जन्म के साथ
जिन्दगी की तरह
एक सीधी-सपाट डोर थमाई थी "उसने",
कहा था, इसके सहारे
इसीकी तरह तुम भी चलना।
अभी चलना शुरू किया ही था कि
रिश्ते-नातों की तमाम
गठानें बान्धनी भी शुरू कर दी।
जीवन को जीने, उसे मज़बूत बनाने के चक्कर में
कितनी गांठे बान्ध ली..।
और जब मुड कर देखा तो
उन्हीं गांठों में फंसे, तडपते से हम दिखे।
और तो और
गांठों की वजह से
वो सीधी-सपाट, लम्बी सी डोर भी
छोटी हो गई, बिल्कुल जिन्दगी की तरह।
अब गठान खुलती नहीं,
खुलती भी है तो डोर में सलवटे हैं
वो सीधी रही नहीं,
सो इंसानी फितरत कि
काटने लगे हैं अब अपनी ही डोर
अपनी ही जिन्दगी की तरह।
उपर से यह वाहियात सोच कि
एक दिन
न रहेगा बांस
न बजेगी बांसुरी।
संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है…
1 हफ़्ते पहले
