शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

भ्रम

छोटे बडे
ऊंचे ऊंचे
रेलवे ब्रिज़
रोज़ चढना
रोज़ उतरना।
और लोकल के
फर्स्टक्लास डिब्बे से
उतरकर कर भीड में
खो जाना।

जिन्दगी के सच है।

एक में
उतरना तय है
दूजे में
इस भ्रम का
दूर होना कि
हम विशेष हैं।

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

जिन्दगी

जिन्दगी-

ढेर सारे चिंतकों की किताबें
खुली हैं और पन्ने
फडफडा रहे हैं।

ग्लैडी टैबर की खिडकी
सनसनीखेज जिन्दगी को बयां करती है तो
मेसफिल्ड के लिये यह
शोरभरी गली में एक
लम्बे सिरदर्द का नाम है।

'किंग जोन' का लेखक
शेक्सपीयर मानता है
जिन्दगी उतनी ऊबाऊ होती है,
जितनी कोई दोबारा कही गई कहानी।

किंतु देखो
जिजीविषा..कि
यह है तो जीवन है, जीवन रहेगा तो
अनंत संभावनायें भी रहेंगी।
'अनामदास का पोथा' खुलता है मगर
उधर ह्यूगो ग्रोशिय मानो इसे नकारते हुए
लिखता है
मैने अपना जीवन परिश्रमपूर्वक
कुछ भी नहीं करते हुए गुजार दिया।

और एक मैं
जिन्दगी के ताने-बाने में उलझा
डरता हूं, तब और ज्यादा जब
टैगोर को पढता हूं कि
मृत्यु है, उस के होने पर भी जीवन नष्ट नहीं होता।

यानी फिर से जिन्दगी...???? उफ्फ।

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

सलीके से रखे हैं मेरे दिन-रात

लगभग खंडहर होते जा रहे
इस शरीर के स्टोर रूम को
साल में महज़ एक बार खोलता हूं।
जब भी दरवाजा खोल कर मैं अन्दर घुसता हूं
रैक में सलीके से जमाये गये
दिन और रातों का
हिसाब रखते रजीस्टर के पन्ने
फडफडा कर उडने लगते हैं।
मुझे अच्छा लगता है क्योंकि
वे इस दिन खिलखिलाने लगते हैं।

घंटो बैठा रहता हूं उनके साथ..
सन 1967 की रात से लेकर
19 अगस्त 2010 तक के इस समय तक
का पूरा पूरा हिसाब है।
और जैसे जैसे पल बीत रहे हैं
पन्नों पर चढते जा रहे हैं।

अमूमन मैं दिन का वो पन्ना निकालता हूं
जब अपने शहर को छोड महानगर में आया था।
सिर्फ शहर नहीं छूटा था
छूट गया था बहुत कुछ...

पता नहीं किस बचत में से
पिताजी ले आते थे नये कपडे
और मां पानी मिले दूध को
ओटा ओटा कर खीर बनाती थी।

ललाट पर टीका लगा कर
चारों दिशा में धौक दिलवाती थी मां
और पीठ पर हाथ धर
अपने जीवन के मानों सारे
आशीर्वाद उढेल दिया करती थी।

मैं नहीं जानता था तब इन सब का महत्व
आज जब इस दिन
अपने स्टोर रूम में बैठा दिन के उस
पन्ने को खोल बैठा हूं तब जाना है इसका महत्व।
तभी ..तभी..बरबस ही आंखों से अश्रुदल फूट पडते हैं
और मैं इन्हें पौंछ कर इस महानगर से
फोन करता हूं।

क्योंकि आज यदि मैं इन दिन और रात को
बटौर संजो पा रहा हूं तो
उन्हीं की बदौलत जिनके हाथ मेरे शीश पर हैं
और जिनके आशीर्वादों से मेरी सांसे गति पाती है।

सोमवार, 9 अगस्त 2010

कशमकश



लगता है
अपनी ग्रेविटी खोये
ग्रह-नक्षत्रों ने
एटम बम की तरह
गिर-गिर कर
मेरी किस्मत को
चकनाचूर कर दिया है।
और दिमाग
किसी जापान की तरह
फिर उठने, किस्मत चमकाने,
संवरने की फिक़्र में
जुटा है।


इस जुटने में हो यह रहा है कि-

कभी-कभी दिल
हिटलर की तरह पेश आता है
और गान्धीवादी विचारधारा
उसके तमाम 'ब्लाकेज' को
क्लियर कर देती है।
यह जंग भी जारी है।

खून में लोहा है
और रगों में गुलामी से
लडने की ताक़त
शायद यही वजह है कि
अंग्रेजों की तरह
मेरे इन हालात ने
मुझे झौंक रखा है
एक नये विश्वयुद्ध में।

आज़ादी की सोच ने
हाथ-पैरों में गज़ब की
स्फूर्ति ला खडी की है
जो सुध-बुध खोकर
भिडे पडे हैं,
मगर अफसोस
इरविन-गांधी के बीच की सन्धि
दिमाग द्वारा दिल को
हमेशा परास्त कर दिया करती है।

देखिये इन फेफडों को
जो गोले-बारूद की गन्ध
के बावजूद सीने को
ताने रखने के भरसक प्रयास में हैं।
और अपने पीछे
रखे गये दिल को बचाने की
खातिर
किसी 'अस्थालिन' के 'पफ' से
सांसों को रास्ता दे रहे हैं।
आखिर कब तक
कृत्रिम रासायनिक हवा से
सांसो को काबू में रखा जा सकता है?

यूं तो खडे कर चुका हूं
अपनी उम्मीदों के
बडे बडे रडार,
जो दुश्मन की हर चाल
का पता लगाते हैं।
मगर अपने ही लोगों का
खिलाफत आन्दोलन
हर-हमेश ले डूबता है मुझे।
फिर भी
सागर की गहराई में किसी
डिस्कवरी चैनल की तरह
कैमरों से खोज करता हूं
उम्मीद का कोई
अजीबो-गरीब जलचर।

आखिर जापान की तरह
खत्म होकर जिन्दा होने की
कशमकश जो है।

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

सवाल सावन का



"नीम का वो पेड
आज भी है।
किंतु
वो डाल नहीं
जिस पर बंधता था
सावन का झूला।

सावन खिलखिला तो रहा है
मगर यौवन की
खिलखिलाहट पर
वक्त की रस्सी ने गांठ बान्ध दी है।
गांठ कसती जरूर है अपनी
इच्छाओं को।

इच्छायें क्या नहीं होती
हवा के साथ डोलने की?

डोलना इस मौसम में
स्वतः ही मन चाहता है।
मन उड कर फिर
उस डाल पर बैठना
चाहता है
जिस पर बन्धा करता था
सावन का झूला।

और उसका घर
ठीक सामने दिखाई देता था।

अब सवाल यह था कि
सावन के झूले का लुत्फ
लेता था या
उसके घर से उसके निकलने
की प्रतीक्षा करता था?

जो भी हो नीम के
पेड की तरह
सवाल भी खडा है...।
और सावन
झूम रहा है।"


* चित्र उसी असली नीम के पेड का है जो आज भी वहां है, पर सूना सूना सा, जैसे उसे भी हमारी याद आती हो और वो भी रोता हो।

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

बस यूं ही

1-
विचारों का तीर सीधे
खोपडी की किसी हड्डी में
धंस जाता है।
उसका नुकीला कोना
मजबूत कोशिकाओं के बने
किसी ज्ञान खंड से टकराता है,
और एक दर्द का रैला उठता है
जो फेफडों से बहता हुआ
एक कोने में दुबके
हृदय के स्पन्दन को भी भिगो देता है।
खून की गति
अचानक तेज़ हो जाती है
जो कंपकपा देती है
इरादों को,
कि
बस बहुत हो चुका
इस बेशर्म दुनिया में
भावनाओं के तट पर
कुम्भ का आयोजन।


2-
आंखों की गीली पुतलियां
दृष्य ओझल कराती हैं,
और गाल पर बहती
अश्रूधार का नमकीन स्वाद
होठों से टकराता है तो
बरबस फूट पडता है स्वर
ओह क्या प्रेम ऐसा होता है?
इसीलिये कहता हूं
दिमाग के कामकाज में
दिल के लिये
'वेकेंसी' नहीं होती।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

बारिश?

मुम्बई में बारिश का कोई ठिकाना नहीं रहता, अभी सूरज चमक रहा है और अचानक बारिश धम से टपक पडती है..रुक रुक कर, कभी तेज़ तो कभी धीमी...यहां के आलम का यह विचित्र मज़ा है..ऐसी ही बारिश की तरह लग सकती है मेरी यह रचना...

हां शायद बारिश शुरू हो गई है,
कल घर से बाहर निकला था
तो पैर के जूते गिले हो गये थे..
पसीना इतना तो नहीं होता कि
जूते के तलवे गिले हो जाये
सो निश्चित ही बारिश का मौसम है।

और तुम कहते हो कि
आजकल अपनी भी फिक्र नहीं है,
कहां खोये होते हो
पहाड टूटना बस एक मुहावरा भर है
कोई सचमुच थोडी टूट जाता है माथे पर।
और अगर टूट भी जाये तो
यकीन रखो तुम्हारे माथे पर तो नहीं ही गिरेगा।
तब लगता है हां
निश्चित ही बारिश का मौसम होगा।

सूरज निकलता नहीं है
डरता है शायद
और ये हवाओं को क्या हो चला है कि
आजकल ठंडी हो गई है,
बाहर दिन भी पगला गया है
देखो कैसा तो रोता रहता है,
इधर रात है कि दिखती नहीं है इस अन्धेरे में
पता नहीं क्या हो गया है आजकल
इसे तुम कहते हो कि बारिश का मौसम है
सो हो सकता है।

वैसे

जब भंवर लयबद्ध नहीं होती
जीवन की दिशायें एक सीध खो देती हैं
मुहफेरी की खिडकियों से
झांकने लगते हैं दोस्त,
पीठ के पीछे छूरा घोपने की घटनायें आम हो जाती हैं,
मुंह के सामने मीठी छुरियों का बाज़ार लगने लग जाता है
और वे कन्धे ऊंचे व बडे हो जाते हैं एक दम से
जिनके सहारे गले में हाथ डाला जाता था
तब लगता है बारिश सावन की चमक खो चुकी है
फिर तेज़ कितनी भी हो
मुझे दिखाई नहीं देती,
बस घर के छप्पर पर आवाज़ आती है
धप धप धपा धप
जैसे कोई धोबी घाट पर कपडों को पीट रहा हो
और ऐसे में कहो कि बारिश है
तो हो सकता है बारिश का मौसम है?

सोमवार, 12 जुलाई 2010

यह कैसा इतिहास?

इतिहास कैसा होना चाहिये? सत्य पर आधारित। और सत्य? कम से कम गोरों द्वारा दिये गये सत्य जैसा तो नहीं। क्योंकि गोरों ने हमारे इतिहास से काफी छेडखानी की है, नफरत के बीज बोये हैं, जो उनके खून में है। उनके गन्दे खून का भी एक इतिहास है। खैर, इन दिनों महाराष्ट्र में एक किताब पर बवाल मचा हुआ है। जेम्स लेन नामक एक कथित इतिहासकार हैं जिन्होंने शिवाजी महाराज पर एक किताब रची है ' शिवाजी-हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया' नामक। किताब मैने पढी नहीं है, पढना भी नहीं चाहता। क्योंकि उसके जितने प्रचारित या प्रसारित अंश पढे है वे तमाम, किसी भी सत्य से कोसो दूर हैं। यह विडम्बना है कि हमने अपने इतिहास के लिये हमेशा से ही गोरों की बातों पर विश्वास किया। हमारे इतिहासकार भी हुए किंतु अधिकांश सहमति गोरों की बातों से दर्शाई गई। क्यों? क्या हमारे इतिहासवेत्ता लायक नहीं या उनकी बातें गलत हैं? ऐसा कुछ भी नहीं है, यदि हम पी एन ओक जैसे इतिहासकारों को आज मान्यता देते तो सम्भव था इन गोरों द्वारा समय-समय पर जिस तरह से जनमानस को भडकाने का षडयंत्र चला आ रहा है वो बन्द हो जाता। ग्रांट डफ जैसे इतिहासकारों को हमने अपने दस्तावेजों मे तरजीह दे दी मगर ओक को क्यों नहीं?
इस विषय पर तर्क-वितर्क होगा। हास्यास्पद तो वो है जो लेन की किताब की तरफदारी करेगा। मैं लेन की तरफदारी क्यों नहीं करता? आपको बता दूं कि इतिहास का छात्र रहा हूं। भारतीय इतिहास से लेकर यूरोपीय इतिहास का गम्भीर अध्ययन किया हुआ है। हां पीएचडी नहीं है तो इसका मतलब यह भी नहीं कि बन्दे ने रिसर्च जैसा कुछ किया ही नहीं। ढेरों इतिहासकारों को पढा, कई-कई जगह खुद गया और जानकारियां ली। बहस-मुबाहस भी खूब की। और हमेशा अपने इतिहासकारों की बातों को यकीन के करीब पाया। खासकर पी एन ओक जैसे। जदुनाथ सरकार, जी एस सरदेसाई, एम जी रानाडे जैसों ने भारत के सन्दर्भ में काफी सच्चा अध्ययन किया है। यदि ग्रांट डफ जैसे ने शिवाजी द्वारा अफज़ल खां
के खिलाफ विश्वासघात का आरोप लगाया तो रानाडे ने अपनी पुस्तक' राइज आफ द मराठा' में इसका बहुत सटिक जवाब दिया है। खैर..मैं कहना यह चाह रहा हूं कि जेम्स लेन बाजारवाद का इतिहासकर्ता है। उसकी किताब किसी प्रकार के अध्ययन या रिसर्च का नतीज़ा नहीं है बल्कि बाज़ार द्वारा प्रायोजित भारत के जनमानस को भडकाने का कृत्य है। लेकिन फिलहाल न्याय के क्षेत्र में लेन की किताब की लाइन क्लीयर है। आपको बता दूं और यह तमाम इतिहासवेत्ता जानते हैं कि शिवाजी महाराज द्वारा मराठा राज्य की स्थापना की सम सामयिक स्त्रोत सामग्री व अभिलेखों के पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होने के कारण उनके प्रशासनिक आदर्शों व परम्पराओं का अनुमान लगाना कठिन है। यूरोपीय स्त्रोत व फारसी इतिवृत्तों से भी इस सम्बन्ध में पर्याप्त सूचना प्राप्त नहीं होती तथा मराठी अभिलेख अधिकतर परवर्ती काल से संबद्ध है। अब रही उत्तरकालीन प्रशासनिक पद्धति से अनुमान की बात, तो इसी के आधार पर शिवाजी के जीवनकाल की घटानाओं का अनुमानभर लगाया गया है। इसमें भी भारतीय इतिहासकार ज्यादा करीब माने गये हैं क्योंकि उन्होंने जमीन से जुडी जानकारियां प्राप्त की और विदेशी इतिहासकारों ने सुनी सुनाई बातों को अपने ढंग से मोडने का काम किया। अब जेम्स लेन को कोई नया तीर मारना था सो महाराष्ट्र में देवतुल्य पूजनीय समझे जाने वाले शिवाजी महाराज के खिलाफ आग उगली ताकि बवाल हो और उसकी किताब धडल्ले से बिके। मोटी कमाई हो। मेरा मानना है इतिहास जो रहा, वो रहा..आज क्या है? जो राज्य शिवाजी के नाम से गर्व अनुभव करता है, सिर्फ राज्य नहीं पूरा भारतवर्ष, और इसके साथ ही उस राज्य की आस्था भी जुडी है तो इसे भंग करने का दुस्साहस कतई नहीं किया जाना चाहिये। यह अपराध है। आप किसी इतिहास को, ऐसा इतिहास को जो जनमानस में घर कर गया हो, जिससे दिशायें प्रवाहित होती हैं, जिससे प्रेरणा का सूत्रपात होता है उसे किसी भी प्रकार के तथ्यों का प्रभावी जामा पहना कर सत्य को झुठलाने का प्रयास करते हैं तो यह आपका अतुलनीय कार्य नहीं बल्कि घोर अपराध है? जेम्स लेन को विद्वान मानने से में इंकार करता हूं। उसकी विद्वत्ता गोरों की मानसिकता का परिचायक हैं। कम से कम आप तो इस सच्चाई को पूरी ईमानदार तरीके से स्वीकार कीजिये। तर्क-वितर्क तो बहुत हो जायेंगे। मगर अपने देश के लिये यदि अन्धभक्ति भी हो तो क्या गलत है?

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

ईसा वाक्य

-मैं भूल गया
उन मानसिक दबावों,
जानबूझ कर
दिये गये अप्रत्यक्ष तनावों को,
भूल गया तमाम कडवे अनुभव.......
क्योंकि मुझे लगता है
कडवी दवाई
अमूमन सेहत के लिये
हितकारी होती है।

-आज अगर मैं टिका हूं
या भले ही सलीब पर टंगा हूं
फिर भी सोचने में
बुराई नहीं कि
आखिर उन सच्चे
हृदयवालों की दुआयें
फिज़ूल कैसे हो सकती हैं?......
क्या यह विश्वास
जीवन को गति नहीं दे सकता?

-इसलिये
ईसा के अंतिम वाक्य
गूंजते हैं
"ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं......।"

मंगलवार, 15 जून 2010

चारोक्ति

1,
हां मैं हारा हुआ हूं
अब बताओ कैसे जीतोगे मुझसे?
मगर सावधान रहना तुम
जीत स्थाई नहीं होती।
और न हार....।

2,
गुरुर के लायक हो
सबकुछ तो है तुम्हारे पास,
इसलिये आंखे भी बन्द है,
और मैं गुरबत में
तुम्हे खुली आंखों से देख रहा हूं।

3,
सुना है
पुण्य भी कटते हैं
चलो आज मैं
अपने पाप काटता हूं
तुम पुण्य काटो।

4,
तुम्हारा नाम
अखबारों में है
बडे आदमी बन गये हो तुम,
मैं छोटा हूं,
एक रद्दी की दुकान है बस।

मंगलवार, 1 जून 2010

आदमीयत से भरी सोच

सबकुछ उल्टा-पुल्टा है। लिखना या पढना कठिन हो चला है। अब यह देखने वाली बात है कि इमानदारी और मेहनत से भरा प्रतिभायुक्त पिचका पेट आखिर कितनी और पराजय पचा सकता है? कब तक बडे पेट वालों की डकार अपने नथूनों में भरकर चाटुकार अपनी चमक बिखेरते रहेंगे? कोई एक तो होगा जो उम्मीद जैसे शब्द को साकार बनाता हो? यह है एक आदमीयत से भरी सोच, जिसका कोई बीमा नही होता। खैर....

