शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

"सुन्दर कांड- एक पुनर्पाठ "


पिछले दिनों जब मैं अपने शहर खरगोन गया था, पिताजी ने दो पुस्तके पढने को दी थी। उनमें से एक थी "सुन्दर कांड- एक पुनर्पाठ।" हमारी विद्वता है यह कि हमने महाकाव्यों की सैकडों टीकायें, भाष्य, व्याख्यायें की और यह सुस्थापित करने का सफल प्रयत्न किया कि वे काव्य कितने सामयिक हैं, कितने ऊर्जावान हैं, कितने अमूल्य हैं। देखिये कि आज तक उन महाकाव्यों पर चिंतन का कोई अंतिम चरण नहीं आया, और वे हमेशा से ही हमारे लिये नये-नये द्वार खोलते जा रहे हैं..। जितना कुछ लिखा गया..लगता है कम ही लिखा गया..। जितना कुछ चिंतन हुआ..लगता है कम ही हुआ है, यह उस काव्य और उस लेखक की ईश्वरीय शक्ति है कि वो जीवंत, चेतना से लबालब, दिशायें प्रदत्त करने में सार्थक और लगातार हमारी बुद्धि को विस्तार देने का काम कर रहे हैं, भ्रांतियों को नष्ट कर रहे हैं। 'सुन्दर कांड-एक पुनर्पाठ' इस आधुनिक युग में बिल्कुल आधुनिक अंदाज में व्याख्यायित है कि मुझे उसके लेखक की लगन, मेहनत और अध्ययन पर ताज्जुब होता है। मैं जानता हूं कंप्यूटर और इंटरनेट की इस दुनिया में रिफ्रेंसेस बटौरने में आने वाली दुविधायें कम ही हो गई हैं किंतु इस पुस्तक के लेखक ने महज इंटरनेट का उपयोग कर उदाहरण बटौरे? नहीं लगता ऐसा। खूब-खूब अध्ययन का प्रतिफल है कि "सुन्दर कांड-एक पुनर्पाठ' जैसी अतिपठनीय पुस्तक का जन्म हो सका।
मैं पुस्तक के लेखक को नहीं जानता, सिर्फ पुस्तक पर उनके नाम से जाना कि इसका लेखक भी है..। इसके अलावा अपने परिचय में लेखक ने एक रत्ती शब्द भी नहीं लिखा है जिससे जाना जा सके कि वो कौन है, कहां का है, क्या करता है? जैसा कि आजकल होता है..कि हम अपनी पुस्तक पर अपना जीवन परिचय या कुछ इसप्रकार का लिख छोडते हैं। वैसे लेखक का यह गुण हो सकता है जो उसके किसी कारण से उपजा हो, किंतु मुझे भा गया इसलिये कि मैं सोचता हूं जो पुस्तक सर्वहारा के लिये लिखी जाती है वो निजी कभी नहीं रहती या उसपे अपने बारे में लिखने का मोह नहीं रहता। जैसे न कभी तुलसीदास को यह मोह रहा न वेदव्यास जैसे लेखकों को। अब अगर मैं पुस्तक के लेखक को इस श्रेणी में रख देता हूं तो यह उसके लिये सबसे बडा पुरस्कार है। हालांकि लेखक तुलसी, वेदव्यास, कालीदास आदि की पंक्ति का नहीं है क्योंकि लेखन भी उस तरह का नहीं है। यह लेखन समीक्षा है, तुलनात्मक अध्ययन है, और अपने विचारों को साकार करने के लिये दुनियाभर के उदाहरणों का संग्रहण है। इसे मैं आज के दौर के लेखक-पत्रकारों में सबसे श्रेष्ठ मानता हूं जो किसी दृष्टांत के प्रति अपनी पूरी शक्ति उढेल देता हैं और स्थापित करता है कि सच किस प्रकार सच है। मेरे पिताजी ने मुझे शायद इसीलिये यह पुस्तक पढने को दी थी कि मैं जान सकूं लेखन का एक और अद्भुत उदाहरण।
पहले मैं आपको बता दूं कि "सुन्दर कांड-एक पुनर्पाठ" के लेखक का नाम मनोज श्रीवास्तव है। बस। और उन्होने पुस्तक भी उन्हें समर्पित की है जिन्हें हनुमान की तरह बिना किसी दावे के सेवा करते रहना प्रिय है। आप सोच सकते हैं कि क्या यह पुस्तक हम सबको समर्पित हुई? या जिनके बारे में लिखी गई उसे ही? यानी हमारा इस पर सिर्फ उतना ही अधिकार है कि हम पुस्तक पढें, जानें और अपने दिमाग के तंतुओं को नई चेतना से जाग्रत कर अपने आदिपुरुषों के प्रति आभार व्यक्त करें जो हमे जीवन का सदमार्ग आज भी दिखा रहे हैं। और कोशिश करें कि पुस्तक हमारी हो जाये।
