शनिवार, 27 जून 2009
डांस 'ब्रेक'
बात बहुत पुरानी है, जब मै कालेज का छात्र हुआ करता था. उन दिनो हमारा शहर आधुनिकता मे बहुत पीछे था, पास ही इन्दोर जैसा बडा शहर जरूर था किंतु हमारे शहर मे उसकी हवा बहुत बाद मे पहुचती थी. मुझे फैशन भाती थी, कुछ नया करने व करते रहने की धुन बलवती रही. मै जानता हू उन दिनो घर की माली हालत. ऐसे मे मैरे शौक पूरे होना सम्भव नही थे, मुझसे बडे भाईसाहब की नौकरी जब मुम्बई मे लगी तो उनके माध्यम से मेरे पहनावे इत्यादि के शौक भी पूरे होने लगे.यानी मुम्बइया होने लगे. घर मे यदि फैशन आई तो सिर्फ मेरी ही वजह से, और ये भी यकीन के साथ कह सकता हूं कि शहर मे भी मै ही नई फैशन लाया था. दरअसल सिर्फ पहनावे से ही नही बल्कि मुझे हमेशा से ही आकर्षक दिखने की ललक रही थी, और इसके लिये मै खुद ही कुछ न कुछ ऐसा किया करता था कि वो सबसे अलग हो. उन दिनो फेशन का एक्मात्र स्त्रोत सिनेमा हुआ करता था, जबकी सिनेमा ने मुझे कभी अपनी ओर लुभाया नही. आज भी फिल्म से बहुत दूर हूं, हीरो-हीरोइने मुझे आकर्षित नही करते, फिर भी पता नही क्यों मेरे अन्दर अच्छा दिखने की ललक रही थी. खैर.. 'हिप्पी पना' न पिताजी को अच्छा लगता था न मां को. पर इतना जरूर कहूंगा कि मुझे कभी किसी ने रोका नही, शायद मै बहुत लाड का रहा. मेरे शहर मे उन इक्के दुक्के लोगो मे मै भी शरीक था जिन्हे बेहतरीन फेशनेबल कहा जाता था. दोनो भाई मेरे लिये मै जैसी मांग करता, वैसे परिधान लेकर आते,, 'ज़िंस' का शौकीन था, आज भी हूं, आज हालत ये है कि 'ज़िंस' पैंट के अलावा मुझे दूसरा कोई कपडा अच्छा नही लगता. किंतु तब 'ज़िंस' पैंट पहनना या खरीदना कठिन था. बावजूद इसके एक दिन जब पिताजी ने किसी व्यक्ति के माध्यम से 'जिंस' का कपडा बुलवाया तो मुझे हैरत हुई थी. मैरे लिये पिताजी की और से 'जिंस'?? वो पहला 'जिंस' का पैंट था, जिसे अपने मित्र बने टेलर से सिलवाया था, टेलर भी मुझसे खुश रहता क्योकि मै उससे अपने अन्दाज़ मे कपडे सिलवाता फिर वो उसी अन्दाज़ के ओरों को सिल के देता. बहरहाल वो जिंस का पैंट मेरे लिये बहुत कीमती था. कालेज मे मेरा जिंस पहनना भी एक अलग ही शान थी. शौको मे फेशन ही नही गीत-संगीत भी था. खेलकूद तो मुझे मानो विरासत से मिला ही था. मैं सोचता हूं यदि शहर पिछ्डा हुआ नही होता तो उन्नति के नाम पर बहुत कुछ पा जाता. विशेषतौर पर मेरे बडे भाई, जो टेनिस और टेबल-टेनिस के उन दिनो राज्य के बेहतरीन खिलाडी हुआ करते थे. खैर... बांसूरी बजाना, सिंथेसाईज़र बजाना मेरे शौक थे और ये शौक पूरा करते थे मेरे मुम्बई वाले भाई साहब. तब एक दिन मुझे ज्ञात हुआ कि कोई मायकल जैक्सन नामक प्राणी भी है जो गाता और नाचता जबरदस्त है. बस फिर क्या था, मुम्बई वाले भाईसाहब से पूछा, और उन्होने मुझे जैक्सन की कुछ किताबे व कैसेट भिजवा दी. तब मेने जाना जैक्सन को. फिर क्या था, मेरे शहर मे जैक्सन और उसका ब्रेक डांस अपने दोस्तो के माध्यम से फैलने लगा. मै उसकी दो कैसेट 'बेड' और 'थ्रीलर' बजाता, डांस करता. यकीन मानिये कुछ स्टेप तो मै बहुत ही जानदार करने लगा था. पर ये सब अपने घर मे पता नही चलने दिया था, क्योकि डर था कि डांट पडेगी. हमारे शहर मे विशेष दिन जैसे गणेश उत्सव, नवरात्रि आदि पर खूब कर्यक्रम होते थे, कालेज के गेदरिंग तो थे ही, जिनमे मेरा हिस्सा लेना जरूरी होता था. इधर ब्रेक डांस जैसी नई विधा से शहर अभी परिचित नही हुआ था. एमपीईबी मे ऐसे ही एक उत्सव मे सांस्क्रतिक कार्यक्रम था, मुझे याद है मै उस दिन बीमार था, घर पर आराम कर रहा था, एक दोस्त ने मुझे बताया कि अमिताभ् तुम्हे वहां डांस करना है और वो भी तुम्हरा नया डांस.. मै मना नही कर पाया. शाम हुई, रात आठ बजे से कार्यक्रम शुरू होना था. इधर मुझे किसी भी तरह जाना था, मगर बुखार ने रोक रखा था. फिर भी ठीक होने, अच्छा लगने का झूठ बोल कर थोडा बाहर घूम आने की इच्छा मां से व्यक्त की. जवाब मे 'ना' ही था. दीदी को पटाया.