"जब रेंकने वाले गधे
भौंकने लगे
तब समझो आदमी के
धैर्य की
परीक्षा शुरू हो जाती है।
उनकी यह पदोन्नति है या अवनति?
जो भी हो किंतु
परिस्थितियों की इस
कोचिंग क्लास में
सीख यही मिलती है कि
आखिर गधों की उम्र
आदमी की उम्र से कम होती है।"

शनिवार, 15 मई 2010

तीन कवितायें

1, प्रतीक्षा के
अग्नि कुंड में
समय की समिधायें
डाल-डाल
उम्र को हवन कर दिया
और
इस तप का
प्रतिफल ये मिला कि
अब आस्तिक न रहा।


2, विरह की लपटों से
झुलसी
लगभग राख हुई उम्र
इस नंगी-रूखी
हवा के बदन से
लिपट
जीवन के चारों ओर
भंवर बना
नाचने लगी है
मानो यह
अंतिम नृत्य साधना है
किसी बलि के लिये।


3, स्मृतियों का पत्थर
आंखों के स्थिर
अश्रु ताल में
जब भी गिरता है
तो
हलचल मच जाती है,
फिर उम्र कितनी भी हो
गाल गीले हो ही जाते हैं।

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

तेरी प्रतिमा

बहुत दिनों से रागमयी कोई रचना नहीं की। दिमाग भी ऐसा है कि जिसमें मज़ा आता है वही करता रह जाता है, आलेख या समीक्षायें लिखने में रमा तो लिखता ही रहा, बगैर यह सोचे कि उनके पाठक ज्यादा नहीं, सीधी, सपाट कवितायें की तो बस करता ही चला गया, बगैर यह सोचे कि उसके रस में फीकापन भी है। मगर मैं जानता हूं मेरी फितरत ही ऐसी है, किंतु यह भी जानता हूं एक ही धारा में बहते रहना भी मुझे पसन्द नहीं, हालांकि कहते हैं धारायें बदलते रहने वाले को किनारा नहीं मिल पाता, वो भटकता रह जाता है। किंतु इसका भी अपना मज़ा है, किनारा पा कर भी करना क्या है, भटकने में कभी कभी कुछ नया सा मिल तो जाता है, सो ऐसा ही एक नयापन-


"तेरी प्रतिमा दिखती है नयनों की इन कोरों में
जैसे पुष्पों की गरिमा झांकती केवल भोरों में।

मेरी उत्कंठा खेले जब हृदय पटल पर गा कर
झरती है बरबस भरकर, स्मृति बस आंसू बनकर।

भावों का मलयानिल जब करता आंखों में क्रीडा
रूखे यौवन सी तब तब मुस्काती मेरी पीडा।

स्मृति तेरी रे सचमुच अब बन बैठी दीवानी
चिर अजिरल मौन प्रतीक्षा, थी मेरी ही नादानी।

पर कौन कहेगा तुझको मेरी यह अकथ कहानी
शायद ही पहुंचे बह कर, खारा आंखों का पानी।

मेरे उजडे उपवन में कब सावन बन आओगी
कल्पना कुसुम हो मुकुलित नव जीवन सरसाओगे।

तुमको ढूंढा मैने पर हा पा न सका औरों में
जीवन भर तडपूं बिलखूं बिरहाग्नि अंगारों में।

तेरी प्रतिमा दिखती है नयनों की इन कोरों में
जैसे पुष्पों की गरिमा झांकती केवल भोरों में॥"
बहुत दिनों से रागमयी कोई रचना नहीं की। दिमाग भी ऐसा है कि जिसमें मज़ा आता है वही करता रह जाता है, आलेख या समीक्षायें लिखने में रमा तो लिखता ही रहा, बगैर यह सोचे कि उनके पाठक ज्यादा नहीं, सीधी, सपाट कवितायें की तो बस करता ही चला गया, बगैर यह सोचे कि उसके रस में फीकापन भी है। मगर मैं जानता हूं मेरी फितरत ही ऐसी है, किंतु यह भी जानता हूं एक ही धारा में बहते रहना भी मुझे पसन्द नहीं, हालांकि कहते हैं धारायें बदलते रहने वाले को किनारा नहीं मिल पाता, वो भटकता रह जाता है। किंतु इसका भी अपना मज़ा है, किनारा पा कर भी करना क्या है, भटकने में कभी कभी कुछ नया सा मिल तो जाता है, सो ऐसा ही एक नयापन-


"तेरी प्रतिमा दिखती है नयनों की इन कोरों में
जैसे पुष्पों की गरिमा झांकती केवल भोरों में।

मेरी उत्कंठा खेले जब हृदय पटल पर गा कर
झरती है बरबस भरकर, स्मृति बस आंसू बनकर।

भावों का मलयानिल जब करता आंखों में क्रीडा
रूखे यौवन सी तब तब मुस्काती मेरी पीडा।

स्मृति तेरी रे सचमुच अब बन बैठी दीवानी
चिर अजिरल मौन प्रतीक्षा, थी मेरी ही नादानी।

पर कौन कहेगा तुझको मेरी यह अकथ कहानी
शायद ही पहुंचे बह कर, खारा आंखों का पानी।

मेरे उजडे उपवन में कब सावन बन आओगी
कल्पना कुसुम हो मुकुलित नव जीवन सरसाओगे।

तुमको ढूंढा मैने पर हा पा न सका औरों में
जीवन भर तडपूं बिलखूं बिरहाग्नि अंगारों में।

तेरी प्रतिमा दिखती है नयनों की इन कोरों में
जैसे पुष्पों की गरिमा झांकती केवल भोरों में॥"

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

गांठे

जन्म के साथ
जिन्दगी की तरह
एक सीधी-सपाट डोर थमाई थी "उसने",
कहा था, इसके सहारे
इसीकी तरह तुम भी चलना।

अभी चलना शुरू किया ही था कि
रिश्ते-नातों की तमाम
गठानें बान्धनी भी शुरू कर दी।

जीवन को जीने, उसे मज़बूत बनाने के चक्कर में
कितनी गांठे बान्ध ली..।

और जब मुड कर देखा तो
उन्हीं गांठों में फंसे, तडपते से हम दिखे।

और तो और
गांठों की वजह से
वो सीधी-सपाट, लम्बी सी डोर भी
छोटी हो गई, बिल्कुल जिन्दगी की तरह।

अब गठान खुलती नहीं,
खुलती भी है तो डोर में सलवटे हैं
वो सीधी रही नहीं,
सो इंसानी फितरत कि
काटने लगे हैं अब अपनी ही डोर
अपनी ही जिन्दगी की तरह।

उपर से यह वाहियात सोच कि
एक दिन
न रहेगा बांस
न बजेगी बांसुरी।

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

निवाला

सुबह होने के साथ ही
अट्टहास करता
छा जाता है
राक्षसी दिन।

जैसे भूखा हो बरसों से।

अपने नुकीले दांतों के बीच
रख कर चबाता है
और एक एक करके
खाने लगता है हम सबको।

अपने लवणयुक्त चिपचिपे
लार के साथ उतारता है
अन्धेरी गर्म कोठरी से पेट में।

फिर आंतों के
अजगरी कसाव से
दबाता है,
इतना कि सारी हड्डियां
चूर चूर हो जाती है।

खून-पसीना सबकुछ एक हो जाते हैं।

विटामिन, प्रोटिन, जैसे तमाम
शक्तिवर्धक पदार्थ को शोषित कर
अपनी धमनियों में भेजता है।

और रात होते ही
डकार मार सो जाता है।


बचे हुए लोग
फिर जुट जाते हैं
दिन की तैयारी में,
उसका निवाला बनने के लिये।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

ज्ञान का अधिकार ज्यादा जरूरी

मैं एक कार्यक्रम में था। "शिक्षा के अधिकार पर चिंतन"। कुल पांच-छह वक्ता। अच्छे वक्ता थे। मुझे भी बोलने का अवसर मिला। हालांकि मैं बोलने या वक्ता के रूप में कहीं ज्यादा आता-जाता नहीं, क्योंकि सिर्फ बहस पर, विशेषकर औपचारिक बहस पर मैं विश्वास नहीं करता क्योंकि वहां विषय लुप्त हो जाते हैं और 'व्यक्ति विशेष' विषय पैदा हो जाते हैं। सो मुझे अधिक बेहतर लगते है ऐसे आयोजन जहां गम्भीरता हो। कोई चिंतन हो। जहां सार्थक मंथन होता हो। किंतु ऐसा अब ज्यादा कहां होता है? है न। पर कभी-कभी हो भी जाया करता है। जैसा हाल ही में हुआ। खैर, बहुत कुछ सुना, विषय था भी सार्थक और वो दर्शन की ओर मुड गया था सो ज्यादा आनन्द आने लगा था। अपनी बात रखते वक़्त कितना कुछ कहा, बोला शब्दशः याद नहीं किंतु सोचा इस विषय पर लिखना भी चाहिये, विषय अच्छा था सो आपके सम्मुख रखने के मोह से विलग नहीं हो सका। और लिखने के इस लोभ का संवरण नहीं कर सका, क्योंकि मैं समझता हूं, जब कोई सर्वहारा विषय होता है तो उसे व्यक्त कर देना चाहिये। छोटा सा आयोजन था, विशुद्ध साहित्यिक आयोजन अब अदने ही होते हैं। उसकी चर्चा भी अपने कुनबे से बाहर नहीं निकल पाती। ठीक भी है, शक्ति संचय शायद यही है।


"मेरा यह दृढ मानना है कि श्रद्धा है तो ज्ञान है। ज्ञान अर्जन के लिये श्रद्धा का होना अनिवार्य है। किसी भी प्रकार का ज्ञान आपकी श्रद्धा के प्रतिशत पर निर्भर करता है। मैं समझता हूं दुनिया में जितने प्रकार के दुख है, अशांति है, तनाव है वे पहले श्रद्धा के अभाव में तो बाद में ज्ञान के अभाव में ज्यादा हैं। निस्सन्देह इसका उपचार भारतीय आध्यात्म, उसके दर्शन में है। आपको बता दूं कि भारतीय आध्यात्म ईश्वर आस्था का विषय नहीं है। यह ईश्वर द्वारा, उसके प्रतिनिधित्व में या किसी प्रकार की घोषणा में नहीं है। यह सिर्फ श्रद्धा और ज्ञान की प्रीति है। यह खुद के भीतर के जगत का ही अध्ययन है, न कि बाहर के किसी प्रायोजन का प्रतिफल। आप जानते हैं कि भीतर का जगत रहस्यों से परिपूर्ण, बेहद ही दिलचस्प है। यहां ढेर सारी इच्छायें हैं, कामनायें हैं, राग है, द्वेष है , दुख हैं, सुख हैं किंतु चीर आनंद नहीं है। इसी आनन्द की बाहरी तलाश हमारे तमाम तनावों, अशांति की जनक है। जहां श्रद्धा का प्रतिशत कम है वहां ज्ञान का अभाव ज्यादा है। अब एक बडी ही दिलचस्प बात है कि भारतीय दर्शन का उद्गम, उसका जन्म दुख का कारण खोजने और उसे समाप्त करने की जीवन राह खोजते हुए हुआ है। यह भी आप जानते हैं कि कामनायें कर्म कराती हैं। चित्त में कर्मफल की इच्छायें जाग्रत करातीं हैं। और ये जो आप कर्म करते हैं उसके फलों में प्रकृति की ढेरों शक्तियां हिस्सा लेती हैं। कभी सफलता हाथ लगती है तो कभी नहीं लगती। किंतु दोनों कर्म बन्धन में आपको फंसाती हैं। भारतीय दर्शन में यही कर्म बन्धन, बार बार के जन्म का प्रतिफल है। आप गम्भीर होकर सोचिये कि कर्म बन्धन से मुक्ति ही स्थाई आनंद है। गीता में पूर्ण ज्ञान ही मुक्ति का उपाय दर्शाया गया है। ऋगवेद में यह ज्ञान प्रकृति की एक बडी शक्ति के रूप में है।
अब सरकार भले ही शिक्षा के अधिकार का कानून ले आये किंतु इस प्रकार की शिक्षा ज्ञान नहीं बांट सकती। ज्ञान के लिये तो आपको अपने भीतर की पाठशाला में जाना होगा। क्योंकि शिक्षा और ज्ञान में ज़मीन-आसमान का फर्क़ है। शिक्षा सरोवर हो सकती है किंतु ज्ञान सागर है। यह सच है कि ज्ञान के लिये शिक्षा के रास्ते ही जाया जा सकता है किंतु पूर्ण रूप से श्रद्धा के संग। यह बडा ही अज़ीब दौर है जब हम भारतीय दर्शन से विरक्त शिक्षा को ही सम्पूर्ण मान बैठे हैं और अपने बच्चों तक में अल्फा, बीटा, गामा आदि सम्प्रेषित कर रहे हैं। यह सच है कि यह अतिआवश्यक है। किंतु यह भी सच है कि हम अपनी तरह, अपने बच्चों में भी अशांति, तनाव संक्रमित कर रहे हैं। इतनी आपाधापी, इतनी प्रतियोगिता और शिक्षा भी तो ऐसी जो श्रद्धा के बगैर है, ज्ञान से रिक्त है, सिर्फ जीविकोपार्जन के निमित्त। तो स्वभाविक रूप से कई प्रकार के तनाव घिर आने हैं। खैर..भारतीय शिक्षा में मान लीजिये यदि गीता का भी सब्जेक्ट इंक्लुड हो जाये तो? क्या बुराई है, यह किसी मज़हब से जुडा है, मुझे तो ऐसा नहीं लगता। कुरान मदरसों में पढाई जाती है, बाइबल की विद्या भी कई स्कूलों में दी जाती है, गीता की क्यों नहीं? मेरा मानना है कि हमारी शिक्षा में गीता, कुरान, बाइबल, गुरुग्रंथ साहेब सबके वैकेल्पिक विषय होने चाहिये। दरअसल यह इसलिये कि मैं यहां ज्ञान की चर्चा कर रहा हूं जो इन्हीं विषयों में समाहित है। शोध जरूर होते हैं। शोध महज़ आपकी डिग्री तक सीमित न हो तो आध्यात्म के अन्दर झांका जा सकता है। अब आप यह मान सकते हैं कि दुनिया इन सब चीजों से बहुत आगे निकल चुकी है। ये विषय हमारी उन्नति, या आर्थिक प्रगति नहीं कर सकते, न ही देश-विदेश में आगे बढने में सफलता दे सकते हैं। यह है बगैर श्रद्धा। श्रद्धा किसी भी वस्तु में होगी, वो निश्चित रूप से आपको सफल करेगी ही। बस, सफलता के इस मापदंड में देखना यह है कि आप बाहरी सफलता प्राप्त कर रहे हैं या आंतरिक। बडा ही उबाऊ विषय लेकर चर्चा कर रहा हूं मैं। है न। किंतु मैं जानता हूं जिसकी श्रद्धा पढने की है उसे कुछ न कुछ अवश्य मिलेगा, जिस प्रकार मेरी श्रद्धा लिखने में है और इसके लिये गहन अध्ययन हुआ। आप सोच सकते हैं इससे मुझे मिला क्या? सुख। इस सुख का औचित्य क्या? मैं किसी भी प्रकार के तनाव से मुक्त हूं। कितना? और कितने लम्बे समय तक ऐसा हो सकता है? जब तक मैं इस पूरी मनस्थिति में आकंठ डूबा रहूंगा। मैं आपको फिर कह देता हूं कि ये किसी प्रकार की ईशवरीय आस्था नहीं है। और न ही श्रद्धा अन्धविश्वास है। श्रद्धा पर डॉ.राधाकृष्णन ने अपनी राय देते हुए लिखा था कि- " श्रद्धा अन्धविश्वास नहीं है। यह आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने की महत्वकांक्षा है।" ( डॉ. राधाकृष्णन, श्रीमद्भाग्वत गीता, पृ.158)। चित्त की विशेष दशा श्रद्धा है। ज्ञान के कई क्षेत्र हैं। विज्ञान की भी कई शाखायें हैं। कोई डॉक्टर, कोई अर्थशास्त्री, कोई मनोविज्ञान, कोई दर्शन, कोई भूगर्भ शास्त्र कोई इतिहास आदि में ज्ञान अर्जित कर शांति चाहता है। किंतु गीता में ज्ञान का तात्पर्य खुद के अंतिम तत्व बोध से है। इसके लिये बडी महत्वकांक्षा चाहिये, और श्रद्धा इसी महत्वकांक्षा की ऊर्जा है।
ये जो हमारा भारत है, क्यों महान है? इसलिये कि यहां अनुभव अध्ययन, जिज्ञासा और निष्कर्षो की एक सुदीर्घ परम्परा है। भौतिक जगत के जितने भी अध्ययन हैं वे सारे हस्तांतरित हैं। वैज्ञानिक विज्ञान के सूत्र खोजते हैं, हम सब भी लगभग इसी तकनीक का इस्तमाल करते हैं। किंतु आत्म ज्ञान अहस्तांतरित नही। कपिल, कणाद, गौतम, बादरायण, पतंजलि या शंकराचार्य आदि की अनुभूतियां वैयक्तिक है, वे प्रेरित कर सकती हैं मगर उनका हस्तांतरण नहीं किया जा सकता। ये श्रद्धा के विषय हैं। उन्हें मिला आत्मज्ञान श्रद्धा की शक्ति पाकर हम सबके लिये महत्वकंक्षा बन सकता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मूर्ख, अश्रद्धालु और संशयी नष्ट हो जाते हैं। ऐसे लोगों के लिये न तो ये जगत है, न वो परलोक। उन्हें सुख तो मिल ही नहीं सकता। ( वही श्लोक 40)। हममें एक बुरी आदत भी है कि हम सन्देह करने लगते हैं। सन्देह दरअसल देह के साथ है। वृहदारण्यक उपनिषद (4.4.13) में कहा गया है कि- " शरीर में प्रविष्ट यह आत्म तत्व जिसे प्राप्त हो गया है- यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आतमास्मिन सन्देहेय गहने प्रविष्टः।" वह सब कर्ता है- "स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव?" "उसे सबका कर्ता व लोक का स्वामी बताया गया किंतु तब वह और लोक दो होते हैं इसलिये अंतिम में जोडा गया हे - वही लोक भी है। प्रकृति और परमतत्व दो नहीं है। श्रीकृष्ण सन्देह और संशयों को खत्म करने के लिये ज्ञान मार्ग दिखाते हैं। क्योंकि ज्ञान से ही तमाम सन्देह दूर हो सकते हैं। आप मान सकते हैं कि हम भारतीय हैं इसलिये भारतीय दर्शन की महत्ता सिद्ध करते हैं। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि यूरोपीय दर्शन जिसका आधार यूनानी दर्शन है वो भी भारतीय दर्शन से प्रभावित ही है। प्लेटिनस (204-70ई.) आखिरी यूनानी दार्शनिक रहे थे। उनका चिंतन भारतीय दर्शन से युक्त रहा। उनके विवेचन में जिन तीन तत्वों को दिखाया गया उसे ट्राइनिटी यानी त्रितत्व कहा गया। पहला 'वह एक' , दूसरा तर्क बुद्धि, तीसरा विश्वात्मा है। हालांकि इसाइयत ने इन्हें नहीं अपनाया। किंतु त्रित्व की कल्पना नई नहीं थी। महामृत्युंजय मंत्र के नाम से विख्यात ऋगवेद के सातवें मंडल के एक मंत्र में 'त्र्यंबक यजामहे' हजारों साल पहले से ही मौजूद है। प्लेटिनस ने जागतिक कर्मों से परे रहकर मुक्ति मार्ग को अपनाने पर जोर दिया जो गीता कहती रही है। इसके पहले प्लेटो (428-427ई.पू) ने गीता की तरह 'फीडो' मे कहा है कि "देहधारी अज्ञानी होकर बन्धन में होते हैं। किंतु ज्ञानी मुक्त हो जाते हैं।" प्लेटो 'रिपब्लिक' में लिखते हैं कि-" शुभ प्रत्यय पर ध्यान करने से आत्मा की गति ऊर्ध्वगामी हो जाती है और आनंदद्वीप पहुंच जाती है।" कुलमिलाकर मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय दर्शन ज्ञान का महासागर है, इसमें डुबकी लगायें, दावे के साथ कहता हूं बाहर आने की इच्छा ही नहीं होगी, खैर ..ज्ञान सर्वोच्च है। इसे श्रद्धा से ग्रहित करें। कभी-कभी हमें लगता है कि कोई विषय रुचिकर नहीं है किंतु सम्भव है वो ही जीवन मार्ग के लिये असल रोशनी हो। यानी, शिक्षा का अधिकार सरकार दे सकती है, किंतु जो अधिकार हमारे भीतर है उससे हम दूर क्यों रहें। श्रद्धा रखे, ज्ञान प्रेषित करें। जन जन तक पहुंचाने का कर्म करें। बस कर्म करें। "

