शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

समय

वो पहले था
क्योंकि समय परिवर्तित है 
अब भी वैसा ही हो या रहे सम्भव नहीं।
इसलिये 'था' से 'है' की तुलना करना 
और 'है' को 'था' बना देना उचित नहीं ।
इसे ही स्वीकारो
जो है ।
और जब जब
'है' को 'था' से जोडते हुये
किसी काम का न मानना स्मरणीय होता है
आप अपने आप को छल लेते हैं
क्योंकि तब आप 'है' के साथ अन्याय ही नहीं बल्कि उसकी हत्या कर देते हो ।

बुधवार, 14 जनवरी 2015

अब नही आती 
कोई चिट्ठी , 
कोई पत्री ..
न मेल, ....
आती है तो 
सिर्फ याद ...
कभी स्याही से कागज पर 
तो कभी आंखो से गालो पर ..

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

अभिमन्यु

वह गर्भ में नहीं सुन पाया कि  चक्रव्यूह को तोड़ते कैसे हैं , इसीलिये द्रोणाचार्य, कर्ण   सहित दुर्योधन  के वीर सैनिकों ने मिलकर उसे मार गिराया। अभिमन्यु मारा गया। ज़िंदा रहे उसके माता-पिता। 
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अच्छा बताओ हमारे बच्चे का नाम क्या होगा ?
अभिमन्यु। 
अरे वाह बहुत सुन्दर नाम है। 
यह तुम्हारे जैसा होगा , बुद्धिमान, तेजस्वी। 
हाँ, तुम पर भी तो जाएगा और इसीलिये हमारा अभिमन्यु बहुत सुन्दर और तेजस्वी होगा। 
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कल्पना भी शरीर में रोमांच भर देती है , शरीर इतना गुदगुदाता है कि उसकी सारी नसें प्रफुल्लित होकर खून को तेजी से दौड़ने के लिए रास्ता दे देती हैं। अभी उम्र क्या थी , कोई २१-२२ साल।  वो १८ या १९ वर्ष की होगी , प्रेम आहें भरने लगा था।  छुप छुप के मिलना-बातें करना उस शहर के हरेक प्रेमी के लिए मजबूरी था।  समाज संकीर्ण अवस्था में प्रेमियों पर नज़र रखता था , कब कोई मिले और कब उन्हें अलग कर दिया जाए। बावजूद फूल खिलते थे। वे भी खिलें , मिले और प्रेम को जीवन मिला। बात भविष्य की योजनाओं और कल्पनाओं तक जा पहुँची थी।  क्योंकि साथ रहने की जिद मस्तिष्क में कुलांचे भरने लगी थी।  दूर रह भी  नहीं सकते थे।  और समाज में रहकर साथ भी नहीं रह सकते। दुविधा , मुसीबतें और बावजूद इसके घड़ीभर मिल लेने की जद्दोजहद प्रेम को परिपक्व बना रहे थे। अभिमन्यु ने दोनों की कल्पनाओ के गर्भ में जन्म ले लिया था।   उसका विस्तार विवाह के बाद ही संभव था किन्तु उसके लिए योजनाएं मस्तिष्क के कोरे पन्नों पर लिखी जाने लगी थी। ये करेंगे, वो करेंगे , यहां पढ़ाएंगे , वहां ले जाएंगे , ऐसा होगा , वैसा होगा , तुम उसे ऐसा बनाना , तुम उसे ये मत करना , मैं उसे ऐसे रखूँगी जैसे सवाल बातों के दरमियान हल किये जाते थे और माता-पिता के होने का सुख कल्पनाओं में अनुभव कर प्रफुल्लित होते थे वे दोनों।  रोज ही। 
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सुनो , मुझे पापा अपने भाई के यहां भेजना चाहते हैं। 
कहाँ ?
बहुत दूर , यहां से तो बहुत दूर है , वहीं पढूंगी। 
क्यों ? क्या तुम इंकार नहीं कर सकती ?
नहीं , भाई ने भी मुझे अपने पास ही रखने को कहा है।  यहां अकेले बिगड़ जाना है इसलिए। 
अरे वाह ऐसे कैसे हो सकता है।  अगर तुम न चाहो तो कोई कैसे तुम्हें कहीं भेज सकता है। 
तुम नहीं समझोगे।  जाना ही होगा। 
मैं रहूँगा कैसे तुम्हारे बगैर ?
वो तो मेरा भी यही हाल होना  है मगर हमारे पास चारा क्या है। 
आखिर क्यों तुम्हें भेजना चाहते हैं ?
पता नहीं , शायद हमारे-तुम्हारे बारे में पता चल गया हो ? शायद इसलिए की मैं यहां रहकर बिगड़ रही हूँ। 
नहीं, तुम मना कर दो। 
कई बार किया मगर   …… . 
फिर हम ? … 
एक लम्बी चुप्पी , सिर्फ साँसे ही चल रही थी , दो देह मुर्दा बनी हुई थी।  दिमाग की नसों में विचारों के प्रवाह आपस में लड़ झगड़ रहे हो , कोई विकल्प नहीं सिवा इसके की वो जाए अपने भाई के पास और दूसरा यहीं रहकर इन्तजार करे समय का।  उस समय का जब वो अपने पैरों पर खड़ा होकर उसे लेने आ जाए। उस वक्त का जब समाज उसे स्वीकार करने में नाक भौंह न सिकुड़े। उस वक्त का जो सामान्य हो जाए , उस वक्त का जब भगवान दोनों को साथ रखे।  मनौतियां भी पूरी हों। उस समय का इन्तजार। 
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मेरे घरवाले नहीं चाहते कि तुमसे शादी हो।  चाचा -ताऊ , भाई-भाभी सब खिलाफ हैं इस रिश्ते के।  पत्रों के जरिये दोनों के बीच अब बातें होती थी । पत्रों के जरिये ही रिश्ता कायम था  और प्रेम आसमान में  लहरा रहा था ।  डाकिया किसी देवता की तरह पूज्य हो चला था ।  वो खाना-पीना छोड़ कर रोज ही डाकिये का इन्तजार करता।  मोहल्ले में प्रवेश के रास्ते पर ही डाकिये को पकड़ता और पूछता - कोई चिट्ठी है क्या ? डाकिया जानने लगा की वो किस चिट्ठी की बात करता है।  वो उसका दोस्त बन गया था  , दोस्त बना क्या उसने बना लिया था  क्योंकि उसकी कोई भी चिट्ठी घरवालों के हाथ नहीं लगनी चाहिए। इसके लिए वो चुराए तथा बचाये गए पैसों में से कुछ डाकिये को रिश्वत बतौर देता। कुछ के डाक टिकिट खरीदता और कुछ से कोई ग्रीटिंग वगैरह। पहले पहल खतों में प्रेम-मनुहारों की बातें थी मगर धीरे धीरे उदासियों-निराशाओं में बदलने लगे शब्द। क्योंकि उसके घरवाले ऐसी किसी शादी या सम्बन्ध के खिलाफ थे जो प्रेम से शुरू हो। 
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कितने पैसे हैं तुम्हारे पास उसने अपने एक मित्र से पूछा। 
ज्यादा नहीं और वहां तक जाने के लिए किराया बहुत है। 
तब कैसे होगा यार?
पता नहीं। 
ऐसा करते हैं मैं अपने एक दोस्त से उधार मांगकर देखता हूँ , दे दिए तो चले चलेंगे। 
कौन देगा उधार ? वो जो तुझसे ही पैसा लेते रहता है। 
तब ठीक है मैं कोई नौकरी करता हूँ। 
हाँ , ये बेहतर है , मगर फिर तेरी पढ़ाई?
जाने दे उसे भाड़ में , उससे मिलना बहुत जरूरी है। 
ओके।  मित्र ने उत्तर दिया। 
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कोई दो महीने गुजर गए , एक दिन वो अपने उसी मित्र से मिला और कहा किराया जितना पैसा हो गया है मगर लौटने का नहीं है।  मित्र ने कहा -तब ?
तू साथ दे तो चल सकते हैं , विदाउट टिकिट भी  सफर कर सकते हैं। 
दोनों ट्रेन से विदाउट टिकिट ही जा पहुंचे।  रास्ते में कुछ नहीं खाया-पीया क्योंकि पैसा था नहीं और अगर वो मिलती है तब कोई खर्च हुआ तो कैसे किया जाएगा , सोच लिए दोनों वहां पहुँच गए जहां वो थी। कोई १८ -१९ घंटों का सफर।  जेब में न पैसा न पहनने के लिए कोई कपड़ा।  कपडे भी दोनों ने चलते वक्त फुटपाथ से खरीद लिए थे सस्ते वाले ताकि पैसा जाया न हो। 
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''तो भाग चलें।  अभी नहीं भागेंगे तो कभी नहीं भाग सकेंगे। '' उसने बहुत रुआंसे मन से कहा। 
''पर यह तो गलत होगा और मैं तुम्हें शान से इज्जत से ले जाना चाहता हूँ।'' जवाब में यही था। 
इसी बात पर दोनों के बीच वैचारिक जंग होने लगी थी। वो अपने परिवार को छोड़ देना चाहती थी , मगर इसे यह चिंता थी कि  उसे भगाकर रखूंगा कहाँ और क्या खिलाऊंगा , उसके पास न अच्छी नौकरी है न पैसा है।  दिमाग में मंथन समुद्र के तूफ़ान सा उमड़ने लगा था। लहरें आसमान से  टकरा रही थी।  मजबूरियाँ पसरी हुई थी।  न वो गलत सोच रही थी न ये गलत सोच रहा था , क्योंकि दोनों दोनों के बारे में सोच रहे थे।  दोनों अपने भविष्य के लिए ही सोच रहे थे। 
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अच्छी नौकरी मिली तो शादी कर दी जाएगी।  इस आश्वासन ने उसे एक सुनहरा अवसर दे दिया था। जो उसकी भाभी की ओर से था। वह जानता था कि ये शर्त वह पूरी कर सकता है। दिन-रात पढ़ाई करके वह बड़ा अफसर बन सकता है और वह भी इन्हीं दो सालों में, जो दिया गया वक्त है।  लौट आया था मिलकर वह।  अब वह सिर्फ और सर्फ अपनी पढ़ाई में व्यस्त था।  उसे अपने प्रेम को जीतना था , उसे उसके अलावा दूसरा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।  वह परीक्षा की प्रारम्भिक सीधी भी चढ़ गया।  मुख्य परीक्षा   में भी उसे बेहतर अंक प्राप्त हुए , अब अंतिम पड़ाव था इंटरव्यू का।  इंटरव्यू में पास होने का मतलब था एक बड़ा पद और समाज में बेहतरीन मान-प्रतिष्ठा। उसने इस बीच एक घर किराए से लिया , उसे सजाया , उसे ऐसा किया कि  बस इधर नौकरी लगी और उधर वो उसे ले कर आ जाए ।  बस,  इसके पहले  वो एकबार मिलना चाहता था उससे।  पता चला पास के ही शहर में वो अपनी बहन के यहां है , वो पहुंचा।  पहुंचा -मिला और उसे पता चला कि  उसकी शादी तय कर दी है।  ये कैसे हो सकता है ?  आखिर क्यों ? उस शर्त का क्या ? उसे जवाब मिला -''पापा ने कह दिया है या तो मैं या वो। '' 
ये कैसी शर्त ? उसने कहा।  मगर चुप्पी ने घेर लिया था समय को। 
क्या ब्रह्माण्ड का कोई भी देवता , कोई भी अंश उसकी मनोदशा समझ सकता था वह उस वक्त कैसे यह सब सुन कर हतप्रभ सा खड़ा रह गया था, कौन जान सकता था उसे ? वह भी नहीं जो उससे अटूट प्रेम करती थी।  गोया  आसमान टूट कर उसके सर पर ही गिरा हो। जैसे दुनिया उससे अलग हो गयी हो, वह एकदम हाशिये पर खड़ा  हो गया हो , अकेला। .उसकी आँखों में जैसे आंसू बह बह कर निकलने को आतुर थे  किन्तु निकल ही नहीं रहे थे । कोई भी , कोई भी उसकी मनोदशा को समझने को तैयार नहीं था , वो भी नहीं जिसके लिए उसने जमीन-आसमान एक कर दिया था । निश्चित रूप से समाज जीत रहा था।  उसका प्रेम पराजित सा खड़ा था। वह अपने पैरों के नीचे से खिसक रही  जमीन को अच्छी तरह से अनुभव कर रहा था। 
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अकेला लौटा वह।  उस घर को तहस-नहस कर दिया जो उसने अपने हाथों से संवारा था।  आसपास के लोगों ने कहा शायद पागल हो गया है।  सचमुच पागल ही तो हो गया था , या अब तक पागल था , आज यथार्थ स्थिति में आया।  जो हो किन्तु उसने अपने सपनों के घर को पूरी तरह उजाड़ दिया। 
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हाँ, परिणामस्वरूप हुआ क्या ? यही न कि चक्रव्यूह में तो घुसा , बेहतर तरीके से लड़ा मगर समाज द्वारा बनाई गयी व्यूह रचना को तोड़ने का उसे ज्ञान नहीं था इसलिए मारा गया , सबने उसे मारा , एकसाथ मिलकर मारा , अभिमन्यु मारा गया।  अभिमन्यु अब सिर्फ स्मृतियों में  है।  उसकी ह्त्या कर दी गयी , वो कल्पना के गर्भ से जन्मा अपनी मूलावस्था को प्राप्त करने से पहले ही मार दिया गया। अभिमन्यु नहीं है उसके काल्पनिक  माता-पिता ज़िंदा थे ।  क्योंकि उन्हें तो महाभारत जीतना था ।  उनके प्रेम और त्याग के सम्मुख कौन टिक सकता था ।  कोई नहीं टिका , किन्तु इसके बावजूद टीस जो उनके जीवनभर बनी रही वह थी अभिमन्यु की।  उनका अपना बच्चा , उनके सपनों का बच्चा , उनकी कल्पना का आकार।  काश उसे चक्रव्यूह तोड़ना आता। 

