सोमवार, 30 मार्च 2009

जैसे माँ का आँचल

तुम्हारा निर्मल स्नेह
मेरे तपते हुए जीवन को
बर्फ सी ठंडक देता है,
मै थोडा शांत होकर
अपने 'होने' के भाव को
महसूस करने लगता हूँ।
तुम्हारे शब्द सुमन
मेरे रेगिस्तानी पथ पर
मखमली गलीचे का
निर्माण करते है,
और दूर होने के बावजूद
लक्ष्य के करीब होने का
अहसास होने लगता है।
तुम्हारा दिया गया
अप्रत्यक्ष मान- सम्मान
इस भीड़ भरी
स्वार्थी दुनिया में
मस्तक को गर्व से
ऊंचा उठाने में
टेका देता है,
और दंभ से भरा
आकाश मेरे कदमो में
लिपटने लगता है।
एक सच कहू-
तुम्हारा व्यवहार
और तुम मेरे लिए
ठीक वैसी हो
जैसे माँ का आँचल।

शनिवार, 28 मार्च 2009

ह्रदय से धन्यवाद

अपने माता-पिता के पास था, इसलिए संसार से दूर था॥
आज ही लौटा हूँ, ब्लॉग देखा, अपने आदरणीय, प्रिय, मित्र, स्नेही, शुभचिंतक और कुछ नए पाठको ने अपना स्नेह बनाये रखा है, जो मेरे लिए सोभाग्य की बात है।
मै अपने ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ, और उम्मीद करता हूँ आप सबका स्नेह बना रहेगा। सुधीर, vijay kumaar, प्रवीण त्रिवेदी, sandhya guptaji , shyamkoriji, अनिल कान्तजी ,समीर सृज़नजी , ब्रजमोहन श्रीवास्तवजी ,कुमार धीरज, हेम पांडेजी, विनीता यशस्वी ,रंजनाजी, आदि सभी का आभारी हूँ जो आपने समय निकाल कर मेरी रचना पढ़ी और अपनी टिप्पणिया दी।
विशेषरूप से गौतम राज ऋषिजी , दिगंबर नासवाजी का ब्लॉग पर आना मेरे लिए हमेशा से ही सुखद अनुभूति रही है। और हां प्रिय काजल का मेरे शब्दों के संग सफ़र अलग ही अहसास दिलाता है। सबका आत्मीय आभार। आप सबका प्रेम बना रहे यही कामना है।

बुधवार, 4 मार्च 2009

मै सुख चुरा लाया हूँ

जिन्हें प्रतीक्षा रहती है मेरे शब्दों की, उन्हें समर्पित -

" बडी मुश्किल से
दुःख को सुला आया हूँ,
तुम्हारे लिए
कुछ सुख चुरा लाया हूँ।

ग़मगीन रात में
चांदनी बिखेरता ये चाँद क्यो हंस रहा है?
लो प्रिये , उसकी मुस्कुराहट उधार लाया हूँ।

तुम्हारे लिए कुछ सुख चुरा लाया हूँ।

यकीन करो मै
उम्रभर काँटों के बीच जूझता रहा,
आज एक गुलाब खिला लाया हूँ।

तुम्हारे लिए कुछ सुख चुरा लाया हूँ।

मुझे पता नही
प्रेम का इजहार कैसे होता है?
जो दिल में था वो उगल आया हूँ।

तुम्हारे लिए कुछ सुख चुरा लाया हूँ।

है हाथ तुम्हारे
पतवार मेरी मासूम जिन्दगी की ,
मै नाव बीच मझधार छोड़ आया हूँ।

तुम्हारे लिए कुछ सुख चुरा लाया हूँ
बड़ी मुश्किल से दुःख को सुला आया हूँ। "

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

पिता

पिता की कराहती आवाज़
हवा संग, ऊंचे पर्वतो
उबड़- खाबड़ रास्तो
खेत-खलिहानों, नदी -तालो
वृक्षों, उनके झुरमुटों के
बीच से होकर
इस महानगर की
भागती- दौड़ती
जिंदगी को चीरती
समय की
आपाधापी को फाडती
थकी -हारी
सीधे मेरे हृदय में
जा धंसती है औऱ
मैं लगभग बेसुध सा
तत्क्षण उनके पास
पहुंचने के लिए