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

डोर

यह 150 वीं पोस्ट है, पता ही नहीं चला। खैर.., काफी दिनों से काव्यात्मक कुछ लिखा नहीं,वैसे मूलत: मैं तो आलेख लिखने वाला ठहरा, काव्यात्मक रचना मेरे बस की नहीं, सिर्फ प्रयासभर करता हूं। हां, कवितायें पढने में बहुत रस लेता हूं। अपने चन्द लेखक कवि हैं जिनके ब्लोग पर जा कर अपनी काव्य प्यास बुझा लेता हूं। इन कवि हृदयों से सीखते हुए कभी कभी मैं भी शब्दों को धारा में बहाने का प्रयत्न कर बैठता हूं, पता नहीं यह धारा में बहते भी हैं या इधर उधर होकर कहीं अटक जाते हैं? जो भी हो आपके सामने है। शब्द अटके हों तो निकालने में सहायता करें।

"मां से नज़र बचा
भरी दोपहर अपनी
नवजात प्रेम डोर लिये
भाग जाया करता था
कहीं सुदूर
वीराने पडे मैदान में।

डोर मांझने की खातिर
तपी हुई,
खौलती हुई
सरस,गोन्द की लुग्दी
मलता था, ताकि
वो पक्की हो सके।

फिर दुनियाई पतंगों को
काटने की खातिर
बीन कर लाये
कांच के टुकडों को
पीस-पीस महीन कर
उसका बुरादा बना
लगाता था।

चढाता था उस पर
अपने खून से बना रंग।
सूखने देता था घंटों
तेज़ धूप में उसे।
ये तप था, और अज़ीब सा
गुदगुदाता उत्साह था।

यकीन हो जाता था कि
हां, अब ठीक है तो
होले होले से
लपेट कर उसे
अपनी दिल की चक्री में
छुपाकर लौटता था घर।

ऐसा तो रोज़ ही किया।
धूप में जला बदन
हाथों में पडे छाले
और उपर से खाई
मां की डांट भी,
मगर सुकून था।

कि एक दिन इस
आकाश में उडाऊंगा
अपनी भी पतंग।
और काटूंगा विरोध की
तमाम उन पतंगों को
जो रोज़ उडती हुई देखता हूं।

सच पूछो तो पता नहीं था
बाज़ार में बिकने वाले
रासायनिक पदार्थों से लिपटे
इन पक्के धागों के बारे में,
जो महंगे और मज़बूत थे
बिल्कुल समाज़ की तरह।

तभी तो
थिगी ही थी कि
कट गई,
दूर कहीं जा अटकी
बबूल के पेड में।

आज भी लटकी है वहीं,
अपने उसी बने मंझे हुए
धागे के साथ,
जो हवा के संग इधर-उधर
पता नहीं कहां कहां
आधारहीन झूल रहा है।
वक़्त की मार सहता
रंगहीन, कमज़ोर, मज़बूर
बेचारा, यूं ही।

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

मेरी नज़र में-नाटककार चरणदास सिद्धू (अंतिम भाग)

14.3.1997 को डॉ. राजेन्द्र पाल को दिये गये एक साक्षात्कार में डॉ.चरणदास सिद्धू ने नास्तिकता पर अपने विचार प्रकट किये हैं। ( नाट्यकला और मेरा तजुरबा, पृ.141) यह मुद्दा वाकई गम्भीर है। डॉ.सिद्धू नास्तिक हैं। पहले नहीं थे, बाद में हुए। ( इंगलिश ऑनर्स करते समय मैने, प्राइवेट कैंडिडेट के तौर पर, प्रभाकर ( हिन्दी) तथा विद्वानी (पंजाबी) के इम्तिहान पास किये। तब तक मैं आम लोगों जैसा वहमी था...।' इसी पुस्तक से , पृ.142) यह जो होना होता है उसे मैं ठीक वैसे ही लेता हूं जैसे कोई पहले पढाई किसी विषय की कर रहा होता है और बाद में करियर कोई दूसरा चुन लेता है। उन्होनें एक जगह कहा है- "मैं नास्तिक हूं। बिना झिझक हर एक को बताता हूं कि मुझे कल्पित रब में विश्वास नहीं है।..... मैं मुश्किल से मुश्किल घडी में भी किसी दैवी ताकत से, प्रार्थना करके, भीख नहीं मांगता। मगर मैं जानबूझकर आस्तिक लोगों की बेइज्जती नहीं करता। मुझे कमजोर वहमी लोगों से हमदर्दी है। काश उनके पल्ले सोच समझ होती। अंदरूनी शक्ति होती...।" मुझे याद आते हैं सर्वपल्ली राधाकृष्णन, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गान्धी, विनोबा भावे आदि। मुझे सोचना होगा कि क्या ये कमजोर थे? या वहमी थे? या फिर इनमे अन्दरूनी शक्ति का अभाव था? इस मुद्दे पर ज्यादा कुछ कतई नहीं लिखना चाहुंगा, क्योंकि मैने जाना है कि दुनिया के जितने भी नास्तिक हैं वे तमाम लोग बहुत बडे आस्तिक होते हैं। अपने नास्तिक होने के लिये वे जिस रब या ईश्वर का विरोध करते रहते हैं उम्रभर, तर्क देते हैं, अमान्य करने की कोशिश करते हैं और बहुत कुछ आस्तिकता पर कहते हुए यह भी कहते हैं कि जानबूझकर आस्तिक लोगों को बेइज्जत नहीं करता तब उससे लगता है कि ये 'रब' काल्पनिक तो कतई नहीं हो सकता। वरना इतना विरोध क्यों? खैर..। ऐसे में मेरी आस्तिकता और अधिक दृढ हो जाती है। बरनर्ड शॉ, बरट्रेंड रसल, सैमुअल बटलर, टॉमस हार्डी तथा कई यूरोप व अमेरिका के लेखक व चिंतक-खासकर कार्ल मार्क्स की विचारधारा के प्रशंसक। मनोविज्ञान की किताबें और मिथिहास के बारे में फ्रेज़र जैसे विद्वानों के खोज ग्रंथ आदि ने डॉ सिद्धू को तर्कशील बनाया। भारत देश सनातन काल से आध्यात्मिक रहा है, ऐसा माना जाता है। वेद-पुराण, शास्त्र और कई तरह के दर्शनयुक्त साहित्य रचे गये, बडे से बडे साहित्यकारों द्वारा....। शायद सब फिज़ुल? मैने कहीं पढा था कि भारत जैसे अतिबुद्धिवादी देश और इसकी परम्पराओं को नष्ट करने के लिये भी विदेशों में काफी काम हुआ है। विदेशी साहित्यकारों का एक पूरा जमघट लगा..।खैर.., यह विषय सचमुच बहस के लायक नहीं है क्योंकि मेने हमेशा माना है कि तर्क समाधान नहीं देता, सिर्फ उलझाता है, भ्रमित रखता है। आखिर इस 'तर्क' का रूप भी तो ऐसा है कि इसे उल्टा कर पढे तो होता है 'कर्त', यानी 'काटना'। बस तर्क सिर्फ काट है। काट कब समाधानी हुआ? बहरहाल, इस बहस में उज्जवल पक्ष जो जीवन की प्रेरणा हो सकता है, उसे कतई नहीं भूला जा सकता।
20 बरसों के लगातार लेखन, अनुभवों को समेटने का प्रतिफल है डॉ सिद्धू की यह किताब"नाट्यकला और मेरा तजुरबा"। डॉ. सिद्धू गम्भीर चिंतक हैं। जो व्यक्ति 7वीं जमात में परिपक्व विचार पाल लेता हो उसका पूरा जीवन कैसा होगा इसकी कल्पनाभर करके समझा जा सकता है। " कुछ बन्दे मौत को जीत लेते हैं। अपने कारनामों के जरिये, कलाकृतियों द्वारा, वे अपनी जिन्दगी को अमर बना जाते हैं। मुझे चाहिये, मैं भी अपनी मेहनत सदका, दिमागी ताक़त के भरोसे, कुछ इस तरह का काम कर जाऊं, लोग मेरा काम और मेरा नाम सदियों तक याद रखें।" फिर 32 वर्ष में प्रवेश करते करते उन्होंने साध लिया कि आखिर उन्हें करना क्या है? 'कॉलेज में पढाने के साथ-साथ मैं नाटक पढने, देखने, लिखने और खेलने पर शेष जिन्दगी लगाउंगा।' आप सोच सकते हैं कि जिला होशियारपुर का एक देहाती लडका, प्रोफेसर बनता है, नाटक लिखता है, खेलता है, आई ए एस के इम्तिहान में सफल होता है किंतु नाटक के शौक में वो उसे त्यागता है, अमेरिका जाता है, अंग्रेज़ी का डबल एमए, फर्स्टक्लास, पीएचडी और तमाम नाटककारों का गहन अध्ययन करता हुआ युरोप की यात्रा करता है, तेहरान होते हुए स्वदेश लौटता है। और इस बीच अपने लक्ष्य को बेधने के लिये पूरी तरह तैयार हो जाता है...। क्या यह सब सहज हो सका? नहीं। लगन, मेहनत और दृढ विश्वास का नतीजा था कि डॉ. सिद्धू ने जो ठाना था उस दिशा में वे अपना वज़ूद ले, निकल पडे थे, संघर्ष खत्म नहीं बल्कि नये नये सिरे से उठ खडे हुए थे। अपनी पूरी जिंदगी कभी हार नहीं मानी। उन्होने जो देखा वो लिखा, देहात का परिवेश, सामाजिक समस्यायें, धर्म, कर्म आदि तमाम गूढ बातों का चिंतन-मनन उनके नाटकों में उतरता रहा। मंचित होता रहा। उनकी धुन, लगन, मेहनत देख देख कर उनके छात्र, दोस्त आदि जो उनके करीब आया सबके सब उनके मुरीद होते चले गये। आलोचना नहीं हुई, ऐसा भी कभी नहीं हुआ, या यूं कहें ज्यादा आलोचनायें ही हुई और सिद्धू साहब कभी डिगे नहीं। उनका पूरा परिवार उनके साथ सतत लगा रहा। और जीवन भी क्या, कि जो देखा वो कहा, कोई लाग-लपेट नहीं, कोई भय नहीं, कोई चिंता नहीं। थियेटर का यह बिरला कलाकार धनी नहीं था, न हुआ और न ही इसका कोई उपक्रम किया। वो सिर्फ नाटक के लिये पैदा हुए। पूरी इमानदारी से नाटक को समर्पित रहे। जीवन में, अपने काम में जब भी आप इमानदार होते हैं तो सफलता भी इमानदार ही प्राप्त होती है जो लगभग आदमी को अमर कर देती है। तभी तो मुझ जैसा भी उन पर कुछ लिखता है, उन्हें याद करता है और राह बनाता है कुछ ऐसे ही जीवन जीने या हौसले के साथ रहने की। यह व्यक्ति के कार्य ही हैं जो जग में विस्तारित होते चले जाते हैं।
अपने कई नाटकों का विशेष ज़िक्र किया है चरणदासजी ने, जैसे इन्दूमती सत्यदेव, स्वामीजी, भजनो आदि, बस यह जान सका हूं कि नाटक क्या हैं, किस पर आधारित है और उसका मूल क्या है। मगर वो कैसे हैं यह तो देख कर या उसे पढकर ही पता लग सकता है इसलिये नाटकों पर मैं कुछ नहीं लिख सकता। सिद्धू साहब की दूसरी पुस्तक जो मेरे पास है (नाटककार, चरणदास सिद्धू, शब्द-चित्र), उसका सम्पादन रवि तनेजा ने किया है और कुल 29 लोग, जिनमें साहित्यकार, नाटककार, समीक्षक, लेखक, छात्र आदि सब कोई समाहित हैं जिन्होंने एकमत से सिद्धू साहब के जीवन के पहलुओं को अपने-अपने तरीके से व्यक्त किया है। अपने संस्मरण व्यक्त किये हैं। असल में यही सब तो होती है, जीवन की पूंजी। जीवन की सफलता। सिर ऊंचा उठा कर चलते रहने की शक्ति। ऐसे व्यक्ति दुर्लभ होते है। बिरले होते हैं। आप कह सकते हैं कि सचमुच के इंसान होते हैं। ताज्जुब और विडम्बना यह कि 'इंसान' को पढने, जानने, समझने वाले आज कम होते चले जा रहे हैं।

मंगलवार, 30 मार्च 2010

मेरी नज़र में-नाटककार चरणदास सिद्धू (भाग-2)

अनुभव जब एकत्र हो जाते हैं तो वे रिसने लगते हैं। मस्तिष्क में छिद्र बना लेते हैं और ढुलकने लगते हैं, कभी-कभी हमे लगता है अपनी खूबियों को बखानने के लिये व्यक्ति लिख रहा है, बोल रहा है या समझा रहा है। किंतु असल होता यह है कि अनुभव बहते हैं जिसे रोक पाना लगभग असम्भव होता है। नदियां बहुत सारी हैं, कुछ बेहद पवित्र मानी जाती है इसलिये उसमें डुबकी लगाना जीवन सार्थक करना माना जाता है। हालांकि तमाम नदियां लगभग एक सी होती हैं, कल कल कर बहना जानती हैं, उन्हें हम पवित्र-साधारण-अपवित्र आदि भले ही कह लें किंतु किसी भी नदी को इससे कोई मतलब नहीं होता कि उसे कैसा माना जा रहा है या वो कैसी है? वो तो निरंतर बहती है, सागर में जा मिलती है। आप चाहे तो उसके पानी का सदुपयोग कर लें या उसे व्यय कर लें, या फिर नज़रअंदाज़ कर लें, यह सब कुछ हम पर निर्भर होता है। ठीक ऐसे ही आदमी के अनुभव होते हैं, जो रिसते हैं, कलम के माध्यम से या प्रवचन के माध्यम से या किसी भी प्रकार के चल-अचल माध्यम से। कौन किसका अनुभव, किस प्रकार गाह्य करता है यह उसकी मानसिक स्थिति या शक़्ति पर निर्भर है। " मेरी दृष्टि में, एक सुखी जिन्दगी वो होती है जिसमें जरूरी आराम की चीज़े हों, मगर ऐशपरस्ती न हो। इसमें किसी किस्म का अभाव महसूस न हो। सब्र संतोष हो। इसके लिये आवश्यक है कि आदमी तगडा काम करे जो इंसानियत की भलाई की खातिर हो। सबसे अहम बात-एक सुखी जीवन रिश्तेदारों और दोस्तों की संगत में, दूसरों के वास्ते जिया जाय।" ( 'नाटककार चरणदास सिद्धू, शब्द चित्र', - सुखी जीवन-मेरा नज़रिया पृ.17) डॉ. चरणदास सिद्धू अब जाकर यह कह सके, यानी 44-45 वर्षों बाद, तो इसे क्या उनके जीवन का निचोड नहीं माना जा सकता? मगर ये ' दूसरों के वास्ते जिया जाय' वाला कथन मुझे थोडा सा खनकता है क्योंकि पूरी जिन्दगी उन्होंने नाटक को समर्पित की, उनका परिवार उनके समर्पण में सलंग्न रहा तो इसे मैं दूसरों के वास्ते जीना नहीं बल्कि अपने लक्ष्य के वास्ते जीना ज्यादा समझता हूं। वैसे भी जब आप किसी लक्ष्य पर निशाना साधते हैं तो शरीर की तमाम इन्द्रियां आपके मस्तिष्क की गिरफ्त में होती है और आपको सिर्फ और सिर्फ लक्ष्य दिखता है, ऐसे में दूसरा कुछ कैसे सूझ सकता है? यह सुखद रहा कि सिद्धू साहब को जैसा परिवार मिला वो उनके हित के अनुरूप मिला। यानी यदि जितने भी वे सफल रहे हैं उनके परिवार की वज़ह भी उनकी सफलता के पीछे है और यह उन्होंने स्वीकारा भी है। खैर..। पर यह तो नीरा दर्शन हुआ, जिसमें जीवन के लौकिक रास्तों से हटकर बात होती है। पर असल यही है कि सिद्धू साहब बिरले व्यक्ति ठहरे जिनका अपना दर्शन किसी गीता या कुरान, बाइबल से कम नहीं। यथार्थवादी दर्शन। और यह सब भी इसलिये कि उन्होंने जिन्दगी को जिया है, नाटकों में नाटक करके, तो यथार्थ में उसे मंचित करके। उनकी पुस्तक 'नाट्य कला और मेरा तजुरबा' जब पढ रहा था तो उसमे पहले पहल लगा कि व्यक्ति अपनी महत्ता का बखान कर रहा है, या करवा रहा है। किताब सबसे उत्तम जरिया होता है। मगर बाद में लगा कि व्यक्ति यदि अपनी महत्ता बखान भी रहा है तो फिज़ुल नहीं, बल्कि वो वैसा है भी। और यदि वो वैसा है तो उसका फर्ज़ बनता है कि वैसा ही लिखे या लिखवाये। कोई भी कलाकार हो, उसे अपनी कला का प्रतिष्ठित प्रतिफल मिले, यह भाव सदैव उसके दिलो दिमाग में पलता रहता है। यानी यह चाहत कोई अपराध नहीं। सामान्य सी चाहत है। इस सामान्य सी चाहत में रह कर असामान्य जिन्दगी जी लेने वाले शख्स को ही मैरी नज़र महान मानती है। महान मानना दो तरह से होता है, एक तो आप उक्त व्यक्ति से प्रभावित हो जायें, दूसरे आप व्यक्ति का बारिकी से अध्ययन करें, उसके गुण-दोषों की विवेचना करें। मैं दूसरे तरह को ज्यादा महत्व देता हूं। इसीलिये जल्दी किसी से प्रभावित भी नहीं होता, या यूं कहें प्रभावित होता ही नहीं हूं, क्योंकि यहां आपका अस्तित्व शून्य हो जाता है, आप अपनी सोच से हट जाते हैं और प्रभाववश उक्त व्यक्ति के तमाम अच्छे-बुरे विचार स्वीकार करते चले जाते हैं। ऐसे में तो न उस व्यक्ति की सही पहचान हो सकती है, न वह व्यक्ति खुद अपने लक्ष्य में सफल माना जा सकता है। फिर एक धारणा यह भी बनाई जा सकती है कि आखिर मैं किस लाभ के लिये किसी व्यक्ति के सन्दर्भ में बात कर रहा हूं? और क्या मुझे ऐसा कोई अधिकार है कि किसी व्यक्ति के जीवन को लेकर उसकी अच्छाई-बुराई लिखूं? नहीं, मुझे किसी प्रकार का कोई अधिकार नहीं है। न ही ऐसा करने से मुझे कोई लाभ है। फिर? आमतौर पर आदमी लाभ के मद्देनज़र कार्य करता है। उसे करना भी चाहिये। जब वो ईश्वर को अपने छोटे-मोटे लाभ के लिये पटाता नज़र आता है तो किसी व्यक्ति के बारे में लिख पढकर लाभ क्यों नहीं कमाना चाहेगा? मुझे भी लाभ है। वो लाभ यह कि मुझे सुख मिलता है। किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में लिख कर जिसके माध्यम से अन्य जीवन को किसी प्रकार का रास्ता प्राप्त हो सके, बस इसका सुख। न कभी मैं सिद्धू साहब से मिला, न ही दूर दूर तक ऐसी कोई सम्भावना है कि मिलना हो। और मैं जो भी लिख रहा हूं वो सारा का सारा उनकी किताब में ही समाहित है। मैं तो सिर्फ उस लिखे को सामने रख अपनी व्याख्या कर रहा हूं, जो किसी भी प्रकार से गलत नहीं माना जा सकता। यह मैरा धर्म है कि जब किसी पुस्तक को पढता हूं तो उसे सिर्फ पढकर अलमारी के किसी कोने में सजाकर नहीं रख देता बल्कि उसके रस से अपनी छोटी ही बुद्धि से सही, सभी को सराबोर या अभिभूत करा सकने का प्रयत्न करता हूं क्योंकि कोई भी पुस्तक किसी पाठक से यही चाहती है। यह मेरी, नितांत मेरी एक ईमानदार सोच है। और मेरा कर्म, धर्म लिखना ही तो है सो मैं इसे निसंकोच निभाता हूं। और लाभ यह कि सुख मिलता है। जैसा कि सिद्धू साहब ने लिखा- " सुख तो एक सोचने की आदत है, स्थाई तौर पर अच्छा महसूस करने की हालत। सुख कभी न छूटने वाली वो आदत है जिसके जरिये आप हमेशा चीज़ों के रौशन रुख को ताकते रहें...।" मेरा रुख यही है। सुख की सोच। रोशन रुख को ताकते हुए। तो क्या, सिद्धू साहब दार्शनिक हैं? नहीं। उनका जीवन दार्शनिक है। उनके अनुभव दर्शन है। मैने उनकी किताबों से जो व्यक्तित्व पाया है उसके आधार पर ही मैं कुछ कह सकता हूं। वरना लिखना तो उन लोगों के बारे में होता है जिन्हें आप अच्छी तरह से जानते हों। और यदि मैं कहूं, मैं उनके बारे में कैसे लिख रहा हूं तो वो सिर्फ इसलिये कि मेरी जिन्दगी में उनकी किताबे आईं और उन्हीं किताबों के जरिये अपनी छोटी सी बुद्धि के सहारे बतौर समीक्षक शब्दों में उतार रहा हूं। "नाटक लिखा नहीं जाता नाटक गढा जाता है" ( नाट्य कला और मेरा तजुरबा,मुलाकातें-पृ.165) सिद्धू साहब बताते हैं। जब अपनी धुन, अपने तरह का जीवन जिसने गढ रखा हो वो कोई चीज कैसे लिख सकता है? गढ ही सकता है। काश के मुझे उनके नाटक देखने का सौभाग्य प्राप्त हो पाता? भविष्य में ही सही इंतजार किया जा सकता है। किंतु इधर 1973 से 1991 तक के सफर में उनके द्वारा जो करीब 33 नाटक रचे, लिखे गये हैं उन्हें पढने की उत्सुकता बढ गई है और यह भी तय है कि सबको धीरे धीरे पढ लूंगा। शायद तब डॉ. सिद्धू सर के नाटकों पर लिखा जा सकता है, अभी तो उनके जीवन पर ही लिखी गई किताबें मेरे पास है सो मैं सिर्फ वही लिख सकता हूं। जैसी किताब है। तो अगली पोस्ट में मिलिये और यह भी जानिये कि, हां आदमी जो ठान लेता है, वो करके ही दम लेता है। और जब दम लेता है तो उसके वो दम में बला की तसल्ली होती है। किंतु इस दम लेने के बीच उसे उम्र का बहुत बडा भाग तपा देना होता है। " स्वर्ण तप-तप कर ही तो निखरता है।" कैसे तपे सिद्धूजी? और कैसे निखरे? जरूर पढिये अगली पोस्ट में।