और किसी तरह एक झोले मे जिंस पैंट, टी शर्ट, कमीज़ डाल कर भाग निकला सीधे एमपीईबी. ऐलान हुआ. मै जल्दी तैयार होकर स्टेज़ पर जा पहुंचा. कैसेट थ्रीलर की थी, जिसका कोई गाना जिसमे म्यूजिक ज्यादा था, बजना शुरू और मैरा थिरकना भी. तालियो की आवाज़ से मेरा बुखार हवा हो चुका था. जब डांस खत्म हुआ तो ' एक बार और, एक बार और की आवाज़े कानो मे पड रही थी..किंतु मुझे तो जल्दी घर भागना था अन्यथा डांट मिलती. मै घर पहुच गया था. सोचा मम्मी-पापा को पता नही चला है. वाकई पता नही था. वो तो दूसरे दिन पापा को शहर मे फैली मेरे डांस की चर्चा से ज्ञात हुआ. इधर मेरे दोस्त ने बताया था कि तूने बहुत अच्छा डांस कर दिया भाई..पर मुझे भय था कि पापा को पता चल गया होगा और अब डांट के लिये तैयार हो जाऊं. पर जब पिताजी घर आये तो कुछ नही बोले..मुझे लगा उन्हे पता नही चला है. मायकल जैक्सन की बुक उठा कर उन्होने मुझसे इतना ही कहा कि पढाई भी जरूरी होती है.
कहने का मेरा तात्पर्य यह है कि मायकल जैक्सन का बुखार तब से मुझ पर था, किंतु बाद के दिनो मे समय बदला, नौकरी की आपाधापी और भागादौडी ने मैरे तमाम शौको पर स्वतः ही ज़ंज़ीरे जकडना शुरू कर दी, और समय की रेत मे मेरा वो अलमस्त जीवन भी दबता रहा. मुम्बई आ गया, परिवेष बदला, भाषा बदली..रहन-सहन बदला. सोचने- समझने की शक़्ल बदली. गम्भीरता ने उस काल के उत्साह को हरा दिया. मै अपने कार्यो मे व्यस्त हो गया. पत्रकारिता के संघर्ष मे खुद को झोंक दिया. क्योकि यही जरूरी था. गाना-बजाना-नाचना सब बंद. एक अलग 'अमिताभ' बन गया.
मुझे पता चला कि शिवसेना मायकल जैक्सन को मुम्बई आमंत्रित कर रही है। बस उसे देखने-मिलने की इच्छा और उसके होने की याद 6 सालो बाद फिर कुलाचे मारने लगी. 30 अक्टूबर 1996 का वो दिन था, जब मेरा हीरो मुम्बई मे मुझे साक्शात दिखने वाला था. वो आया. मैने देखा, मिला. और मह्सूस किया कि आज भी अपने शहरवासियो से पहले उसे मेने देखा, जिसके नाम से मै चर्चित हुआ था कभी. दुनिया को जिसने अपने गीत संगीत से झूमने पर मज़बूर कर दिया हो ऐसा व्यक्ति साधारण तो हो नही सकता॥सचमुच जैक्सन साधारण नही था. उसका महज़ 50 वर्ष की आयु मे चला जाना मुझे अटपटा सा लग रहा है. मै जानता हूं मेरी तरह इस देश मे भी कितने होंगे जिन्हे जैक्सन भाता होगा..../ ऐसे जादूगर को कौन भूला सकता है.
शुक्रवार, 19 जून 2009
असल साहित्य क्या है ?
गौतमजी के ब्लोग पर राजेन्द्र यादव के प्रति स्वस्थ आलोचना मन को भायी, स्वस्थ आलोचना साहित्य को तराशने का काम करती है/ हालांकि राजेन्द्रजी जैसे जीव का पाचन तंत्र कितना बलिष्ठ है इसका पता नही किंतु साहित्य के 'आका' कहलाने का उनका मोह 'हंस' मे दीखता है/ उनका साहित्य और साहित्य के लिये उठा पट्क वाला जो आभा मन्डल है वो उन लोगो की आंखे भले ही चौन्धीयाता रहे जिन्हे उनसे स्वार्थ हो, मेरी आंखो मे वे और उनका सहित्य कभी आकर्षण का पात्र नही बन सका। अपना अपना द्रष्टिकोण ठहरा. सौभाग्यवश मेरी उनसे कभी मुलाकात नही हुई, दुर्भाग्यावश मेने उनकी कुछ रचनाओ को पढा है। खैर जहा तक बात कहानी को ही साहित्य मानने की है तो मै इसे ठीक नही मानता। साहित्य की उपज राग से है, राग पध्य रूप मे ज्यादा स्पष्ट होता है। लिहाज़ा साहित्य का जन्म ही मै पध्य से हुआ मानता हू/ आप यदि गम्भीरता से विचार करे या साहित्य की मूल गहराई मे उतरे तो पहले काव्य के रूपो को जानने व समझने के लिये थोडा पाश्चात्य व भारतीय परम्परा को खंगाल लेना आवश्यक है। काव्य के भेदो मे यूरोपीय समीक्षको ने व्यक्ति और संसार को प्रथक करके काव्य के दो भेद किये है, एक विषयीगत दूसरा विषयागत. विषयीगत यानी सब्जेक्टिव, जिसमे कवि को प्रधानता मिलती है और दूसरा विषयागत यानी आब्जेक्टिव जिसमे कवि के अतिरिक्त शेष स्रष्टि को मुख्यता दी जाती है. यानी पहला प्रकार काव्य 'लिरिक' हुआ। यूनानी बाज़ा 'लाइर' से सम्बन्ध होने के