मैं पुस्तक की समीक्षा कत्तई नहीं करना चाहता। और इसके लिये बैठा भी नहीं हूं। मुझे पुस्तक ने प्रभावित किया। उसके विषय और विषय पर सार्थक प्रस्तुति ने अपनी ओर खींचा और चाहा कि यह आप सबको भी बताऊं.. बस्स इस लिहाज़ से मैं अपने भाव रख छोड रहा हूं। विषय वही है जो रहता आया है। या कहें जो हमारी जडों में व्याप्त है। तुलसीदास की महानतम कृति या कहें..तुलसी के राम की महानतम लीला का जो वर्णन रामचरितमानस में हैं, उसके एक अतिमहत्वपूर्ण भाग के सुन्दर कांड पर..नहीं पूरे सुन्दरकांड पर नहीं, किंतु हनुमानजी के संदर्भ में ही..उनके श्लोक पर आधारित बातों को हजारों रिफ्रेंसेस के जरिये जिन 252 पृष्ठों में समाहित किया गया है वो हमारी सोच को, सोच की दिशा को पन्ने दर पन्ने प्रभावित किये बगैर नहीं छोडता। जो यह साबित भी करता जाता है कि लेखक ने बला की मेहनत की है। उसके पास देखने, समझने और सोचने की बडी ही विचित्र शक्ति है, जिसने अपनी बात को किसी अंधविश्वास के तहत नहीं बल्कि आधुनिक मानसिकता के जरिये, बहुत ही वैज्ञानिक ढंग से अंकित किया है।
ऐसा होता है। आजकल ऐसा ही हो रहा है कि हम अपनी जडों को छोडकर विज्ञान के तर्कों पर जीना सीख रहे हैं। चारों और हिन्दू संस्कारों, पुराणों, उनके विश्वासों पर आघात-प्रतिआघात करने का दुस्साहस चल रहा है। हमारे मानस को बदलने की जितनी राक्षसीय कुचालें रची जा रही है वे हमे अपने वज़ूद से डिगाने के लिये काफी है। इसलिये जरूरत पडती दिखती है कि हम सबूत दें। साबित करें। और उन मूर्खों को ज्यादा जो ईश्वरीय सत्य को झुठलाने के लिये बकवास करते फिरते हैं। हालांकि मुझे स्वामी अखंडानन्दजी का एक कथन यहां सौफीसदी अच्छा लगता है कि " जिन्हें खोजना है वो खोजें..मेरे लिये तो कृष्ण कदंब की डाली पर बैठा बांसूरी बजा रहा है..सामने ही..। तुम भी देख सकते हो..अगर तुम्हें देखना है तो, और अगर अनुसंधान करना है तो करो, मुझे क्या..। यह तुम्हारा काम है मेरा नहीं..क्योंकि मुझे तो कृष्ण दिख रहा है।" किंतु..आज का परिवेश बगैर साबित हुए चीजों को अन्ध विश्वास की नज़र करार देता है। और संभव है यह पुस्तक इसी अन्धेपन को दूर करने के लिये काफी है..। पुस्तक में हनुमानजी क्यों हनुमानजी हैं..इसे सार्थक करने की छोटी सी सफल कोशिश की गई है..क्यों वे अतुलित बलधामं हैं? हेमशैलाभदेहं क्यों है? कैसे हैं? या क्यों दनुजवनकृशानुं कहते हैं? ज्ञानिनामग्रगण्यं, सकलगुणनिधानं, वानराणामधीशम, रघुपतिअप्रियभक्तं, वातजातं, नमामी जैसे शब्दों पर विस्तार से अलग-अलग अध्याय के आधार पर सैकडों प्राचीन, आधुनिक, देशी, पाश्चात्य..लेखकों, विद्वानों..के कथनों..उद्धरणों आदि के रिफ्रेंसेस देते हुए सिद्ध किया गया है। और यह सिद्धता इसके लिये बिल्कुल भी नहीं है कि आप उसे आलोचना की श्रेणी में रखते हुए नकार सकें। "क्या तुलसी ने आतंक का प्रत्युत्तर सुन्दरकांड में दिया?" साबित किया है लेखक ने। जहां वाल्मिकी भी हैं अब्दाल सलाम फराज़ भी है तो स्यूवाल भी है, स्टोल भी है, साथ ही वैज्ञानिक आधार भी प्रस्तुत है तो कई रिपोर्ट्स हैं। कई कई कई...तरह से कई, कई विद्वानों के कथनों, आंकडों आदि को लेकर बूना जाने वाला यह जाल व्यक्ति को जानकारी, समझ, ज्ञान देने के लिये भरपूर तो है ही साथ ही यह स्थापित भी कर देने के लिये है कि हम अपनी भ्रांतियां उतार फेंके...। मैं बधाई देना चाहूंगा मनोज श्रीवास्तव को कि जिन्होने अपने ज्ञान, बुद्धि का सही सदुपयोग करते हुए इस तरह की पुस्तक को आकार दिया।