शनिवार, 27 मार्च 2010

मेरी नजर में- नाटककार डॉ.चरणदास सिद्धू

किसी भी व्यक्ति को उसकी किताब से पूरा-पूरा नहीं जाना जा सकता। वैसे भी किसी व्यक्ति को पूरा कब जाना जा सका है, हां उसके करीब रह कर उसकी प्रकृति, उसका स्वभाव, उसकी आदतें आदि जानी जा सकती है और जब ऐसे व्यक्ति किसी के बारे कुछ लिखते हैं तो हम उक्त व्यक्ति के सन्दर्भ में अपनी रूप रेखा बना सकते हैं। बस यही रूप-रेखा खींची है मैने डॉ. चरणदास सिद्धू को लेकर। इस देश में कई ख्यातिनाम नाटककार हुए हैं। उनमे से एक यदि मैं चरणदास सिद्धू को गिन लूं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। ठीक है कि मैने कभी सिद्धू साहब के नाटक नहीं देखे, कभी इसके पहले तक उनके नाम से परिचय नहीं हुआ, कभी उनसे मुलाकात नहीं हुई, किंतु यह कतई जरूरी नहीं होता कि आपके जीवन में कभी कोई महान व्यक्ति आ ही नहीं सकता। समय-समय की बात होती है जब आपको मिलने, पढने आदि को प्राप्त होता है और तब आप कह उठते हैं कि अरे, मैं इनसे पहले क्यों नहीं मिल पाया या मैं इतना अज्ञानी रहा कि अब जा कर इनके बारे में पता चला? खैर देर आयद दुरुस्त आयद। धन्यवाद दूंगा सुशील छौक्कर जी का जिनके माध्यम से मैं डॉ.चरणदास सिद्धू के नाम से परिचित हुआ, फिर उनकी 'नाट्य कला और मेरा तजुरबा' तथा 'नाटककार चरणदास सिद्धू, शब्दचित्र' जैसी किताब पढ पाया। दोनों किताबें सुशीलजी के सौजन्य से ही मुझे प्राप्त हुई। एक आदमी जिसने अपना पूरा जीवन नाटकों को समर्पित कर दिया, जिसने नाटक के अलावा कुछ और सोचा ही नहीं, जिसने अपने सामने आए कई सारे बडे प्रतिष्ठित पदों को ठुकरा दिया, जिसने अपने घर-परिवार तक को नाटक की दीवानगी में दूसरे पायदान पर रखा और जो आज भी नाटक के लिये ही जी रहा है क्या ऐसे व्यक्ति के बारे में जानना-समझना कोई नहीं चाहेगा? क्या ऐसे व्यक्ति बिरले नहीं? मैं समझता हूं कि किसी भी कार्य को करने के लिये सनक होनी चाहिये, सनक यानी दीवानगी आपको कार्य की सफलता तक छोडती है और यदि सफलता की चमक में आपकी आंखे चौन्धियाती नहीं है तो समझो आप सचमुच के आदमी है। बस यही 'आदमी' माना जा सकता है चरणदास सिद्धू को। सुशीलजी ने इनकी बारे में काफी कुछ बताया। फिर पढा। और फिर इनके बारे में, इनके करीबी रहे, छात्र रहे, दोस्त रहे, जानने-समझने वाले रहे व्यक्तियों ने जो कुछ भी लिखा, उसे भी पढा। फिर इनको मनन किया। और तब खींची रूप रेखा जो आपके सम्मुख लाने से रोक नहीं पाया।
इस देश में बेहतरीन नाटककार शेष ही कितने हैं? नाटककारों पर लिखने वाले भी शेष कितने है? और नाटककारों को जानने-समझने के लिये कितनों के पास वक्त है? ऐसे प्रश्न क्यों नहीं कौन्धते है आमजन में? खैर इससे नाटककारों या चरणदास सिद्धू जैसों को कोई मतलब भी नहीं क्योंकि ये तो बस धुनी रमाये हुए हैं, तप में लीन है। दुर्भाग्य हमारा है कि हम वंचित रह जाते हैं ऐसे दुर्लभ जीवन से, जिसके माध्यम से हम जीवन के कई सारे अनबुझे पहलुओं को जान सकते हैं, समझ सकते हैं। क्योंकि नाटककार सिर्फ नाटक मंचित नहीं करता बल्कि अपने जीवन को, अपने परिवेश को, अपने अनुभवों को या कहें एक समग्र जीवन दर्शन को कथानक में उतारकर पेश करता है। वो अभिनय करता या कराता तो है किंतु कहीं वो अपने ही जीवन के साथ खेल भी रहा होता है। कौन खेलता है अपने जीवन के साथ? आज जब मैं अपने चारों ओर भागते-दौडते-खाते-पीते- कमाते- गंवाते लोगों की भीड देखता हूं तो यही ख्याल आता है कि जी कौन रहा है? खेल कौन रहा है? जीवन काट रहें है सब। कट रहा है सबकुछ बस। खेलने के अर्थ बदल गये हैं। खैर..। मैने चरणदास जी के बारे में सुना व पढा है। फक्कड सा जीवन। किंतु ऐसी फक्कडता नहीं कि जीवन का लक्ष्य ही लुप्त हो जाये। अपने लक्ष्य के लिये तमाम बाधाओं को पार करने वाला व्यक्तित्व, अपने शौक के लिये आसमान को ज़मीन पर झुका देने वाला साहसिक जांबाज, अपनी एक अलग दुनिया बना कर चलने वाला दुनियादार इंसान...., क्या कभी मिल भी सकुंगा उनसे? क्योंकि जितना पढा-सुना है वो उनसे मिलने के लिये व्यग्र तो कर ही देता है किंतु अपनी भी बडी बेकार आदत है कि किसी के बारे में जानने-समझने के इस चक्कर में यदि कभी कहीं उसके ही विचारों के कई सारे विरोधाभास जब सामने आते हैं तो उसे कहने-बोलने से भी हिचकिचाता नहीं। कभी-कभी इस आदत के चलते सामने वाला मिलना नहीं चाहता। जबकि मिलकर मुझे बहुत कुछ और जानने-समझने को मिल सकता है जो ज्यादा असल होता है। पर..स्पष्टवादिता की प्रवृत्ति स्वभाव में प्राकृतिक रूप से जो ठहरी। कभी कभी गुडगोबर भी कर देती है। क्योंकि ज़माना औपचारिकता का है और अपने को औपचारिकता की ए बी सी डी नहीं आती। यानी हम जमाने के साथ नहीं है, यह हम जानते हैं। शायद इसीलिये बहुत पीछे हैं। वैसे इस पीछडेपन को हम स्लो-साइक्लिंग रेस मानते हैं। जिसमे जीतता कौन है? आप जानते ही हैं। खैर..डॉ.चरणदास सिद्धू के बारे में सुशीलजी से सुनकर, उनकी किताबो को पढकर उनके बारे में जो चित्र खींचा है वो वाकई दिलचस्प है और जिसे एकमुश्त पोस्ट मे ढालकर पेश नहीं किया जा सकता, सो अगली पोस्ट का इंतजार जरूर कीजियेगा।

रविवार, 21 मार्च 2010

उथले हैं वे जो कहते हैं


किसी भी साहित्यिक रचना या रचना संग्रह को इमानदारी से पढने वाला पाठक अगर मिल जाता है और वो उस रचना पर अपनी राय भी व्यक्त कर देता है तो यह सोने पे सुहागा हो जाता है। उस संग्रह को फिर किसी दूजे पुरस्कार आदि की आवश्यकता ही नहीं होती। मेरे पूज्य पिताजी डॉ. जे पी श्रीवास्तव के काव्य खंड " रागाकाश" के प्रकाशन के लिये जब इस पर मैं वर्क कर रहा था तो कई सारी कठिनाइयां आ रही थीं। पहली तो यही थी कि मैं बगैर पिताजी की आज्ञा के उनकी धरोहर को छापना चाह रहा था। उनकी अपने दौर में लिखी गई कई सारी रचनायें, जिसमें कइयों के कागज़ भी पुराने होकर फटने लगे थे को सहेज कर मुम्बई तो ले आया था अब बस पिताजी की आज्ञा की देर थी। पहले जब उनका साहित्ययुग पूरे उफान पर था, देश-विदेश के बडे से बडे साहित्यकार आदि से मेल मिलाप था, तब परिवारिक परिस्तिथियों ने उनके किसी भी तरह के प्रकाशन सम्बन्धित कार्य को नहीं होने दिया। और जब परिस्थितयां सुधरी तो काफी देर हो चुकी थी, पूरा का पूरा युग मानों बदल गया था, फिर भी उनका लेखन सतत जारी रहा, आज भी पठन-पाठन वैसा ही है जैसा पहले था किंतु लेखन अब ज्यादा नहीं होता। इस दौर में किसी प्रकाशन के प्रति भी उनका रुख उदासीन रहा। फिर भी मेरा प्रयास जारी था, उधर मेरे बडे भाई ने ढांढस बन्धाया कि अभी काम पे लग जाओ बाद में अपनी मंशा पिताजी को बतायेंगे, कुछ हो न हो कम से कम रचनायें व्यवस्थित तो हो जायेंगी। हमारे लिये यही जरूरी था। सो टाइप और इसकी साज सज्जा मैने अपने कमप्युटर पर दिन रात बैठ कर तैयार कर ली। अब? यदि पुस्तक का रूप देना है तो खास समस्या थी प्रकाशक की। दरअसल मेरे पास एक साहित्यक निधि थी, साहित्य के रसिकों के लिये बेहद उपयुक्त व विशुद्ध धरोहर थी सो चाहता था कि अच्छा प्रकाशक मिले। किंतु इस 'बाज़ार' में प्रकाशकों की शर्तों व आनाकानी का जो सीधा अनुभव मैने किया वो संस्मरण योग्य है। खैर..अगर बेहतर सामग्री हो तो उसे बेहतर कलेवर देना ही आवश्यक होता है जिसमे मैं कोई समझौता नहीं करना चाहता था। लिहाज़ा एक प्रकाशक की भूमिका अख्तियातर करने की मानसिकता लिये मैं छापाखानों पर भटकने लगा। कई जगह अलग अलग लागत निकालता रहा और अंत में तय किया कि अब हो न हो अपना प्रकाशन शुरू कर इस दस्तावेज को पुस्तकाकार देना ही है। चाहे जितना पैसा लगे। सो पुस्तक छपने डाल दी। अब सामने था पिताजी को बताना और बाद में विमोचन या लोकार्पण ताकि साहित्य को उसका पूरा पूरा सम्मान मिल सके। कहते हैं न यदि आप अपने कार्य के प्रति इमानदार हों और वो सदमार्गीय हो तो ईश्वर रास्ते निकालते जाता है। रास्ते निकले। पिताजी माने। बडे भाई की मेहनत रंग लाई। फिर तो बाद में आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जी जैसे महान साहित्यकार की अद्वितीय कलम ने 'पुरोवाक' लिखा। "रागाकाश" छपकर आई। विमोचन भी बडे साहित्यकारों की संगत में हुआ। समीक्षायें हुई। किसी ने कहा कि ऐन समारोह पर किताब को डिसकाउंट में बेचा जा सकता है। काफी बिक सकती है। किंतु पिताजी ने साफ इंकार कर दिया। हम भाई भी इस मूड में नहीं थे कि किताब बेचें। साहित्यकार, इसके रसिक परिचितों, मित्रों के साथ साथ देश की कई पत्रिकाओं-समाचार पत्रों में 'रागाकाश' प्रेषित की गई। कुछ ने समीक्षा की, कुछ पचा गये। परिचितों, मित्रो आदि में से किसने कितना लाभ लिया यह उनका अनुभव होगा। किंतु जिस प्रयास की शुरुआत मैने की थी वो 2008 के अप्रैल महीने में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। किताब के बारे में राय आती रही यानी उसकी सार्थकता सिद्ध होती रही। यह नहीं पता था, और न ही इसका कोई प्रयास था कि किसी प्रकार के पुरस्कार के लिये कोई अतिरिक्त उपक्रम किया जाये। वैसे भी पिताजी को पुरस्कार आदि का कभी मोह नहीं रहा, और मैने भी ज्यादा यही सोचा कि 'रागाकाश" पठनप्रेमियों तक ज्यादा से ज्यादा पहुंचे। लिहाज़ा सम्मान या पुरस्कार आदि के सन्दर्भ में कभी हमने सोचा ही नहीं था। पिताजी का मानना रहा है कि- होई वही जो राम रची राखा। सो दो वर्ष बीत जाने के बाद अचानक अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जयपुर राजस्थान की ओर से स्व.सेठ घनश्यामदास बंसल स्मृति 2009-10 का पुरस्कार काव्य संग्रह " रागाकाश" को प्राप्त हुआ है, कि खबर डाक द्वारा आई। श्री नरेन्द्र शर्मा, डॉ. आनंद मंगल वाजपेयी, डॉ. त्रिभुवन राय और डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के सूक्ष्म परिक्षण के बाद तय हुआ रागाकाश को पुरस्कृत करना। इस पुरस्कार से और कुछ हो न हो किंतु यह जरूर ज्ञात होता है कि आज भी बेहतर साहित्य को पूछने-परखने वाले लोग हैं और यथासम्भव उनकी वजह से ही भारत में साहित्य जिन्दा है। क्योंकि साहित्य के जिन्दा रहने के लिये सुधी पाठकों की आवश्यकता होती है। बहरहाल, यह भी एक अनुभव रहा था मेरा जिसने सिखाया कि कार्य इमानदारी से करो, प्रतिफल जो भी हो जैसा भी हो, अच्छा ही होता है। इसी सम्बल से फिलवक़्त उनके एक निबन्ध संग्रह के कार्य में भी रत हूं। देखता हूं कब वो पुस्तक का आकार लेता है? अच्छे प्रकाशक की तलाश तब भी रहेगी ही। और न मिलेगा तो अपना दम है ही।
अब 'रागाकाश' के दूसरे खंड 'रागानुगा" की एक छोटी रचना भी चलते चलते आपको नज़र करता हूं, यह मुझे बहुत पसन्द है, शायद आपको भी पसन्द आयेगी-

" उथले हैं वे जो कहते हैं
वर्ना दुख तो सब सहते हैं
किसको है मिल गया किनारा
सब धारा ही में बहते हैं।

सूखेगा जो हरा बना है
टूटेगा जो अभी तना है
कोई काम नहीं आता है
बडबोलापन यहां मना है।

सृष्टि किसी की नहीं, यहां सब
नश्वर है, टिकता है क्या कब?
जाने किसके हाथ डोर है
दिखा रहा प्रतिक्षण नव करतब।

हार-हार कर हार न मानी
मृत्यु वरण करने की ठानी
ऐसे पुरुषार्थी भी डूबे
डूबे पीर, औलिया, ज्ञानी।

