गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

प्रेम

इन दिनों कुछ ज्यादा व्यस्तता है, किंतु मस्तिष्क में विचार घुमड़ते जा रहे है। उनकी कुलबुलाहट बढ़ गई है। इस कुलबुलाहट को मुझे शब्दों में परिवर्तित करना ही था, सोच रहा था फ्री होकर प्रेषित करूंगा किंतु फ्री होना फिलहाल शायद नसीब में नही। सो जैसा भी बना अपनी कुलबुलाहट को पेश कर रहा हूँ। त्रुटिया अवश्य है। आप बताएँगे तो अच्छा रहेगा॥


" तपता जितना सोना
उतना निखरता है,
उम्र के बंधन में
प्रेम कब बंधता है।
हवा संग झूमता है
लहरों पे मचलता है ,
टहनियों पे वृक्षों की
पत्तो संग झूलता है।
दुखो के नागफन पर
कृष्ण सा थिरकता है,
त्याग वेदी से निकले
हलाहल को पीता है।
अश्रु को सोख कर
चुपके वो रोता है,
ह्रदय के घावो को
छुपाकर हँसता है।
खिलता है कमल सा
अधरों पे सजता है,
शब्दों में ढल कर
रस काव्य वो रचता है।
प्रेम कब किस बंधन
में बंधता है। "

12 टिप्‍पणियां:

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" ने कहा…

वाह्! बहुत ही उम्दा.....कितनी बखूबी से आप भावों को शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं. कमाल है! नितांत सुन्दर......
कृ्प्या आप इसे ये न समझिए कि व्यर्थ में यूं ही तारीफ कर रहे हैं.आपकी रचना को पढकर मुझे जिस प्रकार की अनुभूति हुई, सिर्फ उसे ही मैने प्रकट किया है.
धन्यवाद........

बेनामी ने कहा…

प्रेम उन्मुक्त होता है. उसकी मर्यादा प्रेम करने वाला ही तय करता है-यदि, प्रेम करने के बाद भी ऐसा करना उसके नियंत्रण में हो.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अमिताभ जी
खूबसूरत है कविता..........
जीवन से भरी, आसानी से अपने भावों को शब्दों में पिरो इया है आपने.कोई त्रुटी नहीं है इसमें

बेनामी ने कहा…

vaah vaah amitabh ji , prem ki kitni hi kalao ka varnan kar dala aapne to.. prem ki udaan, uski svatantra kalpana aur vastavikta ka sundar chitran kiya hai aapne.. badhai ..

Vineeta Yashsavi ने कहा…

तपता जितना सोना
उतना निखरता है,
उम्र के बंधन में
प्रेम कब बंधता है।

sunder kavita...

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर!
अश्रु को सोख कर
चुपके वो रोता है,
ह्रदय के घावो को
छुपाकर हँसता है।

सुंदर अभिव्यक्ति।

सुधीर महाजन ने कहा…

प्रेम के विविध आयामों एवं
परिणिति की भावनात्मक
अभिव्यक्ति !
व्यस्तता का प्रसाद यदि ये
रचना है तो व्यस्तता बनी रहे !

kumar Dheeraj ने कहा…

तपता जितना सोना
उतना निखरता है,
उम्र के बंधन में
प्रेम कब बंधता है।
बिल्कुल सही लेख आपने लिखा है । लगता तो ऐसा है कि आपने इस लेख के जरिए यथाॆथ को सामने ले आये है । जो लिखा गया है वही हकीकत है धन्यवाद

सुशील छौक्कर ने कहा…

हवा संग झूमता है
लहरों पे मचलता है ,
टहनियों पे वृक्षों की
पत्तो संग झूलता है...

प्रेम कब किस बंधन में बंधता है

सच लिखा आपने, मैं तो गीत सा बस गाता चला गया।

sandhyagupta ने कहा…

Sundar abhivyakti.Badhai.

admin ने कहा…

आपकी कविता में वाकई कुछ खास है। बधाई।

अभिन्न ने कहा…

अमिताभ जी आप का हृदय से स्वागत है आप मेरे ब्लॉग पर आये ओर पढ़ कर अपने विचार व्यक्त किये बहुत अच्छा लगा आप जैसे गुणिजन जब हौसला अफजाई करते है तो लगता है की बहुत बड़ा रिवार्ड मिल गया है ,इधर जब आपके ब्लॉग पर आना हुआ तो पाया की आप की कवितायेँ जो न केवल भावपूर्ण है अपितु उनमे एक जीवन, एक दर्शन का भी आभास होता है
कितना सत्य है की प्रेम कब बंधन में बंधता है