अधीर हो उठता हूं
कि तभी

महानगरीय मकडी
अपने पूरे तामझाम के साथ
दायित्वों, कर्मो,
नौकरी - चाकरी
का तामसी, स्वार्थी
राक्षसी जाल बुनने
लगती है,
जिसमे फंस कर में
छुट्टिया लेने
छुट्टिया मिल जाने की
याचनामयी सोच
के संग तडपने लगता हूँ।
जाल और सोच के
इस युद्ध के मध्य
मस्तिष्क सुन्न हो जाता है।
गीता का सार
कुरान की आयते
या बाइबिल, गुरुवाणी की शिक्षाये
सब निष्फल हो कर
मेरी इस जंग में
हाथ मलते दिखती है।
समय जाता रहता है,
मेरी जरूरत,
मेरे होने का भाव
सब कुछ शून्य में कहीं
खो जाता है।
राक्षसी मकड जाल
कस जाता है,
महानगरी मकडी
मुझे लानत भेजती है
और अपने पुत्र होने पर
मुझे कोफ्त होती है।
ह्रदय में धंसी वो
आवाज़ भी कही
विलीन हो जाती है,
कि फोन आता है,
मैं ठीक हूँ
तुम परेशान मत होना
मेरे बेटे।
............................
काश
हर पिता के
साथ उसका बेटा
आजीवन रह सके,
ऐसा कोई
ईश्वरीय वरदान
प्राप्त हो सकता है क्या?

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

प्रेम

इन दिनों कुछ ज्यादा व्यस्तता है, किंतु मस्तिष्क में विचार घुमड़ते जा रहे है। उनकी कुलबुलाहट बढ़ गई है। इस कुलबुलाहट को मुझे शब्दों में परिवर्तित करना ही था, सोच रहा था फ्री होकर प्रेषित करूंगा किंतु फ्री होना फिलहाल शायद नसीब में नही। सो जैसा भी बना अपनी कुलबुलाहट को पेश कर रहा हूँ। त्रुटिया अवश्य है। आप बताएँगे तो अच्छा रहेगा॥


" तपता जितना सोना
उतना निखरता है,
उम्र के बंधन में
प्रेम कब बंधता है।
हवा संग झूमता है
लहरों पे मचलता है ,
टहनियों पे वृक्षों की
पत्तो संग झूलता है।
दुखो के नागफन पर
कृष्ण सा थिरकता है,
त्याग वेदी से निकले
हलाहल को पीता है।
अश्रु को सोख कर
चुपके वो रोता है,
ह्रदय के घावो को
छुपाकर हँसता है।
खिलता है कमल सा
अधरों पे सजता है,
शब्दों में ढल कर
रस काव्य वो रचता है।
प्रेम कब किस बंधन
में बंधता है। "

शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

शान्ति

संस्कारों से सींची
मेरी धरती पर
तुम्हारी पाश्चात्य सोच के
लाल गेहूं
नहीं बोए जाते।
यहां गोबर से लीपे
आँगन में फैली
सौंधी महक
पूरे शरीर को
पावन करती है।
तुम्हारे ऊंचे व मंहगे
परफ्यूम की तरह
शरीर में उत्तेजना व
मादकता का
संचार नहीं करती।
यहाँ गली- गली
खेत-खलिहानों में
कूदते - फांदते
धूल धूसरित बच्चे
वृक्षों की टहनियों पर
झूलते- लटकते
मस्ती भरी जिन्दगी
जीते है।
किसी एस्सेल वर्ल्ड के
कृतिम व यांत्रिक
झूलो में बैठ कर
भौतिक आनंद
में लिप्त क्षणभंगुर
उत्साह का अनुभव
नहीं करते।
हां, गंवार तो मैं हूं ही
मुझमें प्रेम का
वह भौतिक
रूप भी नहीं
जिसमे दैहिक योग
की अग्नि प्रज्ज्वलित होती है,
और जब शांत होती है तो
सिवाय दुःख के
हाथ कुछ नहीं लगता।
ऊंची- ऊंची अट्टालिकाओं के
मोह में फंस
चौंधियाती जिन्दगी में
जीने की जो ललक
तुममे है, शौक से जियो।
किन्तु हां,
जब इस शौक से उपजने वाला
'शोक' तुम्हे तंग
जिन्दगी का अहसास
कराये तो
वही ऊंची सी तुम्हारी छत
पर चढ़ कर चाँद को देखना
जो मेरे गाव के आसमान पर भी
चमकता है और
नदी- नहरों की लहरों पर
अठखेलिया
करती उसकी किरणे
मन को अद्भुत सी
शान्ति का अहसास कराती है।
ठीक मेरी भावनाओं की तरह
जिसे तुमने कभी तरजीह नहीं दिया।
शायद वो चाँद
तुम्हे कुछ शान्ति दे सके?

तुम देर न करो

" शक न करो
एतबार करो,
जिन्दगी की
नई शुरुआत करो।
दूर नहीं
मंजिले इश्क की,
फासले दरमियान
थोड़े कम करो।
तन्हाई में
डूबा मंज़र है,
आकर इसे
आबाद करो।
आंसुओ से
झुकती नहीं दुनिया,
जंग कर इसपे
राज़ करो।
आ जाओ अब
छोड़ के सबको,
खडा हूँ इन्तजार में
तुम देर न करो। "

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

इश्तहार

आज मेरे मित्र की कविता आप सब के लिए। देवास मध्यप्रदेश के है मेरे मित्र सुधीर महाजन, जो कामर्स के प्रोफेसर है किन्तु हिन्दी में काफी कुछ बेहतर लिखते है, मेल पर उन्होंने मुझे कविता भेजी जिसे चाहता हूँ अपने ब्लॉग पर लाकर आप सब की नज़र में लाना। कृपया नज़रे इनायत करे।

"शराफत जो
पसरती थी
आँगन में
दिखाई देती है
अब वो
इश्तहारों में,
बांग भौर की
मुर्गा देता नहीं,
क्यों अजान
सुनाई देती नहीं?
वेदों की
ऋचाओ में
खेरियत
तलाशते संत भी
कर बैठे
इश्तहार
कोई नई बात नहीं।"

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2009

इश्क ऐ ताक़त




" दिखता नही

खुदा , मगर

उसे सब जानते है,

शब्दों से जैसे

आपको हम

पहचानते है।


जरूरी नही

इश्क में

किसीका राज़ी होना,

नाम दिल में

सजाकर भी

लोग उम्र गुजारते है।


इबादत हमारी

सुनेगा वो एक दिन,

जो पाक- ऐ दिल से

उसे हम पुकारते है।


छोड़ दुनिया को

हमारे वास्ते

वो जरूर आयेंगे ,

इश्क -ऐ- ताक़त को

हमारी, हम

खूब जानते है। "

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

कभी- कभी

कभी - कभी
मस्तिष्क के
अतीत कोष से बहकर
मधुर स्मृतिया
ह्रदय के
खारेपन से जा मिलती है,
ओर किसी
लेमन जूस की तरह
जीवन की तपती
दोपहर में
ताजगी का
अहसास करा जाती है।
कभी - कभी
लगता है मानो
मेरे ही साथ
चलने वाली छाया भी
किसी साए का
हाथ थामे चल रही है,
ओर मे कुछ
ज्यादा देर तक
सूरज की तेज़
किरणों को सहन कर
चलता रहता हूँ।
कभी - कभी
मेरे अकेलेपन में
बर्फ सी ठंडी हवा
इन्द्रियों को बहलाकर
चुरा ले जाती है
ओर न जाने किस
ऊर्जा स्त्रोत में बहकर
में कुछ ज्यादा ही देर तक
अकेला बैठा रह जाता हूँ।
शायद ये वही
ह्रदय के खारेपन में
घुले लेमन जूस का कमाल है
जो मुझे
मेरी बिछड़ चुकी
यादो को ताज़ा कर
एकबार फिर
नया जीवन जीने को
प्रेरित कर रही है।
शायद
कभी -कभी
ऐसा हो जाता है।