काल अजय है, अजय विधाता
माया है सब रिश्ता-नाता
धीरे-जल्दी, हंसके-रोके
आया है जो, निश्चित जाता॥"

मंगलवार, 16 मार्च 2010

सृष्टि सर्जन का पहला मुहूर्त

बचपन से ही सृष्टि के सन्दर्भ में जानने-समझने की जिज्ञासा रही है। यह विषय मेरे लिये हरहमेश रोमांचित कर देने वाला रहा है। बहुत कुछ पढा-लिखा, अध्ययन किया, साथ ही इस सन्दर्भ में पंडित, ज्योतिष, वैज्ञानिक, ज्ञानियों आदि इत्यादि से समय समय पर अपनी जिज्ञासा शांत करने के उपक्रम भी करता रहा हूं, बावजूद सृष्टि मेरे लिये अबूझ ही बनी हुई है। यानी संतुष्ट नहीं हो पाया हूं कि आखिर ऐसा अजूबा जन्मा कैसे? हालांकि अपने-अपने तरीकों से लगभग सारे शास्त्रों, ज्ञानी महापुरुषों ने इसके बारे में बताया है। समझाया है। विज्ञान का भी अपना तर्क है। जितना अधिक मिल सका उतना मैने पढा भी। किंतु इस क्षुधा का क्या जो शांत ही नहीं होती? खैर..। आज इस व्यक्त सृष्टि का पहला ऊषाकाल है। सवंतसर। समग्र जगत का प्रथम सूर्योदय। भारतीय नव वर्ष का प्राम्भिक दिन। आप गर्व कर सकते हैं कि इसका प्रारम्भ किसी ऋषि-मुनि, पंडित, महात्मा आदि की किसी जन्मतिथि आदि से नहीं है बल्कि जिस क्षण सृष्टि शुरू हुई उसी समय संवतसर का प्रारम्भ हो गया। हां इस तिथि मे कई महाज्ञानी जन्में, मृत्यु को धारित हुए। यहां तक कि युधिष्ठिर विक्रमादित्य समेत कइयों ने अपने अपने संवतसर चलाये भी, किंतु इस प्रथम संवतसर की पहली सौर्यकिरण, पहला दिन, तिथि गणना सचमुच बेहद ही दिलचस्प और अनूठी है। गणना के अनुसार सृष्टि की आयु 1 अरब 95 करोड, 58 लाख, 85 हजार एक सौ 12 वर्ष हो चुकी है। वैज्ञानिक अनुमान भी यही है। आज के दिन से ही काल की भी शुरुआत हुई थी। जी हां वही काल जिसे हम समय, टाइम आदि नाम से जानते हैं। भारतीय दर्शन में काल और ब्रह्म पर्याय हैं। लोकजीवन में काल और मृत्यु को पर्याय माना जाता है। सृष्टि सर्जन से पूर्व काल बोध नहीं था। संवतसर भी नहीं। फिर उसके पहले था क्या? मेरी जिज्ञासा का सूत्रपात इसी प्रश्न से हुआ था। ऋगवेद के नासदीय सूक्त (10.129) में बहुत खूबसूरत चित्रण किया गया है कि- तब न सत था, न असत। न भूमि, न आकाश- "नो व्योमा परो यत।" न मृत्यु थी न अमरत्व। न रात, न दिन। वायु भी नहीं थी किंतु वह एक स्वयं अवात अवस्था में अपनी शक्ति से प्राण ले रहा था- "आनीदवातं स्वधया तदेकं।" अब आप देखिये कितना मजेदार है यह, कि 'वह एक- तदेकं' कौन? .., ऋगवेद में है यह, कि वह बिना हवा के सांस ले रहा था। इसी 'वह एक' को विद्वानजन कभी विप्र इन्द्र, मित्र, अग्नि तो कभी वरूण आदि देव नामों से पुकारते हैं। किंतु वह 'एक सद'- एक ही सत्य है- एकसद विप्रा बहुधा वदंति। (ऋ.1.164.46) सृष्टि सर्जन के मंगलाचरण के साथ का आईना ही परिवर्तन की शुरूआत है। प्रारम्भ है। जब परिवर्तन है तो तय है कोई गति अवश्य है। जहां गति है वहीं समय है। और यही समय का दर्पण ही तो संवतसर है।
विज्ञान में देखें। प्रत्येक सर्जन या बदलाव यानी परिवर्तन के पीछे एक ऊर्जा है। शक्ति के केन्द्र लगातार ऊर्जा दे रहे हैं तो क्या एक दिन इस संचित ऊर्जा का भी क्षय होगा? हो सकता है। होगा ही। एंगेल्स की ' डायलेक्टिस आफ नेचर' में लिखा है करोडों वर्ष बीतेंगे, सूर्य की ऊर्जा क्षीण होगी। सूर्य का ताप ध्रूवों के हिम को गला न पायेगा। हिम बढेगा, मानव जाति को जीवन के लिये पर्याप्त ऊष्मा नहीं मिलेगी। वो आगे लिखते हैं कि- धरती चन्द्रमा के समान, निर्जीव हिम पिंड की तरह निर्जीव होते सूर्य के चारों ओर निरंतर घटती हुई कक्षा में चक्कर लगायेगी और अंत में उसी में जा गिरेगी। कुछ ग्रह इसके पहले ही वहां गिर चुके होंगे। वैदिक दर्शन इसे प्रलय कहता है। किंतु प्रलय काल सम्पूर्ण ऊर्जा का नाशक नहीं है यानी उसके बाद भी ऊर्जा शेष रहती है और यही वजह है कि प्रलय के बाद पुनः सृष्टि का जन्म होता है। भारत के सांख्य दर्शन में कपिल ने यही बात बहुत पहले ही कही थी। सृष्टि और प्रलय प्रकृति की इकाई में चलते हैं इसीलिये प्रकृति मे द्वंद्व दिखाई देता है। बडी अजीब है न सृष्टि। और आज उसके काल के प्रवाह में बहते बहते हम यहां तक आ गये। भारतीय कालबोध का क्षण सृष्टि का प्रारम्भ है। फिर इसके बाद युग हैं। महाभारत युद्ध के 36 वर्ष बाद यानी ईसा पूर्व 3102 वर्ष से कलियुग चल रहा है। युगाब्ध के अनुसार भारत की 52 वीं सदी है यह। विक्रमसम्वत के अनुसार यह 2067 सम्वत है। यही शक संवत्सर 1932 है। किंतु दुनिया ईसाकाल की दृष्टि से देखती है जिसके अनुसार 21 वीं सदी है। जो भी हो किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि आज के दिन से सृष्टि का प्रारम्भ हुआ था जो हमारे लिये नववर्ष का प्रारम्भ है। तो आइये इसे मनायें। हमारे भारतीय संवत्सर का स्वागत करें। खूब नाचे-झूमें-गायें। सभीको मेरी ओर से आत्मीय शुभकामनायें।

शनिवार, 6 मार्च 2010

फिर दिल की नहीं, दिशा की जरूरत है

हॉकी का विश्वकप चल रहा है और भारत अपने तीन मैचों में सिर्फ एक पाकिस्तान से जीता है बाकी के ऑस्ट्रेलिया और स्पेन से बुरी तरह हारा। यानी उसके सेमीफाइनल के रास्ते अब कठिन हो चुके हैं। आज उसका इंग्लैंड के साथ मुकाबला है। इधर हीरो होंडा के विज्ञापन में दिखाया गया है कि फिर दिल दो हॉकी को....। कैसे? हीरो होंडा खरीद कर या हॉकी के लिये नया दिमाग देकर? खैर। भारतीय हॉकी जिस परम्परागत शैली में खेली जाती है उसे बदलने की जरूरत है। बदलाव की इस दरकार को समझकर प्रयत्न भी हुए किंतु सबसे बडी समस्या हमारी जलवायु की है। गरम देश में स्टेमिना को बरकरार रख पाना थोडा कठिन हो जाता है। फिटनेस भी इसीके चलते अपना अहम रोल निभाती है। लगातार तेज़ हॉकी खेलते रहना सम्भव नहीं हो पाता। किंतु यह सब कारण बहाने की लिस्ट में रखे जा सकते हैं। हां, भारतीय हॉकी संघ और खिलाडियों में मानसिक बिखराव भी अहम भूमिका निभाता है। हॉकी को लेकर गम्भीर चिंतन, समाधान, आर्थिक सहयोग आदि जैसे तमाम प्रयत्न किये जाते रहे हैं, बावजूद हम इसमे सुधार नहीं कर पाये। यही हाल पाकिस्तानी हॉकी का भी है। उसकी शैली भी ठीक हमारी शैली से मिलती जुलती है किंतु पाकिस्तान में जीतने की जिजीविशा हमसे ज्यादा है और यही कारण है कि उसकी हॉकी मरी नहीं है। भारतीय हॉकी से अपेक्षायें कुछ ज्यादा कर ली जाती है, वैसे पिछले डेढ दशक से जिस गति से उसका पतन हुआ है उससे अपेक्षायें जैसी बात बहुत हद तक कम हो चुकी है। किंतु फिर भी हॉकी को फिर से दिल देने की जरूरत नहीं है क्योंकि वो हमारा दिल है ही। हां, लगातार पराजय किसी भी खेल से ध्यान भंग करा देती है, बस हॉकी के साथ भी यही हो रहा है। हॉकी महासंघ विवादों में रहता है। उसकी अपनी राजनीति है। इस तथ्य को थोडी देर के लिये भूल जाइये क्योंकि मैं उस कारण की ओर ध्यान खींचना चाहता हूं जो आज की हॉकी के लिये बेहद जरूरी है। हॉकी के ख्यातिनाम खिलाडी धनराज पिल्लै मेरे मित्र हैं। उनसे भी कई बार इस मुद्दे पर चर्चा हुई है। विवाद अपनी जगह है, मुद्दे अपनी जगह है जिस पर धनराज ने भी कईबार अपनी राय व्यक्त की है, ऐसे और भी कई हॉकी के खिलाडी हैं जिन्होंने हॉकी की रजनीति को अव्वल कारण बताया है किंतु फिर भी इसे मैं फिलहाल परे रखूंगा क्योंकि मैं मानता हूं कि उससे ज्यादा जरूरी है हमारी खेल शैली में बदलाव की। धनराज भी मानते हैं कि 'यूरोपीय शैली आज के दौर में हमारी परम्परागत शैली को पीछे छोड चुकी है। किंतु उनका मानना यह भी कि इसके बावजूद हम बेहतर खेल सकते हैं और जीत सकते हैं। अगर सूझबूझ के साथ खेलें तो।' मैने पूछा भी था कि क्या सूझबूझ नहीं होती? उन्होने कहा था कि होती तो है मगर हम विरोधी टीम की रणनीति में उलझकर रह जाते हैं। और उसे भंग करने के चक्कर में कईबार खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते। खैर यह पहलू तो है ही, इसके साथ ही साथ मेरा सोचना है या यूं कहूं हॉकी के सन्दर्भ में बारिकी से जानना है कि हमारी हार के पीछे सबसे बडा कारण है जीतने की जिद का न होना। साथ ही यूरोपीय शैली को समझने के बावजूद उसका तोड न ढूंढ पाना। तोड के लिये या तो आप भी उतने ही तेज़ हों या तकनीकी रूप से आप पूरे 70 मिनिट तक ढीले न पडें। हमारी टीम की स्वभावगत कमजोरी है कि हम विरोधी टीम पर या तो दबाव नहीं बना पाते या फिर यदि बनाते भी हैं तो उसे कायम नहीं रख पाते। उल्टे खुद बहुत जल्दी दबाव में आ जाते हैं। आज भी फिनिशिंग नहीं है। ट्रेपिंग नहीं है। साझापन नहीं है और रणनीति को साधे नहीं रख पाते। या बीच खेल में अपनी रणनीति को बदल नहीं पाते। खिलाडियों में आपस में कोई समझदारी दिखती ही नहीं जो विरोधी टीम को धोखे में रख सके। न तो हमारे पास लम्बे शॉट्स हैं, न स्कूप को रोकने की सधी कला, न ही पेनल्टी कार्नर को गोल में बदलने की धारधार क्षमता। और जब विरोधी टीम की डी में हम घुसते हैं तो बिखर जाते हैं। वहां इतनी हडबडाहट होती है कि गेन्द को अपनी हॉकी से चिपकाये भी नहीं रख पाते। ऑस्ट्रेलिया से मैच की बात हो या स्पेन से, हम यदि हारे तो हमारी परम्परागत गलतियों की वज़ह से। हां हमारी रक्षापंक्ति हमेशा मजबूत रही है यह कहा जा सकता है किंतु उसकी मजबूती बनी रहे इसके लिये हमारे फारवर्ड खिलाडियों को और ज्यादा मेहनत करनी जरूरी हो जाती है। वैसे भी आज की हॉकी, उसके नियमों में भारी बदलाव हैं और जिसमें अब किसी भी खिलाडी की कोई फिक्स जगह नहीं रह गई है, यह वजह भी है कि हम अभी तक इन नियमों में पारंगत नहीं हो पायें हैं। दूसरी बात जो सबसे प्रमुख है कि यूरोप में हॉकी फुटबाल की रणनीति की तरह खेली जाने लगी है। इसका उदाहरण स्पेन के साथ हुए मुकाबले में देखा जा सकता था। कौनसा खिलाडी कहां से कब निकल कर गेन्द पर झपटता है या कौन किसे कब गेन्द पास कर रहा है यह दौडते रहते खिलाडियों में सूझबूझ का कमाल है जो हम नहीं समझ पाते, यही वजह है कि विरोधी टीमे हम पर अक्सर फिल्ड गोल दागती रहती हैं। कुलमिलाकर भारतीय हॉकी को अभी सुधरने में काफी वक्त लगेगा, और यह भी तब होगा जब हॉकी संघ की राजनीति अहम, स्वार्थ, कमाई की लडाई से बाहर निकल जाये। फिर चाहे कोच बदल लें, देशी-विदेशी कोच रख लें, खिलाडियों को बाहर कर दें, नये खिलाडी ले आयें, कोई फर्क़ नहीं पडने वाला। इस तरह के तमाम दोषों पर जब तक गम्भीर नहीं होंगे तब तक हम विश्व विजेता बनने के सपने देखना छोड ही दें तो अच्छा है। हम जानते हैं कि इस राजनीति ने कई बेहतरीन खिलाडियों के करियर को खा लिया है। जिसमें धनराज जैसे ताज़ा उदाहरण सामने हैं। और यही कारण रहा कि भारतीय हॉकी आज अपने ही अस्तित्व को तलाशने में जुटी हुई है। सो मुद्दे की बात यह है कि हॉकी को दिल नहीं दिशा देने की जरूरत है। आप भी कुछ सोचते होंगे? सो लिख डालिये ताकि हमारी हॉकी के लिये कुछ बेहतर हो सके। क्योंकि यह तय है कि मैं समय समय पर तमाम बातों को लेकर हॉकी की जड में सम्पादित करने की किसी भी तरह की कोशिश करता ही रहता हूं।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

जो प्रेम की हो ली, वो है होली

रुकिये.....इतना बडा आलेख देख कर भागिये मत। सच पूछिये तो आनंद आयेगा। होली के पर्व पर इस तरह के आनंद को पाने की भी चेष्ठा होती है, तभी आप मेरे ब्लोग पर आये हैं। पूरा पढने का साहस करें, पसन्द आयेगा। तब तक मैं आपके और अन्य ब्लोग से होकर आता हूं।


