सोमवार, 24 सितंबर 2012

द्वैत है और अद्वैत भी

चारो और है 
कणिका जगत /

ऊर्जा के अबेध कण /

कई कई ..,

मगर 

सब आपस में 
लथ-पथ/

आश्चर्य ...

कि
द्वैत है और अद्वैत भी /








(जैसे - 'मै' -'तुम' द्वैत 
मगर 'हम' अद्वैत ) 

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

सिगरेट अच्छी होती है


अगर इश्वर है तो चमत्कार भी होगा। बगैर चमत्कार के कौन इश्वर की सत्ता पर विश्वास करता है। इतने इतने सारे लोग यदि घुटने टेकते हैं तो चमत्कार की वजह से ही न! और इतने-इतने वे लोग भी घुटने टेकते हैं जिन्हें चमत्कार का कोई अनुभव मिला होगा। तो भैया दिखा दे चमत्कार।
 है न तू?
मैं भी घुटने टेकना चाहता हूं।
तुझे याद करना चाहता हूं।
सुना है तू ऐसे ही तो सबसे घुटने टिकवाता है, नहीं।
 देखूं..कहां है तू?
तेरा चमत्कार!
मुझे भी अधिकार है देखने और तुझे मानने का?
सिर्फ  प्रेम में या मूरती बन जाने वाली चेहरे की मुस्कान से क्या होता है?
होता तो दीवार पर लटके या किसी मंदिर में बैठे -खड़े, टूटते हुए दरवाजे या लड़ते हुए लोगों की भीड़ नहीं देखता। वैसे  तो तू हंसता रहता है..लुटता हुआ जीवन देखने के बाद भी।
वो हाथ जोड़े सैकड़ों की तादाद सिवा भीख मांगते हुए ही दिखी है मुझे आजतक। उन्हें नसीब तो कुछ नहीं हुआ। वैसे के वैसे ही हैं गलीच बस्तियों में, गलीच जीवन जीने को विवश।
खैर.. चल दिखा दे यार कोई चमत्कार..। है न तू? बोल...है की नहीं......
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सार्वजनिक स्थल से दूर किसी एकांत में खड़े होकर सिगरेट धौंक रहा है वो। धुएं के झल्लों में अपनी बुदबुदाहट के शब्दों को लपेट कर हवा में तैरा देता है, हवा में फैलते  हुए वो आसमान में कहीं जाकर लुप्त से हो जाते होंगे , उसे लगता है कि अब ये शब्द आसमान को आच्छादित कर देंगे और सारा आकाश मेरे शब्दों से गूंज उठेगा । दिग-दिगन्ता कांप उठेंगे । या फिर अपने चेहरे पर छा गए धुएं को हटाते हुए नाक बंद करते हुए कहेंगे?
कौन सिगरेट पी रहा है?
हा हा हा..
हंसते हुए अधजली सिगरेट नीचे फेंकता  है, अपने पैरों के जूते से मसलता है और सामने वाली गली के अंतिम छोर तक देख सकने का प्रयत्न करता है। वहीं से तो आना है उसे, मिलने का कहा था। और ये इंतजार..।
इंतजार पैरों में जंजीरे जकड़ देता है, जाना भी चाहता है कोई तो न जा सके, ऐसी। सिगरेट इंतजार की जंजीरों को जलाती हैं। हां, लाहे की जंजीरों को जलाने के लिए एक से तो काम नहीं चलने वाला न, इसलिए कई कई पी जाता है वो। वैधानिक चेतावनी के बावजूद। वो सोचता है..एक चेतावनी आदमी के शरीर पर भी खुदी हुई होना चाहिए- जन्मजात- ‘कितना जिएगा, एक दिन तो जाना ही है पट्ठे...।’
क्योंकि फिर भी जिएगा वो..देख देख कर जिएगा जैसे सिगरेट पीता है..।
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इसी सिगरेट से तो कभी वो मिली थी,
कहा था-क्यों पीते हो..अच्छे भले दिखते हो।
वो  हैरान था कि दिखने और सिगरेट पीने के बीच क्या तारतम्य। उसने बताया भी था कि इससे चेहरा मुरझा जाता है। वो  जोर से हंसा था, उसने  हंसने का कारण पूछा तो,
उसने  हंसते हंसते ही कहा- क्यों हंसने से चेहरे की रौनक नहीं बढ़ जाती?
दोस्ती हो गई थी। दोस्ती के पीछे सिगरेट थी। वो उधर जल रही थी, इधर दोस्ती आगे बढ़ रही थी। शायद सिगरेट के अंतिम छोर तक आते-आते दोस्ती भी अलविदा हो गई।उठा  ही लेना था फिर से सिगरेट को। क्योंकि यही थी जो उसे ताप देती थी। संताप से बचकर। कितनी रातें उसने धुएं में बिताई,
धुआं जिंदगी जैसा ही तो होता है।
घना, छल्लेदार,
उड़ता है हवा में, टिकता नहीं जमीन पर।
जमीन पर रेंगता हैं।
जिंदगी भी रेंगती है..। धुएं के माफिक।
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आफिस ब्वाय से लेकर बॉस तक ने सिगरेट पीने की मनाही कर रखी थी..। ये कोई पांचवा दफ्तर होगा जहां मना किया गया था। योग्यता जलती हुई सिगरेट की तरह होती है..राख बन जाती है तब जब आपको कोई लत हो। उसे लत नहीं थी..सिगरेट तो बस इसलिए थी कि इसके अलावा उसके पास था क्या! न साथी, न संगी..। एक दिन कलिग ने कहा था कि
यार शादी कर ले..। ये सिगरेट छूट जाएगी।
कुछ छोड़ने के लिए कुछ बहुत बड़ा पकड़ना होता है। दोनों में अंतर क्या है? शादी और सिगरेट। कलिग्स भी मन बहलाते हैं। उससे  सहानुभूति प्रदर्शित करने के लिए सिगरेट को बदनाम किया जाता है। खैर..कुछ नहीं छूटा, सिर्फ  नौकरी छोड़ दी।
प्रतिभा का अचार डाल भी दो तो उसे खानेवाला कौन है? सड़ ही जाना है। सड़ने से बचाना है तो प्रतिभा को स्टोर करके रख देना चाहिए।
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दर-दर भटका। क्योंकि नौकरी की जरुरत होती है। जेब में जब तक पैसा तब तक दुनिया आपकी। सिगरेट आपकी। उधार ज्यादा नहीं देता कोई। महंगी हो गई है। सरकार ने मुझ जैसे से सिगरेट छुड़वाने के लिए उसे महंगी कर दी..। या फिर इसका फायदा उठाकर  ज्यादा कमाई का जरिया बनाया? शायद बेरोजगारी बढ़ाकर बाजार बढ़ाया जा रहा हो? पता नहीं...जो हो..पर नौकरी आवश्यक हो जाती है।
वो जितनी भी थी, जितनी भी मिली थी सब नौकरी कर रही थी। अच्छी पढ़ी-लिखी हैं..स्मार्ट हैं..उन्हें तुरंत नौकरी मिल भी जाती है क्योंकि वे सिगरेट पीती भी हैं तो कायदे और तमीज के साथ। हा हा हा।
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उस धुएं में बात पते की थी। घर में कोई छह सात खाने वाले, बूढ़े मां-बाप और इकलौता वही था कमाई का साधन। पूरी योग्यता। कहीं से भी कोई कमी नहीं। मगर नौकरी नहीं। जिससे आज वो मिलने वाला था वो उसके साथ ही पढ़ा करती थी..आज उसके इंतजार में इसलिए खड़ा था कि किसी नौकरी के संदर्भ में उसे वो कही ले जाने वाली थी...। कहा तो उसने ऐसा ही था । वो अब तक नहीं आई थी क्योंकि..वो नौकरी कर रही थी..किसीका इंतजार उसके लिए मायने नहीं रखता था..। फिर ऐसे का जो सिगरेट के धुएं में अपनी जिंदगी को तबाह किए बैठा  है।
तबाह या आबाद!
जो हो ...
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यार भगवान..तेरा चमत्कार देखने का मूड है..चल बहला दे थोड़ा...। एक सिगरेट और मुंह में लगाकर उसने खाली डिब्बा सामने सड़क पर फेंक  दिया..जो लुढ़कते हुए किनारे जा लगा... । पर वो नहीं।..
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* कन्टीन्यू..क्योंकि ये कहानी खत्म नहीं होती..जलती जाती है..चैन स्मोकिंग  की तरह....

मंगलवार, 26 जून 2012

बिखरे बिखरे से कण -

-खाली होना , खाली होना नहीं होता/ भरा होना भी होता है/ लबालब/ ये आकाश है/ खालीपन से पटा हुआ.
-मेरी कलम मेरी ही हो, जरूरी नहीं/ जैसे मेरे शब्द/ लिखे/ तुमने पढ़े तुम्हारे हो गए/ तुमने पढ़े, फेंके आवारा हो गए/ जैसे मुझे तुमसे प्रेम है, जरूरी नहीं कि तुम्हे भी मुझसे हो..
-दो प्रेमियों का मिलन/ तीन चीजे है/ दो में प्रेम है तीसरे में मिलन/ एक को प्रेम है/ दूसरे को उससे प्रेम है/ यानी उसे भी प्रेम है/ फिर मिलन है/ मिलन प्रेम नहीं है/ प्रेम की वजह है/ और जब इस 'वजह' से हम प्रेम करने लगते है तो बिछोह भी 'वजह' बन कर टूट पड़ता है/ ये वजहों का झंझट है/ वरगना प्रेम ने कब किसे धोखा दिया है/ धोखा तो 'वजहे' देती है/
-आध्यात्म ? मेरे अन्दर उठी ज्वाला है/ पूरा शरीर/ दिमाग सहित / प्रकाशमयी है/ प्रकाश है/ उसकी परिधि क्या है, वो कहां तक पहुच रहा है/ प्रकाश नहीं जानता/ उसे तो बिखरना है/ मुझे/ तुम्हे/ जितना हो समेटना है/ संजोना है/ अगर हाथ जलने का डर न हो तो..

शनिवार, 23 जून 2012

कृष्ण का जादू

कृष्ण ने मुझे हमेशा से ही प्रभावित रखा है. वैसे भी कृष्ण सर्वाधिक लोकप्रिय, रहस्यमयी, पठनीय और ह्रदय समीप विषय है. जितना अध्ययन करो कम है. कई कई सारी जानकारिया   कृष्ण में दिलचस्पी  पैदा  करती  है. और लगता है कि बस पढ़ते जाओ. मै कृष्ण को  किसी धर्म विशेष की तुला पर नहीं बैठाता क्योंकि वो उससे परे का विषय है. कृष्ण हमारा पूरा एक जीवन है. इस जीवन की थाह पाना सचमुच कठिन है किन्तु गहरे जितना उतरो मोतियों का अपरम्पार खजाना हाथ लगते ही जाता है. बहुत पहले कृष्ण के एक विशेष विभाग पर शोधपरक कथा गढ़ने की ठानी थी.प्रारम्भ  भी किया था वह कार्य.किन्तु रोजमर्या की आपाधापी ने उस महती कार्य को रोक दिया.रुका तो रुका ही रहा. अब एकबार फिर उसे नए सिरे से गूंथने का विचार  है जो  यथाशीघ्र प्रारम्भ  कर दूंगा. ख़ैर..इसके पहले कुछ महत्वपूर्ण जानकारिया लिखने का मन है. इसके नेपथ्य   में दो    बाते   है, एक तो यह संग्रहित   हो जायेंगी   दूसरे   आपको  भी पढने  में आनंद  आयेगा . 
कई  सारी भ्रान्तिया है, कई सारे तर्क है, कई सारे आत्मविश्वास और अतिविश्वास है. कृष्ण का जन्म, कृष्ण का जीवनकाल आदि पर बहस-मुबाहस है. जो भी है वो सदा रहेगा किन्तु मै समझता हूँ अनुसंधान जिसे करना हो वो  करे..जिसे प्रलाप करना हो वो करे. हमारे लिए तो कृष्ण सामने खड़ा है, बांसूरी की धुन पर मुग्ध कर रहा है. इसलिए प्रमाणिकता हमें हमारी खोज पर संतुष्ट  करती है. बहरहाल, कृष्ण के विकास, स्वरूप को प्रकट करने से पहले पूर्व वैदिक देवता विष्णु के स्वरूप को समझना जरूरी हो जाता है ताकि कृष्ण के सन्दर्भ में हमें प्रमाणिकता प्राप्त हो सके. वेद सर्व प्रथम सूत्र है किन्तु कृष्ण वेदों में नहीं मिलता, पुरानो में मिलता है. ऐसे में भ्रम पैदा होना लाजिमी है. मेरा जो अध्ययन है उसके तहत चूंकि पुराण कृष्ण को विष्णु का अवतार और वृष्णि वंश का मानता है इसलिए वेद से भी जुड़ जाता है. कैसे ? ऋग्वेद में कही-कही विष्णु का उल्लेख है , विष्णु 'विष' धातु से बना, जिसका अर्थ व्याप्त होना है/ विष्णु कही मुख्य तो कही समानार्थक रूप में आया है. शक्ति के अर्थ में भी विष्णु का उल्लेख है. ऋग्वेद मन्त्र में विष्णु का सम्बन्ध गायो से भी बांधा है. ऋग्वेद के सातवे अध्याय में २९ वा सूक्त गाय, गोपाल, गौचारण से सम्बन्ध रखता है. इधर कृष्ण को 'गोपाल' भी कहा गया है. रिग्वेदी विष्णु  और उसका गायो से सम्बद्ध होना मुझे कृष्ण के अवतार पर सहमत कराता है. कृष्ण जन्म के सन्दर्भ में ब्रह्म वैवर्त पुराण में कृष्ण का जैसा रूप-सौन्दर्य वर्णन है वो ठीक विष्णु से मिलता जुलता है. आप देखिये वैदिक विष्णु जो प्रथम कोटि का देवता नहीं है किन्तु धीरे धीरे देवत्व के सबसे उपरी आसन पर विराजमान हुआ है और इधर कृष्ण भी कुछ इसी प्रकार सर्वोपरि हुए/  ऋग्वेद में कृष्ण का नाम हमें जरूर मिलता है आठवे मंडल के ८५ वे ८६, ८७, और दसवे मंडल के ४२, ४३,४४, सूक्तो के ऋषि का नाम कृष्ण है. उन्ही के नाम पर कृष्णायन गौत्र चला.हालांकि यह वैदिक ऋषि कृष्ण हमारे कृष्ण नहीं है किन्तु यह मान्य करना पड़ जाता है कि उनके नाम पर ही वासुदेव ने अपने पुत्र का नाम कृष्ण रखा हो. ख़ैर..इस सन्दर्भ में भी विवेचन है. किन्तु कृष्ण जन्म को लेकर बहुत सारे तर्क-वितर्क है. देश-विदेश के खोजियों ने अपने-अपने तर्क दिए है. हापकिंस तो कहता है कि महाभारत में पहले कृष्ण का मनुष्य रूप ही है, बाद में वो देवत्व से युक्त कर दिया गया. कीथ भी इसे मानता है. ईसा से ४०० साल पहले कृष्ण के देवत्व का खूब प्रचार हो चला था. आप जानते है कि ईसा से ३०० वर्ष पूर्व मेगस्थनीज भारत आया था, उसने भी लिखा था कि मथुरा और कृष्ण पुर में कृष्ण की पूजा होती है. पुराण, पुराणकार, यात्री , लेखक, इतिहासकार आदि के तर्कों में भले ही थोड़ा बहुत अंतर रहा हो मगर यह सब मानते है कि कृष्ण नामक एक देवतुल्य पुरुष  इस धरती पर जन्मा था...बहुत से शिध्परक संग्रहण है, मेरे पास भी है..और इन्ही सबकी वजह से कृष्ण का जादू छाया हुआ रहता है..समय समय पर कुछ लिख लिख कर खुद की कलम को भी साधुँगा ताकि अपने मूल शोधपरक कथा को बल मिले और मै उसे लिख सकने मै समर्थ बन सकू. फिलहाल इतना ही.    