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

प्रेम भोक्ताओ को दूर से राम राम

प्रेम भोक्ताओ को दूर से राम राम। दूर से इसलिए क्योकि आज उनका दिन है। उनके पास आने का मतलब है, या तो उनकी छिड़क खाओ या फिर उनकी जो उनके इस व्यवहार को अनुचित ठहराते है। इसलिए अच्छा है दूर से ही नमस्कार कर लो। प्रेम दिवस है आज। जी हां, वेलेंटाइन महाराज की स्मृति में। वेलेंटाइन भक्तो में एक रोमांचभरा उत्साह है। होना भी चाहिए, आखिर उन्हें प्रेम भोग जो करना है। आखिर उनके उपभोग के कारण कितनो का पेट भरता है। कोई करोडो में खेलता है तो कोई लाखो के वारे न्यारे करता है। बाज़ार बहुत प्रसन्न रहता है इस दिन। बाज़ार की महिमा ही तो है जो इन प्रेमभोक्ताओँ में नया संचार भरती है। यही संचार उन्हें वेलेंटाइन का प्रसाद प्राप्त कराता है। आखिर इम्पोर्टेड माल जो है। अब देशी में क्या मज़ा? देशी तो बहस के मुद्दे हो सकते है। उदाहरण की वस्तु हो सकते है। किसीने विरोध किया तो झट से कह दिया, इसमें बुराई क्या है जी, हमारे यंहा तो कृष्ण राधा भी रास लीला किया करते थे। अब उन्हें कोन बताये प्रेम की परिभाषा? या कृष्ण राधा का प्रेम? उन्हें कोन बताये प्रेम माने क्या? प्रेम यानी त्याग, अनुभूति, अहसास, समर्पण, ...ये आखिर क्या होते है? अरे प्रेम यानि होता है, मोज मस्ती, सुख....आदि आदि। इसलिए प्रेमभोक्ताओँ को दूर से राम राम। लगे रहो। पर में एक बात को लेकर परेशान हूँ, १४ फरवरी के बाद क्या? ये बेचारे क्या करेंगे? प्रेम दिवस तो ख़त्म हो जायेगा। जैसे नया साल आता है, जाता है, सालभर तो कोई नयासाल का ज़श्न तो नहीं मनाता ना। फिर प्रेमदिवस का भी कैसे मनाएंगे? यानी मेरी समझ में जो आ रहा है वो ये की प्रेम भाई सिर्फ एक दिन का होता है, तभी तो मैं कहू, ये इस दिन आलिंगनबद्ध क्यों होते है, एक दूसरे का हाथ थामे क्यों रहते है? चलो प्रेमभोक्ताओँ दूर से आपको राम राम। लगे रहो।
बाज़ार में बहुत सारी गिफ्ट आई है, तरह तरह की। पूरे सालभर थोडी रहती है ऐसी गिफ्ट ओर न ही ऐसा प्रेम। प्रेम तो उसे कहते है, जो गिफ्ट दे , ले।वैसे वेलेंटाइन महाराज जी का भी जवाब नहीं था। वेसे ये थे कौन भाई? होंगे तो कोई बड़े बाबा, क्योकि उनको लेकर देखिये कितना हो हंगामा चल रहा है। सब अपनी अपनी दुकाने लगाये बैठे है। कोई प्रेम कर रहा है, कोई प्रेम में बाधा बना फिर रहा है, किसी की राजनीति चल रही है, किसी का लेखन चल रहा है, कोई दोनों हाथो से लूट रहा है यानी कमा रहा है, तात्पर्य ये है कि इन महाराज जी ने सबको व्यस्त कर रखा है। पहुंचे हुए लगते है। उन्हें भी दूर से राम राम। तो प्रेम दिवस के भक्तो लगे रहो। खूब मज़ा लो, लुत्फ़ उठाओ। प्रेम तो इसीका नाम है। अपने लैला मजनू , सीरी फरहाद ....को भी वेलेंटाइन महाराज जी के दर्शन हो जाते तो शायद उन्हें पुण्य लग जाता। बदकिस्मत थे बेचारे। अरे प्रेमभोक्ताओँ की किस्मत देखो इम्पोर्टेड माल खरा होता है, ओर उन्हें वो मिल भी रहा है। लगे रहो भाई।
अफ़सोस बस इतना है, मेरे देश की मिटटी को भी मिलावटी करने का जो षडयंत्र रचा गया था वो सफल रहा है। पर नहीं हम जैसे षडयंत्र कहने ओर मानने वालो को क्या पता प्रेम क्या होता है? भाई हमने तो प्रेम किया नहीं है, हमारा नमस्कार पंहुचा देना उन वेलेंटाइन महाराज जी को॥ ओर आपको दूर से राम राम। मुबारक हो आज का दिन...कल क्या करोगे? अरे छोडो जाने दो..में भी क्या सोचने लग जाता हूँ।