कारण इसका शाब्दिक अर्थ तो वैणिक होता है किंतु इसे प्रायः प्रगति या भाव- प्रधान काव्य कहते है। इसमे गीत तत्व की प्रधानता रह्ती है. दूसरे प्रकार के काव्य को अनुक्रत या प्रक्थनात्मक कहा गया है। महाकाव्य और खंड काव्य इसके उपविभाग है. किंतु पाश्चात्य देशो मे प्रायः महाकाव्य ही इस प्रकार के काव्य का प्रतिनिधित्व करता है. वहा खंड काव्य जैसा कोई विशेष उपविभाग नही है. ये विभाग पध्य के ही है। अब यदि गध्य की बात करे तो इसके विभाजन मे गध्य काव्य की महिमा है. जहा भाव-प्रधान काव्य मिलेगा. और उपन्यास महाकाव्य का तथा कहानी खंड्काव्य का प्रतिनिधित्व करेगा/ गद्य मे निबन्ध, जीवनी आदि अनेक ऐसे रूप है जिनको इस विभाजन मे अच्छी तरह बान्ध नही सकते. पर गध्य काव्य के शेत्र से बाहर नही है। गद्य का उलट ही पद्य है. जिसको आप अंगरेज़ी मे (Verse) कहते है।
आप जानते है कि भारतीय परम्परा मे नाटक को प्रधानता मिली है। जो काव्य अभिनीत होकर देखा जाये तो द्रष्य काव्य है और जो कानो से सुना जाये तो श्रव्य काव्य कहलाता है। यध्यपि श्रव्य काव्य पढे भी जाते है। रामायण का उदाहरण लिया जा सकता है जिसे पढने व गाने के लिये उपयुक्त माना जाता है।
उपन्यास महाकाव्य का स्थानापन्न होकर और कहानी खन्डकाव्य के रूप मे गद्य के प्रबन्ध काव्य कहे जाते है। गद्य काव्य तो मुक्तक है ही, पत्र भी मुक्तक की कोटि मे आयेंगे. उनकी निबन्ध और जीवनी के बीच की सी स्थिति है। समस्त संग्रह की द्रष्टि से एक एक निबन्ध मुक्तक कहा जा सकता है। किंतु निबन्ध के भीतर एक बन्ध रहता है. ( हालांकि उनमे निजीपन व स्वछन्दता भी होती है) वैयक्तिक तत्व की द्रष्टि से गद्य के विभागो को इस प्रकार श्रेणी बद्ध कर सकते है, उपन्यास, कहानी ( काव्य के इस रूप मे उपन्यास की अपेक्षा काव्य तत्व और निजी द्रष्टिकोण अधिक रहता है.) जीवनी यह इतिहास और उपन्यास के बीच की चीज है। इसका नायक वास्तविक होने के कारण अधिक व्यक्तिपूर्ण होता है) निबन्ध (इसमे विषय की अपेक्षा भावना का आधिक्य रहता है) गद्य काव्य तो ये सभी रूप है। किंतु गद्य काव्य के नाम की विधा विशेष रूप से गद्य काव्य है।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो यह समझते है कि साहित्य कहानी या गद्य को ही कहा जाता है वे मेरी समझ मे ना समझ है। गद्य का जन्म ही कविता से हुआ है। मुझे अच्छा यह लगा कि गौतमजी न सिर्फ गज़ल या संस्मरण के महारथी है बल्कि वे वैचारिक स्तर पर साहित्य की परख करने से भी नही हिचकिचाते है। सम्भव है इसीलिये मुझे उनका ब्लोग रुचिकर लगता है।
बहुत दिन हुये मेने कोई रचना उकेरी नही.तो कोशिश करता हूं-
" मासूम हूं
इसलिये
छला जाता हूं,
हर बार बस
यू ही
अकेला
रह जाता हूँ ।
निजत्व जो है
नीरा पवित्र है,
किंतु, ठीक है
गंगा की तरह
मैला कर
दिया जाता हूं,
तो कर दिया जाता हूं।
अब वो माने
या ना माने
समर्पण करे
या ना करे
मुझे प्राथमिकता दे
या ना दे
मै तो उन्हे सिर्फ
प्रेम किये जाता हूं।
अपना लेखा-जोखा
पायथोगोरस का
सिद्धांत भी नही,
जितने जोड
बनाता हूं
उतने ही
घटाव किये
जाता हूं।
क्योकि
मासूम हूं।
हर बार
छलने के
लिये ही हूं। "
गुरुवार, 28 मई 2009
किसी बिरले को खो दे
आदमी जो कहता है
उसके अर्थ को अपने आस-पास के
परिवेश के कारण
बदल कर गाह्य कर लिए जाते है
और इस तरह शब्दों के
ईमान की हत्या हो जाती है।
शंकाओ के भेडिए
सच की लाश को
नोच-नोच कर खाने लगते है,
आदमी की आदमियत पर
और उसके स्नेह पर
जटिल मानसिकता आक्रमण
करने लगती है,
रिश्ते-नाते टूट कर बिखरने लगते है,
होता कुछ नही है
बस आदमी आदमी
नही रहता
उसका पवित्र नाता
किसी ग़लत फहमी के जाल में
उलझ कर तड़पता है।
बार-बार यदि वो अपनी
सफाई भी पेश करे
तो भी मन के अन्दर पेठी
विरूध्द भावना उसके रास्ते की
रुकावट बनती है,
और यह मान्य कर लिया जाता है
की जिस पर भरोसा किया
उसने, उसकी भावनाओ ने
सिर्फ़ लूटा या लूटना चाहा।
कैसी मानवता है ये ?