सोमवार, 1 सितंबर 2014

दीवार के आहते में

इश्क़ के बीच जो दीवार खड़ी हुई है उसकी नींव धरने और एक एक ईंटें रखने में कई दिन व्यय हुए थे उसके।  दरअसल उसने ठान लिया था कि जिस इश्क के साथ वो न्याय नहीं कर पा रहा है उसके बीच दीवार खिंच जाना चाहिए। यह उसके लिए बेहतर है जिससे  उसने इश्क किया था।  फैसला यकीनन जानलेवा था।  जानलेवा मर जाना नहीं होता , जानलेवा जीते हुए मर जाना होता है या मरते हुए जीना होता है।  वह यह भी जान चुका था कि वो उसके लायक नहीं है। लायक होना चाहता था वो।  लायकी के लिए उसने दुनिया के साथ जंग की थी।  वो थका था , बहुत बहुत थका था , मगर हार नहीं मानी थी। हर बार जब भी उससे बातें हुई , बातों में पहला सवाल रहता था -क्या हुआ ? कोई नौकरी मिली ? कैसे गुजारा चलता होगा ? क्या करते हो तुम ? वह उसे समझाता था , अपने गम सुनाता था मगर इससे मुनाफ़ा क्या ? न उसकी किस्मत में जीत लिखी थी न ही वो उसके लिए वक्त निकाल सकता था।  जंग जारी थी। उसने फैसला किया कि अब वो उसे कुछ न तो सुनाएगा , न ही कहेगा।  क्योंकि उसके पास कहने को था ही क्या ? वह चुप हो गया।  चुप होना उसके लिए तकलीफदेह था मगर चुप होना था। दूसरी तरफ वो थी जो दुनिया देख रही थी। वह जानता था कि वो उससे बे पनाह मोहब्बत करती है किन्तु उसने अपनी मोहब्बत को सिगरेट के छल्लों में उड़ाना शुरू किया , कई बार टोका था उसने मगर वो नहीं मानी।  जब नहीं मानी तो उसके इश्क को पहली बार झटका लगा।  ऐसा क्या इश्क जो सिगरेट को अधिक महत्व दे , इस मानिंद कि जी कर करना क्या है ? जब तुम साथ नहीं रहे तब ये शरीर किस काम का।  मगर यह इश्क नहीं होता , जो सिगरेट के छल्लों में जल जल दिली सुकून पाए। एक तरफ वो जंग कर रहा था  उसके लायक होने के लिए दूजे वो इश्क के नाम पर खुद को तबाह किये जा रही थी ।  दीवार की पहली ईंट उसने तब ही रखी थी।
तुम्हे मेरी जरुरत नहीं रही।  उसने लिखा  तो जैसे उस पर बिजली कौंध कर गिरी।  जरुरत।  उसने इश्क क्या जरुरत के लिए किया ? जरुरत होती तो कितनी कितनी बार ऐसे ऐसे वक्त आये जब वो उसे छल सकता था।  जरुरत शब्द  ने उसे तोड़ दिया। उसके इश्क को समझ पाना शायद उसके बस का नहीं था , जो इतने इतने दिनों बाद वह भी महज अल्फाज के सहारे मिले बावजूद उसने उसकी बातों को अपने अंदाज़ में लिया और साफ़ साफ़ लिख दिया कि -ठीक है, ईश्वर तुम्हें खुश रखे।  वक्त के साथ साथ ईंटें एक के ऊपर एक रखती चली गयी और दीवार बनती  गयी।  वो आखिर उसके इश्क को जान ही नहीं पाई। या जानती भी हो ? उसके लिए ही उसने ऐसा लिखा हो कि दीवार मजबूती से खडी हो सके।  जो हो मगर खुदा सबूत के तौर पर खडा है बनी हुई उसी दीवार पर जो इश्क के बीच है।  जंग फिलवक्त भी जारी है।  हारा नहीं है वो।  और अगर वाकई उसे उससे इश्क है तो उसे ज़िंदा रहना होगा देखने के लिए उसकी जीत , क्योंकि ये जीत इश्क के बीच की दीवार ढहाएगी। उम्रदराज़ होकर इश्क करना भी तो रोमांच होता है। इसी ढही दीवार के आहते में बैठकर … 