गुरुवार, 10 मई 2012

100 वे जन्मदिन पर विशेष- "मंटो का मतलब"


" जब मै किसी से दोस्ती करता हूँ, तो मुझे इस बात की तवक्को होती है कि वो अपना आप मेरे हवाले कर देगा. दोस्ती करने के मुआमले में मेरे अन्दर ये एक जबरदस्त कमजोरी है जिसका इलाज मुझ से नहीं हो सकता .."
 ढेर सी काबिलियत वाली कमजोरियों से सना और कलम की नोंक से जिन्दगी की सच्चाई को उखाड़ने वाला नाम है सआदत हसन मंटो. १०० साल के मंटो को बधाई. आपको लगेगा कि मंटो तो इस दुनिया में है नहीं फिर बधाई कैसी ?मगर मंटो मरा कब? उसे जो और जितने लोग पढ़ते -समझते है उनके दिल-दिमाग में झांकिए तो पता चलेगा मंटो ज़िंदा है. हां, वो और शख्सियतो की तरह आज भी नहीं बन पाया जिनके जन्मदिनो या किसी विशेष दिनो को जलसों का आकार देकर मनाया जाता है. शुक्र है मंटो इन सब से बच गया . ख़ैर.. पूरी जिन्दगी बस जंग रही. मगर जंग के बीच मंटो की जो साफगोई रही वो ऊपर लिखे वक्तव्य से स्पष्ट जाहिर हो जाता है. हालांकि मंटो ने जीवन के हर मोड़ पर मात खाई चाहे निजी जिन्दगी का मसला हो या बाहरी जिन्दगी का..दोस्ती हो या दुश्मनी का.. किन्तु मात खाने का मतलब यह नहीं कि मंटो थम गया हो..चाहे समाज ने गालिया दी हो, या अदालत में उस पर अश्लीलता के मुकदमे चले हो, मंटो ने पार किये हर दौर जो उसके खिलाफ रहे..टूटन रही मगर मंटो झुका नहीं ...इसलिए मंटो मरा नहीं..इसलिए उसके जन्मदिन पर उसे बधाई

.. क्या लिखा जाए मंटो पर..? मंटो को चाहने वालो के सामने से कुछ छूटा हो तो लिखा जाए ..मित्र सुशील छौक्कर ने दो दिन पहले से बोल दिया था कि आपको मंटो पर कुछ तो लिखना ही है ..मेने उन्हें समझाया कि ब्लॉग अब कौन पढता है..और फेसबुक जैसे नेटवर्क पर मंटो को समझकर पढने वाले न के बराबर है..फिर? सुशीलजी ने साफ़-साफ़ कह दिया कि इन सब बातो को छोडिये, कोइ पढ़े या न पढ़े किन्तु मुझ जैसे है जो पढेंगे ..., उनका यह भाव एकबार फिर मुझे यह यकीन दिला गया कि सचमुच मंटो ज़िंदा है.

 लिखने के लिए जनाब अनवर सईद द्वारा लिखा मज़मून "सआदत हसन मंटो -खुतूत के आईने में" पढ़ कर मुझे ऐसा लगा था कि इसमे कुछ ऐसा है जिसे लिखा ही जाना चाहिए ..तो उसी मज़मून से कुछ अंश लेकर आपके लिए यहाँ पेश करता हूँ -
 'मंटो के खुतूत' मंटो की मासूम शख्सियत की कई परते खोलती है..ये खुतूत अहमद नदीम कासिमी के नाम है और जनवरी १९३७ से लेकर फरवरी १९४८ तक के उस दौर से ताल्लुक रखते है जब मंटो बंबई की फ़िल्मी दुन्या में अमली जिन्दगी के झमेलों में उलझे हुए थे और ज़माने के थपेड़े खा रहे थे. अहमद नदीम लाहौर में अपनी अदबी जिन्दगी के शुरुआती दौर में थे और उस दौर के एक मुमताज़ और मारूफ अफसाना निगार को न सिर्फ हैरत से देख रहे थे , बल्कि उनसे प्रेरणा भी ले रहे थे. मंटो का अख्तर शीरानी के माहनामा 'रुमान' में उनका अफसाना 'बेगुनाह' पढ़कर खातो का सिलसिला शुरू हुआ. मंटो को लगा कि वो दोनों मुख्तलिफ राहो के मुसाफिर है.इसका ज़िक्र 'मंटो के खुतूत' के पेश लफ्ज़ में इस तरह किया गया है-
" देहली में मंटो से मेरी ( अहमद नदीम कासिमी) मुलाक़ात हुई, तो मुझे एक ही दिन में मालूम हो गया कि मंटो के जेहन में रहने और मेरे दोस्ताना रिश्ते के यकायक ख़त्म हो जाने का इमकान (संभावना) क्यों मौजूद था...." फिर उन्होंने लिखा ' ये मुलाकात हमारे रिश्ते का कुछ न बिगाड़ सकी. इसलिए कि अगर मंटो की रोजमर्रा की बेशतर दिलचस्पिया मेरी जिन्दगी के मामूलात से बिलकुल अलग थी. तो कम से कम वो सतह तो अब भी महफूज़ थी जिस पर हम एक दूसरे से प्यार करने वाले दोस्त की हैसियत से मिल सकते थे और ये सतह आपसी भाईचारे और कुर्बानी ने मुहैया कर रखी थी. ' कासिमी साहिब ने हिंद -पाक के अदीबो से मंटो के दोस्तों और अजीजो से भी उनके खुतूत हासिल करने की कोशिश की मगर उन्हें कामयाबी नहीं मिली. इसलिए भी उन्होंने अपने रिकार्ड में महफूज़ खतो पर तसल्ली कर ली. पहला ख़त का मज़मून - " आपका अफसाना 'बेगुनाह' वाकीअतन मेने बेहद पसंद किया है. सच तो यह है कि इस किस्म के ज़ज्बात में डूबे हुए अफ़साने उर्दू में बहुत कम शाए हुए है. आपके हाथ प्लास्टिक के है और मालूम होता है कि अफ़साने के मौजू को आपने न सिर्फ महसूस किया है बल्कि उसे छूकर भी देखा है. ये खुसूसीयत हमारे मुल्क के अफसानानिगारो को नसीब नहीं. मै आपको मुबारकबाद देना चाहता हूँ कि आपमें ये खुसूसीयत भरपूर है. "
 मंटो उन दिनों रिसाला ' मुसव्विर ' की एडिटिंग करने के इलावा फ़िल्मी दुन्या के साथ भी वाबस्ता थे और स्क्रीन के लिए कहानिया लिख रहे थे जिसके दर्शक ज़ज्बाती सीन, ज़ज्बाती रोल और गीत जियाद पसंद करते थे. मंटो ने अफसाना 'बेगुनाह' में भी आम लोगो की पसंद को ही मद्देनज़र रखा और कासिमी साहब को लिखा- " अफसाने में आब्जेक्तिविटी टच बहुत प्यारे है और मौजू व् मुनासिब है. कुछ अरसे से मै फ़िल्मी अफ़सानो के तौर पर गौर कर रहा हूँ, चुनांचे मेने आपके अफ़साने को गैर इरादे तौर पर फ़िल्मी ही की ऐनक से देखा और इसे बहुत खूब पाया. एटमोसफेरिक टच बेहद अच्छे है...." अपने खतो के केनवास पर मंटो हमें बेहद भला , बेलौस और बेरिया (निश्छल) शख्स नज़र आते है. उस दौर में वो खुद मुश्किलों में घिरे हुए थे. माली हालात अच्छे नहीं थे. मिजाज़ में इंतिहा दर्जे का ईगो था, लेकिन किसी दुसरे को तकलीफ में देखकर मंटो पिघल जाते थे. मंटो ने कासिमी साहब की मुश्किल भांप ली थी. वो उन्हें जिन्दगी के असली उतार चढ़ाव से भी बाखबर कर रहे थे और हमदर्दी का इज़हार भी. मंटो ने लिखा- " फ़िल्मी दुन्या में कदम रखने की ख्वाहिश कालेज के हर तालिबे इल्म के दिल में होती है. आज से कुछ अरसा पहले यही जूनून मेरे सर भी सवार था. चुनांचे मेने उस जूनून को ठंडा करने के लिए बड़े  जतन  किये और  अंजामकार   थक हार कर बैठ गया. अहमद नदीम साहब, दुन्या वो नहीं, जो हम और आप समझते है और समझाते रहे है. अगर आपको कभी स्टूडियो की सियासत की स्टडी करने का मौका मिले तो आप चकरा जायंगे.फ़िल्मी कंपनियों में उनका जियाद असर है जिनके खयालात बूढ़े और नकारा है. वो बिलकुल जाहिल है और वो लोग जो अपने सीनों में असली  फ़न  की परवरिश करते है, उन्हें कोइ नहीं पूछता. .." मगर इस सब के बाद भी अहमद नदीम साहब की मदद करने को मंटो तैयार थे. वे लिखते है- " मै बंबई में पचास रुपये महावार कमा रहा हूँ और बेहद फजूलखर्च हूँ, आप यहाँ चले आये तो मेरा ख़याल है कि हम दोनों गुजर कर सकेंगे. मै अपनी फजूलखार्ची बंद कर सकता हूँ. मुझे आपकी मजबूरियों का पूरा एहसास है, इसलिए कि मै इन मजबूरियों से गुजर चुका हूँ." आगे देखिये मंटो लिखते है.- " आप यहाँ तशरीफ ला सकते है. मगर ये बात याद रखिये कि आपको मेरी जिन्दगी की  धूप  छाह में रहना होगा. मेरे पास छोटा सा कमरा है जिसमे हम दोनों रह सकते है. खाने को मिले न मिले, मगर पढने को किताबे मिल जाया करेंगी..."
किताबो से बेइंतेहा  मोहब्बत   करने  वाले   मंटो वाकई आदमीयत वाले इंसान थे ..वैसे तो उनके खतोकिताब की दास्ताँ लम्बी है जिसे मै पूरी तरह यहाँ लिख नहीं पाउँगा .. इतने से सिर्फ यह जतलाने की कोशिश है कि मंटो आज भी ज़िंदा है...कम से कम मुझ जैसे लोगो में.. जो मंटो से कोइ हट कर जिन्दगी नहीं जी रहे है....

मंगलवार, 20 मार्च 2012

दो कदम

1,
न उम्मीद से
चूल्हा फूँका जा सकता है
न इच्छाओ की रोटी
बनाई जा सकती है ..
हो यह सकता है कि बस
दोनों की चटनी बनाकर
चाट ली जाए ....
2,
आग उगलते सूरज
और इच्छाओं की
जलती सूखी लकडियो से
निकलती लपटों में
मेरे साथ
सचमुच कोइ बैठना
नहीं चाहता ..
और गर
चाहता भी है तो बस
घी डालना ...

शनिवार, 17 मार्च 2012

इश्क

मेरा और उसका नाम
आज भी खुदा होगा वहां
जहां जुदा होने से पहले
कुरेदी थी ज़मीन..........
और लम्बी चुप्पी के बाद
तन्हाई ने बाहे फैला कर
धीरे से बुदबुदाया था
इश्क .....
वहां खुदा होगा एक पूरा इतिहास ..
क्योकि इश्क की बदकिस्मती है
की वो 'खुदा' ही होता है...

बुधवार, 2 नवंबर 2011

प्रेम

न्याय, वैशेषिक, सांख्य हो
या योग मीमांसा
वेदांत जैसे वैदिक दर्शन
घुस टटोला।

इन्हें नकारने वाले...
चार्वाक, जैन, वैभाषिक
सौत्रांतिक, योगाचार और
माध्यमिक जैसे
अवैदिक दर्शन की पनाह भी ली
किंतु मिला नही
उसका ओर न छोर।

खपा दिया खुद को
सिर खुजाखुजा..,

पट्ठा मिला भी तो कहां
कबीर की झोपडी में
गुनगुनाता हुआ-
पोथी पढ-पढ जग मुआ.......।

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

दस का दम

ये फेसबुक ने ब्लॉग को मानो ग्रहण लगा दिया। करीब चार महीनों बाद ब्लॉग की शक़्ल देखी। यह जानते बुझते भी कि ब्लॉग और फेसबुक में ज़मीन-आसमान का अंतर है, यहां मन हल्का होता है तो वहां तो सारा कुछ फास्ट फूड जैसा है..खैर..किंतु यह अच्छा है कि फेसबुक पर पिछले दिनों कुछ अच्छी पंक्तियों ने रूप लिया, जिसे मेरे ब्लॉग साथियों से शेयर करना चाहूंगा..क्योंकि यहीं उन पंक्तियों की असली परीक्षा होती है।



1, बार बार की
झंझट से मुक्त ही हो जाऊं तो अच्छा है।
देखना, इक दिन मैं भी
बहला-फुसलाकर
किस्मत को ऊंची पहाडी पर ले जाउंगा और
चुपके से नीचे धकेल दूंगा
फिर चिल्लाकर कहूंगा
जैसे को तैसा।

2,यूं तो बहुत से
देते है दिलासा
कोई दिल भी दे
तो बात बने।

3,कितने और
इम्तहान लेगा ए खुदा
ऐसे बुरे भी नहीं
कि हाशिये पे रहें।

4,तेरे साथ....

इस दौडती भागती सडको पर
पसरी रात की खामोशी में
हाथ थामे दूर तक चलना..
... ...
किसी सन्नाटे में डूबे कोटर में
चांद तले घंटो बैठ
बतियाते रहना..

सुबह की पहली किरण का
आचमन कर, दिन कहीं
ऊंची पहाडी, कंदराओं में भटकते हुए
वीरान पडी चट्टानों को नापना ..

किसी गांव के नुक्कड पर बैठ
चाय की चुस्कियां लेना
और खेत खलिहानों के बीच
जिन्दगी के रास्ते तलाशते हुए
कहीं दूर
किसी वृक्ष तले ठहर सुस्ताना..
तेरे साथ....

चाहता है दिल।

5,"पीर पराई
कौन जाने
जो जाने
अपनी जाने"

6,कब तक रख सकेगा
झूठ को कन्धो पर,
खुदा रहम नहीं करता
ऐसे बन्दो पर"

7,अमूमन,
अकेला होता हूं मैं
शब्द बिखेरता हूं,
सहेजता हूं मैं...
जैसे जीवन।
...
अक्सर, छूट जाता है
हाथों से वो 'अक्षर'
जिसका एक छोर
हृदय से प्रांरभ होता है
मन तक जाता है...
जैसे प्रेम।

और फिर नितांत
निर्दयी सन्नाटा घेर लेता है।

8, "हर आस अपनी
जलते जलते बुझती गई,
जिन्दगी कुछ यूं
बुनते बुनते उलझती गई।"

9,भटकना
पैदल, अकेले..
उद्देश्यविहीन.......
बिल्कुल
कोरे प्रेम की तरह....।

10, गम नहीं ए दोस्त,
के तुम्हे हमसे प्यार नहीं,
चूक रहे हो तुम्ही
इक बेहतरीन प्यार से....