कैसी विचारशक्ति है ?
शायद इसी वजह से इस समाज में
प्रेम नही टिकता , नाते टूटते है,
रिश्ते बिखरते है,
और सात्विक हृदय की
पूछ नही होती,
उसे समझा नही जाता
और बहुत जल्द उसके ख़िलाफ़
एक घिनौनी मानसिकता
तैयार कर ली जाती है।
जबकि होना यह चाहिए की
किसी के प्रति कोई धारणा
बनाने से पूर्व
उसके सच को खंगालना
परम जरूरी है।
हम सबको एक द्रष्टिकोण से
नही देख सकते।
और यदि देखते है तो
हो सकता है
किसी बिरले को
खो दे।
बुधवार, 20 मई 2009
मन मत्स्य

जिस पर मन बार- बार फिसल जाता है,
फिसलकर भाव सरिता में बहने लग जाता है।
भावो की लहरों संग खूब तो उछलता है
डुबकिया लगाता है और किनारे आ-आ कर
साधु हृदय को चिढ़ाता है।
कभी बिल्कुल निरापद
तो कभी शैतान होकर
उसका चैन उडाता है।
खिलखिलाते नृत्यरत
ऐसे मन को क्या साधना?
किंतु
शब्द अपना जाल बुनते है
उसे पकड़ने के लिए स्याही के कांटे का उपयोग करते है।
और चारे की तरह अक्षर को कांटो में फंसा
सरिता में डालते है।
घंटो इन्तजार के पश्चात
अंततः झांसे में आ ही जाता है मन
अक्षर शब्दों के साथ पंक्तिबध्द
खड़े होकर मन को चीरने लग जाते है
फाड़ते है,
उसकी आजाद जिंदगी को
कविता के नाम पे
बलि चढ़ा दिया जाता है।
भुना जाता है और
काव्य जगत के बाज़ार में
परोस कर फ़िर
रसास्वादन होता है।
बेचारा मन मत्स्य ।
बुधवार, 13 मई 2009
मंगलवार, 5 मई 2009
मेरा जीवन सार तुम्ही हो...
तुमसे मिलने ओ एकांत,
बता कहां है मागॅ जहां से
मिलता माँ का वो प्रांत।
याद मुझे है सबकुछ किंतु
राह विस्मृत सी हो चुकी
विदा हो रहा था जब मै
थी अश्रुरत पलके झुकी।
ये समय का फेर था कैसा
कालचक्र से छला गया,
अपने हृदय धर तुमको
दूर कैसे मै चला गया।
संग दल-बल, बना महल
किंतु न कभी चैन मिला,
भीड़ में भी रहा अकेला
एक अदद न मीत मिला।
कहा तुम्हे था कि रोना मत
यदि ध्यान कभी मेरा आए,
पर मै यहाँ बिन तुम्हारे
रहा नित दृग नीर बहाए।
अपने हृदय पर रख पत्थर
था केसे तूने विदा किया,
मेरा मन धरने को तूने
विष बिछोह का पी लिया।
वर्षो संघर्ष में लिप्त रहा
पर नही मिला ठोर ठिकाना,
मिले जो जग के वैभव सारे,
झूठे है सब मेने जाना।
मेरा सुख साम्राज्य तुम्ही
मेरा राज वैभव तुम्ही हो,
गोद तुम्हारी, प्यार तुम्हारा,
मेरा जीवन सार तुम्ही हो। "
रविवार, 26 अप्रैल 2009
यादे
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शनिवार, 18 अप्रैल 2009
अधरों से मै पी लूं
गुरुवार, 9 अप्रैल 2009
ऐसे कैसे लोग ?
कार में अंगूठा सवार हुआ है,
चाट- चाट तलुवो को बने है
देखो सांठ गाँठ वाले लोग।
देश हमारा महान हुआ
शुक्र है चाँद से नज़र ना आते
भूखे नंगे फिरते लोग।
आदत पड़ी जो 'खाने' की ,
रिश्वत - घूस ठूंस ठूंस कर
सेठ कहलाते पेट वाले लोग।
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009
मुफलिस जी की कविता से प्रेरित होकर लिखने का मन हुआ। इसके पूर्व प्रख्यात रचनाकार विजय देवनारायण साही की कुछ पंक्तिया स्मृति में आ रही है, उन्हें जरूर लिखूंगा , जिसके अर्थ तथा गंभीरता की गहराई में जाकर मेरी सीधी व सपाट कविता के संग आप किनारे लग सकते है।
" सच मानो प्रिय
इन आघातों से टूट- टूट कर
रोने में कुछ शर्म नहीं ,
कितने कमरों में बंद हिमालय रोते है।
मेजों से लग कर सो जाते कितने पठार
कितने सूरज गल रहे है अंधेरो में छिपकर
हर आंसू कायरता की खीझ नहीं होता। "
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क्या ऐसे ही प्रतिभाये
रोती रहेंगी?