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

दीवारे हैं, दीवारें ही दीवारें हैं

दीवारें ही दीवारें है 
मेरे अंदर/
कोइ दरवाजा नहीं /
चौखट / भूलभुलैया /
पूरी देह अपने मन और आत्मा के साथ 
बंदी है /

बाहर जाने की उत्कंठा
संसार देखने की ललक
हरी भरी वादियों में
दौड़ लगाने की इच्छा
घंटो गपशप /
घंटो बेफिक्री
न कोइ भय
न ही कोइ अज्ञात भय /

बस
सोचता हूँ
चाहता हूँ
लिखता हूँ
पढता हूँ
दीवारों के अंदर /

दीवारों में
विश्वासघात है
धोखा है
आदमी को अकेला कर
तालियों की गूँज है/
और बस कर्णभेदी इस
गूँज में चलती -धड़कती
डरती -कांपती साँसे हैं /
जो दीवारों से टकराती हैं
लौटती है और धंसती रहती है मुझमें /
प्रतिक्षण /

क्योंकि चारों तरफ
दीवारे हैं, दीवारें ही दीवारें हैं /

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

तिकड़ी

1, तुम्हें जो प्रेम था मुझसे / 
इतना कि बस्स... / 
किधर है ? 
अब मैं ढूँढने लगा हूँ /

2, प्रेम 
विशेष दिन ज्यादा 
उमड़ता है /
विशेष दिन 
विशेष न रह जाएँ तब ?
शायद इसलिए 
आजकल मुझसे 
छूती नहीं हवा उनकी /

3,सारी बातें,
तब ज्यादा खोखली होने लगती है 
जब जरुरत पर 
वे काम नहीं आती /

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

देखना मुझे

मौके की तलाश में हूँ , देखना मुझे 
तुम्हारे ही शहर में हूँ, देखना मुझे /

कद -पद के मद में कुछ दीखता नहीं
श्रेष्ठ तुम सबसे हूँ , देखना मुझे/

संकटों में भी और मजबूत बना हूँ
भ्रम में हो के गिर गया हूँ, देखना मुझे/

दर्द आज है तो क्या कल भी रहेगा
गर्द है ये , मर्द हूँ मैं, देखना मुझे/

हुनर के भाग्य में देर ही लिखी है
मिटा इसे रहा हूँ कर्म से, देखना मुझे/

रो के ही जीता नहीं 'अमिताभ' कभी भी
हंसकर ही बला टालता हूँ , देखना मुझे/

शनिवार, 20 जुलाई 2013

इज्जत

अलगनी पर लटका 
कमीज़, 
न न आदमी की इज्जत 
झूल रही है/ 
फरका रही है/

खुशबूदार सर्फ़ के झाग से
गंदे, मैले , कुचले कमीज को
खूब धो-पछीट के धो लिया गया है /

काले , मटमैले और बदबूदार पसीने युक्त
पानी को नाली के हिस्से बहा ,
निचोड़ कर
खुली हवा में
फिर लटका दिया गया है
सूखने , चमकने /

बुधवार, 8 मई 2013

अ -हम

तुम 
जब तक तुम रहोगे ,
मै 
जब तक मै ,
तब तक 
'ह' और 'म' के बीच 
फासला बना ही रहेगा /

अजीब गणित है दोस्त 
रिश्तो के अहम् (अ -हम ) का 
यह व्याकरण में मत देखना 
न ही भाषा में तलाशना /

रविवार, 31 मार्च 2013

शेर सरीखे टुकड़े

यूं तो मेरे सपने सुहाने बहुत है 
और नाकामियों के बहाने बहुत है
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मुझे अपने रकीब से ईतलाफ़ है 
वो अपने मकसद में तो साफ़ है 
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बाते बहुत है तन्हाई की गहरी 
वल्लाह क्या शीरीं जबान ठहरी
******************

मंगलवार, 19 मार्च 2013

सोचो तो यार ............


तुम हजार बहाने बना लो/
चाहे मुझे कारण बना लो 
किन्तु 'हमारे' लिए 
यह उचित नहीं माना जा सकता /
इसके बावजूद 
 मुझे कोइ 
शिकवा नहीं है /

बस ये जो सिगरेट है न 
इश्क के फेफड़ो में 
धुँआ धंस रही  है /

पर मुझे कोइ गिला नहीं /

सिगरेट पीना 
चारित्रिक पतन का 
लेशमात्र भी संकेत नहीं देता /
हां , इसे आदत कहते है /
आदत बदलने के लिए भी 
मै नहीं कहता/
मै सिर्फ यह कहता हूँ कि 
सिगरेट पीकर 
खुद को अस्वस्थ करने की इस  प्रक्रिया में 
महज तुम दुःख नहीं उठाओगी 
तुम्हारे 'हम' ज्यादा उठाएंगे /
और अगर इश्क का मामला है तो 
वो दुःख तो नहीं दे सकता न ..../
सोचो तो यार ............

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

मै हूँ यह क्या कम है

बैठो तो दो पल ..

देखो सूखे इस वृक्ष को 
जिस पर खिले है सिर्फ फूल /

अब मुझे देखो ..


क्यों मेरी नाकामी से परेशा हो
मै हूँ यह क्या कम है /

(पलसधरी की एक शांत दोपहर और मेरे कैमरे में कैद यह अद्भुत वृक्ष )

सोमवार, 24 सितंबर 2012

द्वैत है और अद्वैत भी

चारो और है 
कणिका जगत /

ऊर्जा के अबेध कण /

कई कई ..,

मगर 

सब आपस में 
लथ-पथ/

आश्चर्य ...