-आनंद में डूबना, उसमे सराबोर होना, उसमें समाहित होना मनुष्य की प्रकृति है। आनन्द के लिये ही मानवजीवन के समस्त कर्म है। वो इसका प्यासा है। प्रकृति आनंद से परिपूर्ण है। वह मनमोहक है, उसमे रूप, रंग, गुण, गन्ध, स्वर, रस है। यानी समग्र प्रकृति में सौन्दर्य रचा बसा है। वह नियम से बन्धी है। उसका कर्म लय से जुडा है। राग स्वतंत्र है। और जितनी भी दैवीय शक्तियां हैं वे सारी इसी नियम के अंतर्गत भ्रमण करती है। प्रकृति का संविधान ऋत कहा जाता है। ऋग्वेदिक ऋषियों द्वारा निर्मित प्रकृति इसी संविधान का अनुगमन करती है। ग्रीष्म, वर्षा, शिशिर, हेमंत, पतझड, बसंत इसी ऋत के ऋतुरूप होते हैं। इसमे बसंत प्रकृति का यौवनकाल है, तरुणाई उमंग का उत्थान है। प्रकृति अपना सबकुछ बसंत पर न्योछावर कर देती है। मानो नववधु पहली बार अपने प्रियतम से मिलन को ललचा रही हो। वो उसे पाकर नवजीवन सा अहसास पाती है। खिल उठती है। खिलखिला उठती है। अल्हडपन, मस्ती, दीवानगी यानी यौवन का चरम होली है। बसंत ऋतु का उल्लासशिखर होली है। जम्बुद्विप भरतखंड का उत्साह, उल्लास, और उमंग़ होली है। मस्तक पर चन्दन का टीका हो, गाल गुलाल से लाल हों, नृत्य में झूमते, गाते लोग हों, टोलियां हों, हंसी-ठिठोली हो..यही होली है। जीवन का उत्साह ही होली है।
हिन्दू धर्म व्यापक है। सनातन है। यहां जीवन को पूजा जाता है। जीवन का पर्व मनाया जाता है। यहां राम आगमन की दीवाली होती है तो कृष्ण की बांसुरी से निकले स्वर हृदयों में प्रेम घोल देते हैं, रास रचता है, रंग बिखरते हैं। जन-मन सब एक हो जाते हैं। द्वेत भाव नहीं दिखता, अद्वेत हो जाता है प्रकृति का कण-कण। यही होली है। ढेर सारे रंगों का मिलना और एक होकर उल्लास का नृत्य ही होली है। राधा-कान्हा का रास, अमीर-गरीब की गलबहियां। धरती-आकाश की प्रीति, वाकदेवी के सातों सुर झृंकत हो उठते हैं और शिव भी सुधबुध खो कर इस मस्ती में डूब जाते हैं। वात्सायन के कामसूत्र (1.4.42) में बसंत का यही उल्लास क्रीडा पर्व है। भारतवर्ष का महानतम प्रेमपर्व। मानों आकाश के तमाम देवी-देवता धरती पर उतरकर रंगों से खेल रहे हों। बैरभाव कहीं लुप्त होकर दैत्यों का मन भी ललचा रहे हों इस पावन पर्व पर थिरकने को। यही होली है।
होली को कुछ विद्वानों ने मिस्त्र या यूनान से आयातित बताया है। मिस्त्र में होली जैसा उत्सव था, यूनान में भी था। क्योकि ऐसे देशों से भारत के व्यापारिक सम्बन्ध रहे थे। सत्यकेतु विद्यालंकार के "वैदिक युग" (पृष्ठ- 232) में लिखा है कि वर्तमान ईराक़ और तुर्की राज्य के कुछ क्षेत्रों से प्राप्त भग्नावशेष व पुरातन सभ्यताओं से हमें पता चलता है कि उनके भारत से व्यापारिक सम्बन्ध थे। ऋगवेद (1.25.4) में पक्षियों के उडने वाले आकाश मार्ग और समुद्री नौका मार्ग के उल्लेख हैं। जेमिनी ने होलिका पर्व का उल्लेख (400-200 ईसापूर्व) किया और लिखा कि होलिका सभी आर्यों का उत्सव है। आचार्य हेमाद्री ने (1260-70 ई.) पुराण के उदाहरण से होली की प्रधानता बतलाई है। हज़ारों वर्ष पुरानी होली की परम्परा इसी भरत की भूमि से उपजी। मिस्त्र-यूनान ने नक़ल की। भारतीय दर्शन, साहित्य, संस्कृति कला, गीत, संगीत तथा उत्सवों, पर्वों से सराबोर है। यहीं आनंद की ऊर्जा उफान मारती है। उसका मद रस झलकाता है। प्राणीमात्र में बहकर वो प्रकृति के उच्चतम उत्साह को पाता है और होली स्दृश्य बन जन जन में व्याप्त हो जाती है।
संवेदनशीलता प्रकृतिप्रदत्त है। चार्ल्स डारविन ने ' द ओरिजिनल आफ द स्पेसिस एंड द रिसेन्मेंट' में बताया है कि ' प्राणियों को भावोत्तेजना में आनंद आता है।' आनंद का केन्द्रबिन्दु मानव के भीतर है। इसके उपाय, साधन प्रकृति में हैं। धरती सगन्धा है, पवन गन्ध प्रसारित करती है। मनुष्य में मदन गन्ध है, पुष्पों में सुगन्ध है। सूर्य ऊर्जावान है, ऊषा में सौन्दर्य झलकता है। चंद्रमा शीतल है, सुन्दर है। पूर्णीमा धवल चान्दनी बिखेरती है। प्रकृति के सारे जीव सवेंदित होते हैं। यही होली है। होली में नृत्य है। मगन होने का बोध है। महाप्राण निराला तो मानों अपने शब्दों में प्रक़ृति के इस आनंद के साथ खेलते हैं कि- 'वर्ण गन्ध धर, मधुरन्द भर, तरु-उर की अरुणिमा तरुणतर, खुली रूप-कलियों में पर भर, स्तर-स्तर सपुरिकरा, रंग गई पग-पग धन्य धरा।" निराला ही क्या तुलसी, कालीदास ने भी इस यौवनमयी प्रकृति को अंगीकार करते हुए शब्दचित्र खींचे हैं। तुलसी कहते हैं-" सीतल जागे मनोभव मुएंहु मन वन सुभगता न परे कही, सुगन्ध सुगन्द मारुत मदन अनल सखा सही। विकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकदा, कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपसरा।" कालीदास का कुमारसम्भव तो बसंत के रस-रंग में नहाया हुआ है-" पवन स्वभाव से ही आग भडकाऊ है, बसंत कामदेव के साथ आया है। उसने नई कोपलों के पंख लगाकर आम्र मंजरियों के वाण तैयार किये हैं। आम्र मंजिर खाने से ही नर कोकिल का सुर मीठा हुआ। उसकी कूक पर रूठी नारियां भी रूठना भूल जाती हैं।" यही होली है। रूठना, गिले-शिकवा, बैरभाव जहां प्रेम के रंगों में समाहित हो जायें और एक रंग बन जायें, होली मन जाती है। सांस्कृतिक राष्ट्रभाव की उल्लासधर्मिता या उसकी अभिव्यक्ति ही होली है। और जब इस पर बाज़ारवाद चढ जाता है तो यह पूरी की पूरी स्वच्छंदता पर, संस्कृति पर आक्रमण है। संस्कृति कभी उत्सवों की प्रेरक नहीं रही, किंतु ये बाज़ार अपने उत्सव गढता है। कभी फादर्स डे होता है तो कभी मदर्स। कभी वैलेनटाइन बिकता है तो कभी होली डे। मीडिया से लेकर पूरा बाज़ारतंत्र त्योहारों को बेचने लगता है। दुकानें खुल जाती हैं। उमंग की दुकाने, उत्साह की दुकानें। रंगों की दुकानें। प्रेम की दुकानें। और खरीददारों की भीड उमडती है। माल खरीदा जाता है। उपभोग किया जाता है। और जब उपभोग के बाद माल खत्म तो उत्साह खत्म, उमंग खत्म, प्रेम के गीत खत्म। नाच खत्म। थक हार कर बैठ जाना होता है। गाल पर लगे गुलाल पौछ दिये जाते हैं, रंग नहा धो कर निकाल दिये जाते हैं। फिर से तैयार होकर मनुष्य अपने बाज़ारीकरण में मशगूल हो जाता है। या मज़बूर हो जाता है। अब जब दुकानें सजेंगी तब खरीरदारी होगी। यह होली नहीं। होलिका है जो हमारे देश के पावन पर्वों को बाज़ार की आग में झौंकती है। प्रह्लाद बनिये और इससे बचिये। होली मनाइये। इसकी अल्हडता, प्रकृति की चरम बसंतोंपूर्ण मादकता का रसभोग लेने और इसके प्रेम, दुलारमयी भांग के नशे में 12 मास रहने के लिये बस प्यार करें। भारत की महान संस्कृति, सभ्यता का रसपान करें। होली खेलें। प्रेम, भक्ति, गीत, नृत्य, सेवा, समर्पण को पूजा मान गलमिलौवल करें।
ऐसी ही सार्थक, जीवंत होली दिवस पर मेरी आत्मीय शुभकामनाये आप सब स्वीकार करें।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

आंखों में कल का सपना है


ओफिस से रात में लौटना होता है, अमूमन आधी रात चढ जाया करती है। जब गांव वाले अपनी नींद को बिदाई देने के लिये अंतिम खर्राटे लिया करते हैं तब मैं अपने घर पहुंच कर या तो दरवाजा खटखटाता हूं या फिर बेल बजाता हूं। अज़ीब सी जिन्दगी है महानगरों की। खैर..लौटा ही था कि अपने पोस्ट बाक्स में कोई किताब आई हुई दिखी, झट से बाक्स ओपेन किया। सीढियां चढते चढते ही उसका कवर खोला और दरवाजे की बेल बजाने से पहले आंखों के सामने थी 'आंखों में कल का सपना है' गज़ल संग्रह। डा.अमर ज्योति 'नदीम' का गज़ल संग्रह। दरअसल यह आर्कुट का कमाल है जब डाक्टर साहब से परिचय हुआ। और उनके ब्लोग तक जा पहुंचा। उनके बारे में लिखा हुआ पढा और थोडा बहुत उन्हे जाना। फिर जी मेल से चेट पर उन्हें पक़डा और उनसे शुरू हुई बातचीत। गम्भीर और सधे हुए उनके शब्दों ने प्रभावित किया। आदमी की उम्र और उसके अनुभव परिपक्वता प्रदान करते हैं,और ज्ञान बन कर बरसते हैं। मुझे तो इसी बरसात में नहाना अच्छा लगता है सो डाक्टर साहब जब भी नेट पर दिखते हैं मैं उन्हें पकड लेता हूं। वे भी मुझसे बात करते हैं बिल्कुल ऐसे जैसे मुझे बरसों से जानते हों। यह उनका बडप्पन है। हालांकि आजकल ऐसे लोग कम ही मिल पाते हैं। मेरा तगडा अनुभव है कि ज्यादातर लोग अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिये छोटा होना नहीं चाहते। पद का, प्रतिष्ठा का, पैसों का या फिर ज्ञान का ऐसा मद उनमें भरा होता है कि वे झुकना नहीं चाहते। झुकने को अक्सर छोटापन मान लिया जाता है जबकि कहा जाता है कि ज्ञानी हमेशा सरल और लचीला होता है। किंतु आज नमस्कार भी ऐसे किया जाने लगा हैं मानों एहसान जता रहे हों। खैर..मैने कहीं पढा था कि छोटा होना या झुकना जब आदमी भूल जाता है उसका पतन वहीं से शुरू हो जाता है। ख्यातिनाम ला त्सू का एक कथन भी प्रसंगवश कहता हूं कि "झुकना समूचे को सुरक्षित रखना होता है।" अपन तो छोटे हैं इसलिये पतन का प्रश्न ही नहीं है। न नाक कटने का डर, न अहम भंग होने का भय। और किस्मत भी अच्छी कि डाक़्टर साहब जैसे लोग भी मुझे मिल जाते हैं। जिनमें किसी तरह की दुनियाई स्वर्ण परत नहीं चढी होती,और आदमी होने का 24 कैरेट खरापन भी होता है। दरअसल मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं यह भी बताता चलूं, डाक्टर साहब की जिन गज़लों को मैने पढा उनमे बहुत सारी गज़ले मेरे मनोभावों को छूती हुई गईं। यानी आज के दौर में सामाजिक स्तर पर पतन हो या व्यवहारिक स्तर पर टूटन या नौकरी पेशे में चल रही अव्यवस्थायें हों, आदमीयत कैसे खत्म होती जा रही है उसे बखूबी से उन्होंने शब्दों में उतार कर लक्ष्य पर सीधे चोट की है। जैसे-
" चूक हो जाये न शिष्टाचार में, दुम दबा कर जाइये दरबार में।
कुर्सियों के कद गगनचुम्बी हुए, आदमी बौना हुआ आकार में...।"
हां उनसे उनके गज़ल संग्रह के बारे में एक बार पूछा था, सो उन्होने डाकविभाग का सदुपयोग करते हुए मुझे अपनी हस्ताक्षरयुक्त किताब प्रेषित कर दी। मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और आप सब के लिये किताब का निचोड प्रस्तुत करने की कोशिश कर बैठा। हालांकि मैं जानता हूं यह कोशिश किताब की पूरी तरह निचोड नहीं है उसके लिये तो वह पढनी ही होगी फिर भी जो कर पाया, जितना कर सका, आपके लिये नज़र है।
मैने उनकी कृति पढनी शुरू की तो हिन्दी और ऊर्दू सम्मिश्रण युक्त उनके शब्द खिलखिलाते हुए मेरी आंखों के सामने थे जो उनके जीवन का बहुत सारा भाग उढेल रहे थे। जिसमे जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, दुष्यंत कुमार ,प्रेमचन्द और मैक्सिकम गार्की से ली गई प्रेरणा स्पष्ट झलक रही थी। उनकी ज्यादतर गज़लें समाज़ और दुनिया की अव्यवस्थाओं के खिलाफ आक्रोश से भरी हुई महसूस होती है। और सचमुच उनकी आंखों में कल का सपना है जो उम्मीद व्यक्त करता है कि बदलाव सुखद हो।
प्रसादजी का छ्न्दबोध गज़लों में समाहित करना कठिन होता है किंतु
"जो कुछ भी करना है, कर ले
इसी जनम में, जी ले, मर ले।"

डाक्टर साहब का यह शे'र प्रसाद्जी के श्रद्धा और मनु के बीच से निकलती जीवन धारा माना जा सकता है। किंतु इसी के आगे उन्होने प्रेमचन्द का यथार्थबोध भी करवाया कि-
" अवतारों की राह देख मत
छीन-झपट कर झोली भर ले।"

गार्की का मर्म और समाज़ की पीडा इस किताब में ज्यादा है जो व्यवस्था के साथ भिडती हुई प्रतीत होती है। तो दुष्यंतजी शे'रों के साथ चलते नज़र आते हैं। यह अद्भुत है कि गोर्की और दुष्यंतजी को पढने वाले उनका अक़्स अमर ज्योति साहब के शब्दों के नेपथ्य में ढूंढ सकते हैं।
"कह गया था, मगर नहीं आया
वो कभी लौट कर नहीं आया।"

तो
" नहीं कोई भी तेरे आसपास, क्यों आखिर?
सडक पर तन्हा खडा है उदास, क्यों आखिर?"

आप देखिये डाक्टर साहब का आक्रोश, वेदना और राजनीतिक,सामाजिक तंत्र के प्रति धधकते सवाल कि-
"राम के मन्दिर से सारे पाप कट जायेंगे क्या?
बन गया मन्दिर तो चकले बन्द हो जायेंगे क्या?
कितने लव-कुश धो रहे हैं आज भी प्लेट-ओ- गिलास
दूध थोडा, कुछ खिलौने उनको मिल पायेंगे क्या?
चिमटा,छापा,तिलक,तिर्शुल,गांजे की चिलम
रहनुमा-ए-मुल्क अब इस भेस में आयेंगे क्या?
अस्पतालों, और सडकों, और नहरों के लिये
बोलिये तो कारसेवा आप करवायेंगे क्या?"

अध्यापन और इसके बाद बैंक की नौकरी विचित्र लग सकती है किंतु पठन पाठन, दर्शन और फिर गणित का गुणा-भाग वाला व्यक्ति जीवन के हर स्तर को अनुभव करने में ज्यादा समर्थ हो जाता है जिसका निष्कर्ष, परिणाम यही निकलता है कि-
"खूब मचलने की कोशिश कर
और उबलने की कोशिश कर
व्याख्यायें मत कर दुनिया की
इसे बदलने की कोशिश कर।"

सचमुच डा.अमर ज्योति 'नदीम' की आंखें (कृति) कल का सपना देखती हैं और अपने अनुभवों से आने वाले पीढी की दिशा तय करती हैं। कुल 86 गज़लों से बनाया गया है यह गुलदस्ता जिसके प्रत्येक फूल ताज़े, महकते हुए हैं। या यूं कहें अमर हैं, ज्योति की तरह रोशनी बिखेरते से हैं। अब आप सोचिये कैसे मूरख हैं वे प्रकाशक जो सिर्फ बाज़ारवाद को देखते हुए बेहतरीन कृतियों को नज़रअन्दाज़ करते हैं, जिन्हे जन-जन में जाने से रोकते हैं। और ये आजकल की नई पीढी के फेशनेबल, आधुनिक मानेजाने वाले हाडमांस के अर्धजीवित पुतले हिन्दी साहित्य से क्यों दूर हैं? शुक्रिया अयन प्रकाशन का जिसने इस कृति को आकार दिया। और शुक्रिया डाक्टर साहब का भी जिन्होनें मुझे अपनी कृति से परिचय कराया।

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

रंगोली

अनमना सा मैं। डूबा तो अपने शहर के उन दिनों तक जा पहुंचा जो दिलोदिमाग में जड से गये हैं, पिघला तो पिघलता ही चला गया। होता है कभी कभी ऐसा भी। फिर शब्दों ने नहीं देखा कि उसकी बनावट कैसी है, वो किस रूप में हैं। जब यथार्थ के धरातल पर आकर शब्दों की ओर नज़र गईं तो सुधारना चाहा, किंतु किसे सुधारुं? बना हुआ अतीत कब बिगडता या सुधरता है? सो जस का तस। आपके लिये।

"गोबर से सने हाथ
लिपा हुआ आंगन
और आंगन मे बनाती
रंगोली,
कितनी रंगीली लगती थी वो।

उसकी चटक धूप से
मखमली सांझ तक की मेहनत
रंग लाती मुझे दिखती थी तब
जब रंगोली बनकर
तैयार हो जाती थी
और चेहरे पर संतोष की लकीरें
मुस्कान के साथ खिलती थी,
कितनी मासूम सी लगती थी वो।

निहारता था मैं
रंगोली को नहीं
ज्यादा उसे,
और पता भी नहीं चलता था जग को
कि किसे देख रहा हूं।

जब कोई उसकी कृति की
तारीफ करता
तो मैं भी करता,
रंगोली की नहीं,
उसकी जिसने बनाई थी।

मैं जानता था
वो नही जानती
कि मैं उसे देखने आता था
उसकी रंगोली के बहाने।
और
प्रेम के रंगों से
हृदय में नित बनाया करता था
उसकी-अपनी सपनों की रंगोली।

हां तब जब
उसकी बनाई रंगोली कोई
मिटा जाता तो
फिर बना लेती थी वो।

मगर

मगर
मेरी बनाई रंगोली जब मिटी
आज तक नहीं बन पाई है।"

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

जनता या जमूरा?

किसी को अपनी
फिल्म चलानी है,
पार्टियों को राजनीति करनी है
चैनलों को मसाला कूटना है
और आपको?
आप तो ज़मूरे हैं।
इशारों पर नाचने वाले ज़मूरे,
इनके धंधों में
बेमोल बिकने वाले ज़मूरे।
क्या ज़मुरुओं की
कोई औकात होती है?



मुम्बई पिछले कुछ दिनो से हैरान है। आप जानते हैं क्यों है? यह भी बता दूं कि टीवी चैनलों पर जो आप देख रहे है वो असली हालात नहीं है बल्कि हालात बिगाडने के लिये बनाये गये द्रुश्य है। अपने वीज़न के अनुसार गढी जा रही मानसिकता को बखूबी प्रकट किया जा रहा है जिससे देखने वालों को लगे कि मुम्बई सचमुच आफत में है और अब बस तहस नहस ही होना है। उधर राजनीतिक स्तर पर कांग्रेस का खेल है, असली मुद्दे फिलहाल पूरी तरह डिब्बा पैक हो गये हैं, यहां तक कि जनता भी सवाल नहीं कर रही। क्या बिजली, क्या पानी, क्या महंगाई सब कुछ इस बनाये गये हालात की भेंट चढ गये।
शाहरुख खान को चिंता है? अमेरिका, दुबई घूम घूम अपने स्टेटस और कमाई में जुटे इस हीरो को क्या सचमुच चिंता है? मगर हम उसके लिये परेशान है। क्यों?
क्या कभी अपने आप पर भी हंसी आई है? आई है, किंतु दबा ली गई है। क्योंकि जनता को ज़मूरा बना दिया गया है।
इधर सब इस हालत का जायजा कुछ इसप्रकार ले रहे है मानों देश की यही एक समस्या है और इसके हल हो जाने पर सबकुछ ठीक हो जायेगा।
बडी बडी बातें, बडे बडे विचार प्रस्तुत किये जा रहे हैं। यह सब आखिर क्यों? अब तर्क पर तर्क मिलेंगे.... खैर।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