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

वो भूमि बंज़र हो गई

बही हवा परिवर्तन की
और प्रीत मेरी खो गई,
मैं रह गया पूर्व दिशा में
वो पश्चिम की हो गई।
गाँव गाँव भटका निरर्थक
गली गली ढूंढा क्यों,
पागल मनवा जान न पाया
कि मीत सयानी हो गई।
बीज प्रेम के जहां बोए थे
आंसू से सींचा था जिनको
सुन ले ओ परदेसी अब
वो भूमि बंज़र हो गई ।
बही हवा परिवर्तन की
और प्रीत मेरी खो गई

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

अश्के खूं

यूं बदन से मोहब्बत क्या हुई
रूह पता नही कहां खो गई ।

अब लडाई है, झगडे है, आशिके- महजूं है
दो जिस्म एक जान की तक़रीर बदल गई ।

उतारा था खुदा ने हमें इश्क के वास्ते
हिज्र की आस्मां पर क्यों बदली छा गई ।

तूने न जाना हमारी असलियतों को जाना
खामोश रहकर आँखे अश्के खूं पी गई ।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

स्नेह आमंत्रण

शब्द मेरे
सेतु है
जिन पर
चलकर तुम
आ जाना,
कागज़ जैसे कोरे
दिल पर
गीत नया
तुम रच जाना
काली- काली
जैसे स्याही
बन के घटा
तुम छा जाना,
सूने पड़े इस
जीवन में
प्रेम रस
तुम बहा जाना।
चाहो तो
रहना सदा
चाहो तो
बस जाना,
जग ने खूब
सताया है
बस तुम
ना कभी
छल जाना॥

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

प्रेम

प्रेम सिर्फ
दो शरीर से
निकली तरंगो का
मिलन नहीं ,
न ही
स्त्री - पुरुष के
संबंधो का
खेल है।
प्रेम तो वह
ह्रदय की कम्पन
धारा से बहने वाली
पावन पवन है ,
जो
कृष्ण के अधरों पर
रखी बंशी के
छिद्रों से प्रस्फुटित होकर
राग रूप में
जीवन रस घोलती है।
प्रेम सिर्फ
शब्दों से बुना मकड़
जाल भी नहीं ,
न ही
मायावी जगत का
सौदाई ताल है।
प्रेम तो
वो ओस की बूँद है
जो सुबह की
नई कोपलों से
ढुलकता हुआ ,
सूर्य किरणों संग
बेहद मासूमियत से
चमकता है ।
जिसे धरा की
भींगी भींगी
द्रूप
ईश्वरीय चरनामृत
मान आचमन कर
वायु में प्राण तत्व
प्रवाहित करता है।
किन्तु विडम्बना है॥
आज कहा है प्रेम ?
आज है तो
सिर्फ एक वादा है
एक सौदा है।
मेने किया
तूने किया का
लेखा- जोखा है।
शायद
यही वजह है की
आज बिछोह है
दुःख है, संताप है ,
प्रेम नहीं सिर्फ एक
धधकता
उत्ताप है ।