कि
द्वैत है और अद्वैत भी /








(जैसे - 'मै' -'तुम' द्वैत 
मगर 'हम' अद्वैत ) 

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

सिगरेट अच्छी होती है


अगर इश्वर है तो चमत्कार भी होगा। बगैर चमत्कार के कौन इश्वर की सत्ता पर विश्वास करता है। इतने इतने सारे लोग यदि घुटने टेकते हैं तो चमत्कार की वजह से ही न! और इतने-इतने वे लोग भी घुटने टेकते हैं जिन्हें चमत्कार का कोई अनुभव मिला होगा। तो भैया दिखा दे चमत्कार।
 है न तू?
मैं भी घुटने टेकना चाहता हूं।
तुझे याद करना चाहता हूं।
सुना है तू ऐसे ही तो सबसे घुटने टिकवाता है, नहीं।
 देखूं..कहां है तू?
तेरा चमत्कार!
मुझे भी अधिकार है देखने और तुझे मानने का?
सिर्फ  प्रेम में या मूरती बन जाने वाली चेहरे की मुस्कान से क्या होता है?
होता तो दीवार पर लटके या किसी मंदिर में बैठे -खड़े, टूटते हुए दरवाजे या लड़ते हुए लोगों की भीड़ नहीं देखता। वैसे  तो तू हंसता रहता है..लुटता हुआ जीवन देखने के बाद भी।
वो हाथ जोड़े सैकड़ों की तादाद सिवा भीख मांगते हुए ही दिखी है मुझे आजतक। उन्हें नसीब तो कुछ नहीं हुआ। वैसे के वैसे ही हैं गलीच बस्तियों में, गलीच जीवन जीने को विवश।
खैर.. चल दिखा दे यार कोई चमत्कार..। है न तू? बोल...है की नहीं......
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सार्वजनिक स्थल से दूर किसी एकांत में खड़े होकर सिगरेट धौंक रहा है वो। धुएं के झल्लों में अपनी बुदबुदाहट के शब्दों को लपेट कर हवा में तैरा देता है, हवा में फैलते  हुए वो आसमान में कहीं जाकर लुप्त से हो जाते होंगे , उसे लगता है कि अब ये शब्द आसमान को आच्छादित कर देंगे और सारा आकाश मेरे शब्दों से गूंज उठेगा । दिग-दिगन्ता कांप उठेंगे । या फिर अपने चेहरे पर छा गए धुएं को हटाते हुए नाक बंद करते हुए कहेंगे?
कौन सिगरेट पी रहा है?
हा हा हा..
हंसते हुए अधजली सिगरेट नीचे फेंकता  है, अपने पैरों के जूते से मसलता है और सामने वाली गली के अंतिम छोर तक देख सकने का प्रयत्न करता है। वहीं से तो आना है उसे, मिलने का कहा था। और ये इंतजार..।
इंतजार पैरों में जंजीरे जकड़ देता है, जाना भी चाहता है कोई तो न जा सके, ऐसी। सिगरेट इंतजार की जंजीरों को जलाती हैं। हां, लाहे की जंजीरों को जलाने के लिए एक से तो काम नहीं चलने वाला न, इसलिए कई कई पी जाता है वो। वैधानिक चेतावनी के बावजूद। वो सोचता है..एक चेतावनी आदमी के शरीर पर भी खुदी हुई होना चाहिए- जन्मजात- ‘कितना जिएगा, एक दिन तो जाना ही है पट्ठे...।’
क्योंकि फिर भी जिएगा वो..देख देख कर जिएगा जैसे सिगरेट पीता है..।
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इसी सिगरेट से तो कभी वो मिली थी,
कहा था-क्यों पीते हो..अच्छे भले दिखते हो।
वो  हैरान था कि दिखने और सिगरेट पीने के बीच क्या तारतम्य। उसने बताया भी था कि इससे चेहरा मुरझा जाता है। वो  जोर से हंसा था, उसने  हंसने का कारण पूछा तो,
उसने  हंसते हंसते ही कहा- क्यों हंसने से चेहरे की रौनक नहीं बढ़ जाती?
दोस्ती हो गई थी। दोस्ती के पीछे सिगरेट थी। वो उधर जल रही थी, इधर दोस्ती आगे बढ़ रही थी। शायद सिगरेट के अंतिम छोर तक आते-आते दोस्ती भी अलविदा हो गई।उठा  ही लेना था फिर से सिगरेट को। क्योंकि यही थी जो उसे ताप देती थी। संताप से बचकर। कितनी रातें उसने धुएं में बिताई,
धुआं जिंदगी जैसा ही तो होता है।
घना, छल्लेदार,
उड़ता है हवा में, टिकता नहीं जमीन पर।
जमीन पर रेंगता हैं।
जिंदगी भी रेंगती है..। धुएं के माफिक।
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आफिस ब्वाय से लेकर बॉस तक ने सिगरेट पीने की मनाही कर रखी थी..। ये कोई पांचवा दफ्तर होगा जहां मना किया गया था। योग्यता जलती हुई सिगरेट की तरह होती है..राख बन जाती है तब जब आपको कोई लत हो। उसे लत नहीं थी..सिगरेट तो बस इसलिए थी कि इसके अलावा उसके पास था क्या! न साथी, न संगी..। एक दिन कलिग ने कहा था कि
यार शादी कर ले..। ये सिगरेट छूट जाएगी।
कुछ छोड़ने के लिए कुछ बहुत बड़ा पकड़ना होता है। दोनों में अंतर क्या है? शादी और सिगरेट। कलिग्स भी मन बहलाते हैं। उससे  सहानुभूति प्रदर्शित करने के लिए सिगरेट को बदनाम किया जाता है। खैर..कुछ नहीं छूटा, सिर्फ  नौकरी छोड़ दी।
प्रतिभा का अचार डाल भी दो तो उसे खानेवाला कौन है? सड़ ही जाना है। सड़ने से बचाना है तो प्रतिभा को स्टोर करके रख देना चाहिए।
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दर-दर भटका। क्योंकि नौकरी की जरुरत होती है। जेब में जब तक पैसा तब तक दुनिया आपकी। सिगरेट आपकी। उधार ज्यादा नहीं देता कोई। महंगी हो गई है। सरकार ने मुझ जैसे से सिगरेट छुड़वाने के लिए उसे महंगी कर दी..। या फिर इसका फायदा उठाकर  ज्यादा कमाई का जरिया बनाया? शायद बेरोजगारी बढ़ाकर बाजार बढ़ाया जा रहा हो? पता नहीं...जो हो..पर नौकरी आवश्यक हो जाती है।
वो जितनी भी थी, जितनी भी मिली थी सब नौकरी कर रही थी। अच्छी पढ़ी-लिखी हैं..स्मार्ट हैं..उन्हें तुरंत नौकरी मिल भी जाती है क्योंकि वे सिगरेट पीती भी हैं तो कायदे और तमीज के साथ। हा हा हा।
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उस धुएं में बात पते की थी। घर में कोई छह सात खाने वाले, बूढ़े मां-बाप और इकलौता वही था कमाई का साधन। पूरी योग्यता। कहीं से भी कोई कमी नहीं। मगर नौकरी नहीं। जिससे आज वो मिलने वाला था वो उसके साथ ही पढ़ा करती थी..आज उसके इंतजार में इसलिए खड़ा था कि किसी नौकरी के संदर्भ में उसे वो कही ले जाने वाली थी...। कहा तो उसने ऐसा ही था । वो अब तक नहीं आई थी क्योंकि..वो नौकरी कर रही थी..किसीका इंतजार उसके लिए मायने नहीं रखता था..। फिर ऐसे का जो सिगरेट के धुएं में अपनी जिंदगी को तबाह किए बैठा  है।
तबाह या आबाद!
जो हो ...
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यार भगवान..तेरा चमत्कार देखने का मूड है..चल बहला दे थोड़ा...। एक सिगरेट और मुंह में लगाकर उसने खाली डिब्बा सामने सड़क पर फेंक  दिया..जो लुढ़कते हुए किनारे जा लगा... । पर वो नहीं।..
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* कन्टीन्यू..क्योंकि ये कहानी खत्म नहीं होती..जलती जाती है..चैन स्मोकिंग  की तरह....