चीनी कम

अमिताभ बच्चन और तब्बू की फिल्म थी 'चीनी कम'। मैने देखी नहीं। फिल्म देखने का शौक नहीं है सो नहीं देखी। उसकी कहानी भी पता नहीं। किंतु देश में चल रही सरकारी फिल्म 'चीनी कम' से जरूर दो चार हो रहा हूं। लगता है यह फिल्म ज्यादा लम्बी है। खत्म होने का नाम नहीं लेती। ऊपर से इसकी रील भी बढाई जा रही है। निर्माता देश की सरकार है तो निर्देशक हैं कृषि मंत्री शरद पवार। आपको बता दूं कि इस फिल्म के डायलाग गज़ब के हैं। शरद पवार खेमे के एक अखबार 'राष्ट्रवादी' में प्रकाशित हुए हैं- ' चीनी महंगी हो गई है तो चिल्लाते क्यों हो, चीनी कम खाओ, कम चीनी खाने से कोई मरता नहीं है।' है न जबरदस्त डायलाग। भारत की जनता खूब शक्कर खाती है। उसे इससे डायबटिज़ न हो जाये इसके लिये चिंतित है निर्देशक। फिल्म के साथ साथ मानवधर्म भी तो कुछ होता है। सरकार उपाय बताती है। अरहर की दाल महंगी है इसलिये पीली मटर की दाल खाओ। यानी आप दुआ कर सकते हो कि कहीं कपडे और अधिक महंगे न हो जाये वरना सरकार कहेगी नंगा घूमो। शायद इसकी नौबत पर भी सरकार का ध्यान है। वो सोच रही है कि फिल्म में आजकल अंग प्रदर्शन भी होता है, ग्लैमर भी तो होना चाहिये न। नहीं तो फिल्म चलेगी कैसे? निर्देशक का अखबार कहता है कि ''शक्कर के दाम यदि 10-15 रुपये बढते भी हैं तो इतनी हाय तौबा क्यों? एक परिवार का यदि चीनी के लिये प्रतिमाह का खर्च 90 से 100 रुपये बढ जाता है तो इससे क्या फर्क़ पडेगा? सौन्दर्य प्रसाधन का खर्च भी तो वहन किया जा रहा है।'' अब सोचने की जरूरत जनता की है। जनता सोचती बहुत है। सोचने का पैसा नहीं लगता है ना इसीलिये सरकार ने यह काम जनता को सौंप रखा है। जनता सोचती है कि- 'क्या एक परिवार महीने में एक किलो ही शक्कर खाता है?' मुझसे पूछें तो अनुमान लगा कर कह सकता हूं कि एक परिवार में चार-पांच किलो शक्कर की खपत तो होती ही होगी। राशन लेने जाता होता तो सही बता सकता था। किंतु अनुमान में कम से कम इतनी खपत तो होगी ही। कम सोचने में क्या बुराई? तो पांच किलो शक्कर कितने की हो गई? यदि 50 रुपये से जोडे तो 250 रुपये की। यह खर्च उनके लिये ठीक है जिनका पेट भरा रहता है या जो सवाल उठाने में शर्म नहीं करते। भला निर्देशक का अखबार शर्म क्यों करेगा? शर्म करे जनता। पर सवाल तो यह है कि एक सामान्य आदमी या वो जो दो रोटी की जुगाड में दिन रात एक करते हैं उनकी भूख का क्या? सवाल करने वालों को विश्वास है कि आदमी सिर्फ शक्कर खा कर पेट भर लेता है। अजी सौन्दर्य प्रसाधन तो दूर की बात है आज जीवनावश्यक वस्तुओं की हालत देख लीजिये। रसोई घर का बज़ट तीन गुना बढ चुका है। मैं जानता हूं आज से एक दशक पहले तक मैरे घर डेढ से दो हज़ार रुपये में महीनेभर का आवश्यक राशन आ जाता था, धीरे-धीरे वो अब बढ कर 6 से 7 हज़ार पहुंच गया है। गेहूं, चावल, दाल, तेल यहां तक कि सब्जियां भी अपने तेवर दिखा रही हैं। सरकारी फिल्म तर्क दे सकती है कि 'कम खाओ। ज्यादा खाने से मोटे हो जाते हैं।' किंतु कम खाने से? अरे भाई ज़ीरो फिगर का ज़माना जो है। आप कम खाओगे तो कैलोरिज़ कम होगी। हो सकता है कि कुपोषित हो जायें। और कुपोषित हो भी जायें तो यह इत्मिनान रखिये कि मरोगे नहीं। फिर भी यदि मर गये तो सरकार घोषणा कर सकती है कि यह भूख से नहीं बीमारी से मरा है। आखिर देश की इज्जत का भी तो प्रश्न है। अब बीमारी तो हर देश में है। भूखे हर देश में थोडी हैं। खैर, आपको बताता चलूं कि महंगाई के इस दौर में करीब 70 फीसदी आबादी की आय 20 रुपये प्रति दिन से भी कम है। सोचिये..सोचिये वो क्या खायें? कैसे रहें? नहीं सरकार नहीं सोचेगी। क्यों सोचेगी वो? वो इतना निम्नस्तर का नहीं सोचती। वो हमेशा बडा सोचती है। सटोरियों, मुनाफाखोरों, मिल मालिकों..आदि के बारे में। अरे भाई इनकी कौन चिंता करेगा, सरकार ही न। इनकी चिंता सरकारी काम है। जनता तो जी ही लेती है। उसके भाग्य में बदा है कि बेटों मरते मरते भी जियो।
बहरहाल, 'चीनी कम' मुद्दा गहराया हुआ है। मेरे पास जो जानकारी है उसके मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष 220 लाख टन शक्कर का उत्पादन होता है। इस साल देश में लगभग 240 लाख टन चीनी मौज़ूद है। आप पूछेंगे कि तब चीनी का दाम क्यों बढा? हां, गन्ने का उत्पादन घटा है न इसलिये। गन्ना उत्पादकों का संकट देखिये, दो साल पहले खबर थी कि गन्ना उत्पादक अपनी उपज की एवज में 120 रुपये प्रति क्विंटल की मांग कर रहे थे। मगर सरकार ने उनकी मांग नहीं मानी। लिहाज़ा गन्ना उत्पादकों ने उत्पादन में ढिलाई बरती। इस साल हम जो शक्कर खा रहे हैं वो पिछले साल की बनी हुई है। और यदि तमाम खर्च मिला लें तो यह शक्कर हमें 25 रुपये तक मिलनी चाहिये। नहीं मिल रही। वो तो 45 रुपये में मिलेगी।
देश 2009 में पर्याप्त चीनी भंडार से लबालब था। और तो और तब 48 लाख टन चीनी 12 रुपये के भाव से निर्यात भी की गई। जब लगा कि चीनी घटने वाली है तो सरकार ने 30 रुपये किलो की दर से चीनी आयात की कुल 50 लाख टन। यानी 12 के भाव में बेची और 30 में खरीदी। इसके लिये क्या आप सरकार को मूर्ख कहेंगे या उसकी पीठ थपथपायेंगे? आप भले ही न थपथपायें मगर जनता की पीठ पर महंगाई के कोडे अवश्य बरसते रहेंगे। जनता अभिश्प्त है। भले ही आप सोचें कि इस देश का प्रधानमंत्री खुद भी एक गम्भीर अर्थवेत्ता है और जिसे निपुण वित्तमंत्री प्रनब मुखर्ज़ी जैसा बुद्धिजीवी का साथ मिला हुआ है, उसके बावज़ूद यह हालत? भाई दरअसल, यह 'चीनी कम' फिल्म बडे सस्पेंस की है। इसमे पता नहीं चलता कि हीरो मरता है या विलन? हां दर्शक के जीवन की गारंटी नहीं। तो है न कमाल की फिल्म?

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

शुक्रिया जनसत्ता


जनसत्ता के 5 फरवरी के अंक में मेरी पोस्ट 'मुश्फिक़ की फिक़्र" प्रकाशित की गई। इसे जनसत्ता ने ब्लोग से ही उठाया। यह खुशी की बात है कि पत्रकारों मे अभी भी कुछ ऐसे लोग बचे हैं जो अच्छा लिखने का, लिखते रहने का हौसला देते हैं और रचनाओं की कद्र करते हैं। उन्हें धन्यवाद। शुक्रिया जनसत्ता।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

विडम्बना

गधों और घोडों के
खुरों के बीच
रौन्दी जा रही
प्रतिभा।

नोंच-नोंच उसे
खा रहे गिद्ध
आसमान
नाप रहे।

सिसकियां भी
चाटे जा रहे
रात के अन्धेरे में
चमगादड।

खरगोश सा कोमल
मुलायम मांस वाला
ईमान,
कब तक कहां-कहां
फुदकेगा?

आखिर सीधे खडे
कान पकड के उसे
भून दिया जायेगा
सरकारी भट्टी में।

बचना है
या कोई सम्मान
पाना है तो
कुत्ते की दुम की
तरह टेढे हो जाओ,
या अवसर जान
उसे दबा लो
या फिर
हिलाओ
कुं कुं करते।

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

'मुश्फिक' की फिक्र

जी हां, गज़ल को लेकर पत्र-पत्रिकायें थोडी कंज़ूस तो रहती हैं किंतु गज़ल निर्बाध रूप से बह रही हैं, इसे भी स्वीकार किया जाना चाहिये। मुझे लगता है कि गज़ल को अपनी दिशा का भान है। उसके अपने दीवाने हैं। वर्ग विशेष होने का यह फायदा भी है कि उसके रूप, रंग, उसकी रवानी, फसाहत और कायदे पर अभी तक किसी प्रकार की ज्यादती नहीं हुई है, और विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि उसके मुस्तकबिल पर कभी कोई आंच नहीं आने वाली। बहरहाल, आज मैं आपका एक ऐसे शायर से परिचय करा रहा हूं जिनके बारे में आज की गज़ल प्रेमी पीढी शायद न जानती हो। जिन्होने रिवायती और क्लासिकी शायरी से हटकर समाज और मुल्की हालात को अपने मखसूस अन्दाज़ में पेश किया, जिनकी शायरी सेहतमन्द और संज़ीदा अदब से हमेशा लबरेज़ रही। जनाब मुस्तफा हुसैन 'मुश्फिक'। रायगढ (छत्तीसगढ) के गांजा चौक का एक जानापहचाना नाम। अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों, आकाशवाणी आदि मंचों की रौनक। हिन्दी, ऊर्दू और छत्तीसगढी में समान गति से लिखने वाले शायर, गीतकार और कवि। गज़ल क्षेत्र की यह बहुत बडी क्षति है कि मुश्फिक साहब इस दुनिया में नहीं हैं। महज़ चौथी तक की शिक्षा और जीवनयापन के लिये टेलरिंग का व्यवसाय। ताउम्र गुरबत के साये में रहे, और शायद यही वजह रही कि उनके अनुभव ने जीवन को कलाम में बान्धकर कागज़ पर हूबहू उतार दिया। उन्हें कभी गोपालदास नीरज की बगल मिली तो कभी रूपनारायण त्रिपाठी, मुकुटबिहारी सरोज जैसे उम्दा फनकारों के बीच बैठ कर शायरी करने का मौका। यानी आप जान ही गये होंगे कि डिग्रियां हासिल कर लेने वाला ही पढा-लिखा नहीं माना जा सकता, बल्कि कबीर जैसे अनेक लोग भी साहित्य के पुरोधा हैं, उनमें से मैं मुश्फिक को भी एक मानता हूं। पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहने वाले मुश्फिक के लिये गज़ल पर कोई किताब टेडी खीर ही थी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान में 26 दिसम्बर 1959 को पहली रचना प्रकाशित हुई थी, इसके बाद रचनाये छपती रहीं, गज़ले वे कहते, सुनाते रहे मगर उन्हें किताबी शक़्ल कभी नहीं दे पाये। चार दशक बाद यह सब भी हुआ। 1 मई 1998 को "मेरी फिक़्र शायरी" के नाम से उनका कलाम किताबी शक़्ल में शाये हुआ। इसके दो वर्ष पूर्व मेरे विवाह के अवसर पर वे भी शामिल हुए थे। मुझे नहीं पता था कि वो अंतिम मुलाकात होगी। खैर, उनकी किताब और स्मृतियां मौज़ूद हैं।
जनाब मुश्फिक़ ने जैसी जिंदगी देखी उसे ठीक वैसे ही उतार दिया। मुझे लगता है कि आदमी मुख्तालिफ परेशानियों की गिरफ्त के बावज़ूद, अपनी जीने की ललक नहीं छोडता, वो मुसीबतों से दो चार होता है और हंसने की पुरजोर कोशिशे करता रहता है, मुश्फिक कहते हैं कि-

" इस गरानी में भी, नातवानी में भी
लोग जिन्दा हैं, जिन्दादिली देखिये।"

गज़लों में यह खासियत तो सनी हुई है कि वो जीवन के करीब, बिल्कुल सट कर चलती है। खैर, मुश्फिक ने उम्र के करीब छह दशक बाद जब थोडी राहत महसूस की ही थी जहां वो कह सके कि-
" कितने मलाल हमको जमाने से मिले हैं
अब जाके लोग ठीक ठीकाने से मिले हैं।"

कि सांसों ने उनका साथ छोड दिया। बहरहाल, आज उनकी वो गज़ल जो मुझे ज्यादा पसन्द है आप तक पहुंचा रहा हूं, शायद मेरी ही तरह आपको भी पसन्द आयें?


इंसा भी मसीयत का अनमोल खिलौना है
हर खेल का आखिर है और खेल भी होना है।

फितरत का करिश्मा है जादू है ना होना है
सोना कभी मिट्टी है मिट्टी कभी सोना है।

जो दिल पे गुजरती है नग्मों में पिरोना है
पत्थर के कलेजे को हंसना है न रोना है।

गुजरी हैं कई सुबहें हर शाम गुजरती है
हम खानाबदोशों का तकिया न बिछौना है।

वीराना ही अच्छा है बदकार इमारत से
सुख चैन की नींदे हैं और ख्वाब सलोना है।

जिसने निबाह दी है हर गर्दिशे दौरां से
उस सच को ढूंढना भी अपनों ही को खोना है।

मुद्दत से ये हसरत है हो ताबे नज़र 'मुश्फिक'
फिर उसके नज़ारों से हो जाये जो होना है।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

"दिल्ली कितनी दूर"?

कल 26 जनवरी है। गणतंत्र दिवस। और इधर जब मैं कुछ पुरानी किताबें अपनी आदतानुसार टटोल रहा था तो मिले कविवर मधुर जी। जी हां, बलिया के श्री रामसिन्हासन सहाय 'मधुर'। इनसे हिन्दी साहित्य पढ्ने वाले परिचित होंगे। या मेरे जैसे कबाडी। खैर..मधुरजी की कविताये अनुभूति की भेदने वाली सच्चाई व उक्ति की वक्रता के लिये पढी जाती रही है। वर्ष 1920 का काल था जब मधुरजी ने रचनायें लिखना शुरू किया था। हालांकि ज्यादा रचनाये उन्होने नहीं लिखी किंतु जितनी भी लिखी या छपी उसमे देशकाल से लेकर जीवन के कई आयामों का चित्रण देखने को मिल जाता है, मुझे उनकी "दिल्ली कितनी दूर" नामक कविता आज पता नहीं क्यो प्रासंगिक लग रही है सो आप तक पहुंचा रहा हूं।

वह अंतिम बलिदान हमारा, इम्फल का मैदान हिला था
उत्तर का हिमवान हिला था, सारा हिन्दुस्तान हिला था।
रजकण में कितने सोये हैं सैनिक चकनाचूर
सपने में सिसकी लेते हैं, दिल्ली कितनी दूर।
सूम सनन चल री पुरवाई, सेनापति का नाम न पूछो,
कोहनूर की क्या कीमत है, आज़ादी का दाम न पूछो।
आज कंठ से कंठ मिलाओ, अमर शहीदों की जय बोलो,
लाट, किला, मीनारों वाली दिल्ली का दरवाजा खोलो।
भीम मांगता गदा, द्रोपदी मांग रही है चीर,
बापू, आज लुटा दो झोली, दो अर्जुन को तीर।
नील गगन कितना ऊंचा है, पुष्पक से फिर हम साधेंगे,
सागर में जलयान हमारे सप्तसिन्धु को फिर बान्धेंगे।
आज देश स्वाधीन हो गया, हम किसान-मजदूर-
दिल्ली में ही पूछ रहे हैं, "दिल्ली कितनी दूर"?

इसकी अंतिम पंक्तियां क्या आज की सच्चाई नहीं लगती? बस इन्हीं पंक़्तियों ने मुझे यह पोस्ट करने के लिये प्रेरित किया। साथ ही साथ गणतंत्र दिवस की शुभकामनाये भी देता चलूं।

सोमवार, 18 जनवरी 2010

मेरी प्रिय पुस्तक में से----

जब भी कभी खालीपन का अहसास हुआ, मुझे अपनी रुचिकर किताबों ने सम्भाला। जब भी कभी मन भारी होता है मैने हमेशा किताबों की शरण ली है। किताबें मुझे ज्यादा प्रियकर इसलिये भी लगती है कि उनमे स्वार्थ नहीं होता, उनमें छल नहीं होता, कपट नहीं होता, वे जैसी भी होती हैं पूरी की पूरी समर्पित होती हैं। उसके एक एक शब्द मानों जीवन की परतें खोलते हैं। मन की उदासी, खालीपन के भाव यूं रफुचक्कर होजाते हैं कि पता ही नहीं चलता। मैं फिर से तैयार हो जाता हूं। नये सिरे से अपने को संवारने लग जाता हूं। पिछले दिनो अपने पूज्य पिताजी के काव्यखंड "रागाकाश" को पढ रहा था तो मुझे लगा कि उसमें से कुछ रचनायें अपने आदरणीयजन, बन्धुओं व मित्रों के लिये भी पोस्ट करुं। "रागाकाश" पूरा एक जीवन है। तीन खन्डों में विभाजित है यह। पहला रागात्मा, दूसरा रागानुगा और तीसरा खंड रागापरा। मैं अक्सर पढता रहता हूं, और हमेशा ही मुझे लगता है और-और पढूं। आज आपके लिये इस पुस्तक के तीनों खंडों में से एक-एक रचना प्रेषित कर रहा हूं।

"रागात्मा" से-

अब न अन्धेरे से डर और न उजाले से
न कल्पना और न यथार्थ से
अब तो स्त्री से भी डर नहीं लगता।
अब-
आस्वाद और रस
या तो तृप्त हैं या अर्थहीन।
सारी भौतिक उत्तेजनायें और तनाव
जैसे एक आध्यात्मिक शांति में डूब गये हैं।
अतृप्त आकाक्षायें,
जीवन की विभीषिकायें
ऐश्वर्य-विलास
हार-जीत
सब जैसे
एक अनकह विराम में समाहित हो गये हैं।
सारे तीव्र-मध्दम काल-प्रवाह
जैसे एक शांत समुद्र में थिर हो गये हैं।
कुछ बान्धता नहीं अब
न घर, न बाहर,
न माया, न ममता
न वर्तमान, न भविष्य।
दिशा की भ्रांति हो यह
या पारिस्थितिक विवशता
पर,
सब कुछ जैसे एक निस्तब्धता में
विलीन हो गये हैं।
अब यह सोच
कि ' अब क्या होगा?'
कितना निरर्थक है।

"रागानुगा" से-

मैं दिखा,
लजा गई अरुणाई
ऐसी कुछ चमक
सद्य: धुले चेहरे पर आई
जैसे
मन्दिर के ओस-भीगे कलश से
सो के जगी ऊषा की,
पहली-पहली किरण टकराई॥

"रागापरा" से-

मत किनारे आओ
भंवर में रस लो
उसमें चक्कर जरूर है
पर गति वहीं है।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

मेरा प्रेम


उसे
न कभी देखा,
न मिला और
न ही जाना।

हां,
अपने आसपास
उसके होने का अहसास
हमेशा रहता है।

हवा संग वो
कभी शरीर से लिपटती है
तो कभी खुशबू बन
नथुनों से होकर
सीधे हृदय तक
जा उतरती है।

रोमांचित मन
मस्तिष्क में बैठ
उसकी आकृतियां
उकेरने लगता है।

और
जब इन आकृतियों को
कैनवास पर
उतारता हूं
तो चेहरा नहीं बनाता।

क्योंकि
प्रेम में
चेहरे की जरूरत
मुझे कभी
महसूस नहीं हुई।

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

नए साल का सूरज

चलिए मै भी
मना लेता हूँ,
या यूं कहू
मान लेता हूँ
इस नव वर्ष को|

वैसे तो
रोज़ ही
उगता है अलसाते हुए
और किसी
मजदूर की तरह
दिनभर थक कर चूर
शाम होते होते
ढह जाता है वो,
अब खुमारी में
डुबो को कहा दीखता है
नए साल का सूरज?