8 टिप्‍पणियां:

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

पुस्तक की बहुत अच्छे ढंग से जानकारी दी है आपने.

रचना दीक्षित ने कहा…

बाप रे बाप!!!!! इतना गहन अध्ययन उफ्फ़.... समझने के लिए मशक्कत करनी पड़ी

दिगम्बर नासवा ने कहा…

AMITAABH JI ... AAPKE LEKH SE HI PUSTAK KI PRASANGIKTA SAAMNE A RAHI HAI ... MANOJ JI KE PRAYAASON KI JITNI BHI TAREEF KI JAAY KAM HAI ... AAPNE BHI BAHUT GAHAN ADHYAN KIYA IS POST KE LIYE ... PUSTAK PRAAPT KAISE HO SAKTI HAI KRIPYA YE BHI BATAAYEN ..

कविता रावत ने कहा…

PUSTAK ke baare main bahut gahraayee se bahut saari baaten batayee hai aapne.. bahut achha laga... Bhopal mein bhi bahut se log sundar kand ka path karte hai .. bahut hi taal aur sur mein jab gaate hain to man ko behad sukun milta hai...
bahut sarthak chintan ke liye aabhar

शोभना चौरे ने कहा…

सबसे पहले तो आप खरगोन आये और खबर भी नहीं होने दी |
दूसरे सुन्दरकाण्ड की महिमा में आपके इस आलेख ने सुन्दर कांड के पाठमें आस्था और गहरी कर दी |
कोशिश होगी की इस पुस्तक तक हम भी पहुँच पाए |

डॉ.राजेश वर्मा ने कहा…

अमिताभजी,
सौभाग्य है कि मैं इस पुस्तक को पढ चुका हूं। किंतु जितने सुन्दर अन्दाज़ में आपने उल्लेख किया है वे मेरे दिमाग में उठकर रह गये क्योंकि मैं शब्दों का जादूगर नहीं हूं। अमिताभजी, आपकी जानकारी, आपका ज्ञान और लिखने की परिपक्वता है कि हम इतनी सरल और प्रभावपूर्ण हिन्दी को पढ सकते हैं। इसके लिये आपका धन्यवाद अवश्य करुंगा। शेष पुस्तक सिर्फ विचारशील पाठकों के लिये हैं जिन्हें पढना तो अच्छा लगता है मगर सिर्फ कथा नहीं बल्कि आध्यात्म से निकलने वाली ऊर्जा भी जो रिपोर्ट और उदाहरणों से व्याप्त है। हर किसी के बस की पुस्तक मुझे तो नहीं लगी। मगर मैं बहुत प्रभावित हुआ इसे पढकर।
डॉ. राजेश वर्मा

अनाम ने कहा…

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sandeep ने कहा…

आदरणीय सादर
आज शाम मुझे आदरणीय मनोज श्रीवास्तव जी को सामने सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ..........और सच कहिये यों ही लगा के
अब मोहि भा भरोश हनुमंता
बिनु हरी कृपा मिलहिं नहीं संता

उनेक तथ्य जो उन्होंने रखे उनके आगे नतमस्तक रहा .............करीब एक घंटे दस मिनिट तक वह केवल सुन्दर काण्ड की एक चौपाई पर ही बोलते रहे और बस हम मंत्रमुग्ध सुनते रहे .............पेशे से आई ए एस
अधिकारी होने के बाद उनकी काव्य के प्रति इतनी संवेदनशीलता ...........अब क्या कहूँ ............यह पुस्तक मुझे भी लेनी हैं क्या आप बता सकते हैं के यह मुझे कहाँ से प्राप्त हो सकेगी

सादर