मंगलवार, 21 जून 2011

इस यात्रा का अंत नहीं


यात्रा कभी समाप्त नहीं होती है। अनवरत होना, होते रहना उसका धर्म है। पूरे जीवन में ढेर सारे पडाव आते हैं, हम रुकते हैं, चलते हैं, रुकते हैं फिर चलते हैं...। यानी एक अनंत यात्रा का नाम है जीवन। जिस मृत्यु को हम जीवन का अंत समझ बैठे हैं वह नाममात्र का एक पडाव है। यह जो समझ बैठना होता है न वही हमें अपनी यात्रा का आनंद नहीं लेने देता, सुख नहीं भोगने देता, और न ही यह जानने देता है कि आखिर हम हैं क्या चीज? करीब दो माह पहले मुझे डॉ. पीयुष श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक 'अनंत यात्रा, धर्म का विज्ञान' प्राप्त हुई थी। मैने दो बार उसे पढी। पढने का मतलब उसमें खो गया था, विचारों ने द्वन्द मचाना शुरू किया था कि उन्हें शब्द्ब दिये जायें और पुस्तक की समीक्षा की जाये, किंतु समय ने मुझे अपने दूसरे कार्यों में उलझाये रखा। आज उन विचारों को पुनः एकत्र कर रहा हूं..यानी तीबारा पुस्तक का अध्ययन किया और लिखने बैठा हूं। समीक्षा के लिये अधीरता क्यों है? यह प्रश्न भी मेरे सामने था, और समीक्षा कर भी दी जाये तो वो कहां तक सार्थक होगी जबकि मेरे ब्लॉग पर अब ज्यादा पाठक नहीं है? मैं तो चाहता यह हूं कि इस पुस्तक का अध्ययन हर कोई करे, क्योंकि यह जरूरी है.., किंतु जब पाठक कम हैं तब क्या मेरी चाहत का अर्थ रहेगा? खैर..इसका मतलब यह भी नहीं कि एक बेहतर पुस्तक पर अपने विचार लिखे ही न जाये। है न।
'अनंत यात्रा, धर्म का विज्ञान' किसी मजहब, किसी धर्म विशेष या किसी संप्रदाय से ताल्लुक नहीं रखती। यह न ही कोई संदेश देती है, न ही कोई अपना दर्शन व्यक्त करती है। यह सिर्फ वैज्ञानिक आधार पर जीवन और हमारे तपस्वियों के शोध, उनके ज्ञान को, उनके विज्ञान को प्रकट करती है। जो जैसा है, जैसा होना चाहिये, जो होता है, क्यों होता है आदि को ठीक वैसे ही डॉ.पीयुष ने पुस्तक में उतारा है जैसे कोई वैज्ञानिक अपना अविष्कार करता है। अविष्कार के लिये जिन साधनों की आवश्यकता हुई डा. पीयुष ने उनका इस्तमाल किया और तार्किक आकार देते हुए, बेहद, बेहद सरल हिन्दी भाषा में उसे व्यक्त किया..सीधा-सपाट किंतु गहरा..। भारतवासी अपनी विरासत खो रहे हैं, अपने महान तपस्वियों, ऋषि-मुनियों के अध्ययन को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, जबकि वही तमाम शोध उन आधुनिक वैज्ञानिकों ने, जिनका नाम आज सायंस में विख्यात है, हमारे ऋषि-मुनियों के अध्ययन के बल पर किया जिसे हम नया और अद्भुत मानते हैं। यह हमारी बेचारगी है कि हमने हमारी विरासत को श्रेय नहीं दिया। अभी भी बिगडा कुछ नहीं है। इसी बात का जीता जागता उदाहरण है यह डॉ. पीयुष का लेखन।
बहरहाल, भारतीय वेद ग्रंथों की महिमा सिर्फ धार्मिक ही नहीं थी बल्कि वैज्ञानिक थी। अगर 'जगत माया है,' 'जो दिखाई पडता है, वह सत्य नहीं है,' 'सत्य अज्ञेय है,' 'पत्थरों में भी प्राण होते हैं' जैसे वाक्य आपको महज धार्मिक बखान लगते हों तो कृपया अपने इस लगने को बदल दीजिये क्योंकि वह वैज्ञानिक और शोधित हैं। चाहे अल्बर्ट आइंस्टिन हो या नील्स बोर, या फिर हाइजेनबर्ग, डार्विन, मेंडल, स्टीफन हॉकिंग, किरलियन हों तमाम वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में उपरोक्त बातों को प्रमाणित किया है, कर रहे हैं। बस यही सब तो है इस पुस्तक में। कौन क्या कर रहा है, किसने क्या किया, और इस बृह्मांड में आखिर चल क्या रहा है, हमारा जीवन और हमारा दिमाग, उसकी दुविधायें हों या सुख-दुख की परिकल्पना..सब कुछ समाहित है इस पुस्तक में और वह सिर्फ और सिर्फ वैज्ञानिक आधार पर। सच कहूं..मैने अब तक ऐसी पुस्तक का अध्ययन नहीं किया था, कई-कई सारी पुस्तके पढी, धर्म की, दर्शन की, दीन-दुनिया की, समाज की देश की..साहित्य हो या राजनीतिक हो, शोध हो या समीक्षायें हों, आलोचनात्मक हो या समालोचात्मक सब तरह की पुस्तके मेरे पढने में आई हैं किंतु 'अनंत यात्रा, धर्म का विज्ञान' इसलिये विलग है क्योंकि यह खुद का कुछ बखान नहीं करती, जो है वही सामने रखती है।
अगर सूर्य के सात घोडों की बात हो या विज्ञान के सात रंगों की बात, चन्द्रमा की 27 पत्नियों की बात हो या चन्द्रमा के 27 नक्षत्रों की बात..हमने सिर्फ शब्दों पर ध्यान दिया और किसी को नीरा धार्मिक मान लिया किसी को विज्ञान..वस्तुतः सबकुछ अपनी बात कहने और उन्हें शब्द देने की कोशिश रही, जिसे हमने अपने अन्दाज में स्वीकार लिया। डॉ.पीयुष ने बेहद सरलता से इस ओर इंगित किया है। धर्म और विज्ञान की परिभाषा के जरिये किसी सच को दर्शाने की कोशिश की है। धर्म यानी किसी व्यक्ति या वस्तु में रहने वाली मूल वृत्ति, प्रकृति, स्वभाव, मूल गुण, किसी जाति, वर्ग पद आदि के लिये निश्चित किया हुआ कार्य या व्यवहार और विज्ञान माने किसी विषय के सिद्धांतों का विशेष रूप से विवेचित ज्ञान, क्रमबद्ध और व्यवस्थित ज्ञान, जिसे प्रमाणित भी किया जा सके। इसका उदाहरण बताया गया है कि महाभारत और श्रीमद भगवद गीता में जहां एक ही व्यक्ति के लिये अलग-अलग देश, काल, परिस्थितियों में अलग अलग धर्म की बात कही गई है, यथा स्वधर्म, क्षत्रीय धर्म, कुल धर्म, राज धर्म, मानव धर्म आदि। यानी हम कह सकते हैं कि एक ही व्यक्ति के अलग अलग देश काल, परिस्थितियों में अलग अलग धर्म होंगे। वहीं दूसरी ओर हम देखते हैं कि विज्ञान विवेचित, क्रमबद्ध और प्रमाणित ज्ञान है। सामान्य रूप से धर्म को विश्वास आधारित माना जाता है, हर बात मानने के लिये कहा जाता है, मानने से विश्वास उत्पन्न होता है, वस्तुतः हम विश्वास उसी चीज का करते हैं जो हम नहीं जानते, जो जानते हैं उस पर हम यह नहीं कहते कि हम विश्वास करते हैं, क्योंकि वह हम जानते ही हैं। डॉ.पीयुष ने पुस्तक में बहुत सी बातों को वर्णन किया है जो गले उतरती है। विश्वास और अन्धविश्वास में कोई अंतर ब्भी नहीं है, तो कुछ लोग अविश्वास पर विश्वास करने लगते हैं, जबकि अविश्वास भी शीर्षासन करता हुआ विश्वास ही है। अब आप इस पर अपना तर्क दे सकते हैं, किंतु उसके पहले आपको यह पुस्तक पढनी होगी क्योंकि आप जो कुछ भी सोच रहे हैं, तर्क करना चाहते हैं वो सबकुछ इसमें जवाबी तौर पर मिलेगा। पुस्तक में कई वाक्य हैं जिन्हें एक नज़र में पढने से दिमाग उसे काटने या फिजुल का मानते हुए तर्क देने लगता है, मगर जैसे ही आगे पढना होता है हमे हमारे जवाब खुद ब खुद मिलते जाते हैं। अब यदि आपने इस पुस्तक में पढा कि ' हमारी आयु नहीं, सांसे तय होती है" या "वास्तविकता, वास्तविक नहीं," तो पुस्तक आपको वैज्ञानिक, प्रमाणित आधार पर जवाब भी देगी।
बहुत सी बातों का जिक्र मैं करना चाहता हूं किंतु चूंकि ब्लॉग पर बडा आलेख जैसा कुछ अधिक पढ सकने की पाठकों की आदत नहीं होती, इसलिये संक्षिप्त में यही कि 'अनंत यात्रा, धर्म का विज्ञान" इस जीवन, जगत, बृह्मांड और होने वाली क्रिया-प्रतिक्रियाओं का बखूब वैज्ञानिक दर्शन है जिसे पढा ही नहीं बल्कि समझा और जानना भी चाहिये। धन्यवाद दूंगा मैं डॉ.पीयुष श्रीवास्तव को जिन्होंने मुझे यह पुस्तक प्रेषित की, और पुस्तक ने मेरी बहुत सी सोच को पूर्णता की ओर जाने में मदद की। निश्चित रूप से मेरे पाठक इसे पाने की चाह रखेंगे तो उनके लिये यह लिखना जरूरी समझता हूं कि वे" श्यामल प्रकाशन, 38-दुर्गानगर, रीवा, म.प्र. के पते पर सम्पर्क कर सकते हैं।

बुधवार, 15 जून 2011

हम-तुम-सब



कंधे पर आ गया है
ढो रहे से लगते हैं।
है इसलिये बना हुआ है,
मगर जिन्दा लाश की तरह
वेंटीलेटर पर पडा।

न कोई रोमांच
न ही उत्साह,
न मिलने-जुलने की वो
मीठी सी तडप,
मानों खून ठंडा हो गया है,
दुनियाई गरमी
'उसके' सारे धर्मों को
जला चुकी है।

सच तो यह है कि
अब वो बात नहीं रही तुममे,
या उस बात को कहीं कैद कर
दफन करने की कोशिश है।
हां, तुम्हारी आंखों में
आधुनिक जगत का
कलात्मक काजल है,
खूबसूरत है मगर
जिसमे मेरा देहाती
गांवठी-गंवार सा मन
प्रतिबिम्बित नहीं होता।

बातें हैं, खूब सारी
मगर जो मन को छू ले
ठंडी सी बयार से
रोम रोम रोमांचित कर दे
वह विलक्षणता धूमिल हो गई है।
न इधर, न उधर
दोनों तरफ से जमी हुई काई
फिसलन पैदा कर चुकी है।
और जो असल में
होनी चाहिये वो फसल
फासलों के बीच सूख कर
जमींदोज़ होने लगी है।

फिर भी
बेहतर लगता है और और ढोने में
सुकून मिलता है शायद,
क्योंकि इसके आदी होने लगे हैं हम-तुम-सब।

मंगलवार, 3 मई 2011

लेखा-बही

बहुत दिनों से लिखना नहीं हो पा रहा है। इधर रीवा से श्रद्धेय डॉ.पियुष श्रीवास्तव की एक शोध व बोधपरक पुस्तक "अनंत यात्रा, धर्म का विज्ञान" प्राप्त हुए कई दिन हो गये तथा उसे दो-तीन बार पढ भी लिया, किंतु उस पर कुछ लिखने की इच्छा मेरे कार्यों की व्यस्तताओं के कारणवश अधर में है। अपनी इच्छा को शब्द रूप देकर शीघ्र संपादित करुंगा ही, इसके पहले वर्ष 2001 में एक छोटी सी रचना लिखी थी जो डायरी पलटते हुए दिखी तो सोचा ब्लॉग पर चिटका दूं.., न जाने क्यूं मुझे इसकी पंक्तियां अच्छी लगी. ..हालांकि बहुत ही साधारण है मगर अपनी मुर्गी है सो अच्छी लगनी ही है...खैर

"अकेला नहीं
मगर
भीड में नहीं,
अस्तित्व अपना
अदना ही सही।
कुछ जानें
कुछ न जानें..
अपना यही
लेखा-बही।"

बुधवार, 9 मार्च 2011

थैली के चट्टे-बट्टे

जितना अपने चुनावी दांव-पेंच और मतदाताओं को उल्लू बना सकने में गंभीरता अपनाई और दिमाग लगाया जाता है उतना यदि देश के लिये कांग्रेस सोचे तो सच में आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिल सकते हैं, किंतु अफसोस यही है कि कांग्रेस का हर नेता देश के लिये नहीं बल्कि अपने चुनावी और अपने गठबंधन को ध्यान में रखकर अपनी काबिलियत सोनिया गांधी के सामने बघारने की कोशिश करता रहता है। अफसोस यह भी है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के लिये भी बढिया नेता होने का मापदंड यही है कि उक्त नेता कांग्रेस को कितना फायदा पहुंचा सकता है और जब भी गठबंधन में कभी गडबड हो तो चुनाव जीतने तथा मतदाताओं को बेवकूफ बना सकने में वो कितना पारंगत है? कांग्रेस यहां तो हमेशा सोच समझकर, आगा-पीछा देख कर कदम उठाती है, मगर जब भी देश की बात आती है तो टालमटोली करती दिखती है, यहां तक कि उसका प्रधानमंत्री यह कह कर टाल जाता है कि उन्हें कुछ भी पता नहीं था। थॉमस मामले में यही हुआ। महंगाई हो, या बढता भ्रष्टाचार यूपीए की ऐसी कोई नीति अभी तक देखने को नहीं मिली है जो इस पर अंकुश लगा सके। यह विडंबना है इस देश की कि जनता भी कांग्रेस की इस कुचाल में फंस जाती है और वह देश में कोई बडा बदलाव लाने की फिक्र से ऐन वक़्त मुंह मोड लेती है। सच यह भी है कि कांग्रेस भारतीय जनमानस को अच्छी तरह से जानती-समझती है। यही वजह है कि उसके जाल में वो पार्टियां भी अपना हित साधने के लिये फंस जाती है जो आये दिन उसका विरोध करती रहती हैं। जैसा कि हाल ही में देखने को मिला जब पीएम ने माफी मांगी और विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने उन्हें माफ कर दिया। यह मामला सिर्फ माफी मांगने और माफी देने तक का ही था क्या? उधर डीएमके कल तक कांग्रेस से अपनी सीटों के बंटवारे में एकमुश्त शर्त की बात कर रहा था और सरकार से अलग हट जाने की बात ताल ठोंक कर दर्शा रहा था, किंतु अचानक सबकुछ तय हो गया और डीएमके कांग्रेस के साथ हाथ मिलाते नज़र आने लगी। उधर आप समाजवादी पार्टी का उदाहरण ले लीजिये, जब डीएमके ने अपना हाथ खींचने की बात कही तो इसका राजनीतिक फायदा उठाने के लिये मुलायम सिंह यादव ने झट से यह घोषणा कर दी कि वो यूपीए गठबंधन के साथ बने रहेगे और सरकार को किसी अनहोनी का सामना नहीं करना पडेगा। सपा की नीति, उसका कार्य और उसकी विचारमीमांसा रहस्यवादी है, शायद वो नहीं जानती कि स्वार्थगत राजनीति में अपना भविष्य तलाशने वाली पार्टियों को कभी न कभी मुंह की खानी ही पडती है। खैर, फिलहाल सपा ने जो सोचा था कि वो सोनिया गांधी की नज़रों में विश्वासपात्र बन जायेगी, डीएमके के राजी होने के बाद उसका भी कचरा हो गया है। दरअसल यह सब इसलिये होता है कि आज यूपीए गठबंधन की हर पार्टी किसी न किसी घोटाले या विवाद से दो हाथ कर रही है और अगर कांग्रेस से वो अलग हट जाती हैं तो उनका सत्यानाश अवश्य संभव है, लिहाज़ा खिसायाते हुए सब नतमस्तक होते रहते हैं और सोनिया गांधी को खुश करने में ही अपनी राजनीतिक भलाई मानते हैं।
बहरहाल, कांग्रेस-द्रमुक का गतिरोध लगभग खत्म हो चुका है, इससे जयललिता को भी झटका लगा होगा जो यह सोच कर बैठ गईं थी कि अब इस गतिरोध का फायदा उन्हें अपने राज्य में जरूर मिलने वाला है। प्रणब मुखर्जी का दिमाग और उनका कांग्रेस के प्रति समर्पित जीवन ही ऐसा रामबाण है जो करुणानिधि को साध गया। यह सोनिया गांधी भी जानती थी कि ऐसे समय उनके पास तुरुप का इक्का प्रणब मुखर्जी के रूप में मौजूद है, इसलिये ही वे द्रमुक की हवाबाजी से चिंतित नहीं हुई। डीएमके ने कांग्रेस को 63 सीटे दे दी। पिछली बार उसके खाते में 48 सीटे थी, आप सोच सकते हैं कि जो भी सौदेबाजी हुई होगी वो कितनी उच्चस्तरीय रही होगी। करुणानिधि की पत्नी भी 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच दायरे में है और करुणानिधि चाहते हैं कि इस दायरे से उनकी पत्नी को दूर रखा जाये। मज़ेदार बात यह है कि यहां आपस में लडाई वो करते हैं जो खुद के गिरेबां में कलंकित है, और यह जानते हैं कि एकदूसरे की ही उन्हें जरुरत है। वे बस जनता को बेवकूफ बना सके और अपनी महत्ता को दर्शा सकने के लिये हाथ-पैर चलाते रहें, उनका यही परम कर्तव्य है।
अब इस गतिरोध के बीच जयललिता को देखिये जिन्होंने कांग्रेस को अपने 9 सांसद देने की बात से राहत पहुंचाने का काम किया था। कांग्रेस जयललिता के फेंके जाल में फंस जाती मगर उसने देखा कि जयललिता ने अभिनेता विजयकांत की डीएमडीके को 41 सीटे दे रखी है तो उसे यह सौदेबाजी रास नहीं आई। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस विजयकांत से हाथ मिलाती इसके पहले यह बाज़ी जयललिता ने मार ली थी, विजयकांत की पार्टी तमिलनाडु राजनीति में डीएमके और एआईडीएमके के बाद तीसरी सबसे बडी पार्टी के रूप में उभरी थी। ऐसे में कांग्रेस के पास उस वक्त डीएमके से जुडना लाचारी थी, अब चूंकि उसने देखा कि जयललिता के साथ अगर वह हाथ मिलाती है तो चुनाव में इसका खामियाजा उठाना पडेगा, क्योंकि उसके हाथ से डीएमके जैसे दूसरी बडी पार्टी छूट जायेगी, उधर जयललिता चाहती थी कि यदि वह कांग्रेस को पटा लेगी तो इस बार के विधानसभा चुनाव में फिर सत्ता पर आसानी से काबिज हो सकती है। किंतु कांग्रेस के लिये यह फायदेमंद सौदा नहीं था सो उसने डीएमके को पकडे रखा, डीएमके के लिये भी कांग्रेस को खोना उसकी अपनी नींद हराम होने जैसा ही था, एक तो वामपंथी पार्टियों ने उसका दामन छोड रखा है, दूसरे जयललिता ने स्थानीय पार्टियों को अपने खेमे में ले रखा है, डीएमके के लिये अकेले चुनाव लडना आसान भी नहीं था, सो थोडी हुडकी देने के बाद कांग्रेस को कांग्रेस की शर्तों पर सीटे दे दी, जब जयललिता ने यह प्रेम-मोहब्बत देखी तो वो फिर से कांग्रेस की दुश्मन पार्टी बन गई हैं। एक तरफ दोस्ती का हाथ बढाया जाता है और जब मामला करवट बदलता है तो झट से हाथ खींच लिया जाता है या हाथ मलते हुए मतदाताओं को रिझाने के लिये तर्कों-कुतर्कों का सहारा लिया जाने लगता है। राजनीति इसीको कहते हैं। मुलायम हो या जयललिता जैसे नेता सत्ता और सत्ता में बने रहकर अपने खिलाफ कोई मुहिम न चल पडे जैसी सोच के तहत कांग्रेस के आगे झुकते रहते हैं। आप यह भी देखिये कि कांग्रेस कितनी पारंगत है, कितनी मंझी हुई है कि वो तमाम विवाद के बावजूद हमेशा जीत हासिल करती है, इसका एकमात्र कारण यह है कि इस देश में उसका कोई मज़बूत विकल्प नहीं है। एक भारतीय जनता पार्टी है किंतु वो भी अपने स्थान पर अडिग रहने वाली नहीं है। उसकी करवटों से देश भलिभांति परिचित है। पहले राममंदिर का मुद्दा था तो जमकर वोट कबाड लिये गये, अब वो मुद्दा उनकी प्राथमिकता से हट गया है। इंडिया शायनिंग का गुब्बारा भी फुस्स हो चुका है और वे विपक्ष में आ बैठी। अब जब उसके पास ढेरों अवसर हैं तो उसे भुनाने में भी वो देश को अपने स्वार्थ से पीछे धकेल कर सोचती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सीवीसी के थॉमस मामले में लगभग फंस चुके थे और भाजपा ने जिस तरह से उसे प्रचारित करके अपनी छवि संसद में कठोर बनाई थी उसकी हवा पीएम की माफी मांग लेने से ही निकल गई। भाजपा में भी इस विचार के दो धडे हो गये हैं, सुषमा स्वराज के अचानक माफ कर देने वाले लहज़े को दूसरे कुछ नेता समझ नहीं पा रहे हैं। समझे भी कैसे जब आप किसी मुद्दे को देश के साथ जोडते हैं और संसद तक को ठप करके कार्यवाही चाहते हैं,तब अचानक उस मुद्दे को कैसे ठंडा किया जा सकता है? जबकि उसके लिये आपने देश के जनमानस तक को झंझोड कर रखा। क्या वो मुद्दा अपका निजी था? जो आपके माफ कर देने से खत्म हो गया? भाजपा ने इस मुद्दे को अंजाम अपनी स्वार्थगत राजनीति खेल कर दिया। कुलमिलाकर आज चल यही रहा है आप इस देश को, देशवासियों को किस तरह से चूना लगा कर उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड कर सकते हैं, उनकी आंखों में धूल झौंककर अपनी रोटियां सेंक सकते हैं। आप इसमे जितने निपुण हैं उतने ही सफल हैं। और बेचारे सामान्य देशवासी? उनके लिये रोज अखबार पढना, चैनल देखना और किसी चौपाल पर बैठकर राजनीति की बहस कर लेना, फिर उसी महंगाई, रोज-रोज की आपाधापी में ही जीवन गुजार देना भर है। दूसरी ओर तमाम दल एक थैली के चट्टे-बट्टे से अधिक कुछ नज़र नहीं आते।