अमृत

जिसके शीश
हाथ पिता का
और
माता की
आँचल छाया,
उसके जीवन
सागर- मंथन में
भाग सदेव
अमृत ही आया।

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

मै

मै उसे बहुत प्यार करता हूँ
मगर कह नहीं सकता,
क्योकि
मै जब यह कहता हूँ की
मै इमानदार नहीं हूँ, तब भी
मै इमानदार नहीं होता।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

१ बंधुआ, २ शून्य

१,
जो दर्द सहे है
जिन दर्दो को सहना है
हिसाब नहीं होता आदमी के पास।
सिवाय इसके की
ब्याज चड़ता जाता है
ओर आदमी समझ नहीं पाता
की
वो दर्दो का बंधुआ
कैसे बन गया?

२,
आदमी अधुरा है।
जन्म से लेकर मृत्यु तक,
कितनी बार जिया ओर कितनी बार मरा?
इसका कोई गणित नहीं।
हां गणित होता है,
धन का, समाज का, लोक का,
लाज का, कर्तव्यो का,
उसका- मेरा ....
मगर जीवन का नहीं,
यानी
टोटल में शून्य है।


रविवार, 1 फ़रवरी 2009

इन्तजार

जीवन में
यदि पाया तो
खोने से क्यों डरे?
हर चीज लौट कर
आती है
अगर सिर्फ
इन्तजार करे।

गुरुवार, 29 जनवरी 2009

हां में हूँ ना

उसकी कोमल उंगलियों ने

पहली बार

जब मेरे चेहरे को छुआ

मानो टटोलकर विश्वास किया

अपने पापा के होने का।

हां , में हूँ मेरी बेटी

तुम्हारा पापा।

गोद में उठा

कंधो पर बिठा

पीठ पर मुझे घोडा बना ,

उंगलियों को पकड़ कर

वो दोड़ती हुई

समय के रथ पर सवार होकर

अपने संसार में कब प्रवेश कर गई

मुझे नही पता चला,

में तो उसकी रुकावटों को,

आने वाली बाधाओं को

अपने जवान हाथो से

दूर करता हुआ

कब बूडा हो गया

नही पता।

अब

अपने कमजोर हाथो से

उसके चहरे को

टटोलता हूँ

और अहसास पाता हूँ

उसके होने का ,

'बेटी' है वो

इसलिए कहती है

हां में हूँ ना, मेरे पापा

तुम्हारे पास।

सोमवार, 26 जनवरी 2009

गणतंत्र दिवस पर

देश में आज ये कैसा मंज़र है
चारो तरफ रेगिस्तान ओर ज़मीं बंज़र है
दुश्मनों की बात तो छोडिये जनाब
दोस्तों के हाथो में भी अब खंज़र है।

सोचने में क्या बुराई है?

'आम' से 'ख़ास' होना
कोई बड़ी बात नहीं
'ख़ास' में 'आम' जैसे हो
एसा बड़ा कोई नहीं ।
अपनों के बीच से उठ कर
अपनों से अलग हो जाना,
अपना संसार रचने का
यह केवल भ्रम तो नहीं?
बड़े पदों का ये दिखावा
जमा भीड़ का झलावा
भाई खेल ये महज
कुर्सी का तो नहीं?
आग उगलता सूरज
भी अस्त होता है
पूनम के बाद क्या चाँद
अमावस में निकलता नहीं?
ओर जो भूल बैठा है
माता- पिता को अपने
क्या उसके बच्चे
कभी बड़े होते नहीं?
रह न जाता स्थिर कुछ
उम्र भी गुजरती है
जवान दिल भी क्या
बूडा होता नहीं?
छोड़ दे इतराना
क्या रखा है इसमें
ख़ाक में मिलना है
क्यों याद आता नहीं?

शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

आज मेरे 'राम' की बात

राम दोहे

राम नाम रटते रहो,rakh कर आत्मविश्वास
छोड़ दो उस पर अपनी, सारी जीवन आस॥
अपने नित्य कर्मो को, करो पूजा मान,
राम को समर्पित हो, सारे मान सम्मान॥
सुख दुःख के भंवर से , होना हो अगर पार,
राम नाम के जाप को, बनाओ अपनी पतवार॥
माया मोह के बंधन से मुक्त होना हो आज,
लेकर नाम राम का, बुलंद करो आवाज़॥
बही खातो में डूब कर, हुआ जीवन व्यर्थ
बिना राम के जाप से होना हे अनर्थ॥
राम राम बस राम हो, मेरे चारो ओर
कृपा करो, थाम लो मेरी जीवन डोर॥
जगत के झमेलों में क्यों उलझा रहता मन
सुलझा लो जीवन अपना करके राम आराधन॥
मे तो चाहू राम को, ओर ना चाहू कुछ,
एसा भाव बना ज्यो, मिल जाए सब कुछ॥
राम का सर पर हाथ हो, हो राम छत्र छाया,
फिर भला किस काम की ये सांसारिक माया॥
ह्रदय में राम रस निरंतर बहता रहे,
ओर मुख सिर्फ राम नाम कहता रहे॥
एसा विश्वास ठोस हो, तो बन जाए बात,
राम राम श्री राम राम जपते रहो दिन रात॥

बुधवार, 21 जनवरी 2009

सुप्त ज्वालामुखी



समय ओर समाज की

परतो में

दबा प्रेम

मज़बूरी की कार्बनयुक्त

काली चट्टानों

के बीच कराहता है।

किन्तु उसके

कराहने की आवाज़

प्रेम के फिर से प्रस्फुटित

होने के लिए

कोई सूराख

बना नहीं पाती।

आंसुओ का लावा

पिघल कर

अन्दर ही अन्दर

सूखता जाता है।

जम जाती है

स्मृतियों की गंधक।

जिम्मेदारिया दायित्व

ओर सांसारिक बन्धनों

के बीच खडा हुआ

ये पर्वत

अब कभी ज्वालामुखी नहीं

बन सकता ,

क्योकि

इसे सुप्त कर दिया गया है।

चुपचाप

इस जगत में सड़ने के लिए।

शनिवार, 17 जनवरी 2009

विजेता



''संघर्ष में तप कर


है जो निखरता


होता वही है


असली विजेता । ''

जो पंक्तिया मुझे अच्छी लगती है

''चलते चलते रास्ते में मिल गई
सुरा लिए शाम
अच्छा भाई सूरज , राम राम ..... ''
-------------------------

''अश्रु था हृदय में आँखों पर न आया
शब्द थे मन में , फडके न होठो पर''
----------निशीथ

रविवार, 11 जनवरी 2009

आज भी है



सर्द मौसम की
ठिठुरती रात में
गर्म सांसो के
अलाव का
वो अहसास
आज भी है।
सूरज की
तपन के बीच
मिलन की प्रतीक्षा
वेदी पर
श्रावण की बूँद की
आस
आज भी है।
जहा थामा
हाथ छुडा कर
दूर हुई थी तुम
वही जस का तस् है
पड़ा प्रेम विश्वास
आज भी है।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

फिजूल

फिजूल में
जुटे होते है हम
बैल की तरह ।
पूरी जिंदगी
इसका- उसका
तेरा- मेरा
करते रहते है ।
मन का हुआ
तो खुशी
न हुआ तो गम ...
ओर सबकुछ
टिका होता है
दूसरो के व्यवहारों से ॥
पाने- खोने की
लालसा में ।
बस...
फिजूल में ही.....

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

अफ़सोस

फ़िर अफ़सोस .....
वो न मेरा हुआ
कौन किसका हुआ
सब हुआ तो
पराया हुआ
पूरा , समग्र जीवन भी
कंहा अपना हुआ
हुआ तो मृत्यु का हुआ
ओंर .....वह भी
कंहा किसकी हुई
फ़िर जीवन हुआ.....