चाटुकारों- चापलूसों की चांदी कटेगी?
शिक्षाये धंधे बाजों के खेत सींचती रहेंगी ?
कुर्सी पर मूर्खाधिराज का शासन होगा?
प्रिये मंज़र खौफनाक है ।
ऐसे में ईमान लहुलुहान होता दिख रहा है
तो कोई नई बात नही।
प्रतिभाये बिखरते बिखरते रेत बन चुकी है।
रेगिस्तान हो गई है आदमियत,
जिसपे मुह मारने वाले ऊँटो का काफिला
अट्टहास करते गुजरता है।
और बदनीयत मंजिल पा रही है।
किंतु प्रिये अभी भी उम्मीदे शेष है
अन्धकार के घटाटोप बादल छंटेंगे जरूर
क्योकि पचती नही है
हराम की कमाई।
जुलाब होता है और नासूर बन
रिसती है शरीर के हर कोने से।
सच्चाई है यह,
इससे मुह मोडे जो खड़ा है, खड़ा रहने दो।
बस तुम प्रतीक्षा करो।
सोमवार, 30 मार्च 2009
जैसे माँ का आँचल
मेरे तपते हुए जीवन को
बर्फ सी ठंडक देता है,
मै थोडा शांत होकर
अपने 'होने' के भाव को
महसूस करने लगता हूँ।
तुम्हारे शब्द सुमन
मेरे रेगिस्तानी पथ पर
मखमली गलीचे का
निर्माण करते है,
और दूर होने के बावजूद
लक्ष्य के करीब होने का
अहसास होने लगता है।
तुम्हारा दिया गया
अप्रत्यक्ष मान- सम्मान
इस भीड़ भरी
स्वार्थी दुनिया में
मस्तक को गर्व से
ऊंचा उठाने में
टेका देता है,
और दंभ से भरा
आकाश मेरे कदमो में
लिपटने लगता है।
एक सच कहू-
तुम्हारा व्यवहार
और तुम मेरे लिए
ठीक वैसी हो
जैसे माँ का आँचल।
शनिवार, 28 मार्च 2009
ह्रदय से धन्यवाद
आज ही लौटा हूँ, ब्लॉग देखा, अपने आदरणीय, प्रिय, मित्र, स्नेही, शुभचिंतक और कुछ नए पाठको ने अपना स्नेह बनाये रखा है, जो मेरे लिए सोभाग्य की बात है।
मै अपने ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ, और उम्मीद करता हूँ आप सबका स्नेह बना रहेगा। सुधीर, vijay kumaar, प्रवीण त्रिवेदी, sandhya guptaji , shyamkoriji, अनिल कान्तजी ,समीर सृज़नजी , ब्रजमोहन श्रीवास्तवजी ,कुमार धीरज, हेम पांडेजी, विनीता यशस्वी ,रंजनाजी, आदि सभी का आभारी हूँ जो आपने समय निकाल कर मेरी रचना पढ़ी और अपनी टिप्पणिया दी।
विशेषरूप से गौतम राज ऋषिजी , दिगंबर नासवाजी का ब्लॉग पर आना मेरे लिए हमेशा से ही सुखद अनुभूति रही है। और हां प्रिय काजल का मेरे शब्दों के संग सफ़र अलग ही अहसास दिलाता है। सबका आत्मीय आभार। आप सबका प्रेम बना रहे यही कामना है।
बुधवार, 4 मार्च 2009
मै सुख चुरा लाया हूँ
ग़मगीन रात में
चांदनी बिखेरता ये चाँद क्यो हंस रहा है?
लो प्रिये , उसकी मुस्कुराहट उधार लाया हूँ।
यकीन करो मै
उम्रभर काँटों के बीच जूझता रहा,
आज एक गुलाब खिला लाया हूँ।
मुझे पता नही
प्रेम का इजहार कैसे होता है?
जो दिल में था वो उगल आया हूँ।
है हाथ तुम्हारे
पतवार मेरी मासूम जिन्दगी की ,
मै नाव बीच मझधार छोड़ आया हूँ।
शनिवार, 28 फ़रवरी 2009
पिता
हवा संग, ऊंचे पर्वतो
उबड़- खाबड़ रास्तो
खेत-खलिहानों, नदी -तालो
वृक्षों, उनके झुरमुटों के
बीच से होकर
इस महानगर की
भागती- दौड़ती
जिंदगी को चीरती
समय की
आपाधापी को फाडती
थकी -हारी
सीधे मेरे हृदय में
जा धंसती है औऱ
मैं लगभग बेसुध सा
तत्क्षण उनके पास
पहुंचने के लिए
अधीर हो उठता हूं
कि तभी
महानगरीय मकडी
अपने पूरे तामझाम के साथ
दायित्वों, कर्मो,
नौकरी - चाकरी
का तामसी, स्वार्थी
राक्षसी जाल बुनने
लगती है,
जिसमे फंस कर में
छुट्टिया लेने
छुट्टिया मिल जाने की
याचनामयी सोच
के संग तडपने लगता हूँ।
जाल और सोच के
इस युद्ध के मध्य
मस्तिष्क सुन्न हो जाता है।
गीता का सार
कुरान की आयते
या बाइबिल, गुरुवाणी की शिक्षाये
सब निष्फल हो कर
मेरी इस जंग में
हाथ मलते दिखती है।
समय जाता रहता है,
मेरी जरूरत,
मेरे होने का भाव
सब कुछ शून्य में कहीं
खो जाता है।
राक्षसी मकड जाल
कस जाता है,
महानगरी मकडी
मुझे लानत भेजती है
और अपने पुत्र होने पर
मुझे कोफ्त होती है।
ह्रदय में धंसी वो
आवाज़ भी कही
विलीन हो जाती है,
कि फोन आता है,
मैं ठीक हूँ
तुम परेशान मत होना
मेरे बेटे।
............................