मंगलवार, 26 जून 2012

बिखरे बिखरे से कण -

-खाली होना , खाली होना नहीं होता/ भरा होना भी होता है/ लबालब/ ये आकाश है/ खालीपन से पटा हुआ.
-मेरी कलम मेरी ही हो, जरूरी नहीं/ जैसे मेरे शब्द/ लिखे/ तुमने पढ़े तुम्हारे हो गए/ तुमने पढ़े, फेंके आवारा हो गए/ जैसे मुझे तुमसे प्रेम है, जरूरी नहीं कि तुम्हे भी मुझसे हो..
-दो प्रेमियों का मिलन/ तीन चीजे है/ दो में प्रेम है तीसरे में मिलन/ एक को प्रेम है/ दूसरे को उससे प्रेम है/ यानी उसे भी प्रेम है/ फिर मिलन है/ मिलन प्रेम नहीं है/ प्रेम की वजह है/ और जब इस 'वजह' से हम प्रेम करने लगते है तो बिछोह भी 'वजह' बन कर टूट पड़ता है/ ये वजहों का झंझट है/ वरगना प्रेम ने कब किसे धोखा दिया है/ धोखा तो 'वजहे' देती है/
-आध्यात्म ? मेरे अन्दर उठी ज्वाला है/ पूरा शरीर/ दिमाग सहित / प्रकाशमयी है/ प्रकाश है/ उसकी परिधि क्या है, वो कहां तक पहुच रहा है/ प्रकाश नहीं जानता/ उसे तो बिखरना है/ मुझे/ तुम्हे/ जितना हो समेटना है/ संजोना है/ अगर हाथ जलने का डर न हो तो..

शनिवार, 23 जून 2012

कृष्ण का जादू

कृष्ण ने मुझे हमेशा से ही प्रभावित रखा है. वैसे भी कृष्ण सर्वाधिक लोकप्रिय, रहस्यमयी, पठनीय और ह्रदय समीप विषय है. जितना अध्ययन करो कम है. कई कई सारी जानकारिया   कृष्ण में दिलचस्पी  पैदा  करती  है. और लगता है कि बस पढ़ते जाओ. मै कृष्ण को  किसी धर्म विशेष की तुला पर नहीं बैठाता क्योंकि वो उससे परे का विषय है. कृष्ण हमारा पूरा एक जीवन है. इस जीवन की थाह पाना सचमुच कठिन है किन्तु गहरे जितना उतरो मोतियों का अपरम्पार खजाना हाथ लगते ही जाता है. बहुत पहले कृष्ण के एक विशेष विभाग पर शोधपरक कथा गढ़ने की ठानी थी.प्रारम्भ  भी किया था वह कार्य.किन्तु रोजमर्या की आपाधापी ने उस महती कार्य को रोक दिया.रुका तो रुका ही रहा. अब एकबार फिर उसे नए सिरे से गूंथने का विचार  है जो  यथाशीघ्र प्रारम्भ  कर दूंगा. ख़ैर..इसके पहले कुछ महत्वपूर्ण जानकारिया लिखने का मन है. इसके नेपथ्य   में दो    बाते   है, एक तो यह संग्रहित   हो जायेंगी   दूसरे   आपको  भी पढने  में आनंद  आयेगा . 
कई  सारी भ्रान्तिया है, कई सारे तर्क है, कई सारे आत्मविश्वास और अतिविश्वास है. कृष्ण का जन्म, कृष्ण का जीवनकाल आदि पर बहस-मुबाहस है. जो भी है वो सदा रहेगा किन्तु मै समझता हूँ अनुसंधान जिसे करना हो वो  करे..जिसे प्रलाप करना हो वो करे. हमारे लिए तो कृष्ण सामने खड़ा है, बांसूरी की धुन पर मुग्ध कर रहा है. इसलिए प्रमाणिकता हमें हमारी खोज पर संतुष्ट  करती है. बहरहाल, कृष्ण के विकास, स्वरूप को प्रकट करने से पहले पूर्व वैदिक देवता विष्णु के स्वरूप को समझना जरूरी हो जाता है ताकि कृष्ण के सन्दर्भ में हमें प्रमाणिकता प्राप्त हो सके. वेद सर्व प्रथम सूत्र है किन्तु कृष्ण वेदों में नहीं मिलता, पुरानो में मिलता है. ऐसे में भ्रम पैदा होना लाजिमी है. मेरा जो अध्ययन है उसके तहत चूंकि पुराण कृष्ण को विष्णु का अवतार और वृष्णि वंश का मानता है इसलिए वेद से भी जुड़ जाता है. कैसे ? ऋग्वेद में कही-कही विष्णु का उल्लेख है , विष्णु 'विष' धातु से बना, जिसका अर्थ व्याप्त होना है/ विष्णु कही मुख्य तो कही समानार्थक रूप में आया है. शक्ति के अर्थ में भी विष्णु का उल्लेख है. ऋग्वेद मन्त्र में विष्णु का सम्बन्ध गायो से भी बांधा है. ऋग्वेद के सातवे अध्याय में २९ वा सूक्त गाय, गोपाल, गौचारण से सम्बन्ध रखता है. इधर कृष्ण को 'गोपाल' भी कहा गया है. रिग्वेदी विष्णु  और उसका गायो से सम्बद्ध होना मुझे कृष्ण के अवतार पर सहमत कराता है. कृष्ण जन्म के सन्दर्भ में ब्रह्म वैवर्त पुराण में कृष्ण का जैसा रूप-सौन्दर्य वर्णन है वो ठीक विष्णु से मिलता जुलता है. आप देखिये वैदिक विष्णु जो प्रथम कोटि का देवता नहीं है किन्तु धीरे धीरे देवत्व के सबसे उपरी आसन पर विराजमान हुआ है और इधर कृष्ण भी कुछ इसी प्रकार सर्वोपरि हुए/  ऋग्वेद में कृष्ण का नाम हमें जरूर मिलता है आठवे मंडल के ८५ वे ८६, ८७, और दसवे मंडल के ४२, ४३,४४, सूक्तो के ऋषि का नाम कृष्ण है. उन्ही के नाम पर कृष्णायन गौत्र चला.हालांकि यह वैदिक ऋषि कृष्ण हमारे कृष्ण नहीं है किन्तु यह मान्य करना पड़ जाता है कि उनके नाम पर ही वासुदेव ने अपने पुत्र का नाम कृष्ण रखा हो. ख़ैर..इस सन्दर्भ में भी विवेचन है. किन्तु कृष्ण जन्म को लेकर बहुत सारे तर्क-वितर्क है. देश-विदेश के खोजियों ने अपने-अपने तर्क दिए है. हापकिंस तो कहता है कि महाभारत में पहले कृष्ण का मनुष्य रूप ही है, बाद में वो देवत्व से युक्त कर दिया गया. कीथ भी इसे मानता है. ईसा से ४०० साल पहले कृष्ण के देवत्व का खूब प्रचार हो चला था. आप जानते है कि ईसा से ३०० वर्ष पूर्व मेगस्थनीज भारत आया था, उसने भी लिखा था कि मथुरा और कृष्ण पुर में कृष्ण की पूजा होती है. पुराण, पुराणकार, यात्री , लेखक, इतिहासकार आदि के तर्कों में भले ही थोड़ा बहुत अंतर रहा हो मगर यह सब मानते है कि कृष्ण नामक एक देवतुल्य पुरुष  इस धरती पर जन्मा था...बहुत से शिध्परक संग्रहण है, मेरे पास भी है..और इन्ही सबकी वजह से कृष्ण का जादू छाया हुआ रहता है..समय समय पर कुछ लिख लिख कर खुद की कलम को भी साधुँगा ताकि अपने मूल शोधपरक कथा को बल मिले और मै उसे लिख सकने मै समर्थ बन सकू. फिलहाल इतना ही.    