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

राजनीति का त्रिफला

सरकार सोई या बीमार नहीं है,
वो जाग रही है।
उसने तो
सत्ता, नोट और बाहुबल के
त्रिफला चूर्ण से
अपना हाजमा सुधार रखा है।
वो पचा लेती है
तिल-तिल कर मर रहे
भूखे लोगों का दर्द।
वो देखती है
बिल्कुल करीब से
महंगाई के इस दौर में
गरीब का आटा गिला होते।
आंकडे एकत्र करती है
और
संसद में पेश करती है कि
आज कितने किसानों ने
खुद्कुशी की।
वो अनुसन्धान में रत है
कि आखिर
बेरोजगारी से कितने परिवार
तबाह होते हैं या
कितने युवा काम की तलाश में
उसके किसी मोर्चे में,
किसी आन्दोलन में
चन्द पैसों के लिये
मर भी सकते हैं।
वो अध्ययन करती है
कि ऐसे कौनसे मुद्दे हो सकते हैं
जो प्रजा के मर्म पर
प्रहार कर नाजुक भावनाओं को
तहस-नहस कर सके।
वो परखती है कि
महंगाई के बावज़ूद
आम आदमी
कैसे जिन्दा रह लेता है?
वो अपने साथ
अपने परिजनों को भी
मुफ्त हवाई यात्रा करा कर
देश में फैली अस्थिरता के
दर्शन कराती है।
सच में
सरकार सोई नहीं है।
उसे चिंता है देश की।
सोई तो प्रजा है
जिसे कुछ भान भी नहीं कि
देश चलता कैसे है?
धन स्वीस बैकों में पहुचता कैसे है?
कैसे नेता बनते ही
धनवान बना जा सकता है?
और कैसे
आदमी को उल्लू
बनाया जाता है?
उसने बडी लगन से
वैज्ञानिक अविष्कार किया है कि
हवा के ज्यादा दबाव में
कैसे विकल्पहीनता
पैदा की जा सकती है?
सचमुच
राजनीति का त्रिफला
बहुत् फलता है।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

कुपोषण

रीढ से चिपके
पिचके पेट लिये,
कंकाल हो गये
चमडी चढे शरीर वाले
इन बच्चों की
आंखों के आंसू भी
सूख कर
गीजड बन चुके हैं,
जिन पर भिनभिनाती
मक्खियों को तो उनका
भोजन मिल जाता है
किंतु
भूख की आग में
दहन हो रहे
इन नन्हे भविष्यों को
एक दाना तक
मुहाल नहीं है।
इन्हें मिलता है
अनाज़ की जगह आश्वासन,
पानी की जगह प्यास
और
कभी न पूरी हो पाने वाली
कमबख्त आस
कि
21 वीं सदी का भारत
उन्हे मुक्त कर देगा
कुपोषण से।

मगर धन्य है
इस कुपोषण का भी
शोषण जारी है।

ये जन्मे ही शायद इसीलिये हैं।
क्योंकि
इन्हीं की बदौलत
लच्छेदार भाषणों में
उलझा कर
जिन्दा रह सकते हैं नेता,

इनकी तस्वीरें निकाल
दुनियाभर में प्रसारित कर
पा सकता है
कोई फोटोग्राफर पुरस्कार।

इनकी दुर्दशा का
ब्योरा लिख
मर्म को हिला कर
बेस्ट रिपोर्टिंग का हक़दार
बन सकता है पत्रकार।

दुसरी ओर
हमारी सरकार...
फिक़्रमन्द है।

खबर है
कसाब पर करोडों खर्च
अफज़ल को शाही बिरयानी.......।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

विरह

अमूमन
प्रेम की समिधायें
विरह के अग्निकुंड में
अर्पित होते देखी हैं।

सदियां बीत गई
कभी किसी अग्निदेव को
प्रकट होते नहीं देखा,
न ही देखा
प्रेम का यौवन लौटते हुए,
न उसे किसी वरदान से
दमकते हुए।

हां, देखा तो बस
'स्वाहा' का उच्चारण करते हुए
निच्छल हृदयों को
'स्वाहा' होते हुए।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

कांक्रीट क्रांति

यादों ने जहां जन्म लिया
वह तीर्थ स्थल
कांक्रीट क्रांति में
शहीद हो चुका है।
किंतु मस्तिष्क के
किसी
कोने में
धुन्धलाती सी
तस्वीर है,
जिसे मैं चाह कर भी
कागज़ पर नहीं
उकेर सकता।

कैसे उकेरुंगा?

क्या
कडकडाती
ठिठुरती वह रात,
शहर के बाहर की
सुनसान
अन्धेरे में डूबी
काली स्याह सडक
पर उसका मिलना,
धडकते दिल की
आवाज़ का
लगभग सर्द हो चुकी
नासिका से निकलती
गर्म सांस के साथ
मिलकर व्यक्त होना
किसी कागज़ पर
चित्र रूप में
छ्प सकता है?

क्या
सन्नाटे में खोई
सडक पर
अंजानी मंज़िल की ओर
दौडती मेरी
एलएमएल टी 5
स्कूटर पर
किसी अलाव का अहसास
देता उसका साथ,
रेखांकन हो
ड्रांइंग बुक में
समा सकता है?

क्या
सडक के आसपास बने
डरावने लगते
खेत की अनजानी सी
पगडंडी पर
स्कूटर घुसा देना
और किसी
सूखी नहर के बीच
जाकर उस बर्फ सी
रात में
प्रेम का इज़हार करने
पथरीली जगह ढूंढ्ना
कोई पेंसिल की नोंक
व्यक्त कर सकती है?

क्या
रात में दिखाई दे रहे
वे सारे काले
भयावह पेड
जो किसी भूत की
आकृति का
आभास देते हैं
और जिनसे
डर कर मेरे
अन्दर समाने की
उसकी बाल-चंचल चेष्ठा,
या
कहीं दूर
किसी गांव से आ रही
हवा के साथ
हिलौरे खाती
तूतक तूतक तूतिया......जैसे
फिल्मी गीत की
आवाज़ का
उस क्षण को
रसीला बना देने के बावज़ूद
सर्द रात से बचने
न सोने, सुबह जल्दी होने
जैसी उस अज़ीब सी
बैचेनभरी स्थिति को
कौन चित्रकार
तूलिका दे सकता है?

क्या
सूरज के जागते ही
ठंड से
जम चुके दो शरीर का
हडबडा के उठना
और यह पाना कि
हम कहां, किधर, कैसे
इस अज्ञात स्थान पर
आ बैठे,
और बस अब जल्दी
भाग चलो
जैसी मानसिकता में
प्रेम का ना तो कोई
इजहार कर पाना
ना ही कोई बात करना
बस मुस्कुरा कर
रह जाना
कभी पोट्रेट की
शक़्ल ले सकता है?

नहीं, बिल्कुल नहीं
वो तो ह्रुदय की
शीराओं में समा सकता है
या फिर
शरीर के तंतुओं
नसों में दौड
लगा सकता है।
ज्यादा है तो उस
स्थान पर ले
जा सकता है जहां
सुनहरी याद का जन्म हुआ था।
पर हाय रे विकास का दौर
मेरी ऐसी कितनी ही
यादों को लील गया।
खेत-खलीहान
गांव के गांव को
उजाड गया।
उसने वो पावन
बयार को भी
अपने वातानुकूलित यंत्र में
कैद कर लिया जो
बह कर नव-सृजन
किया करती थी,
हमें पवित्र
बनाया करती थी
आज सबकुछ नष्ट हो गया
पश्चीम का दानव
पूर्व की इज्जत को
हडप गया।
और मेरा तीर्थ स्थल
कांक्रीट क्रांति में
शहीद हो गया।

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

'कीबोर्ड के खटरागी' से मुलाकात


आज का ही तो दिन था, कुर्ला रेलवे स्टेशन के बाहर 'नुक्कड' पर जब 'कीबोर्ड के खटरागी' से मुलाकात हुई तो यकीन मानिये ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार किसी व्यक्ति से मिल रहा हूं। सूचना क्रांति के इस दौर की तारीफ तो करनी ही होगी कि उसने बगैर मिले लोगों को आपस में मिला दिया है। दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है। औसतन कद-काठी, गले में टंगा चश्मा, कमर में बान्ध रखा बैग, अपनत्व की मुस्कान और मिलनसार व्यक्तित्व की ऊर्जा लिये दमकता चेहरा मेरी आंखों में आज भी कैद है। कैद है कानों में खनकती स्नेहिल आवाज़ और मिलते ही प्रस्फुटित हुए शब्द ' जैसा फोटो में दिखते हो वैसे ही लगते हो', कुछ देर तो मुझे लगा कि सचमुच फोटो और प्रत्यक्ष दिखने में बहुत अंतर होता है। अमूमन तस्वीरें हक़ीक़त बयान नहीं करती, किंतु मुझे अच्छा लगा कि मेरी तस्वीर हक़ीक़त में भी मेरी ही है। खैर.. 'तेताले' से बाहर निकल मुम्बई आए इस इंसान से मैं मिलने का इच्छुक तो था ही, इसके पीछे मुख्य कारण यह भी था कि इनकी रचनाधर्मिता के साथ- साथ 'पिताजी' नामक ब्लोग से ये अंतर्मन की जो भावनाये प्रसारित करते रहे हैं वो दिल को छूने वाली रही हैं। मैने जब ब्लोग की शुरुआत की थी तो यकीनन यह कतई नहीं सोचा था कि लोग जुडेंगे जो मित्र भी, आदरणीय भी बनते जायेंगे। ठीक है, फोन पर या चेट पर या फिर ब्लोग के माध्यम से ही जुडना होगा, किंतु प्रत्यक्ष भेंट के बारे में सोचना अपने बहुत कम प्रतिशत के साथ मस्तिष्क में था। दरअसल, होता यह है कि साहित्य के इस दौर में या यूं कहें बौद्धिक बाज़ार में लोगों का मन मस्तिष्क पता नहीं किस 'ईगो' से घिरा होता है जो बडे छोटे जैसे मनोभाव से पीडित रहते हैं और भेद कर मिलन जैसी आनन्द की अनुभूति से दूर रह जाते हैं। इस तथ्य को भी उनके आने-मिलने और बाद में 'ब्लोगर्स मीट' के सफल आयोजन ने तोड दिया। ब्लोग और ब्लोगर्स सचमुच अनोखे हैं। मुझे उनके मिलने और मिलते रह कर सबको जोडने की यह फितरत अप्रत्याक्षित तौर पर एक ऐसी मुहिम लगी जो अब तक 'ब्लोग वाणी' या 'चिट्ठा चर्चा' जैसे मंच निभाते आ रहे हैं। मगर ये मंच तो ब्लोग्स को एक सूत्र में पिरो रहे हैं, इससे दो कदम आगे इस व्यक्ति ने भौतिक, मानसिक रूप से सेतु बनने का जिम्मा उठाया और ब्लोग्स के साथ साथ ब्लोगर्स को एक धागे में बुनने का कार्य प्रारम्भ किया। मानो फाह्यान का आधुनिक अवतार हो या व्हेन सांग की आत्मा ने इस युग में पुनर्जन्म ले लिया हो, जो न केवल लोगों को जोड रहा है बल्कि मित्रता की नई दिशाएं तैयार कर उसका बखूबी चित्रण भी कर रहा है। दिलचस्प यह कि इसका कोई दम्भ भी नहीं। बस एक मुहिम और मिलते जा रहे ब्लोगर्स का रैला। हंसता हुआ, हाथ मिलाता हुआ यह 'कीबोर्ड का खटरागी' सचमुच एक नई दुनिया बना रहा है। इस दुनिया के बाशिन्दे बनने और बने रहने की अज़ीब सी खुशी है मुझे। यह खुशी ' अविनाशी' है। इच्छा है यह खुशी बिखरती रहे, ब्लोगजगत में महकती रहे। हम सब आपस में कभी न कभी मिलते-जुलते रहें, फुनियाते रहें, चेटियाते रहे, बतियाते रहें, लिखते रहे और पढते रहें, बुद्धि और स्नेह से मिलकर बन रही चाश्नी से नहाते रहे, साहित्य को अपने अंतरतम तक महसूस करते रहें।
हां, यह सच है कि हमारी मुलाकात 5 दिसम्बर को हुई थी, वह भी दोपहर 2 बजकर 10 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 5 मिनट तक। आज 12 दिसम्बर है। इतने दिनों बाद मुलाकात के सन्दर्भ में पोस्ट डालने का एक कारण भी था। मैं चाहता था अविनाश वाचस्पति सकुशल अपनी यात्रा सम्पन्न कर लें. इस यात्रा के दौरान होने वाले घटनाक्रम भी सकुशल सम्पन्न हों, परिणाम बेहद सुखद रूप से सामने आये, मिलनेवाले तमाम साथी अपनी अपनी रिपोर्ट पोस्ट कर दें और सबकुछ हुआ भी ऐसा ही। अबसे ऐसा ही होता रहे। आमीन।

शनिवार, 28 नवंबर 2009

सुशीलजी की 'अमिताभ यात्रा"


यह भी अज़ीब संयोग है कि कानपुर में भारतीय क्रिकेट टीम ने अपनी 100 वीं टेस्ट जीत अर्जित की और मैने ब्लोग पिच पर अपनी 100 वीं रचना। हालांकि टीम इंडिया ने 1932-33 से अपने टेस्ट जीवन की शुरुआत की थी और 1952 में पहली जीत हासिल की थी। मैं 2008 में ब्लोग पिच पर उतरा था और अक्टूबर को पहली रचना पोस्ट की थी। भारत की 432 वें टेस्ट मैच में 100 वीं जीत है और मेरी करीब 400 दिनों में 100 वीं रचना। है न अज़ीब संयोग। खैर..।
जीवन में घटनाये होना अवश्यंभावी है। प्रकृति घटनाओं में समाई होती है। घटनायें घटित होने के बाद ही हमें ज्ञात होता है कि कुछ हुआ है। यह प्रकृति का गुण है, और शायद इसीलिये प्रकृति को रहस्यमयी माना जाता है। किंतु जो भी घटनायें घटनी होती है उसके घटने का क्रम न जाने कब से प्रारंभ हो चुका होता है। अज्ञात ही सही मगर एक एक तिनके जुडने लगते हैं। काल उसे बुनने लगता है। क्रमानुसार उसके छोटे से छोटे अंश आपस में टकराने लगते हैं और एक विशेष दिन को उद्घाटित करने के लिये पूरा का पूरा प्राकृतिक तंत्र जुट जाता है। कहते हैं इस प्रकृति में जो भी घटता है उसका कोई न कोई अर्थ अवश्य होता है। निरर्थक कुछ नहीं करती प्रकृति। शायद यही वजह है कि सुशील छौक्कर जी और अमिताभ श्रीवास्तव की प्रत्यक्ष भेंट के लिये प्रकृति ने अपना काम बहुत पहले से शुरू कर दिया होगा। ब्लोग की दुनिया से भी पहले। मिलने के लिये कब कब और कौन कौन सी जरुरते होनी है स्वतह ही निर्मित होती चली गई होंगी , हमारे अनजाने ही। दुनिया बहुत छोटी है। सैकडों लोग रोज़ टकराते हैं। किंतु किससे कब कैसे मुलाकात होनी है यह अज्ञात ही होता है और एकदिन जब मुलाकात हो जाती है तो आश्चर्य होता है। इसके बाद किसी दूसरी प्राकृतिक आवश्यकता की पूर्ति के लिये समय दिन बुनने लगता है। स्मृतियां भी बनती है और भविष्य भी निर्मित होता चला जाता है। कुछ जो कर्म होने है वो सम्पादित भी होते चले जाते हैं। हमे बगैर खबर हुए ही हमसे प्रकृति कार्य करवा लेती है। क्योंकि हम प्रकृति के हाथों में कैद हैं। उसके कर्मों के एक माध्यम हैं। उसके लिये कोई बडा या कोई छोटा नहीं होता। सब के सब सामान्य, उसके हाथों के खिलौने। फिर कैसे कहें कि हमने कोई बडा नहार मार लिया? या हम किस शान, किस अहम में जीते हैं? सबकुछ बेमानी। प्रेम ही एकमात्र ऐसा वाहक है जो ईश्वरीय शक़्ति का अहसास कराता है और इस प्रकृति मे तमाम प्राणी इस अद्भुत प्रेम शक़्ति से बन्धे होते हैं। अब यह समय के उपर है कि कब कौन किससे मिलता है?
सुशीलजी से मुलाकात हुई मुम्बई, कल्याण स्टेशन के प्लेट्फार्म नं-5 पर। पंजाब मेल का 24-25 घंटों का लम्बा सफर तय करते हुए 22 नवम्बर की सुबह करीब 7.30 बजे वे दिल्ली से अमिताभ तक आये। अमिताभ इसलिये कह रहा हूं कि वे सिर्फ और सिर्फ मेरे लिये मुम्बई आये थे। अन्यथा होता यह है कि मुम्बई आना होता है, यहां कोई रहता है तो चलो उनसे भी मिल लिया जाये जैसी मानसिकता होती है। हालांकि मिलने के लिये यह मानसिकता भी कोई बुरी नही किंतु सुशीलजी विशुद्ध रूप से मुझसे मिलने आये थे। लिहाज़ा प्रसन्नता को व्यक्त करने के लिये शब्द गुम हो जाते हैं। जहां निस्वार्थ प्रेम भाव होता है वहां किसी के प्रति कोई अन्देशा या भ्रम की स्थिति भी नहीं होती। लिहाज़ा हमारी मुलाकात में औपचारिक जैसी कोई चीज नहीं थी। उन्हे लोकल में तुरंत घुसाया। रविवार था वरना उन्हे 'घुसाया' ना कह कर 'ठूंसना' कहता। फिर भी भीड थी। मेरे घर तक पहुंचने के लिये कल्याण से 20 मिनिट तो लगते ही हैं। उनका यह पहला अनुभव था। 22-23 और 24 तीन दिन हम साथ रहे। और मज़ा देखिये कि मेरी छुट्टियां भी थी, अन्यथा मुम्बइया व्यस्तता में सुशीलजी को पूर्ण समय देना कठिन हो जाता। सुशीलजी ने यह सब पहले ही देखभाल लिया था। जिसका नतीज़ा रहा कि 'बस मज़ा आ गया।' खूब बतियाये, घूमे-फिरे। फोटो-सोटो खींचे। क्या इसे महज़ यह माना जाये कि हमारी मुलाकात के पीछे सिर्फ यही कारण होगा? नहीं, कोई भी मुलाकात सिर्फ मुलाकातभर नहीं होती। बल्कि जीवन के किसी भी दिन के उसके उपयोग के लिये कुछ न कुछ 'अच्छा' प्रकृति तय कर देती है। 'अच्छा' इसलिये कि प्रकृति में बुरा कुछ भी नहीं होता। जो भी बुरा होता है या जो हमे लगता है वो हमारे द्वारा ही किया जा रहा कुछ अप्राकृतिक कर्म है। अब इस 'अच्छे' के मनोभाव में ही सही एक रिश्ता तो बन जाता है। जो जीवन में सुनहरी यादों के इतिहास में अपना एक अलग अध्याय जोडता रहता है। बहलहाल, अज़ीब संयोग के इस सिलसिले में यह कितना बढिया रहा कि अपनी 100वीं पोस्ट सुशीलजी की "अमिताभ यात्रा" को समर्पित है।