शनिवार, 5 मार्च 2011

वाह रे मनमोहना

देश का प्रधानमंत्री तब स्वीकार करता है, तब अपनी जिम्मेदारी मानता है जब सुप्रीम कोर्ट उसके कान उमेठता है। अगर मान लीजिये ऐसा नहीं होता, अदालत बीच में नहीं आती तो क्या कोई जान पाता कि एक धीर-गंभीर, सुशील, बुद्धिमान दिखाई देने वाले प्रधानमंत्री के दो चेहरे भी हैं? आप मान सकते हैं कि यह कैसा मुखिया है जो जैसा दिखता है वैसा है नहीं। अब तक सिर्फ माना जाता था किंतु अब तो खुद उनके स्वीकार कर लेने के बाद स्थितियां साफ हो गई कि बेशर्मी की कितनी हद है। पी जे थॉमस की नियुक्ति अवैध थी, क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नहीं जानते थे? यदि नहीं जानते थे तो क्यों नहीं जानते थे? जानने के लिये जब सुषमा स्वराज ने अपनी आपत्ति जाहिर की और मामले की तमाम जानकारी दी तब भी उनकी आंखे बंद क्यों रही? और जब सुप्रीम कोर्ट ने हंटर चलाया तब ही उन्हें अपनी जिम्मेदारी का अहसास क्यों हुआ? और क्या इस अहसास के बाद वे प्रायश्चित करेंगे? यदि करेंगे तो वो प्रायश्चित क्या होगा? जो भी होगा, किंतु यह सच है कि अगर विपक्ष या यह देश उन्हें सबसे अशक्त प्रधानमंत्री का तमगा देता है तो कोई गलती नहीं करता है। आप अगर मनमोहन सिंह को इसके बाद भी बेहतर प्रधानंमंत्री मानते हैं तो कम से कम अब आपको अपनी राय बदल लेनी चाहिये।
दिलचस्प होगा यह जानना कि मनमोहन सिंह के इस कबूलनामे के बाद राजनीतिक परिदृष्य कैसा होगा? वैसे भी यूपीए सरकार के दिन गर्दिश में दिखाई दे रहे हैं उपर से उसके सबसे मज़बूत धडे करुणानिधि ने भी अपना समर्थन वापस लेने की बात कर दी है, उधर पहले ही कांग्रेस भ्रष्टाचार के दलदल से उबरने का असफल प्रयत्न कर रही है और एक के बाद एक कई खादीधारी कालेधन के जाल में फंसते नज़र आ रहे हैं। ऐसे कार्बनयुक्त माहौल में अब खुद मनमोहन सिंह के हाथ कालिख लगती हैं तो यकीनन यह कहा ही जा सकता है कि सरकार की दाल में काला ही नहीं बल्कि पूरी दाल काली है।
बहरहाल, क्यों थॉमस को लेकर सरकार ने सीवीसी की गरिमा का ख्याल नहीं रखा? क्यों मनमोहन सिंह मौन रहे? और यदि अब जाकर उन्होंने जिम्मेदारी कबूली है तो इसकी सजा क्या है? जिम्मेदारी कबूलना ही यह साबित करता है कि मनमोहन सिंह पहले से जानते रहे हैं कि थॉमस नामक चीज क्या है? यानी देश को अंधेरे में रखा गया, क्यों रखा गया? ऐसे कितने ही सवाल अपनी तेज बौछारों के साथ प्रधानमंत्री के माथे पर ओले की तरह पड रहे हैं। सरकार ने जो काम किया है वह निस्संदेह शर्मनाक है, विपक्ष तो यह चाहेगा ही फिर भी जनमानस मानता है कि अगर प्रधानमंत्री में थोडी भी शर्म शेष है तो अपने पद से हट जाने की हिम्मत दिखाई जा सकती है, मगर सत्तालोभ और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेस के लिये यह संभव नहीं। वो तो शुक्र है कि हमारे देश में न्यायपलिका का इमानदाराना रौब चलता है अन्यथा देश का तो भगवान ही मालिक होता। जब राजा ही सो रहा हो तो उसके मंत्री-संत्री सब इसका फायदा उठाते हैं, थॉमस जिस दादागिरी के साथ अपने पद पर अडिग थे वो स्पष्ट करता है कि उनके सिर पर किसी बलवान का वरदहस्त था। और यह बलवान कौन? प्रधानमंत्री के अतिरिक्त और कौन हो सकता है? दिक्कत यह है कि अब वे ऐसा मान भी नहीं सकते कि वे कुछ नहीं जानते थे, या उन्हें समझने में देर लगी, या फिर वे किसी दबाव में थे। अफसोसजनक तो यह भी है कि 3 सितंबर 2010 से आज तक के इतने समय के बाद तथा इतने वाद-विवाद के बाद जब अदालत की फटकार लगती है तब उन्हें अपने फर्ज़ की याद आती है और वे अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। पर हास्यस्पद यह भी है कि एक ओर सरकार कह रही है कि थॉमस हटाये जा चुके हैं किंतु अभी भी यह भ्रम कायम है (सरकार सोमवार को संसद में जवाब देने वाली है) क्योंकि थॉमस महोदय की ओर से अपने पद से इस्तीफे की बात अभी भी बाहर नहीं आई है। उन्होंने इस्तीफा दे दिया है, इसका कोई सबूत दिखाई नहीं दिया है यानी यह एक घिनौना मज़ाक नहीं तो क्या है? देश का सीधे सीधे मखौल उडाया जा रहा है, और अपनी दादागिरी व्यक्त की जा रही है, मानो थॉमस महोदय देश और देश की न्याय व्यवस्था से कोई उपर के आदमी हैं। ऐसे आदमी को तुरंत घसीटकर चौराहे पर लाकर फटकार लगाने की जरुरत होती है, किंतु ऐसा हो नहीं रहा। क्यों नहीं हो रहा? क्योंकि निश्चित रूप से थॉमस के पास कोई जादू की छडी है जिससे सरकार सहमी हुई है। थॉमस की नियुक्ति के नेपथ्य में यह तय है कि कोई बहुत बडा गेम छुपा है जो सरकार खेलने जा रही थी। पर देश का सौभाग्य है कि उसके लोकतंत्र के सबसे मज़बूत स्तंभ न्यायपालिका को डिगाना संभव नहीं है।
केरल के 1990 में हुए पामोलीन आयात घोटाले के आरोपी हैं थॉमस। उनका दामन दागदार तो है ही साथ ही उन्हें तो किसी प्रकार की सतर्कता या जांच-पडताल का अनुभव भी नहीं है, जो किसी भी सीवीसी के करतार के लिये आवश्यक होता है, बावजूद उनकी नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम ने जल्दबाजी दिखाई साथ ही नियुक्ति के लिये गठित पैनल की तीसरी सदस्य सुषमा स्वराज की बार-बार मनाही को सिरे से खारिज करते हुए थॉमस की नियुक्ति पर ठप्पा लगा दिया गया। जिस व्यक्ति पर एफआईआर दाखिल हो, जिसकी जमानत विचारधीन हो, जिस पर भ्रष्टाचार का मामला चल रहा हो क्या उससे आप उम्मीद कर सकते हैं कि वो सीवीसी के तहत जो भी कार्य करेगा पाक-साफ करेगा? दरअसल यह सब 2 जी स्पेक्ट्रम जैसे बडे-बडे घोटाले पर पानी फेरने और देश को गुमराह करने की कवायद ज्यादा जान पडती है जो सरकार के भ्रष्ट रूप को दबा सके। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह सब आखिर क्यों किया? किसके दबाव में किया? क्यों उन्होने देश को भुलावे में रखने का प्रयत्न क्या? और अब यदि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी कबूली है तो वे इसका उदाहरण किस रूप में देंगे? क्या वे जानते हैं कि खुद को अगर वे इमानदाराना साबित करना चाहते है तो उन्हें पहले अपनी मजबुरी बयां करनी होगी, फिर अपने उपर पडे विशेष दबाव का खुलासा करना होगा। मगर विडंबना यह है कि ऐसा होगा नहीं, क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेस का कचूमर निकल जायेगा। ऐसी कांग्रेस के पास हिम्मत नहीं कि वो देश के लिये अपना बलिदान दे सके, इसका मतलब यह हुआ कि देश को अब नया खेल देखने को तैयार हो जाना चाहिये। आप यूपीए गठबंधन का कालिख लगा दामन किसी सर्फ एक्सेल से धुला हुआ देख सकते हैं। क्योंकि यह तय है कि सरकार अब थॉमस की जगह नये की नियुक्ति कर देगी और इस पूरे विवाद को पीछे छोड देगी। प्रधानमंत्री की ली गई जिम्मेदारी से उठे सवाल जैसे थे वैसे ही रखे रह जायेंगे और एकबार फिर देश की जनता किसी बडे सच से अनजान रह कर नये फेरे में अपनी नज़र गाढ लेगी। यह देश का दुर्भाग्य है। और इसे कांग्रेस अच्छी तरह से समझती है कि भारतीय लोगों को भूलने की आदत है, उन्हें आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। वैसे भी तुलसीदास की चौपाई चरितार्थ होती है कि " समरथ को नहिं दोष गुंसाई...।"

मंगलवार, 1 मार्च 2011

क्या अच्छा सोचूं?

मन-मस्तिष्क भटके हुए हैं, भटके इन द सेंस अस्थिर हैं, जिसमें आप बैठकर कोई बेहतर लेखन नहीं कर पाते, किंतु विचारों के चक्रवात में भी फंसा है मन, जो उगल देना चाहता है जो कुछ भी हैं, जैसा भी है..। तो उस 'विज्ञापन' की तरह जिसमें रितिक रोशन की टोपी बवंडर में उडती है और वो अपनी बाइक लेकर उस बवंडर को चीरते हुए अपनी टोपी हासिल कर लेता है, ठीक वैसा ही प्रयास मेरा है, शेष आप बतायें-

"अचानक मन ने चाहा कि
कभी कुछ अच्छा भी सोचा जाये।
अच्छा यानी भला-भला सा
चाहे वो दीन-दुनिया के बारे में क्यों न हो?

किंतु क्या?

मेरे चारों ओर लगभग
सड चुके विचारों की दुर्गंध है,
बोथरी हो चुकी रचनात्मकता है
उलझे हुए जीवन हैं
और मरी हुई जिजीविषा है।

उधर सीमा पार
जब फर्लांग मार कर जाता हूं तो
काटने-मारने की आवाजें ही कानों में पडती हैं।
इधर भी ज्यादा कुछ अंतर नहीं है।

वातानुकुलित कमरों में बैठकर
खेत-खलियान की बातें हैं,
और खेत-खलियान कभी
सूरज की तपन से तो कभी
बादलों के प्रकोप से उजडे पडे हैं।
किसानों की आंखों से टपकते आंसू
उनके 'लोन' अदा नहीं कर सकते।
उनके बच्चों के पेट
मिलावटी खाद और रासायनिक पदार्थों से
भरे नहीं जा सकते।


अरे, मगर यह सब तो मुझे सोचना नहीं है
क्योंकि आज कुछ अच्छा सोचने
की दरकार करता है मन।

हां, जब फसल अच्छी होती है तो
चेहरे नाचने लगते हैं।
कम से कम उन्हें तो पता नहीं है
कि यह सब
स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है,
जो ऊंचे दाम अदा करके
खाते हैं अनाज।
वैसे भी जीवन कितना बडा होता है?
और सुखद यह कि
यह सब जानती है सरकार भी।

सडक पर निकलते समय
भले ही डर लगता है कि
कहीं कुछ हो न जाये?
भले ही घर में बीवी
लौट आने पर राहत महसूस करती है।
किंतु इससे
आतंक का खात्मा तो नहीं हो सकता न?
पर खुशफहमी है कि
खुद बच निकले।

लालच और भ्रष्ट आचार में
आकंठ डूबे हिन्दुस्तानियों की
वीरता देख कर भी लगता है कि
कोई सरकार या कोई कानून उनका
बाल बांका नहीं कर सकता,
क्योंकि
चाहे सरकार हो या कानून
सब कोई एक ही थैली के चट्टे-बट्टे से
दिखते हैं,
और क्या यह कम बडी बात है कि
हमारे हर कार्य शीघ्रता से निपट जाते हैं
और टेबल के नीचे
मुस्कुराता दिखता है शिष्टाचार।

धर्म पाखंड से खंडित है
तर्क, कुतर्कों में सध रहे हैं
वचनबद्धता बेमानी हैं
प्रवचन जारी हैं,
'रंग' भी लड रहे हैं,
यानी सबकुछ गड्डमड्ड है।
यह चूरमा है उस रोटी का जो बासी है
मगर खिलाई जा रही है शौक से।

'वो' करोडों में खेलते हैं
चाहे 'योग' के नाम या 'भोग' के नाम से,
हैं परम पूजनीय,
और यह उम्मीद कि संतों के देश का
कल्याण संभव है,
यह विचार कुछ देर तक तो शुभ लग सकते हैं न?

किंतु सच से मुख मोडा
नहीं जाता और तुलसी बाबा ध्यान आ जाते हैं
कि-
कलिमल ग्रसे धर्म सब
लुप्त भए सदग्रंथ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि
प्रगट किये बहु पंथ।
भए लोग सब मोहबस
लोभ ग्रसे सुभ कर्म,
सुनु हरिजान ग्यान निधि
कहउं कछुक कलिधर्म।


कलिधर्म का सच होता सिलसिला
बखान होगा तो
वह सोच जाती रहेगी कि
कुछ अच्छा सोचना है।
किंतु विडंबना भी है कि
क्या अच्छा सोचूं?

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

निर्मोही कहीं की



बियाबान हो या बंजर
धूप हो या पानी
उबड-खाबड रास्तों से
सीधी सपाट गलियों तक
चुपचाप लेटी पडी
रहती हैं ये मीटर गेज़ की पटरियां।

ठीक मेरी और उसकी तरह
जो साथ-साथ तो चलती हैं
किंतु कभी आपस में
मिलती नहीं।

और यह दुनिया..