गुरुवार, 10 मई 2012

100 वे जन्मदिन पर विशेष- "मंटो का मतलब"


" जब मै किसी से दोस्ती करता हूँ, तो मुझे इस बात की तवक्को होती है कि वो अपना आप मेरे हवाले कर देगा. दोस्ती करने के मुआमले में मेरे अन्दर ये एक जबरदस्त कमजोरी है जिसका इलाज मुझ से नहीं हो सकता .."
 ढेर सी काबिलियत वाली कमजोरियों से सना और कलम की नोंक से जिन्दगी की सच्चाई को उखाड़ने वाला नाम है सआदत हसन मंटो. १०० साल के मंटो को बधाई. आपको लगेगा कि मंटो तो इस दुनिया में है नहीं फिर बधाई कैसी ?मगर मंटो मरा कब? उसे जो और जितने लोग पढ़ते -समझते है उनके दिल-दिमाग में झांकिए तो पता चलेगा मंटो ज़िंदा है. हां, वो और शख्सियतो की तरह आज भी नहीं बन पाया जिनके जन्मदिनो या किसी विशेष दिनो को जलसों का आकार देकर मनाया जाता है. शुक्र है मंटो इन सब से बच गया . ख़ैर.. पूरी जिन्दगी बस जंग रही. मगर जंग के बीच मंटो की जो साफगोई रही वो ऊपर लिखे वक्तव्य से स्पष्ट जाहिर हो जाता है. हालांकि मंटो ने जीवन के हर मोड़ पर मात खाई चाहे निजी जिन्दगी का मसला हो या बाहरी जिन्दगी का..दोस्ती हो या दुश्मनी का.. किन्तु मात खाने का मतलब यह नहीं कि मंटो थम गया हो..चाहे समाज ने गालिया दी हो, या अदालत में उस पर अश्लीलता के मुकदमे चले हो, मंटो ने पार किये हर दौर जो उसके खिलाफ रहे..टूटन रही मगर मंटो झुका नहीं ...इसलिए मंटो मरा नहीं..इसलिए उसके जन्मदिन पर उसे बधाई

.. क्या लिखा जाए मंटो पर..? मंटो को चाहने वालो के सामने से कुछ छूटा हो तो लिखा जाए ..मित्र सुशील छौक्कर ने दो दिन पहले से बोल दिया था कि आपको मंटो पर कुछ तो लिखना ही है ..मेने उन्हें समझाया कि ब्लॉग अब कौन पढता है..और फेसबुक जैसे नेटवर्क पर मंटो को समझकर पढने वाले न के बराबर है..फिर? सुशीलजी ने साफ़-साफ़ कह दिया कि इन सब बातो को छोडिये, कोइ पढ़े या न पढ़े किन्तु मुझ जैसे है जो पढेंगे ..., उनका यह भाव एकबार फिर मुझे यह यकीन दिला गया कि सचमुच मंटो ज़िंदा है.

 लिखने के लिए जनाब अनवर सईद द्वारा लिखा मज़मून "सआदत हसन मंटो -खुतूत के आईने में" पढ़ कर मुझे ऐसा लगा था कि इसमे कुछ ऐसा है जिसे लिखा ही जाना चाहिए ..तो उसी मज़मून से कुछ अंश लेकर आपके लिए यहाँ पेश करता हूँ -
 'मंटो के खुतूत' मंटो की मासूम शख्सियत की कई परते खोलती है..ये खुतूत अहमद नदीम कासिमी के नाम है और जनवरी १९३७ से लेकर फरवरी १९४८ तक के उस दौर से ताल्लुक रखते है जब मंटो बंबई की फ़िल्मी दुन्या में अमली जिन्दगी के झमेलों में उलझे हुए थे और ज़माने के थपेड़े खा रहे थे. अहमद नदीम लाहौर में अपनी अदबी जिन्दगी के शुरुआती दौर में थे और उस दौर के एक मुमताज़ और मारूफ अफसाना निगार को न सिर्फ हैरत से देख रहे थे , बल्कि उनसे प्रेरणा भी ले रहे थे. मंटो का अख्तर शीरानी के माहनामा 'रुमान' में उनका अफसाना 'बेगुनाह' पढ़कर खातो का सिलसिला शुरू हुआ. मंटो को लगा कि वो दोनों मुख्तलिफ राहो के मुसाफिर है.इसका ज़िक्र 'मंटो के खुतूत' के पेश लफ्ज़ में इस तरह किया गया है-
" देहली में मंटो से मेरी ( अहमद नदीम कासिमी) मुलाक़ात हुई, तो मुझे एक ही दिन में मालूम हो गया कि मंटो के जेहन में रहने और मेरे दोस्ताना रिश्ते के यकायक ख़त्म हो जाने का इमकान (संभावना) क्यों मौजूद था...." फिर उन्होंने लिखा ' ये मुलाकात हमारे रिश्ते का कुछ न बिगाड़ सकी. इसलिए कि अगर मंटो की रोजमर्रा की बेशतर दिलचस्पिया मेरी जिन्दगी के मामूलात से बिलकुल अलग थी. तो कम से कम वो सतह तो अब भी महफूज़ थी जिस पर हम एक दूसरे से प्यार करने वाले दोस्त की हैसियत से मिल सकते थे और ये सतह आपसी भाईचारे और कुर्बानी ने मुहैया कर रखी थी. ' कासिमी साहिब ने हिंद -पाक के अदीबो से मंटो के दोस्तों और अजीजो से भी उनके खुतूत हासिल करने की कोशिश की मगर उन्हें कामयाबी नहीं मिली. इसलिए भी उन्होंने अपने रिकार्ड में महफूज़ खतो पर तसल्ली कर ली. पहला ख़त का मज़मून - " आपका अफसाना 'बेगुनाह' वाकीअतन मेने बेहद पसंद किया है. सच तो यह है कि इस किस्म के ज़ज्बात में डूबे हुए अफ़साने उर्दू में बहुत कम शाए हुए है. आपके हाथ प्लास्टिक के है और मालूम होता है कि अफ़साने के मौजू को आपने न सिर्फ महसूस किया है बल्कि उसे छूकर भी देखा है. ये खुसूसीयत हमारे मुल्क के अफसानानिगारो को नसीब नहीं. मै आपको मुबारकबाद देना चाहता हूँ कि आपमें ये खुसूसीयत भरपूर है. "
 मंटो उन दिनों रिसाला ' मुसव्विर ' की एडिटिंग करने के इलावा फ़िल्मी दुन्या के साथ भी वाबस्ता थे और स्क्रीन के लिए कहानिया लिख रहे थे जिसके दर्शक ज़ज्बाती सीन, ज़ज्बाती रोल और गीत जियाद पसंद करते थे. मंटो ने अफसाना 'बेगुनाह' में भी आम लोगो की पसंद को ही मद्देनज़र रखा और कासिमी साहब को लिखा- " अफसाने में आब्जेक्तिविटी टच बहुत प्यारे है और मौजू व् मुनासिब है. कुछ अरसे से मै फ़िल्मी अफ़सानो के तौर पर गौर कर रहा हूँ, चुनांचे मेने आपके अफ़साने को गैर इरादे तौर पर फ़िल्मी ही की ऐनक से देखा और इसे बहुत खूब पाया. एटमोसफेरिक टच बेहद अच्छे है...." अपने खतो के केनवास पर मंटो हमें बेहद भला , बेलौस और बेरिया (निश्छल) शख्स नज़र आते है. उस दौर में वो खुद मुश्किलों में घिरे हुए थे. माली हालात अच्छे नहीं थे. मिजाज़ में इंतिहा दर्जे का ईगो था, लेकिन किसी दुसरे को तकलीफ में देखकर मंटो पिघल जाते थे. मंटो ने कासिमी साहब की मुश्किल भांप ली थी. वो उन्हें जिन्दगी के असली उतार चढ़ाव से भी बाखबर कर रहे थे और हमदर्दी का इज़हार भी. मंटो ने लिखा- " फ़िल्मी दुन्या में कदम रखने की ख्वाहिश कालेज के हर तालिबे इल्म के दिल में होती है. आज से कुछ अरसा पहले यही जूनून मेरे सर भी सवार था. चुनांचे मेने उस जूनून को ठंडा करने के लिए बड़े  जतन  किये और  अंजामकार   थक हार कर बैठ गया. अहमद नदीम साहब, दुन्या वो नहीं, जो हम और आप समझते है और समझाते रहे है. अगर आपको कभी स्टूडियो की सियासत की स्टडी करने का मौका मिले तो आप चकरा जायंगे.फ़िल्मी कंपनियों में उनका जियाद असर है जिनके खयालात बूढ़े और नकारा है. वो बिलकुल जाहिल है और वो लोग जो अपने सीनों में असली  फ़न  की परवरिश करते है, उन्हें कोइ नहीं पूछता. .." मगर इस सब के बाद भी अहमद नदीम साहब की मदद करने को मंटो तैयार थे. वे लिखते है- " मै बंबई में पचास रुपये महावार कमा रहा हूँ और बेहद फजूलखर्च हूँ, आप यहाँ चले आये तो मेरा ख़याल है कि हम दोनों गुजर कर सकेंगे. मै अपनी फजूलखार्ची बंद कर सकता हूँ. मुझे आपकी मजबूरियों का पूरा एहसास है, इसलिए कि मै इन मजबूरियों से गुजर चुका हूँ." आगे देखिये मंटो लिखते है.- " आप यहाँ तशरीफ ला सकते है. मगर ये बात याद रखिये कि आपको मेरी जिन्दगी की  धूप  छाह में रहना होगा. मेरे पास छोटा सा कमरा है जिसमे हम दोनों रह सकते है. खाने को मिले न मिले, मगर पढने को किताबे मिल जाया करेंगी..."
किताबो से बेइंतेहा  मोहब्बत   करने  वाले   मंटो वाकई आदमीयत वाले इंसान थे ..वैसे तो उनके खतोकिताब की दास्ताँ लम्बी है जिसे मै पूरी तरह यहाँ लिख नहीं पाउँगा .. इतने से सिर्फ यह जतलाने की कोशिश है कि मंटो आज भी ज़िंदा है...कम से कम मुझ जैसे लोगो में.. जो मंटो से कोइ हट कर जिन्दगी नहीं जी रहे है....