काश
हर पिता के
साथ उसका बेटा
आजीवन रह सके,
ऐसा कोई
ईश्वरीय वरदान
प्राप्त हो सकता है क्या?
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009
प्रेम
शनिवार, 21 फ़रवरी 2009
शान्ति
मेरी धरती पर
तुम्हारी पाश्चात्य सोच के
लाल गेहूं
नहीं बोए जाते।
यहां गोबर से लीपे
आँगन में फैली
सौंधी महक
पूरे शरीर को
पावन करती है।
तुम्हारे ऊंचे व मंहगे
परफ्यूम की तरह
शरीर में उत्तेजना व
मादकता का
संचार नहीं करती।
यहाँ गली- गली
खेत-खलिहानों में
कूदते - फांदते
धूल धूसरित बच्चे
वृक्षों की टहनियों पर
झूलते- लटकते
मस्ती भरी जिन्दगी
जीते है।
किसी एस्सेल वर्ल्ड के
कृतिम व यांत्रिक
झूलो में बैठ कर
भौतिक आनंद
में लिप्त क्षणभंगुर
उत्साह का अनुभव
नहीं करते।
हां, गंवार तो मैं हूं ही
मुझमें प्रेम का
वह भौतिक
रूप भी नहीं
जिसमे दैहिक योग
की अग्नि प्रज्ज्वलित होती है,
और जब शांत होती है तो
सिवाय दुःख के
हाथ कुछ नहीं लगता।
ऊंची- ऊंची अट्टालिकाओं के
मोह में फंस
चौंधियाती जिन्दगी में
जीने की जो ललक
तुममे है, शौक से जियो।
किन्तु हां,
जब इस शौक से उपजने वाला
'शोक' तुम्हे तंग
जिन्दगी का अहसास
कराये तो
वही ऊंची सी तुम्हारी छत
पर चढ़ कर चाँद को देखना
जो मेरे गाव के आसमान पर भी
चमकता है और
नदी- नहरों की लहरों पर
अठखेलिया
करती उसकी किरणे
मन को अद्भुत सी
शान्ति का अहसास कराती है।
ठीक मेरी भावनाओं की तरह
जिसे तुमने कभी तरजीह नहीं दिया।
शायद वो चाँद
तुम्हे कुछ शान्ति दे सके?
तुम देर न करो
गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009
इश्तहार
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009
इश्क ऐ ताक़त

" दिखता नही
खुदा , मगर
उसे सब जानते है,
शब्दों से जैसे
आपको हम
पहचानते है।
जरूरी नही
इश्क में
किसीका राज़ी होना,
नाम दिल में
सजाकर भी
लोग उम्र गुजारते है।
इबादत हमारी
सुनेगा वो एक दिन,
जो पाक- ऐ दिल से
उसे हम पुकारते है।
छोड़ दुनिया को
हमारे वास्ते
वो जरूर आयेंगे ,
इश्क -ऐ- ताक़त को
हमारी, हम
खूब जानते है। "
सोमवार, 16 फ़रवरी 2009
कभी- कभी
मस्तिष्क के
अतीत कोष से बहकर
मधुर स्मृतिया
ह्रदय के
खारेपन से जा मिलती है,
ओर किसी
लेमन जूस की तरह
जीवन की तपती
दोपहर में
ताजगी का
अहसास करा जाती है।
कभी - कभी
लगता है मानो
मेरे ही साथ
चलने वाली छाया भी
किसी साए का
हाथ थामे चल रही है,
ओर मे कुछ
ज्यादा देर तक
सूरज की तेज़
किरणों को सहन कर
चलता रहता हूँ।
कभी - कभी
मेरे अकेलेपन में
बर्फ सी ठंडी हवा
इन्द्रियों को बहलाकर
चुरा ले जाती है
ओर न जाने किस
ऊर्जा स्त्रोत में बहकर
में कुछ ज्यादा ही देर तक
अकेला बैठा रह जाता हूँ।
शायद ये वही
ह्रदय के खारेपन में
घुले लेमन जूस का कमाल है
जो मुझे
मेरी बिछड़ चुकी
यादो को ताज़ा कर
एकबार फिर
नया जीवन जीने को
प्रेरित कर रही है।
शायद
कभी -कभी
ऐसा हो जाता है।
शनिवार, 14 फ़रवरी 2009
प्रेम भोक्ताओ को दूर से राम राम
बाज़ार में बहुत सारी गिफ्ट आई है, तरह तरह की। पूरे सालभर थोडी रहती है ऐसी गिफ्ट ओर न ही ऐसा प्रेम। प्रेम तो उसे कहते है, जो गिफ्ट दे , ले।वैसे वेलेंटाइन महाराज जी का भी जवाब नहीं था। वेसे ये थे कौन भाई? होंगे तो कोई बड़े बाबा, क्योकि उनको लेकर देखिये कितना हो हंगामा चल रहा है। सब अपनी अपनी दुकाने लगाये बैठे है। कोई प्रेम कर रहा है, कोई प्रेम में बाधा बना फिर रहा है, किसी की राजनीति चल रही है, किसी का लेखन चल रहा है, कोई दोनों हाथो से लूट रहा है यानी कमा रहा है, तात्पर्य ये है कि इन महाराज जी ने सबको व्यस्त कर रखा है। पहुंचे हुए लगते है। उन्हें भी दूर से राम राम। तो प्रेम दिवस के भक्तो लगे रहो। खूब मज़ा लो, लुत्फ़ उठाओ। प्रेम तो इसीका नाम है। अपने लैला मजनू , सीरी फरहाद ....को भी वेलेंटाइन महाराज जी के दर्शन हो जाते तो शायद उन्हें पुण्य लग जाता। बदकिस्मत थे बेचारे। अरे प्रेमभोक्ताओँ की किस्मत देखो इम्पोर्टेड माल खरा होता है, ओर उन्हें वो मिल भी रहा है। लगे रहो भाई।