आवारा सीटी बजाते हुए
रेंगती गुजर जाती है, रोज़ ही।

निर्मोही कहीं की।

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

चार चटिकायें

1,
जोत दिये
खेत-खलिहान सब।
जितने खरपतवार थे
उखाड फेंके...।
अब नये बीज और
नई फसल है...।

2,
सबकुछ पुराना रखूं
संभव नहीं।
नित बदलती है त्वचा भी
उसकी कोशिकायें रूप लेती हैं..
इसलिये अब 'पोंड्स' नहीं
'एक्स' है..।

3,
परिधान देख कर इंसान की
कीमत आंकी जाती है।
औकातभर का आदमी
औकातभर का आकलन
करता है,
मगर उस नंगे को बडा मज़ा आता है
जो देखता है 'लाइफ स्टाइल' में
आने-जाने वाले बन्दों को।

4,
उसे
मिलावट करने के जुर्म में
पकड लिया गया।
मैने पाया कि
उसने सचमुच
जघन्य अपराध किया है..
बिक रही चीजों में
वो शुद्धता जैसी घटिया
वस्तुये मिलाता था..
और अतिसंवेदनशील
केमिकल बगैर
नैसर्गिक विधि पर
बल देता था..।
स्साला....
बाज़ार खराब करता है
मिलावटखोर कहीं का।

सोमवार, 24 जनवरी 2011

फिर भी ..........

अरे हां,

हम भूल गये हैं
कब और क्यों फहराया जाता है झंडा?
गुलाम थे तो याद था,
आज़ाद होते तब भी याद रहता।

- हम तो बद से बदतर हो चुके हैं,
इतने निर्लज्ज हो चुके हैं कि
हमाम से बाहर निकल कर
खुले मैदान में
नंगा नाच करने लगे हैं।

-फाडने लगे हैं संस्कृतियों के कपडे
गड्ढे खोद-खोद कर
कुर्बानियों को गाडने लगे हैं,
डींगे ऐसी हांकते हैं मानों
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
हमारा राज है।
हा हा हा...।

- हां, आवाज़ आती है
दिल्ली से देश के कोने-कोने तक,
राजपथ चमकता है,
तोपे गूंजती है,
सलामी बजती है
और फिर
भाषणों का भ्रमजाल
कस लेता है शिकंजा।

अब

उठाकर दिखाओ झंडा
बाजुओं में ताकत शेष है क्या?
फहरा कर दिखाओ
लाल चौक पर तिरंगा,
काट डाले जायेंगे हाथ,
खून की नदियां बह निकलेंगी।

ओह,

उधर सरकार
शांति की दुहाई देती है,
......खाक शांति।

चुप्प बैठ और देख......

ढोंग जारी है,
नामर्द मदारियों के
बंदर शिलाजीत के लालच
में खेल रचे हुए है..

कोई नहीं जानता
झंडा क्यों और कहां फहराया जाता है?
फिर भी ..........।

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

दिल भारी है सूखे लब

उधेडबुन आदमी के दिमाग को अस्त व्यस्त रखती है। फिर यदि हम यह सोचें कि इसमें किसी रचनात्मक कार्य को अंजाम दे दिया जाये तो यह कठिन है। पिछले महीनेभर से ब्लॉग के लिये यदि कुछ न लिख पाया तो वजह यही थी, हालांकि यह वजह अभी भी बेवजह बनी हुई है। कौन्धता रहता है सवाल कि आखिर हम अपने लिये वक़्त क्यों नहीं निकाल पाते? दिमाग भी पट्ठा जवाब ढूंढ कर वार कर ही दिया करता है, कि वक़्त तो हम अपने लिये ही जीते हैं, किंतु उसमे परिस्थितियों का तडका लग जाया करता है। और हम तडके के स्वाद में पेट खराब करते रहते हैं यानी अपने लिये वक़्त नहीं निकाल पाते और उलझकर रह जाते हैं ताउम्र। खैर..। मैने अनुभव किया है कि जब मन-मस्तिष्क, सबकुछ जीविकोपार्जन की मशक्कत में सिर तक डूबा रहता है तो अन्यत्र कुछ भी दिखाई नहीं देता और यह एक ऐसी स्थिति होती है जब किसीको समझ पाना भी कठिन होता है। हां, ढेर सारे दर्शन होते हैं, आध्यात्मिक विचार होते हैं, सीखें होती हैं मगर व्यक्ति की पीडा व्यक्ति ही जान सकता है कि गहरे पानी में क्या वजह है कि वह थक गया है या किनारे आने के लिये कितनी और कैसी तकनीक की आवश्यकता है? हां किनारे लगे लोग इसका बखूबी वर्णन कर सकते हैं, और नज़रअंदाज भी। बहरहाल, जीवन के ऐसे ही खाकों से होते हुए सफर करना ठीक वैसा लगता है जैसे उबड-खाबड, गड्ढों से पटी पडी सडक पर किसी सरकारी, खटारा बस का चलना और देर से ही सही किंतु दुरुस्त मंजिल तक पहुंच भी जाना। चलिये..छोडिये मेरी फिलॉसाफी को.., आप पढिये मेरे भाईसाहब की दो और गज़लें-

1,
" दिल भारी है सूखे लब
गिन-गिन तारे बीती शब।

तडपे-रोए इश्क़ में हम
यही है चाके-दिले-सबब।

हुस्न रहा कुछ दूरी पर
हैं साए सब बेमतलब।

देख के दुनिया पागल है
तुम में है कुछ बात गज़ब।

खूब सहेजा और समेटा
टूटे बिखरे ख्वाब हैं अब।

खैर, जो इज्जत बची रहे
दफ्न हो चुके यहां अदब।

तुम भी 'अश्क' अज़ब नादां हो
सुधरे हैं कमजर्फ भी कब?"

2,

कौन यहां रहने वाले हैं
इक दिन सब चलने वाले हैं।

तेज़ बहुत है दिल की धडकन
फिर वो कुछ कहने वाले हैं।

चुप्पी लब पर, रक्तिम चेहरा
ज़ाहिर है लडने वाले हैं।

कहकर कर लो दिल तुम हल्का
हमें है खूं, सहने वाले हैं।

दरिया और समंदर क्या है
आंसू में बहने वाले हैं।

तुलसी,मीर,कबीर,सूर को
कौन आज पढने वाले हैं।

उनने हंसकर मुझको देखा
लोग 'अश्क़' जलने वाले हैं।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

दो गज़लें


सालों बाद जब अपने पुराने दस्तावेजों की पोटली खोली तो मानों वक़्त ने करवट बदल कर मुझे अपनी आगोश में ले लिया। कुछ ऐसे खतों में खो गया जिनमें जिन्दगी खेला करती थी। उन्हीं खतों में मुझे मिला मेरे बडे भाईसाहब का एक पत्र और उनकी लिखी गज़लों के तीन पन्ने। यह तो मैं जानता था कि भाईसाहब तब खूब लिखा करते थे। मुशायरे वगैरह में जाते थे, छपते थे..पिताजी से इस संदर्भ में चर्चायें किया करते थे। मैं छोटा था और गज़ल वगैरह से दूर था इसलिये उनकी कई सारी गज़लें सिर के उपर से जाया करती थी। आज भी बहुत सी गज़लें हैं जो मेरी समझ में नहीं आती किंतु हां, थोडा-बहुत समझने लगा हूं। जब थोडा बहुत समझने लायक हुआ तब तक उन्होने न केवल लिखना छोड दिया बल्कि इस विधा से दूर अपनी जिन्दगी की जरूरतों, जिम्मेदारियों में खो गये। अब वे नहीं लिखते। यह जो उनके तीन पन्ने मेरे हाथ लगे..ये भी वर्ष 1990 के आस पास के हैं। मेरे पास उनकी गज़लों के लिहाज़ से यही तीन पन्ने और मेरी समझ में आ जाये वैसी छ्ह सरल गज़ल है। मुझे खुशी हो रही है कि मैं उनकी रचना जो वे 'अश्क़' के नाम से लिखा करते थे यहां आप सब की नज़र कर रहा हूं।

1,

" इतनी हवाएं सर्द थीं कि दरख्त हम ठिठुर गए
झौंके बहे गमों के यूं कि सख्त हम सिहर गए।

समझ के इब्तिदाए-खुशी तल्खियों को पी गए
अस्ले-सुकूं तभी मिला, बाकी थे बेखबर गए।

मुट्ठी में बहुत बांधा किए बेरुख लकीर हम
दाता ने बेवफाई की, बेबस थे हम बिखर गए।

मुरादो-हसरतों का कहां इन्सां को वक़्त है
कल जो खुले थे चश्म आज बंद हो अखर गए।

दिलकश थी जिन्दगी कभी जिनके सहारे 'अश्क़'
बचपन-ओ-जवानी के वो यार सब किधर गए। "



2,


" झूठी दुनिया झूठ चलन में
होता है व्यापार सदन में।

रस्ता भूले साफ सरल में
मंजिल पाई गहन-सघन में।

उडता टुकडा अखबारी है
नेता का चारित्र्य पवन में।

बात समझना तब है मुमकिन
उतर सको वक्ता के मन में।

पढे-सुने को समझा जाना
गज़ल हो गई अर्थ वहन में।

बच्चों को बचपन जीने दें
यह भी कठिन है इस जीवन में।

कहने को है 'अश्क़' अकेले
महफिल रहती है चिंतन में। "


( कुछ अन्य अगली पोस्ट में)

सोमवार, 22 नवंबर 2010

पत्रकारिता यदि व्यवसाय है तो क्या व्यवसाय में आदर्श की हत्या माफ होती है?

समय, काल, परिस्थितियों के साथ-साथ पत्रकारिता की परिभाषा भी बदली है। उसका रूप, रंग और उद्देश्य ने भी करवट ली है। जिस पत्रकारिता का जन्म कभी 'मिशन' के तौर पर हुआ माना जाता था और जिसने अपनी महत्ता समाज़ की बुराइयों को जड से नष्ट करने के लिये स्थापित की थी वो आज अपनी उम्र के एक ऐसे पडाव पर आ पहुंची है जहां आगे खतरनाक खाई है और पीछे धकेलने वाले हजारों-हजार नये किंतु ओछे विचार। ये ओछे विचार ही आज की मांग बन चुके हैं। ऐसे विचार जिनमे स्वार्थगत चाटुकारिता निहित है, बे-ईमानी को किसी बेहतर रंग-रोगन से रोशन किया गया हैं और जिनमे ऐसे लोगों का वर्चस्व है जो अपनी सडी हुई मानसिकता को बाज़ार की ऊंची दुकानों में सजाये रखने का गुर जानते हैं। कह सकते हैं कि महात्मा गांधी की तरह ही पत्रकारिता भी आज महज इस्तमाल की चीज बन कर रह गई है। इसका हाल ठीक वैसा है जैसे घर में खांसता बूढा अपनी ही संतानों से सताया हुआ हो, या उसे बेघर कर दिया गया हो और उसकी विरासत को लूटा-झपटा जा रहा हो। सत्य, ईमानदारी, निष्ठा, समर्पण वाले अति व्यंजन इस शब्द को स्वर्णाक्षर जरूर देते हैं किंतु यह दिखने वाली वह मरिचिका है जिसके आगे-पीछे सिर्फ रेत ही रेत बिछी है और सामान्य आदमी इस पर सफर नहीं कर सकता। ऊंट की तरह मेरुदंड वाले या कहें कूबड वाले लोग हैं जो इस रेत पर रास्ता बना कर दिशा तय कर रहे हैं। हां, मानस में यह प्रश्न जरूर उठता है कि यह सब हालिया बदलाव तो नहीं हैं, फिर अगर बदलाव हैं तो कब से और किस सदी से? पत्रकारिता का सत्यानाश आखिर कब से शुरु हुआ? और कैसे पाक से नापाक की ओर इसने रुख किया? इसका सही-सही आकलन करना वाकई कठिन है।
फ्रांस का बादशाह नेपोलियन बोनापार्ट जब विश्व विजय का ख्वाब देख रहा था तब उसने कहा था कि "एक लाख संगीनों की अपेक्षा मैं तीन समाचार पत्रों से ज्यादा डरता हूं।" यानी पत्रकारिता से डरने का क्रम 1769 ईसवीं से या इसके पहले से प्रारंभ हो चुका था, किंतु उस काल में इससे डरने का तात्पर्य यह था कि हम कहीं कोई गलत काम न कर बैठें या कोई ऐसी भूल न हो जाये कि लोग हमारे खिलाफ एकजुट हो जायें। समाचार पत्र तब समाज़ को और संसार को बचाये रखने का एक बेहतर जरिया माना जाता रहा। हमे अपने पौराणिक काल या उसके शास्त्रों में नारद जैसा एक विद्वान देवपुरुष मिलता है जो हालांकि पत्रकार नाम से कभी जाना नहीं गया किंतु उसके कार्य कुछ इसी प्रकार के थे। आप इसे नारद की चुगली या इधर की उधर लगाने वाली बात मान सकते हैं किंतु उनके इस कार्य में हमेशा ही कोई सदपरिणाम छुपा हुआ रहा, जिसने लोक की रक्षा की यानी लोकहितार्थ कार्य किये। सैमुअल बौल्स ने पत्रकारिता को देश की प्रमुख शक्ति के रूप में अगर समझा तो इसके पीछे यही कारण था कि पत्रकारिता जनता को जनता के हित में और बुराई से लड सकने का मार्ग प्रशस्त कर रही थी। किंतु समय के साथ-साथ अचानक जब वो सैमुअल जानसन की नज़र में आई तो उसने कहा " शायद ही कोई ऐसी चीज हो जो क्रूरता की कथा की तरह चेतना को झकझोरती हो। संवाद लेखक यह बताने से कभी नहीं चूकता कि शत्रुओं ने कैसे शिशुओं का वध किया और कुमारियों पर बलात्कार किया, और अगर घटनास्थल कहीं दूर रहा तो वह एक पूरे प्रदेश की आधी आबादी की खोपडियां उतरवा कर रख देता है।"
आप गंभीरता से सोचिये कि जिस पत्रकारिता ने भारत की आज़ादी में अपनी अहम भूमिका निभाई वो आज़ादी के बाद राजनीति, कारपोरेट या सेठ-साहुकारों के गलियारों में नाचती हुई दिख रही है। जहां यह फर्क करना दुश्वार हो गया है कि कौन पत्रकार है और कौन दलाल? या पत्रकारिता के भेष में दलाली ही दलाली? यदि इस रूप में पत्रकारिता है तो इसका दोष किसे दें? उन संपादकों को जिन्होने सेठ-मालिकों की जुबान पर अपने विचार तय किये? या उन सेठ-मालिकों को जिन्होने ऊंचे दाम में संपादक खरीदे? या ऐसे संपादकों को जिसने कभी अपने सहयोगियों को स्वच्छंद रहने, लिखने नहीं दिया। उन्हें हमेशा अपने हित के लिये दबाव में रखा और कार्य करवाया? यह आम राय है कि संपादकीय सहयोगी चाहे कितना भी प्रतिभावान हो उसे अपने संपादक की खुशी के लिये कार्य करना होता है न कि अखबार या चैनल के लिये। और यदि सहयोगी विशुद्ध प्रतिभा का इस्तमाल कर कोई बेहतर संपादन कार्य करना चाहता है तो संपादक द्वारा उसे अपने अहम और प्रतिष्ठा पर आघात मान लिया जाता है कि कैसे कोई अदना पत्रकार उन तक पहुंचे या उनसे अच्छा लिख सके। पेट और नौकरी की मज़बूरीवश सामान्य किंतु बेहद ऊर्जावान पत्रकार संपादकों के ओछे निर्णयों को भोगने, मानने के लिये बाध्य हो जाते हैं। या फिर नौकरी छोड कर इस दलदल से दूर। शुद्ध पत्रकारिता को चकनाचूर करने मे इस रवैये ने भी अपनी अहम भूमिका निभाई है।
भारत में हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारिता की दशा में जमीन आसमान का फर्क है। हिन्दी पत्रकारिता गरीबी रेखा से नीचे की दिखती है और अंग्रेजी अमीरी रेखा से भी उपर की। वजह? वजह दोनों में भ्रष्ट नीति। एक ऊपर चढ बैठी तो दूसरी नीचे। सच्चीदानन्द हीरानंद वात्साययन 'अज्ञेय' की 'आत्मपरक' में इसी पत्रकारिता और संपादक के संदर्भ में उनके कथन है कि " आज विचार क्षेत्र में हम अग्रगामी भी कहला लें, तो कर्म के नैतिक आधारों की अनुपस्थिति में निजी रूप से हम चरित्रहीन ही है और सम्मान के पात्र नहीं हैं।" विष्णुदत्त शुक्ल की पुस्तक है 'पत्रकार कला' जिसमे उनकी भूमिका में गणेश शंकर विद्यार्थी का कोट है कि " यहां भी अब बहुत से पत्र सर्व साधारण के कल्याण के लिये नहीं रहे, सर्वसाधारण उनके प्रयोग की वस्तु बनते जा रहे हैं............., इस देश में भी समाचार पत्रों का आधार धन हो रहा है। धन से ही वे निकलते हैं, धन से ही वे चलते हैं और बडी वेदना के साथ कहना पडता है कि उनमे काम करने वाले बहुत से पत्रकार भी धन की ही अभ्यर्थना करते हैं।" कृष्णबिहारी मिश्र भी इस पत्रकारिता के परिवेश को अपनी पुस्तक 'पत्रकारिता, इतिहास व प्रश्न' में यह जाहिर कर कहते हैं कि " आज पत्रकार देश के दुर्भाग्य को अपना दुर्भाग्य मानने और अपनी विरासत के उज्जवल अध्याय को अपना आदर्श बनाने को तैयार नहीं है। समाज के दूसरे वर्ग के लोगों की तरह वह निजी समृद्धि और विलास वैभव में जीने की आकुल स्पृहा से आंदोलित होकर रंगीन-घाटों पर दौडता नज़र आ रहा है।" ऐसे हालात सिर्फ भारत के बने हैं, ऐसा भी नहीं है..यह पत्रकारिता की दुनिया की रीत बन चुकी है। शायद तभी आस्कर वाइल्ड यह कहते पाये गये कि- " साहित्य और पत्रकारिता में फर्क यही है कि पत्रकारिता पढने योग्य नहीं होती और साहित्य पढा नहीं जाता।" जार्ज बर्नाड शा मानते थे कि-" एक साइकिल दुर्घटना और सभ्यता के बीच जो अंतर है, उसे पहचानने में समाचारपत्र जाहिरा तौर पर असमर्थ होते हैं।" यह इसलिये कि पत्रकारिता ने अपने स्तर को पुष्ट नहीं किया, उसने उसे बेहतर बनाने की दिशा नहीं दी। हो यह गया है कि पत्रकार तथ्यों के साथ इंसाफ नहीं कर रहा, इसके पीछे के कारण भी कई सारे होते हैं। मुझे मार्क ट्वेन के शब्द याद आते हैं कि-" पहले तथ्यों को प्राप्त कीजिये, फिर तो आप उन्हें जितना चाहे तोड-मरोड सकते हैं।" मार्क ने हो सकता है दूसरे लिहाज़ से कहा हो किंतु आज पत्रकारिता में अगर तथ्य होते हैं तो उनकी ऐसी-तैसी कर परोस दिया जा रहा है। नेपथ्य में दबाव, लालच या भ्रष्ट आचार का खेल है। समाचार पत्र मुख पत्र बन गये हैं और जो सचमुच मुखपत्र हैं उन पर छींटाकशी ऐसी कि मानों वे कोई अपराध कर रहे हों। कमसे कम वे मुखपत्र अपनी ईमानदारी तो दिखा ही रहे हैं जो समाचार पत्रों में नहीं दिखती।
आप न्यूज चैनलों की बात करें। आधुनिक युग का सबसे बडा और प्रभावशाली मीडिया तंत्र। इसे ग्लेमर या फैशन शो की संज्ञा दी जा सकती है, जहां समाचार और मुद्दो पर निष्पक्ष विचार नहीं होते बल्कि राजनेताओं के लिये खुला मंच सौंपा जाता है, खासकर उन्हें जो सत्ता में हो। सच भी है क्योंकि उनके वरदहस्त से ही सारी माल-मस्ती है। सूट-बूट और टाई में, जेल लगे सलीके से जमे केशों वाले प्रबुद्ध पत्रकार या बढी हुई दाढी और आधुनिक बुद्धिजीवी, जिसे आप अंग्रेजी में एक्स्ट्रा इंटलीजेंट कह सकते हैं, लोगों को इस कदर बेवकूफ बनाते हैं मानों उनके सिवा कोई पत्रकार नहीं है और ये ही चंद लोग अवार्ड या सम्मान पाते दिखते हैं। ऐसा लगता है मानों इलेक्ट्रानिक मीडिया के ये बाप-दादा हों, इनसे ही शुरु और इन पर ही खत्म होती है पत्रकारिता।
आप पिछले एक दशक का काल उठा कर देख लीजिये..कौनसा नया पत्रकार दिखा जिसे आपने कोई मीडिया अवार्ड लेते देखा? जब बडे जनर्लिस्ट दा किसी विवाद या घोटालों में फंसे दिखते हैं तो पत्रकारिता शर्म से अपना सिर नीचा कर लेती है। छोटों की बिसात क्या? वे तो छोटी छोटी बे-इमानियों में ही मस्त रहते हैं। पत्रकारिता की यह पापचरिता इतनी गंभीर रूप से पैठ चुकी है कि इसे ही हमने असल मान लिया है। कारपोरेट या चाटुकारिता वाली पत्रकारिता जबसे शुरू हुई तबसे इसकी जमीन पर अफीम उगने लगी, जिसके नशे में मदमस्त पत्रकार मानने को तैयार नहीं कि वह नशे में है। अफसोस होता है कि जिस पत्रकारिता ने वर्ष 1920 से 1947 के बीच संघर्ष, अभावों, अभिशापों और उत्पीडन के मध्य रहने के बावजूद देशहित में आग उगलती हुई कलम से भारतीय जनमानस में नईचेतना जाग्रत की, जिसने अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ एकमेव होकर अपनी आवाज़ बुलंद की और जिससे ब्रिटिश शासन तक हिल गया आज बाज़ार में सजी हुई है और जो चाहे उसे खरीद ले सकता है। आज 1885 के राजा रामपाल सिंह जैसे विशुद्ध लडाके नहीं बचे है जिन्होने राष्ट्रीय जागरण के लिये हिन्दी दैनिक 'हिन्दोस्थान' का प्रकाशन किया, और ऐसे ही अनगिनत पत्र प्रकाशित किये जाते रहे जो भारत की ऊर्जा, उसका आत्मबल साबित होते रहे। बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर, गणेश विद्यार्थी जैसे अब इतिहास में दफ्न है जिनसे प्रेरणा लेना इन सफेदपोश माने जानेवाले पत्रकारों के लिये शरमींदगी का विषय है। मुझे फिर कृष्ण बिहारी मिश्र याद आते हैं जो लिखते हैं कि ".....स्खलन को नये मुहावरों से महिमान्वित करते गर्वपूर्वक कहा जाने लगा है कि पत्रकारिता आज व्यवसाय है। आदर्श का सवाल उठाना अप्रासंगिक राग टेरना है....।" मेरे जहन में एक सवाल कौन्धता है कि यदि पत्रकारिता व्यवसाय है तो क्या व्यवसाय में आदर्श की हत्या माफ होती है?
एक भारतीय मानसिकता यह भी कि "फिर भी उम्मीद है किसी ऐसे वीर, जाबांज की जो भारत की भूमि से इस गंदगी से सनी पत्रकारिता को उज्जवल कर दिखायेगा और ताज्जुब मत कीजिये कि इस और कदम बढाये जा चुके हैं। क्योंकि अच्छाई सनातन है जिसे खत्म नहीं किया जा सकता और वो बुराई पर विजय प्राप्त करने के लिये ही अवतार लेती है।"