मंगलवार, 20 मार्च 2012

दो कदम

1,
न उम्मीद से
चूल्हा फूँका जा सकता है
न इच्छाओ की रोटी
बनाई जा सकती है ..
हो यह सकता है कि बस
दोनों की चटनी बनाकर
चाट ली जाए ....
2,
आग उगलते सूरज
और इच्छाओं की
जलती सूखी लकडियो से
निकलती लपटों में
मेरे साथ
सचमुच कोइ बैठना
नहीं चाहता ..
और गर
चाहता भी है तो बस
घी डालना ...

शनिवार, 17 मार्च 2012

इश्क

मेरा और उसका नाम
आज भी खुदा होगा वहां
जहां जुदा होने से पहले
कुरेदी थी ज़मीन..........
और लम्बी चुप्पी के बाद
तन्हाई ने बाहे फैला कर
धीरे से बुदबुदाया था
इश्क .....
वहां खुदा होगा एक पूरा इतिहास ..
क्योकि इश्क की बदकिस्मती है
की वो 'खुदा' ही होता है...

बुधवार, 2 नवंबर 2011

प्रेम

न्याय, वैशेषिक, सांख्य हो
या योग मीमांसा
वेदांत जैसे वैदिक दर्शन
घुस टटोला।

इन्हें नकारने वाले...
चार्वाक, जैन, वैभाषिक
सौत्रांतिक, योगाचार और
माध्यमिक जैसे
अवैदिक दर्शन की पनाह भी ली
किंतु मिला नही
उसका ओर न छोर।

खपा दिया खुद को
सिर खुजाखुजा..,

पट्ठा मिला भी तो कहां
कबीर की झोपडी में
गुनगुनाता हुआ-
पोथी पढ-पढ जग मुआ.......।

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

दस का दम

ये फेसबुक ने ब्लॉग को मानो ग्रहण लगा दिया। करीब चार महीनों बाद ब्लॉग की शक़्ल देखी। यह जानते बुझते भी कि ब्लॉग और फेसबुक में ज़मीन-आसमान का अंतर है, यहां मन हल्का होता है तो वहां तो सारा कुछ फास्ट फूड जैसा है..खैर..किंतु यह अच्छा है कि फेसबुक पर पिछले दिनों कुछ अच्छी पंक्तियों ने रूप लिया, जिसे मेरे ब्लॉग साथियों से शेयर करना चाहूंगा..क्योंकि यहीं उन पंक्तियों की असली परीक्षा होती है।



1, बार बार की
झंझट से मुक्त ही हो जाऊं तो अच्छा है।
देखना, इक दिन मैं भी
बहला-फुसलाकर
किस्मत को ऊंची पहाडी पर ले जाउंगा और
चुपके से नीचे धकेल दूंगा
फिर चिल्लाकर कहूंगा
जैसे को तैसा।

2,यूं तो बहुत से
देते है दिलासा
कोई दिल भी दे
तो बात बने।

3,कितने और
इम्तहान लेगा ए खुदा
ऐसे बुरे भी नहीं
कि हाशिये पे रहें।

4,तेरे साथ....

इस दौडती भागती सडको पर
पसरी रात की खामोशी में
हाथ थामे दूर तक चलना..
... ...
किसी सन्नाटे में डूबे कोटर में
चांद तले घंटो बैठ
बतियाते रहना..

सुबह की पहली किरण का
आचमन कर, दिन कहीं
ऊंची पहाडी, कंदराओं में भटकते हुए
वीरान पडी चट्टानों को नापना ..

किसी गांव के नुक्कड पर बैठ
चाय की चुस्कियां लेना
और खेत खलिहानों के बीच
जिन्दगी के रास्ते तलाशते हुए
कहीं दूर
किसी वृक्ष तले ठहर सुस्ताना..
तेरे साथ....

चाहता है दिल।

5,"पीर पराई
कौन जाने
जो जाने
अपनी जाने"

6,कब तक रख सकेगा
झूठ को कन्धो पर,
खुदा रहम नहीं करता
ऐसे बन्दो पर"

7,अमूमन,
अकेला होता हूं मैं
शब्द बिखेरता हूं,
सहेजता हूं मैं...
जैसे जीवन।
...
अक्सर, छूट जाता है
हाथों से वो 'अक्षर'
जिसका एक छोर
हृदय से प्रांरभ होता है
मन तक जाता है...
जैसे प्रेम।

और फिर नितांत
निर्दयी सन्नाटा घेर लेता है।

8, "हर आस अपनी
जलते जलते बुझती गई,
जिन्दगी कुछ यूं
बुनते बुनते उलझती गई।"

9,भटकना
पैदल, अकेले..
उद्देश्यविहीन.......
बिल्कुल
कोरे प्रेम की तरह....।

10, गम नहीं ए दोस्त,
के तुम्हे हमसे प्यार नहीं,
चूक रहे हो तुम्ही
इक बेहतरीन प्यार से....