----------------
उलझन
हिसाब - किताब
कितना ,
गणित
ओंर समीकरण
बस उलझन
पूरा जीव

---------

वो

वो उसका
चुपके से आना
गली में मिलना
रोना- हँसना
बातें करना
वक़्त फे साथ
बिसर गया
बिसर गया
समग्र प्रेम संसार
सिमट गया
चार दीवारी में
समाज का पंछी बन
आजादी के अतीत को
याद करते हुए
पूरा जीवन
अब
पिंजरे में फडफडाते रहना
मिलने को तरसना
सिर्फ़ रोना
वक़्त के साथ
पसर गया

बुधवार, 7 जनवरी 2009

बिटिया



बिटिया मेरी

जीवन का शगुन है

जेसे कृष्ण की

बंशी से बजती धुन है

याद

माता पिता की याद आती है बिल्कुल बच्चो की तरह बच्चा तो हूँ ही बड़ा पद या प्रतिष्ठित व्यक्ति बन जाने पर आदमी बड़ा हो जाता है क्या? वो भी अपने माता पिता के लिए ? मेरी उम्र का अन्तर आज भी उतना ही है जब में पैदा हुआ था आज भी उनकी उंगलियों को पकड़ कर ही चलना होता है फर्क बस यह है की उंगलियों का मतलब बदल कर अनुभवों से हो गया है सच में खूब याद आती है

मेरी इस याद को लेकर कई है जो मुझे नादाँ समझते है कुछ तो हँसते भी है मगर उनके समझने न समझने से मुझे क्या? मुझे तो आज भी लगता है की पिता की सर पर छत्रछाया हो ओर माँ की गोद में सर हो , उनके हाथो की थपकियों से जो सुख रिसता है वो इस संसार के सुखो से भिन्न है एसा सुख जिसे पाने के लिए इश्वर भी लालायित रहता हे पैसा, ऐश्वर्य... क्या सुख असल में दे पाते है? सच तो ये है की ख़रीदा गया सुख भी कोई सुख होता है

आज बहुत याद आ रही है मन करता है भाग कर उनके पास चला जाऊ उनके आँचल में अपने आप को समां दू

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मंगलवार, 6 जनवरी 2009

माँ

माँ
थक गया हूँ मै
तेरी गोद जैसी जगह ,
उन थपकियों का अहसास
ओर कानो मै लोरी की वो मधुर ध्वनी
इस शहर मै नही मिलती
यंहा तो मेरी छोटी जिदो का भी कोई अस्तित्व नही
माँ ...............................

सोमवार, 5 जनवरी 2009

मंथन



" क्या होता है
जो सारे दूर हो जाते है ?
सुख जो अपने है
वो गुम हो जाते है
मंथन तो है ही जीवन
विष पीने वाले ही
शंकर हो जाते है "
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सम्बन्ध

संबंधो में संपर्क
की जरुरत क्या ?
गर जरुरत है तो
फ़िर सम्बन्ध क्या ?

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रविवार, 4 जनवरी 2009

खुदा


"क्यो अक्सर मोहब्बत
जुदा होती है ?
शायद इसीलिए
वो खुदा होती है "

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

रोटी

रोटी के टुकड़े के लिए
दौड़ता बच्चा
लड़खडा कर गिर जाता है
और
वह टुकडा
एक कुत्ता पा जाता है
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रोजगार

जिसके भरोसे पर
बूडे माँ बाप है
वह हर
दर भटकने के बावजूद
बे रोजगार रह जाता है
खूबसूरत सी महिला
जिसके लिए जीवन एक फैशन है
रोजगार उसे
मिल जाता है
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प्रेम
गर प्रेम में पाना होता
तो पा जाता
किंतु फ़िर
आंसुओ का
स्वाद कैसे मिल पाता

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

हां यही जिन्दगी हे

शून्य
शून्य ओर बस शून्य

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

पीड़ा

सागर के किनारे
उन पत्थरो की पीड़ा
कौन जाने ?
जो लहरों के थपेडो से
ठीक उसी तरह दो हाथ करते हे
जेसे गरीब
दो जून की रोटी के लिए