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

"सुन्दर कांड- एक पुनर्पाठ "


पिछले दिनों जब मैं अपने शहर खरगोन गया था, पिताजी ने दो पुस्तके पढने को दी थी। उनमें से एक थी "सुन्दर कांड- एक पुनर्पाठ।" हमारी विद्वता है यह कि हमने महाकाव्यों की सैकडों टीकायें, भाष्य, व्याख्यायें की और यह सुस्थापित करने का सफल प्रयत्न किया कि वे काव्य कितने सामयिक हैं, कितने ऊर्जावान हैं, कितने अमूल्य हैं। देखिये कि आज तक उन महाकाव्यों पर चिंतन का कोई अंतिम चरण नहीं आया, और वे हमेशा से ही हमारे लिये नये-नये द्वार खोलते जा रहे हैं..। जितना कुछ लिखा गया..लगता है कम ही लिखा गया..। जितना कुछ चिंतन हुआ..लगता है कम ही हुआ है, यह उस काव्य और उस लेखक की ईश्वरीय शक्ति है कि वो जीवंत, चेतना से लबालब, दिशायें प्रदत्त करने में सार्थक और लगातार हमारी बुद्धि को विस्तार देने का काम कर रहे हैं, भ्रांतियों को नष्ट कर रहे हैं। 'सुन्दर कांड-एक पुनर्पाठ' इस आधुनिक युग में बिल्कुल आधुनिक अंदाज में व्याख्यायित है कि मुझे उसके लेखक की लगन, मेहनत और अध्ययन पर ताज्जुब होता है। मैं जानता हूं कंप्यूटर और इंटरनेट की इस दुनिया में रिफ्रेंसेस बटौरने में आने वाली दुविधायें कम ही हो गई हैं किंतु इस पुस्तक के लेखक ने महज इंटरनेट का उपयोग कर उदाहरण बटौरे? नहीं लगता ऐसा। खूब-खूब अध्ययन का प्रतिफल है कि "सुन्दर कांड-एक पुनर्पाठ' जैसी अतिपठनीय पुस्तक का जन्म हो सका।
मैं पुस्तक के लेखक को नहीं जानता, सिर्फ पुस्तक पर उनके नाम से जाना कि इसका लेखक भी है..। इसके अलावा अपने परिचय में लेखक ने एक रत्ती शब्द भी नहीं लिखा है जिससे जाना जा सके कि वो कौन है, कहां का है, क्या करता है? जैसा कि आजकल होता है..कि हम अपनी पुस्तक पर अपना जीवन परिचय या कुछ इसप्रकार का लिख छोडते हैं। वैसे लेखक का यह गुण हो सकता है जो उसके किसी कारण से उपजा हो, किंतु मुझे भा गया इसलिये कि मैं सोचता हूं जो पुस्तक सर्वहारा के लिये लिखी जाती है वो निजी कभी नहीं रहती या उसपे अपने बारे में लिखने का मोह नहीं रहता। जैसे न कभी तुलसीदास को यह मोह रहा न वेदव्यास जैसे लेखकों को। अब अगर मैं पुस्तक के लेखक को इस श्रेणी में रख देता हूं तो यह उसके लिये सबसे बडा पुरस्कार है। हालांकि लेखक तुलसी, वेदव्यास, कालीदास आदि की पंक्ति का नहीं है क्योंकि लेखन भी उस तरह का नहीं है। यह लेखन समीक्षा है, तुलनात्मक अध्ययन है, और अपने विचारों को साकार करने के लिये दुनियाभर के उदाहरणों का संग्रहण है। इसे मैं आज के दौर के लेखक-पत्रकारों में सबसे श्रेष्ठ मानता हूं जो किसी दृष्टांत के प्रति अपनी पूरी शक्ति उढेल देता हैं और स्थापित करता है कि सच किस प्रकार सच है। मेरे पिताजी ने मुझे शायद इसीलिये यह पुस्तक पढने को दी थी कि मैं जान सकूं लेखन का एक और अद्भुत उदाहरण।
पहले मैं आपको बता दूं कि "सुन्दर कांड-एक पुनर्पाठ" के लेखक का नाम मनोज श्रीवास्तव है। बस। और उन्होने पुस्तक भी उन्हें समर्पित की है जिन्हें हनुमान की तरह बिना किसी दावे के सेवा करते रहना प्रिय है। आप सोच सकते हैं कि क्या यह पुस्तक हम सबको समर्पित हुई? या जिनके बारे में लिखी गई उसे ही? यानी हमारा इस पर सिर्फ उतना ही अधिकार है कि हम पुस्तक पढें, जानें और अपने दिमाग के तंतुओं को नई चेतना से जाग्रत कर अपने आदिपुरुषों के प्रति आभार व्यक्त करें जो हमे जीवन का सदमार्ग आज भी दिखा रहे हैं। और कोशिश करें कि पुस्तक हमारी हो जाये।
मैं पुस्तक की समीक्षा कत्तई नहीं करना चाहता। और इसके लिये बैठा भी नहीं हूं। मुझे पुस्तक ने प्रभावित किया। उसके विषय और विषय पर सार्थक प्रस्तुति ने अपनी ओर खींचा और चाहा कि यह आप सबको भी बताऊं.. बस्स इस लिहाज़ से मैं अपने भाव रख छोड रहा हूं। विषय वही है जो रहता आया है। या कहें जो हमारी जडों में व्याप्त है। तुलसीदास की महानतम कृति या कहें..तुलसी के राम की महानतम लीला का जो वर्णन रामचरितमानस में हैं, उसके एक अतिमहत्वपूर्ण भाग के सुन्दर कांड पर..नहीं पूरे सुन्दरकांड पर नहीं, किंतु हनुमानजी के संदर्भ में ही..उनके श्लोक पर आधारित बातों को हजारों रिफ्रेंसेस के जरिये जिन 252 पृष्ठों में समाहित किया गया है वो हमारी सोच को, सोच की दिशा को पन्ने दर पन्ने प्रभावित किये बगैर नहीं छोडता। जो यह साबित भी करता जाता है कि लेखक ने बला की मेहनत की है। उसके पास देखने, समझने और सोचने की बडी ही विचित्र शक्ति है, जिसने अपनी बात को किसी अंधविश्वास के तहत नहीं बल्कि आधुनिक मानसिकता के जरिये, बहुत ही वैज्ञानिक ढंग से अंकित किया है।
ऐसा होता है। आजकल ऐसा ही हो रहा है कि हम अपनी जडों को छोडकर विज्ञान के तर्कों पर जीना सीख रहे हैं। चारों और हिन्दू संस्कारों, पुराणों, उनके विश्वासों पर आघात-प्रतिआघात करने का दुस्साहस चल रहा है। हमारे मानस को बदलने की जितनी राक्षसीय कुचालें रची जा रही है वे हमे अपने वज़ूद से डिगाने के लिये काफी है। इसलिये जरूरत पडती दिखती है कि हम सबूत दें। साबित करें। और उन मूर्खों को ज्यादा जो ईश्वरीय सत्य को झुठलाने के लिये बकवास करते फिरते हैं। हालांकि मुझे स्वामी अखंडानन्दजी का एक कथन यहां सौफीसदी अच्छा लगता है कि " जिन्हें खोजना है वो खोजें..मेरे लिये तो कृष्ण कदंब की डाली पर बैठा बांसूरी बजा रहा है..सामने ही..। तुम भी देख सकते हो..अगर तुम्हें देखना है तो, और अगर अनुसंधान करना है तो करो, मुझे क्या..। यह तुम्हारा काम है मेरा नहीं..क्योंकि मुझे तो कृष्ण दिख रहा है।" किंतु..आज का परिवेश बगैर साबित हुए चीजों को अन्ध विश्वास की नज़र करार देता है। और संभव है यह पुस्तक इसी अन्धेपन को दूर करने के लिये काफी है..। पुस्तक में हनुमानजी क्यों हनुमानजी हैं..इसे सार्थक करने की छोटी सी सफल कोशिश की गई है..क्यों वे अतुलित बलधामं हैं? हेमशैलाभदेहं क्यों है? कैसे हैं? या क्यों दनुजवनकृशानुं कहते हैं? ज्ञानिनामग्रगण्यं, सकलगुणनिधानं, वानराणामधीशम, रघुपतिअप्रियभक्तं, वातजातं, नमामी जैसे शब्दों पर विस्तार से अलग-अलग अध्याय के आधार पर सैकडों प्राचीन, आधुनिक, देशी, पाश्चात्य..लेखकों, विद्वानों..के कथनों..उद्धरणों आदि के रिफ्रेंसेस देते हुए सिद्ध किया गया है। और यह सिद्धता इसके लिये बिल्कुल भी नहीं है कि आप उसे आलोचना की श्रेणी में रखते हुए नकार सकें। "क्या तुलसी ने आतंक का प्रत्युत्तर सुन्दरकांड में दिया?" साबित किया है लेखक ने। जहां वाल्मिकी भी हैं अब्दाल सलाम फराज़ भी है तो स्यूवाल भी है, स्टोल भी है, साथ ही वैज्ञानिक आधार भी प्रस्तुत है तो कई रिपोर्ट्स हैं। कई कई कई...तरह से कई, कई विद्वानों के कथनों, आंकडों आदि को लेकर बूना जाने वाला यह जाल व्यक्ति को जानकारी, समझ, ज्ञान देने के लिये भरपूर तो है ही साथ ही यह स्थापित भी कर देने के लिये है कि हम अपनी भ्रांतियां उतार फेंके...। मैं बधाई देना चाहूंगा मनोज श्रीवास्तव को कि जिन्होने अपने ज्ञान, बुद्धि का सही सदुपयोग करते हुए इस तरह की पुस्तक को आकार दिया।

