मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

विडम्बना

गधों और घोडों के
खुरों के बीच
रौन्दी जा रही
प्रतिभा।

नोंच-नोंच उसे
खा रहे गिद्ध
आसमान
नाप रहे।

सिसकियां भी
चाटे जा रहे
रात के अन्धेरे में
चमगादड।

खरगोश सा कोमल
मुलायम मांस वाला
ईमान,
कब तक कहां-कहां
फुदकेगा?

आखिर सीधे खडे
कान पकड के उसे
भून दिया जायेगा
सरकारी भट्टी में।

बचना है
या कोई सम्मान
पाना है तो
कुत्ते की दुम की
तरह टेढे हो जाओ,
या अवसर जान
उसे दबा लो
या फिर
हिलाओ
कुं कुं करते।

16 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

इतना सच सच खरा खरा न बोलो भाई-डर लगता है.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

ईमान तो वही है , जो हर कसौटी पर खरा उतरे।

कडुवासच ने कहा…

.... छा गये ... बेहतरीन रचना !!!

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

बिलकुल सच लिख डाला आपने!!!NICE ONE!!!

विवेक रस्तोगी ने कहा…

सामयिक और हमेशा यही होता है।

Unknown ने कहा…

एकदम सच !
और सच को कहने का अंदाज़ उससे भी ज्यादा सच!
कब तक होता रहेगा ऐसा आखिर!

सुन्दर रचना !

Ravi Rajbhar ने कहा…

Are baap re shabdo ka ashar aisa jaise koi dande se maar raha ho..rachna ka koi jabab nahi.

Pushpendra Singh "Pushp" ने कहा…

अमिताभ जी
बहुत सुन्दर रचना
आपका आभार

शरद कोकास ने कहा…

आजकल सम्मान और पुरस्कार इसी तरह मिल रहे हैं ।

सुशील छौक्कर ने कहा…

एकदम खरी खरी कह दी जी आपने। वैसे इतना सच कहने वालो की दिनोदिन कमी होती जा रही है जी।

डिम्पल मल्होत्रा ने कहा…

प्रतिभा को बचाने के लिए शायद अवसरवादी ही बनना होगा नहीं तो नोच ली जायेगी

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

अमिताभ जी आदाब
आपके ब्लाग पर आया, तो एक साथ 3 पोस्ट पढ़ी
बहुत अच्छा लगा..अब आता रहूंगा
ये पंक्ति बहुत अच्छी लगी-
खरगोश सा कोमल
मुलायम मांस वाला
ईमान,कब तक कहां-कहां फुदकेगा?
बधाई

अपूर्व ने कहा…

सच मे..आजकल सच भी सूखा निगलने मे तकलीफ़ होती है..सो शब्दों के शहद की तलाश ही रहती है..मगर नींद कैसे खुले फिर...
बहुत जरूरी कविता!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

स्पष्ट ...... खरी और सीधी बात करना आपकी आदत है अमिताभ जी ......... और इस रचना में भी सीधा प्रहार किय है आपने कुसंगति की तरफ ............. बहुत प्रभावी और बेबाक रचना ..........

शोभना चौरे ने कहा…

कहते है १०० बार अगर झूठ को सच कहा जाय तो वह झूठ झूठ सच हो जाता है ऐसा मान लेते है |कितु सच को १०० बार भी सच ही कहते है तो भी वह सच अज्ञानियों कि समझ में नहीं आता ऐसा ही सच लिखा है आपने |और ऐसे अज्ञानी ही पुरस्कार देकर राजा बनते है और पुरस्कार लेने वाले मंत्री (प्रजा )?
यथा राजा तथा प्रजा ;

manu ने कहा…

खरगोश सा कोमल
मुलायम मांस वाला
ईमान,
कब तक कहां-कहां
फुदकेगा?...क्या उपमा दी है साहिब...

और ................

सीधे खड़े कान पकड़कर........ooooooffffffffffffff