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गुरुवार, 19 अगस्त 2010

सलीके से रखे हैं मेरे दिन-रात

लगभग खंडहर होते जा रहे
इस शरीर के स्टोर रूम को
साल में महज़ एक बार खोलता हूं।
जब भी दरवाजा खोल कर मैं अन्दर घुसता हूं
रैक में सलीके से जमाये गये
दिन और रातों का
हिसाब रखते रजीस्टर के पन्ने
फडफडा कर उडने लगते हैं।
मुझे अच्छा लगता है क्योंकि
वे इस दिन खिलखिलाने लगते हैं।

घंटो बैठा रहता हूं उनके साथ..
सन 1967 की रात से लेकर
19 अगस्त 2010 तक के इस समय तक
का पूरा पूरा हिसाब है।
और जैसे जैसे पल बीत रहे हैं
पन्नों पर चढते जा रहे हैं।

अमूमन मैं दिन का वो पन्ना निकालता हूं
जब अपने शहर को छोड महानगर में आया था।
सिर्फ शहर नहीं छूटा था
छूट गया था बहुत कुछ...

पता नहीं किस बचत में से
पिताजी ले आते थे नये कपडे
और मां पानी मिले दूध को
ओटा ओटा कर खीर बनाती थी।

ललाट पर टीका लगा कर
चारों दिशा में धौक दिलवाती थी मां
और पीठ पर हाथ धर
अपने जीवन के मानों सारे
आशीर्वाद उढेल दिया करती थी।

मैं नहीं जानता था तब इन सब का महत्व
आज जब इस दिन
अपने स्टोर रूम में बैठा दिन के उस
पन्ने को खोल बैठा हूं तब जाना है इसका महत्व।
तभी ..तभी..बरबस ही आंखों से अश्रुदल फूट पडते हैं
और मैं इन्हें पौंछ कर इस महानगर से
फोन करता हूं।

क्योंकि आज यदि मैं इन दिन और रात को
बटौर संजो पा रहा हूं तो
उन्हीं की बदौलत जिनके हाथ मेरे शीश पर हैं
और जिनके आशीर्वादों से मेरी सांसे गति पाती है।

मंगलवार, 5 मई 2009

मेरा जीवन सार तुम्ही हो...

"दुःख को छिटक मै आया
तुमसे मिलने ओ एकांत,
बता कहां है मागॅ जहां से
मिलता माँ का वो प्रांत।
याद मुझे है सबकुछ किंतु
राह विस्मृत सी हो चुकी
विदा हो रहा था जब मै
थी अश्रुरत पलके झुकी।
ये समय का फेर था कैसा
कालचक्र से छला गया,
अपने हृदय धर तुमको
दूर कैसे मै चला गया।
संग दल-बल, बना महल
किंतु न कभी चैन मिला,
भीड़ में भी रहा अकेला
एक अदद न मीत मिला।
कहा तुम्हे था कि रोना मत
यदि ध्यान कभी मेरा आए,
पर मै यहाँ बिन तुम्हारे
रहा नित दृग नीर बहाए।
अपने हृदय पर रख पत्थर
था केसे तूने विदा किया,
मेरा मन धरने को तूने
विष बिछोह का पी लिया।
वर्षो संघर्ष में लिप्त रहा
पर नही मिला ठोर ठिकाना,
मिले जो जग के वैभव सारे,
झूठे है सब मेने जाना।
मेरा सुख साम्राज्य तुम्ही
मेरा राज वैभव तुम्ही हो,
गोद तुम्हारी, प्यार तुम्हारा,
मेरा जीवन सार तुम्ही हो। "