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

घोटालों के बीच गुम हो रहा सुदर्शन चक्र

पूर्व संघ सरसंचालक सुदर्शन के बयान के बाद मचा बवाल इस पूरे पखवाडे में घोटालो की भेंट चढ गया। वैसे भी सुदर्शन कह कर चुप थे और उधर सोनिया गान्धी ने तो अपना मुंह खोला ही नहीं था। सुदर्शन नहीं जानते थे कि संघ और भारतीय जनता पार्टी उनके बयान पर मुंह फेर लेगी। मगर सोनिया जानती थी कि उन्हें चुप रहना है क्योंकि उनके चाटुकार सैनिकों की फौज काफी है इस बयान, बवाल से निपटने के लिये। यह देश की विडंबना है कि जिसे सुदर्शन का साथ देना चाहिये था उसने अपना हित साधने के लिये होंठ सिल लिये। सुदर्शन का बयान झूठा या सच्चा जो भी हो..किंतु यह जांच का विषय होना ही चाहिये था। आपको क्या लगता है कि सुदर्शन कोई नासमझ व्यक्ति है जिन्होंने किसी पागलपन के दौरे में बयान दिया? क्या वे इस देश को सोनिया से कम जानते हैं या सिर्फ सोनिया ही त्याग की मूर्ति हैं सुदर्शन नहीं? सुदर्शन पढे-लिखे, बेहद सुलझे विचारों वाले और तमाम ऊंच-नीच को जानने-समझने वाले व्यक्ति हैं, सोनिया से ज्यादा...। लिहाज़ा उनके बयान को घोटालों की इस बाढ में बहने नहीं देना चाहिये था। यह भी तो हो सकता है कि घोटालों की सनसनीखेज खबरें, सुदर्शन के आग उगलते बयान पर पानी का छींटा डालने का बेहतर षडयंत्र हो? आप कहेंगे अपने बयान के बाद सुदर्शन क्यों चुप हैं? आप यह क्यों नहीं कहते कि सोनिया क्यों चुप रही? वैसे उनको सलाम ठोंकने वाले सैनिकों का उत्तर होगा कि सोनिया फिज़ूल के आरोपों पर अपना मुंह क्यों खोलेगी। तो भाई आप सैनिक क्यों बक बक करते है? जब फिजुल है तो चुप ही रहा जाये न.., मामला अपने आप निपट जायेगा। किंतु इसके पीछे का खेल भी न्यारा है। यह ऐसे मुद्दे होते हैं जब सोनिया की नज़रों में आया जा सकता है। आप अपनी वफादारी अच्छी तरह से व्यक्त कर सकते हैं। लिहाज़ा सुदर्शन का बोलना हुआ नहीं था कि चारों ओर से उन्हें घेरने, उन्हें घसीटने, उन्हें खींचने का कांग्रेसी कॉमनवेल्थ शुरू हो गया था। इधर सुदर्शन चाहते तो होंगे कि संघ उनका साथ दे। यह ताज्जुब की बात है कि संघ ने उन्हें उनके निजी विचार बता कर उनसे किनारा कर लिया। भाजपा से वैसे भी कोई ज्यादा उम्मीद उन्हें नहीं थी क्योंकि भाजपाई सोच का और मुद्दों पर संघर्ष करने का ढंग बदल चुका है। हालांकि इस मुद्दे पर वो अगर अड जाती और बगैर किसी दबाव, बगैर किसी गलत प्रक्रिया के शुद्ध जांच की मांग करके, एक बार हो ही जाये वाली शैली में आ जाती तो उसे राजनैतिक फायदा जरूर होता साथ ही देश का भी फायदा हो जाता, और दूध का दूध पानी का पानी सामने आ जाता। मगर हर बार की तरह अफसोस कि इतने संवेदनशील बयान के बावज़ूद कोई सार्थक जांच नहीं हुई। आप सोच रहे होंगे कि मैं इतना उतावला क्यों हो रहा हूं इस बयान की तह में जाने के लिये? तो आपको बता दूं कि सोनिया के लिये सुदर्शन द्वारा व्यक्त किया गया बयान कोई नया नहीं था। इसके पहले भी इस तरह की बातें राजनीतिक चक्र में घूमी थीं, और घूम कर कहीं किसी दरार में छिप गई थीं। सुदर्शन ने उसे बाहर निकालने का साहस किया। आप बता सकते हैं सुदर्शन के इस साहस की पुनरावृत्ति कोई और कर सकता है क्या? वो कांग्रेसी नेता खुद भी नहीं जिसके वज़ूद पर सुदर्शन ने अपनी बात कही थी। वैसे कांग्रेसी नेताओं में वो जिगर है ही नहीं कि सोनिया के खिलाफ कुछ सोच भी सकें। यह उनकी अपनी मज़बूरी है। मेरा तो महज़ यह मानना है कि सुदर्शन जैसा व्यक्तित्व जिसने संघ जैसी विशाल राष्ट्रीय, राष्ट्रवादी संस्था को संभाला वो कोई नीचता जनक कार्य तो कभी नहीं कर सकता है, जिससे उनका मानमर्दन हो। तब उनका बयान सिवाय सुर्खियों तक सीमित रह जाये, या सिर्फ थोडे से बवाल में नष्ट हो जाये, देश की एक उच्च पदस्थ पार्टी की उच्च पदासीन अधिकारी के लिये भी ठीक नहीं। आखिर यह उनके अपने जमीर, ईमानदारी पर उठा सवाल है। और वह भी बहुत ज्यादा घातक। जवाब मिलना चाहिये था।
खैर..। घोटालों की बाढ में इन दिनों कांग्रेस क्या और भाजपा क्या..सब के सब बह रहे हैं। एक दूसरे पर कीचड उछाल-उछाल राजनैतिक होली खेली जा रही है। जांच भी अवश्य होगी। किंतु कांग्रेस के लिये यह सुखद भी है क्योंकि अगर इन घोटालों की बाग़ड (खेत के किनारे खडी की जाने वाली घासफूस से बनी दीवार) तैयार नहीं की गई तो सोनिया पर उठे सवालों की लहलहाती फसल पर सबकी नज़र चली जा सकती है। इसलिये चाहे वो अशोक चव्हाण के आदर्श घोटाले की बात हो या रतन टाटा के बयान से उठे विवाद या फिर कॉमनवेल्थ के घोटालों की फेहरिस्त हो, सबकी सब मीडिया में अव्वल स्थान पर हो और सुदर्शन के बयान किसी रद्दी की टोकरी में पडे पुराने अखबार की तरह खत्म हो जाये..कांग्रेस की यह चाहत अवश्य रहेगी। खुदा जाने उसकी चाहतों में और क्या-क्या है? किंतु यह जरूर है कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति पर प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा उठाई गई उंगली के लिये तीसरे अंपायर का निर्णय अगर दिया जाता तो मैच का रंग ज्यादा निखरता, उसका रोमांच बढता और सच्ची जीत सामने आती।

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

अरुधंति से सावधान

क्या अरुधंति राय जैसी बाइयों से देश को सावधान रहने की आवश्यकता नहीं है? खुद को अतिबुद्धिजीवी मानने वाली अरुधंति का विचार देश को बांटने वाला है, और यह पहला अवसर भी नहीं है कि बाई ने ऐसा कहा हो। समय-समय पर अरुधंति ने आग में घी डालने वाले बयान दिये हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह कत्तई नहीं होता है कि देश के बंटवारे या देश के हिस्से के विरोध में अपने बयान देकर चर्चा में बने रहने का मोह पूर्ण किया जाये। क्योंकि यह देश कोई मज़ाक नहीं है। इस देश की आज़ादी के लिये कइयों-कइयों ने अपना बलिदान दिया है। जी हां अरुधंतिजी कश्मीर भी इसी देश में है जिसके लिये आज भी हमारे देशभक्त अपने खून से उसे सींच रहे हैं, जिसे आपने भारत से अलग बताया है। अरुधंति का बयान महज़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को महान कहलवाने और यह साबित कराने के लिये है कि दिखिये हम भारत में रहने के बावज़ूद भारत के खिलाफ बोलते हैं, और किसी की हिम्मत नहीं कि हमसे ऐंठ जाये। ऐसी बाइयां या ऐसे लोग पहले तो बयान देकर सुर्खियों में छा जाते हैं, फिर अपने बयान या अपने बचाव के लिये देश को भ्रमित करने वाले बयान देते हैं, प्रेस कांफ्रेंस लेते हैं और फिर सुर्खियां ढूंढते हैं। फिलवक्त अरुधंति को कानूनी पेंच में लेने की कवायद जारी है। लिया ही जाना चाहिये। कानून की जंजीरों में ऐसे विकृत मानसिकता वाले लोगों को बांधना ही चाहिये जो देश के सौहार्द के लिये खतरा हैं।
क्या जानती हैं अरुधंति कश्मीर के बारे में? कश्मीरी पंडितों से पूछ कर देखें या फिर कश्मीर का इतिहास ईमानदराना होकर पढ लें। वैसे मैं जानता हूं कि अरुधंति जैसे लोग जिस परिवेश, जिस मानसिकता और जिस उद्देश्य के लिये जी रहे हैं उसमें दूसरों की सही राय या सही इतिहास या विशुद्ध भारतीय होकर कभी नहीं सोच सकते। उनकी रगों में विरोध और विवाद पैदा करने वाला ही खून दौडता नज़र आता है। अरुधंति राय की यह किस्मत है कि यह देश उन जैसे लोगों को फिज़ुल में महत्व दे देता है। शायद यही कारण है कि देश को ऐसे लोगों की बयानबाजी से कभी कभी बडी कीमत चुकानी पड जाती है। होना यह चाहिये कि हम अरुधंति जैसे लोगों को महत्व देना छोड दें। दूसरी बात यह है कि कश्मीर का इतिहास या भारत का इतिहास ठीक से पढा जाये। उसका अध्ययन किया जाये। अरुधंति को यह पता होगा कि हमारी संसद में सर्व सम्मति से पारित है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। अगर नहीं तो वे चाहें तो संयुक्त राष्ट्र महासभा में वी के कृष्णमेनन या एम सी छागला या फिर सरदार स्वर्ण सिंह जैसे महानुभावों की दलीलें देख-पढ लें कि कश्मीर किसका हिस्सा है? और यदि इतने से भी उनकी तथाकथित तीक्ष्ण बुद्धि में कश्मीर के प्रति ज़हर खत्म न हो तो प्राचीन भारतीय इतिहास की किताबें खरीद कर लायें और पढें कि कश्मीर किसके नक्शे में हमेशा विद्ममान है या नहीं? भारतीय इतिहास बताता है कि भारत में ईसा पूर्व (गौर से पढें अरुधंतिजी ईसा पूर्व) तीसरी शताब्दी से ही कश्मीर में एक समृद्ध नवपाषाण संस्कृति रही थी। और इस संस्कृति का जो महत्वपूर्ण स्थल मिला है वह है बुर्जहोम। यह आधुनिक श्रीनगर से ज्यादा दूर नहीं है। कहने का मतलब यह है कि मैं भारतीय इतिहास के नवपाषाण युगीन कश्मीर की बात कर रहा हूं। सिन्धु सभ्यता के विस्तार में जम्मू-कश्मीर के एक स्थल मांदा का नाम भी है जो अखनूर के निकट है। यह तो माना जायेगा न कि सिन्धु सभ्यता भारतीय इतिहास की सबसे मज़बूत सीढी है। चलिये 150 ईसवीं के भारत पर नज़र दौडा लीजिये। यह काल शक, कुषाण, सातवाहन का काल माना जाता है। अरुधंतिजी कनिष्क को जानती हैं? कुषाण वंश का तीसरा शासक कनिष्क। कनिष्क को इतिहासकारों ने कुषाण वंश का महानतम शासक माना है। उसका राज्यारोहण का काल 78 से 105 ईसवीं के बीच में अलग अलग इतिहासकारों ने माना है। जो भी हो कनिष्क के राज्यारोहण के समय कुषाण साम्राज्य में अफगानिस्तान, सिन्ध, बैक्ट्रिया व पार्शिया के प्रदेश शामिल थे। कनिष्क ने भारत में अपना राज्य विस्तार मगध तक फैलाया था और कश्मीर को तो उसने अपने राज्य में मिलाकर वहां एक नगर ही बसा लिया था जिसका नाम था कनिष्कपुर। यानी कश्मीर कनिष्क के शासनकाल के समय तो था ही यह ऐतिहासिक तथ्य है। इसके भी पहले प्राचीनतम या वैदिक कालीन इतिहास को अगर अरुधंतिजी मानती हो तो वह भी उठाकर पढ सकती हैं कि कश्मीर भारतवर्ष के नक्शे में रहा है। वे ललितादित्य के शासनकाल पर नज़र डाल सकती हैं या रणजीत सिंह के इतिहास को खंगाल कर देख लें कि कश्मीर कहां था? अरे हमारे पुराण कश्मीर की गवाही देते हैं। इसका नामकरण तो कश्यप मुनि के नाम पर हुआ माना जाता है। फिर कैसे अरुधंति राय को कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं लगता? खैर..यहां मैं साफ-साफ कह देना चाहता हूं कि मैं अरुधंति को समझाने की चेष्ठा कत्तई नहीं कर रहा, वे महान हैं..। मैं अपने भारत के इतिहास को संक्षिप्त में दर्शा कर अपने देशभक्त लोगों के सामने फिर से रख रहा हूं। मुगलों ने भारत पर काफी लम्बा राज किया, यह माना ही नहीं बल्कि लिखा भी गया है। मुगल शासको में कश्मीर किसी जन्नत से कम नहीं था। जहांगीर हो या शाहजांह भारत के इस बेमिसाल स्थान कश्मीर को विशेष प्रेम करते थे। आधुनिक भारतीय इतिहास की परतों पर तो कश्मीर स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। चाहे आप महाराजा गुलाब सिंह को ले लें या महाराजा हरिसिंह के इतिहास को खंगाल लें..क्या ये किसी विदेश में शासन करते रहे? अजी ज्यादा दूर क्यों जाते हैं..हरिसिंह के बेटे कर्ण सिंह से तो पूछ कर भी देखा जा सकता है कि कश्मीर भारत का हिस्सा है या नहीं?
अरुधंति का यह बयान था ही कि एक अन्य महाशय का बयान भी अरुधंति के बयान को बल दे गया। दिलीप पाडगांवकर का। इन महानुभाव ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिये पाकिस्तान को शामिल करके ही हल निकल सकता है, जैसी बात कही। मानों इन्हें यह अधिकार दिया हो कि भाई दिलीपजी आप जो कहेंगे वही मान्य होगा। सिर्फ एक वार्ताकार के रूप में दिलीपजी को भेजा गया था। भाईजान ने हल ही खोज निकाला। कश्मीर का मसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुलझाने का मतलब क्या है? वो हमारा है, हम सोचने में समर्थ हैं कि किससे, कब और कैसी बातचीत करनी होगी? विडंबना यह है कि हमारे इतिहास में गद्दारों का भी एक इतिहास है। इनकी बडी फौज रही है, जिन्होने समय-समय पर भारत को आघात पहुंचाया है। चाहे वो जयचंद के रूप में हो या रानी लक्ष्मीबाई के समय, गद्दारों ने इतिहास के प्रत्येक कालखंड में भारत की संप्रभुता पर वार किया है। और अफसोस कि इसी वजह से हम मज़बूत नहीं बन सके। गद्दारों का इतिहास दफ्न नहीं हो सका है। किंतु हां, आज हम इतने समझदार तो हो गये हैं कि गद्दारों को पहचान सकते हैं। समय यही है कि सबकुछ सरकार ही निपटेगी जैसा विचार त्याग कर हमें अपने धर्म, अपने कर्तव्य को पहचानते हुए भारत को मज़बूत व एकजुट रखने के लिये आगे बढना ही होगा। अन्यथा इसकी कीमत भयावह होगी यह तय है, जो हम सबको भुगतनी ही होगी। भारत कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक एक है..कहने में ही नहीं इसे स्वीकारने का गर्व भी महसूस करना चाहिये।

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

शीर्षकहीन

पद पाने की होड
विशेष बन जाने की चाह
कामयाबी के लिये ज़ंग
मानों जीवन के सूत्र
बन गये हैं।
किंतु अफसोस
यह सूत्र उस
निर्विवाद सत्य को
झुठला नहीं पाता कि
खेल खत्म होने के बाद
बादशाह और प्यादे
सब को एक ही बॉक्स
में डाल दिया जाता है।

दो तिकडियां भी-

1,


हद है मुसाहलत की
वो इश्क़ फरमाते हैं और
हम नींद।


2,

बेदार हैं लोग
उन्हें छेडना नहीं
ख्वाब टूट जायेगा।

*- मुसाहलत- आलस्य
*बेदार- जागरुक

रविवार, 19 सितंबर 2010

क्षणिकायें

1,

उसने किसी के
पेट पर लात मारी।
वाह क्या बात है,
वो एक ही तीर से
कितने
शिकार कर गया।

2,

ऊंचे और ऊंचे
चोटी पर जा पहुंचे।
अफसोस कि
देखना अब नीचे ही है।

3,

हम घास,
आप दरख्त
आपका इतराना
लाज़मी है।
पर बचके,
कहते हैं
आन्धियों में टूटते
दरख्त ही हैं।

