम में चंद पंक्तियां रचा गई।
" घुमड-घुमड के बादल आये
सावन बरसे, मन तरसाये।
दिल में छुपी बतिया को जगाये,
कैसे अब हम मन समझायें॥
घुमड-घुमड के .......
झूले पडे हैं डाली-डाली
रुत भी कितनी है मतवाली।
चारों ओर खिली हरियाली
फिर भी मन है खाली-खाली॥
घुमड-घुमड के..........
भीगी आंखे, भीगा तन है
लागी कैसी ये अगन है।
क्या कभी होगा मिलन है?
दूर बहुत मेरे सजन हैं॥
घुमड-घुमड के.......
तेरे लिये मैं रूप संवारूं
टक-टकी बांधे राह निहारूं।
ओ निर्मोही तूझे पुकारूं
मादक पल ये कैसे गुजारूं?
घुमड-घुमड के बादल आये
सावन बरसे, मन तरसाये॥
झूठ लाए हैं सच छुपाने को ...
2 दिन पहले