अफ़सोस बस इतना है, मेरे देश की मिटटी को भी मिलावटी करने का जो षडयंत्र रचा गया था वो सफल रहा है। पर नहीं हम जैसे षडयंत्र कहने ओर मानने वालो को क्या पता प्रेम क्या होता है? भाई हमने तो प्रेम किया नहीं है, हमारा नमस्कार पंहुचा देना उन वेलेंटाइन महाराज जी को॥ ओर आपको दूर से राम राम। मुबारक हो आज का दिन...कल क्या करोगे? अरे छोडो जाने दो..में भी क्या सोचने लग जाता हूँ।
गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009
वो भूमि बंज़र हो गई
मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009
अश्के खूं
रूह पता नही कहां खो गई ।
अब लडाई है, झगडे है, आशिके- महजूं है
दो जिस्म एक जान की तक़रीर बदल गई ।
उतारा था खुदा ने हमें इश्क के वास्ते
हिज्र की आस्मां पर क्यों बदली छा गई ।
तूने न जाना हमारी असलियतों को जाना
खामोश रहकर आँखे अश्के खूं पी गई ।
शनिवार, 7 फ़रवरी 2009
स्नेह आमंत्रण
बुधवार, 4 फ़रवरी 2009
प्रेम
दो शरीर से
निकली तरंगो का
मिलन नहीं ,
न ही
स्त्री - पुरुष के
संबंधो का
खेल है।
प्रेम तो वह
ह्रदय की कम्पन
धारा से बहने वाली
पावन पवन है ,
जो
कृष्ण के अधरों पर
रखी बंशी के
छिद्रों से प्रस्फुटित होकर
राग रूप में
जीवन रस घोलती है।
प्रेम सिर्फ
शब्दों से बुना मकड़
जाल भी नहीं ,
न ही
मायावी जगत का
सौदाई ताल है।
प्रेम तो
वो ओस की बूँद है
जो सुबह की
नई कोपलों से
ढुलकता हुआ ,
सूर्य किरणों संग
बेहद मासूमियत से
चमकता है ।
जिसे धरा की
भींगी भींगी
द्रूप
ईश्वरीय चरनामृत
मान आचमन कर
वायु में प्राण तत्व
प्रवाहित करता है।
किन्तु विडम्बना है॥
आज कहा है प्रेम ?
आज है तो
सिर्फ एक वादा है
एक सौदा है।
मेने किया
तूने किया का
लेखा- जोखा है।
शायद
यही वजह है की
आज बिछोह है
दुःख है, संताप है ,
प्रेम नहीं सिर्फ एक
धधकता
उत्ताप है ।
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009
मै
मगर कह नहीं सकता,
क्योकि
मै जब यह कहता हूँ की
मै इमानदार नहीं हूँ, तब भी
मै इमानदार नहीं होता।
सोमवार, 2 फ़रवरी 2009
१ बंधुआ, २ शून्य
जो दर्द सहे है
जिन दर्दो को सहना है
हिसाब नहीं होता आदमी के पास।
सिवाय इसके की
ब्याज चड़ता जाता है
ओर आदमी समझ नहीं पाता
की
वो दर्दो का बंधुआ
कैसे बन गया?
२,
आदमी अधुरा है।
जन्म से लेकर मृत्यु तक,
कितनी बार जिया ओर कितनी बार मरा?
इसका कोई गणित नहीं।
हां गणित होता है,
धन का, समाज का, लोक का,
लाज का, कर्तव्यो का,
उसका- मेरा ....
मगर जीवन का नहीं,
यानी
टोटल में शून्य है।
रविवार, 1 फ़रवरी 2009
गुरुवार, 29 जनवरी 2009
हां में हूँ ना
उसकी कोमल उंगलियों ने
पहली बार
जब मेरे चेहरे को छुआ
मानो टटोलकर विश्वास किया
अपने पापा के होने का।
हां , में हूँ मेरी बेटी
तुम्हारा पापा।
गोद में उठा
कंधो पर बिठा
पीठ पर मुझे घोडा बना ,
उंगलियों को पकड़ कर
वो दोड़ती हुई
समय के रथ पर सवार होकर
अपने संसार में कब प्रवेश कर गई
मुझे नही पता चला,
में तो उसकी रुकावटों को,
आने वाली बाधाओं को
अपने जवान हाथो से
दूर करता हुआ
कब बूडा हो गया
नही पता।
अब
अपने कमजोर हाथो से
उसके चहरे को
टटोलता हूँ
और अहसास पाता हूँ
उसके होने का ,
'बेटी' है वो
इसलिए कहती है
हां में हूँ ना, मेरे पापा
तुम्हारे पास।
सोमवार, 26 जनवरी 2009
गणतंत्र दिवस पर
चारो तरफ रेगिस्तान ओर ज़मीं बंज़र है
दुश्मनों की बात तो छोडिये जनाब
दोस्तों के हाथो में भी अब खंज़र है।
सोचने में क्या बुराई है?