4,

तुम्हारी प्रतिष्ठा
तुम्हारा अहम
तुम्हें मोहक
बना रहा है।
किंतु 'प्लेटो' कहता है
कि
छलने वाली प्रत्येक
वस्तु को मोहक
कहा जा सकता है।

सोमवार, 13 सितंबर 2010

आत्म सत्य

अक्सर..
हां अक्सर ही तो,
जब
देखता हूं खुद को
खुद के भीतर,
तो पाता हूं
भीतर
गहरे भीतर
एक सबसे अच्छा गुण..
जिसमे दुर्गुण की
कोई गन्ध आती है।

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

भ्रम

छोटे बडे
ऊंचे ऊंचे
रेलवे ब्रिज़
रोज़ चढना
रोज़ उतरना।
और लोकल के
फर्स्टक्लास डिब्बे से
उतरकर कर भीड में
खो जाना।

जिन्दगी के सच है।

एक में
उतरना तय है
दूजे में
इस भ्रम का
दूर होना कि
हम विशेष हैं।

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

जिन्दगी

जिन्दगी-

ढेर सारे चिंतकों की किताबें
खुली हैं और पन्ने
फडफडा रहे हैं।

ग्लैडी टैबर की खिडकी
सनसनीखेज जिन्दगी को बयां करती है तो
मेसफिल्ड के लिये यह
शोरभरी गली में एक
लम्बे सिरदर्द का नाम है।

'किंग जोन' का लेखक
शेक्सपीयर मानता है
जिन्दगी उतनी ऊबाऊ होती है,
जितनी कोई दोबारा कही गई कहानी।

किंतु देखो
जिजीविषा..कि
यह है तो जीवन है, जीवन रहेगा तो
अनंत संभावनायें भी रहेंगी।
'अनामदास का पोथा' खुलता है मगर
उधर ह्यूगो ग्रोशिय मानो इसे नकारते हुए
लिखता है
मैने अपना जीवन परिश्रमपूर्वक
कुछ भी नहीं करते हुए गुजार दिया।

और एक मैं
जिन्दगी के ताने-बाने में उलझा
डरता हूं, तब और ज्यादा जब
टैगोर को पढता हूं कि
मृत्यु है, उस के होने पर भी जीवन नष्ट नहीं होता।

यानी फिर से जिन्दगी...???? उफ्फ।

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

सलीके से रखे हैं मेरे दिन-रात

लगभग खंडहर होते जा रहे
इस शरीर के स्टोर रूम को
साल में महज़ एक बार खोलता हूं।
जब भी दरवाजा खोल कर मैं अन्दर घुसता हूं
रैक में सलीके से जमाये गये
दिन और रातों का
हिसाब रखते रजीस्टर के पन्ने
फडफडा कर उडने लगते हैं।
मुझे अच्छा लगता है क्योंकि
वे इस दिन खिलखिलाने लगते हैं।

घंटो बैठा रहता हूं उनके साथ..
सन 1967 की रात से लेकर
19 अगस्त 2010 तक के इस समय तक
का पूरा पूरा हिसाब है।
और जैसे जैसे पल बीत रहे हैं
पन्नों पर चढते जा रहे हैं।

अमूमन मैं दिन का वो पन्ना निकालता हूं
जब अपने शहर को छोड महानगर में आया था।
सिर्फ शहर नहीं छूटा था
छूट गया था बहुत कुछ...

पता नहीं किस बचत में से
पिताजी ले आते थे नये कपडे
और मां पानी मिले दूध को
ओटा ओटा कर खीर बनाती थी।

ललाट पर टीका लगा कर
चारों दिशा में धौक दिलवाती थी मां
और पीठ पर हाथ धर
अपने जीवन के मानों सारे
आशीर्वाद उढेल दिया करती थी।

मैं नहीं जानता था तब इन सब का महत्व
आज जब इस दिन
अपने स्टोर रूम में बैठा दिन के उस
पन्ने को खोल बैठा हूं तब जाना है इसका महत्व।
तभी ..तभी..बरबस ही आंखों से अश्रुदल फूट पडते हैं
और मैं इन्हें पौंछ कर इस महानगर से
फोन करता हूं।

क्योंकि आज यदि मैं इन दिन और रात को
बटौर संजो पा रहा हूं तो
उन्हीं की बदौलत जिनके हाथ मेरे शीश पर हैं
और जिनके आशीर्वादों से मेरी सांसे गति पाती है।

सोमवार, 9 अगस्त 2010

कशमकश



लगता है
अपनी ग्रेविटी खोये
ग्रह-नक्षत्रों ने
एटम बम की तरह
गिर-गिर कर
मेरी किस्मत को
चकनाचूर कर दिया है।
और दिमाग
किसी जापान की तरह
फिर उठने, किस्मत चमकाने,
संवरने की फिक़्र में
जुटा है।


इस जुटने में हो यह रहा है कि-

कभी-कभी दिल
हिटलर की तरह पेश आता है
और गान्धीवादी विचारधारा
उसके तमाम 'ब्लाकेज' को
क्लियर कर देती है।
यह जंग भी जारी है।

खून में लोहा है
और रगों में गुलामी से
लडने की ताक़त
शायद यही वजह है कि
अंग्रेजों की तरह
मेरे इन हालात ने
मुझे झौंक रखा है
एक नये विश्वयुद्ध में।

आज़ादी की सोच ने
हाथ-पैरों में गज़ब की
स्फूर्ति ला खडी की है
जो सुध-बुध खोकर
भिडे पडे हैं,
मगर अफसोस
इरविन-गांधी के बीच की सन्धि
दिमाग द्वारा दिल को
हमेशा परास्त कर दिया करती है।

देखिये इन फेफडों को
जो गोले-बारूद की गन्ध
के बावजूद सीने को
ताने रखने के भरसक प्रयास में हैं।
और अपने पीछे
रखे गये दिल को बचाने की
खातिर
किसी 'अस्थालिन' के 'पफ' से
सांसों को रास्ता दे रहे हैं।
आखिर कब तक
कृत्रिम रासायनिक हवा से
सांसो को काबू में रखा जा सकता है?

यूं तो खडे कर चुका हूं
अपनी उम्मीदों के
बडे बडे रडार,
जो दुश्मन की हर चाल
का पता लगाते हैं।
मगर अपने ही लोगों का
खिलाफत आन्दोलन
हर-हमेश ले डूबता है मुझे।
फिर भी
सागर की गहराई में किसी
डिस्कवरी चैनल की तरह
कैमरों से खोज करता हूं
उम्मीद का कोई
अजीबो-गरीब जलचर।

आखिर जापान की तरह
खत्म होकर जिन्दा होने की
कशमकश जो है।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

सवाल सावन का



"नीम का वो पेड
आज भी है।
किंतु
वो डाल नहीं
जिस पर बंधता था
सावन का झूला।

सावन खिलखिला तो रहा है
मगर यौवन की
खिलखिलाहट पर
वक्त की रस्सी ने गांठ बान्ध दी है।
गांठ कसती जरूर है अपनी
इच्छाओं को।

इच्छायें क्या नहीं होती
हवा के साथ डोलने की?

डोलना इस मौसम में
स्वतः ही मन चाहता है।
मन उड कर फिर
उस डाल पर बैठना
चाहता है
जिस पर बन्धा करता था
सावन का झूला।

और उसका घर
ठीक सामने दिखाई देता था।

अब सवाल यह था कि
सावन के झूले का लुत्फ
लेता था या
उसके घर से उसके निकलने
की प्रतीक्षा करता था?

जो भी हो नीम के
पेड की तरह
सवाल भी खडा है...।
और सावन
झूम रहा है।"


* चित्र उसी असली नीम के पेड का है जो आज भी वहां है, पर सूना सूना सा, जैसे उसे भी हमारी याद आती हो और वो भी रोता हो।

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

बस यूं ही

1-
विचारों का तीर सीधे
खोपडी की किसी हड्डी में
धंस जाता है।
उसका नुकीला कोना
मजबूत कोशिकाओं के बने
किसी ज्ञान खंड से टकराता है,
और एक दर्द का रैला उठता है
जो फेफडों से बहता हुआ
एक कोने में दुबके
हृदय के स्पन्दन को भी भिगो देता है।
खून की गति
अचानक तेज़ हो जाती है
जो कंपकपा देती है
इरादों को,
कि
बस बहुत हो चुका
इस बेशर्म दुनिया में
भावनाओं के तट पर
कुम्भ का आयोजन।


2-
आंखों की गीली पुतलियां
दृष्य ओझल कराती हैं,
और गाल पर बहती
अश्रूधार का नमकीन स्वाद
होठों से टकराता है तो
बरबस फूट पडता है स्वर
ओह क्या प्रेम ऐसा होता है?
इसीलिये कहता हूं
दिमाग के कामकाज में
दिल के लिये
'वेकेंसी' नहीं होती।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

बारिश?

मुम्बई में बारिश का कोई ठिकाना नहीं रहता, अभी सूरज चमक रहा है और अचानक बारिश धम से टपक पडती है..रुक रुक कर, कभी तेज़ तो कभी धीमी...यहां के आलम का यह विचित्र मज़ा है..ऐसी ही बारिश की तरह लग सकती है मेरी यह रचना...

हां शायद बारिश शुरू हो गई है,
कल घर से बाहर निकला था
तो पैर के जूते गिले हो गये थे..
पसीना इतना तो नहीं होता कि
जूते के तलवे गिले हो जाये
सो निश्चित ही बारिश का मौसम है।

और तुम कहते हो कि
आजकल अपनी भी फिक्र नहीं है,
कहां खोये होते हो
पहाड टूटना बस एक मुहावरा भर है
कोई सचमुच थोडी टूट जाता है माथे पर।
और अगर टूट भी जाये तो
यकीन रखो तुम्हारे माथे पर तो नहीं ही गिरेगा।
तब लगता है हां
निश्चित ही बारिश का मौसम होगा।

सूरज निकलता नहीं है
डरता है शायद
और ये हवाओं को क्या हो चला है कि
आजकल ठंडी हो गई है,
बाहर दिन भी पगला गया है
देखो कैसा तो रोता रहता है,
इधर रात है कि दिखती नहीं है इस अन्धेरे में
पता नहीं क्या हो गया है आजकल
इसे तुम कहते हो कि बारिश का मौसम है
सो हो सकता है।

वैसे

जब भंवर लयबद्ध नहीं होती
जीवन की दिशायें एक सीध खो देती हैं
मुहफेरी की खिडकियों से
झांकने लगते हैं दोस्त,
पीठ के पीछे छूरा घोपने की घटनायें आम हो जाती हैं,
मुंह के सामने मीठी छुरियों का बाज़ार लगने लग जाता है
और वे कन्धे ऊंचे व बडे हो जाते हैं एक दम से
जिनके सहारे गले में हाथ डाला जाता था
तब लगता है बारिश सावन की चमक खो चुकी है
फिर तेज़ कितनी भी हो
मुझे दिखाई नहीं देती,
बस घर के छप्पर पर आवाज़ आती है
धप धप धपा धप
जैसे कोई धोबी घाट पर कपडों को पीट रहा हो
और ऐसे में कहो कि बारिश है
तो हो सकता है बारिश का मौसम है?

सोमवार, 12 जुलाई 2010

यह कैसा इतिहास?

इतिहास कैसा होना चाहिये? सत्य पर आधारित। और सत्य? कम से कम गोरों द्वारा दिये गये सत्य जैसा तो नहीं। क्योंकि गोरों ने हमारे इतिहास से काफी छेडखानी की है, नफरत के बीज बोये हैं, जो उनके खून में है। उनके गन्दे खून का भी एक इतिहास है। खैर, इन दिनों महाराष्ट्र में एक किताब पर बवाल मचा हुआ है। जेम्स लेन नामक एक कथित इतिहासकार हैं जिन्होंने शिवाजी महाराज पर एक किताब रची है ' शिवाजी-हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया' नामक। किताब मैने पढी नहीं है, पढना भी नहीं चाहता। क्योंकि उसके जितने प्रचारित या प्रसारित अंश पढे है वे तमाम, किसी भी सत्य से कोसो दूर हैं। यह विडम्बना है कि हमने अपने इतिहास के लिये हमेशा से ही गोरों की बातों पर विश्वास किया। हमारे इतिहासकार भी हुए किंतु अधिकांश सहमति गोरों की बातों से दर्शाई गई। क्यों? क्या हमारे इतिहासवेत्ता लायक नहीं या उनकी बातें गलत हैं? ऐसा कुछ भी नहीं है, यदि हम पी एन ओक जैसे इतिहासकारों को आज मान्यता देते तो सम्भव था इन गोरों द्वारा समय-समय पर जिस तरह से जनमानस को भडकाने का षडयंत्र चला आ रहा है वो बन्द हो जाता। ग्रांट डफ जैसे इतिहासकारों को हमने अपने दस्तावेजों मे तरजीह दे दी मगर ओक को क्यों नहीं?
इस विषय पर तर्क-वितर्क होगा। हास्यास्पद तो वो है जो लेन की किताब की तरफदारी करेगा। मैं लेन की तरफदारी क्यों नहीं करता? आपको बता दूं कि इतिहास का छात्र रहा हूं। भारतीय इतिहास से लेकर यूरोपीय इतिहास का गम्भीर अध्ययन किया हुआ है। हां पीएचडी नहीं है तो इसका मतलब यह भी नहीं कि बन्दे ने रिसर्च जैसा कुछ किया ही नहीं। ढेरों इतिहासकारों को पढा, कई-कई जगह खुद गया और जानकारियां ली। बहस-मुबाहस भी खूब की। और हमेशा अपने इतिहासकारों की बातों को यकीन के करीब पाया। खासकर पी एन ओक जैसे। जदुनाथ सरकार, जी एस सरदेसाई, एम जी रानाडे जैसों ने भारत के सन्दर्भ में काफी सच्चा अध्ययन किया है। यदि ग्रांट डफ जैसे ने शिवाजी द्वारा अफज़ल खां
के खिलाफ विश्वासघात का आरोप लगाया तो रानाडे ने अपनी पुस्तक' राइज आफ द मराठा' में इसका बहुत सटिक जवाब दिया है। खैर..मैं कहना यह चाह रहा हूं कि जेम्स लेन बाजारवाद का इतिहासकर्ता है। उसकी किताब किसी प्रकार के अध्ययन या रिसर्च का नतीज़ा नहीं है बल्कि बाज़ार द्वारा प्रायोजित भारत के जनमानस को भडकाने का कृत्य है। लेकिन फिलहाल न्याय के क्षेत्र में लेन की किताब की लाइन क्लीयर है। आपको बता दूं और यह तमाम इतिहासवेत्ता जानते हैं कि शिवाजी महाराज द्वारा मराठा राज्य की स्थापना की सम सामयिक स्त्रोत सामग्री व अभिलेखों के पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होने के कारण उनके प्रशासनिक आदर्शों व परम्पराओं का अनुमान लगाना कठिन है। यूरोपीय स्त्रोत व फारसी इतिवृत्तों से भी इस सम्बन्ध में पर्याप्त सूचना प्राप्त नहीं होती तथा मराठी अभिलेख अधिकतर परवर्ती काल से संबद्ध है। अब रही उत्तरकालीन प्रशासनिक पद्धति से अनुमान की बात, तो इसी के आधार पर शिवाजी के जीवनकाल की घटानाओं का अनुमानभर लगाया गया है। इसमें भी भारतीय इतिहासकार ज्यादा करीब माने गये हैं क्योंकि उन्होंने जमीन से जुडी जानकारियां प्राप्त की और विदेशी इतिहासकारों ने सुनी सुनाई बातों को अपने ढंग से मोडने का काम किया। अब जेम्स लेन को कोई नया तीर मारना था सो महाराष्ट्र में देवतुल्य पूजनीय समझे जाने वाले शिवाजी महाराज के खिलाफ आग उगली ताकि बवाल हो और उसकी किताब धडल्ले से बिके। मोटी कमाई हो। मेरा मानना है इतिहास जो रहा, वो रहा..आज क्या है? जो राज्य शिवाजी के नाम से गर्व अनुभव करता है, सिर्फ राज्य नहीं पूरा भारतवर्ष, और इसके साथ ही उस राज्य की आस्था भी जुडी है तो इसे भंग करने का दुस्साहस कतई नहीं किया जाना चाहिये। यह अपराध है। आप किसी इतिहास को, ऐसा इतिहास को जो जनमानस में घर कर गया हो, जिससे दिशायें प्रवाहित होती हैं, जिससे प्रेरणा का सूत्रपात होता है उसे किसी भी प्रकार के तथ्यों का प्रभावी जामा पहना कर सत्य को झुठलाने का प्रयास करते हैं तो यह आपका अतुलनीय कार्य नहीं बल्कि घोर अपराध है? जेम्स लेन को विद्वान मानने से में इंकार करता हूं। उसकी विद्वत्ता गोरों की मानसिकता का परिचायक हैं। कम से कम आप तो इस सच्चाई को पूरी ईमानदार तरीके से स्वीकार कीजिये। तर्क-वितर्क तो बहुत हो जायेंगे। मगर अपने देश के लिये यदि अन्धभक्ति भी हो तो क्या गलत है?