शुक्रवार, 23 जनवरी 2009
आज मेरे 'राम' की बात
राम नाम रटते रहो,rakh कर आत्मविश्वास
छोड़ दो उस पर अपनी, सारी जीवन आस॥
राम नाम के जाप को, बनाओ अपनी पतवार॥
बिना राम के जाप से होना हे अनर्थ॥
सुलझा लो जीवन अपना करके राम आराधन॥
फिर भला किस काम की ये सांसारिक माया॥
राम राम श्री राम राम जपते रहो दिन रात॥
बुधवार, 21 जनवरी 2009
सुप्त ज्वालामुखी

शनिवार, 17 जनवरी 2009
जो पंक्तिया मुझे अच्छी लगती है
सुरा लिए शाम
अच्छा भाई सूरज , राम राम ..... ''
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''अश्रु था हृदय में आँखों पर न आया
शब्द थे मन में , फडके न होठो पर''
----------निशीथ
रविवार, 11 जनवरी 2009
आज भी है
शुक्रवार, 9 जनवरी 2009
फिजूल
जुटे होते है हम
बैल की तरह ।
पूरी जिंदगी
इसका- उसका
तेरा- मेरा
करते रहते है ।
मन का हुआ
तो खुशी
न हुआ तो गम ...
ओर सबकुछ
टिका होता है
दूसरो के व्यवहारों से ॥
पाने- खोने की
लालसा में ।
बस...
फिजूल में ही.....
गुरुवार, 8 जनवरी 2009
अफ़सोस
वो न मेरा हुआ
कौन किसका हुआ
सब हुआ तो
पराया हुआ
पूरा , समग्र जीवन भी
कंहा अपना हुआ
हुआ तो मृत्यु का हुआ
ओंर .....वह भी
कंहा किसकी हुई
फ़िर जीवन हुआ.....
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उलझन
हिसाब - किताब
कितना ,
गणित
ओंर समीकरण
बस उलझन
पूरा जीवन
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वो
वो उसका
चुपके से आना
गली में मिलना
रोना- हँसना
बातें करना
वक़्त फे साथ
बिसर गया
बिसर गया
समग्र प्रेम संसार
सिमट गया
चार दीवारी में
समाज का पंछी बन
आजादी के अतीत को
याद करते हुए
पूरा जीवन
अब
पिंजरे में फडफडाते रहना
मिलने को तरसना
सिर्फ़ रोना
वक़्त के साथ
पसर गया
बुधवार, 7 जनवरी 2009
याद
माता पिता की याद आती है बिल्कुल बच्चो की तरह बच्चा तो हूँ ही बड़ा पद या प्रतिष्ठित व्यक्ति बन जाने पर आदमी बड़ा हो जाता है क्या? वो भी अपने माता पिता के लिए ? मेरी उम्र का अन्तर आज भी उतना ही है जब में पैदा हुआ था आज भी उनकी उंगलियों को पकड़ कर ही चलना होता है फर्क बस यह है की उंगलियों का मतलब बदल कर अनुभवों से हो गया है सच में खूब याद आती है
मेरी इस याद को लेकर कई है जो मुझे नादाँ समझते है कुछ तो हँसते भी है मगर उनके समझने न समझने से मुझे क्या? मुझे तो आज भी लगता है की पिता की सर पर छत्रछाया हो ओर माँ की गोद में सर हो , उनके हाथो की थपकियों से जो सुख रिसता है वो इस संसार के सुखो से भिन्न है एसा सुख जिसे पाने के लिए इश्वर भी लालायित रहता हे पैसा, ऐश्वर्य... क्या सुख असल में दे पाते है? सच तो ये है की ख़रीदा गया सुख भी कोई सुख होता है
आज बहुत याद आ रही है मन करता है भाग कर उनके पास चला जाऊ उनके आँचल में अपने आप को समां दू
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मंगलवार, 6 जनवरी 2009
सोमवार, 5 जनवरी 2009
रविवार, 4 जनवरी 2009
शुक्रवार, 2 जनवरी 2009
गुरुवार, 1 जनवरी 2009
रोटी
दौड़ता बच्चा
लड़खडा कर गिर जाता है
और
वह टुकडा
एक कुत्ता पा जाता है
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रोजगार
जिसके भरोसे पर
बूडे माँ बाप है
वह हर
दर भटकने के बावजूद
बे रोजगार रह जाता है
खूबसूरत सी महिला
जिसके लिए जीवन एक फैशन है
रोजगार उसे
मिल जाता है
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प्रेम
गर प्रेम में पाना होता
तो पा जाता
किंतु फ़िर
आंसुओ का
स्वाद कैसे मिल पाता
सोमवार, 22 दिसंबर 2008
सोमवार, 1 दिसंबर 2008
पीड़ा
उन पत्थरो की पीड़ा
कौन जाने ?
जो लहरों के थपेडो से
ठीक उसी तरह दो हाथ करते हे
जेसे गरीब
दो जून की रोटी के लिए



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