मंगलवार, 21 जून 2011

इस यात्रा का अंत नहीं


यात्रा कभी समाप्त नहीं होती है। अनवरत होना, होते रहना उसका धर्म है। पूरे जीवन में ढेर सारे पडाव आते हैं, हम रुकते हैं, चलते हैं, रुकते हैं फिर चलते हैं...। यानी एक अनंत यात्रा का नाम है जीवन। जिस मृत्यु को हम जीवन का अंत समझ बैठे हैं वह नाममात्र का एक पडाव है। यह जो समझ बैठना होता है न वही हमें अपनी यात्रा का आनंद नहीं लेने देता, सुख नहीं भोगने देता, और न ही यह जानने देता है कि आखिर हम हैं क्या चीज? करीब दो माह पहले मुझे डॉ. पीयुष श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक 'अनंत यात्रा, धर्म का विज्ञान' प्राप्त हुई थी। मैने दो बार उसे पढी। पढने का मतलब उसमें खो गया था, विचारों ने द्वन्द मचाना शुरू किया था कि उन्हें शब्द्ब दिये जायें और पुस्तक की समीक्षा की जाये, किंतु समय ने मुझे अपने दूसरे कार्यों में उलझाये रखा। आज उन विचारों को पुनः एकत्र कर रहा हूं..यानी तीबारा पुस्तक का अध्ययन किया और लिखने बैठा हूं। समीक्षा के लिये अधीरता क्यों है? यह प्रश्न भी मेरे सामने था, और समीक्षा कर भी दी जाये तो वो कहां तक सार्थक होगी जबकि मेरे ब्लॉग पर अब ज्यादा पाठक नहीं है? मैं तो चाहता यह हूं कि इस पुस्तक का अध्ययन हर कोई करे, क्योंकि यह जरूरी है.., किंतु जब पाठक कम हैं तब क्या मेरी चाहत का अर्थ रहेगा? खैर..इसका मतलब यह भी नहीं कि एक बेहतर पुस्तक पर अपने विचार लिखे ही न जाये। है न।
'अनंत यात्रा, धर्म का विज्ञान' किसी मजहब, किसी धर्म विशेष या किसी संप्रदाय से ताल्लुक नहीं रखती। यह न ही कोई संदेश देती है, न ही कोई अपना दर्शन व्यक्त करती है। यह सिर्फ वैज्ञानिक आधार पर जीवन और हमारे तपस्वियों के शोध, उनके ज्ञान को, उनके विज्ञान को प्रकट करती है। जो जैसा है, जैसा होना चाहिये, जो होता है, क्यों होता है आदि को ठीक वैसे ही डॉ.पीयुष ने पुस्तक में उतारा है जैसे कोई वैज्ञानिक अपना अविष्कार करता है। अविष्कार के लिये जिन साधनों की आवश्यकता हुई डा. पीयुष ने उनका इस्तमाल किया और तार्किक आकार देते हुए, बेहद, बेहद सरल हिन्दी भाषा में उसे व्यक्त किया..सीधा-सपाट किंतु गहरा..। भारतवासी अपनी विरासत खो रहे हैं, अपने महान तपस्वियों, ऋषि-मुनियों के अध्ययन को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, जबकि वही तमाम शोध उन आधुनिक वैज्ञानिकों ने, जिनका नाम आज सायंस में विख्यात है, हमारे ऋषि-मुनियों के अध्ययन के बल पर किया जिसे हम नया और अद्भुत मानते हैं। यह हमारी बेचारगी है कि हमने हमारी विरासत को श्रेय नहीं दिया। अभी भी बिगडा कुछ नहीं है। इसी बात का जीता जागता उदाहरण है यह डॉ. पीयुष का लेखन।
बहरहाल, भारतीय वेद ग्रंथों की महिमा सिर्फ धार्मिक ही नहीं थी बल्कि वैज्ञानिक थी। अगर 'जगत माया है,' 'जो दिखाई पडता है, वह सत्य नहीं है,' 'सत्य अज्ञेय है,' 'पत्थरों में भी प्राण होते हैं' जैसे वाक्य आपको महज धार्मिक बखान लगते हों तो कृपया अपने इस लगने को बदल दीजिये क्योंकि वह वैज्ञानिक और शोधित हैं। चाहे अल्बर्ट आइंस्टिन हो या नील्स बोर, या फिर हाइजेनबर्ग, डार्विन, मेंडल, स्टीफन हॉकिंग, किरलियन हों तमाम वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में उपरोक्त बातों को प्रमाणित किया है, कर रहे हैं। बस यही सब तो है इस पुस्तक में। कौन क्या कर रहा है, किसने क्या किया, और इस बृह्मांड में आखिर चल क्या रहा है, हमारा जीवन और हमारा दिमाग, उसकी दुविधायें हों या सुख-दुख की परिकल्पना..सब कुछ समाहित है इस पुस्तक में और वह सिर्फ और सिर्फ वैज्ञानिक आधार पर। सच कहूं..मैने अब तक ऐसी पुस्तक का अध्ययन नहीं किया था, कई-कई सारी पुस्तके पढी, धर्म की, दर्शन की, दीन-दुनिया की, समाज की देश की..साहित्य हो या राजनीतिक हो, शोध हो या समीक्षायें हों, आलोचनात्मक हो या समालोचात्मक सब तरह की पुस्तके मेरे पढने में आई हैं किंतु 'अनंत यात्रा, धर्म का विज्ञान' इसलिये विलग है क्योंकि यह खुद का कुछ बखान नहीं करती, जो है वही सामने रखती है।
अगर सूर्य के सात घोडों की बात हो या विज्ञान के सात रंगों की बात, चन्द्रमा की 27 पत्नियों की बात हो या चन्द्रमा के 27 नक्षत्रों की बात..हमने सिर्फ शब्दों पर ध्यान दिया और किसी को नीरा धार्मिक मान लिया किसी को विज्ञान..वस्तुतः सबकुछ अपनी बात कहने और उन्हें शब्द देने की कोशिश रही, जिसे हमने अपने अन्दाज में स्वीकार लिया। डॉ.पीयुष ने बेहद सरलता से इस ओर इंगित किया है। धर्म और विज्ञान की परिभाषा के जरिये किसी सच को दर्शाने की कोशिश की है। धर्म यानी किसी व्यक्ति या वस्तु में रहने वाली मूल वृत्ति, प्रकृति, स्वभाव, मूल गुण, किसी जाति, वर्ग पद आदि के लिये निश्चित किया हुआ कार्य या व्यवहार और विज्ञान माने किसी विषय के सिद्धांतों का विशेष रूप से विवेचित ज्ञान, क्रमबद्ध और व्यवस्थित ज्ञान, जिसे प्रमाणित भी किया जा सके। इसका उदाहरण बताया गया है कि महाभारत और श्रीमद भगवद गीता में जहां एक ही व्यक्ति के लिये अलग-अलग देश, काल, परिस्थितियों में अलग अलग धर्म की बात कही गई है, यथा स्वधर्म, क्षत्रीय धर्म, कुल धर्म, राज धर्म, मानव धर्म आदि। यानी हम कह सकते हैं कि एक ही व्यक्ति के अलग अलग देश काल, परिस्थितियों में अलग अलग धर्म होंगे। वहीं दूसरी ओर हम देखते हैं कि विज्ञान विवेचित, क्रमबद्ध और प्रमाणित ज्ञान है। सामान्य रूप से धर्म को विश्वास आधारित माना जाता है, हर बात मानने के लिये कहा जाता है, मानने से विश्वास उत्पन्न होता है, वस्तुतः हम विश्वास उसी चीज का करते हैं जो हम नहीं जानते, जो जानते हैं उस पर हम यह नहीं कहते कि हम विश्वास करते हैं, क्योंकि वह हम जानते ही हैं। डॉ.पीयुष ने पुस्तक में बहुत सी बातों को वर्णन किया है जो गले उतरती है। विश्वास और अन्धविश्वास में कोई अंतर ब्भी नहीं है, तो कुछ लोग अविश्वास पर विश्वास करने लगते हैं, जबकि अविश्वास भी शीर्षासन करता हुआ विश्वास ही है। अब आप इस पर अपना तर्क दे सकते हैं, किंतु उसके पहले आपको यह पुस्तक पढनी होगी क्योंकि आप जो कुछ भी सोच रहे हैं, तर्क करना चाहते हैं वो सबकुछ इसमें जवाबी तौर पर मिलेगा। पुस्तक में कई वाक्य हैं जिन्हें एक नज़र में पढने से दिमाग उसे काटने या फिजुल का मानते हुए तर्क देने लगता है, मगर जैसे ही आगे पढना होता है हमे हमारे जवाब खुद ब खुद मिलते जाते हैं। अब यदि आपने इस पुस्तक में पढा कि ' हमारी आयु नहीं, सांसे तय होती है" या "वास्तविकता, वास्तविक नहीं," तो पुस्तक आपको वैज्ञानिक, प्रमाणित आधार पर जवाब भी देगी।
बहुत सी बातों का जिक्र मैं करना चाहता हूं किंतु चूंकि ब्लॉग पर बडा आलेख जैसा कुछ अधिक पढ सकने की पाठकों की आदत नहीं होती, इसलिये संक्षिप्त में यही कि 'अनंत यात्रा, धर्म का विज्ञान" इस जीवन, जगत, बृह्मांड और होने वाली क्रिया-प्रतिक्रियाओं का बखूब वैज्ञानिक दर्शन है जिसे पढा ही नहीं बल्कि समझा और जानना भी चाहिये। धन्यवाद दूंगा मैं डॉ.पीयुष श्रीवास्तव को जिन्होंने मुझे यह पुस्तक प्रेषित की, और पुस्तक ने मेरी बहुत सी सोच को पूर्णता की ओर जाने में मदद की। निश्चित रूप से मेरे पाठक इसे पाने की चाह रखेंगे तो उनके लिये यह लिखना जरूरी समझता हूं कि वे" श्यामल प्रकाशन, 38-दुर्गानगर, रीवा, म.प्र. के पते पर सम्पर्क कर सकते हैं।

बुधवार, 15 जून 2011

हम-तुम-सब



कंधे पर आ गया है
ढो रहे से लगते हैं।
है इसलिये बना हुआ है,
मगर जिन्दा लाश की तरह
वेंटीलेटर पर पडा।

न कोई रोमांच
न ही उत्साह,
न मिलने-जुलने की वो
मीठी सी तडप,
मानों खून ठंडा हो गया है,
दुनियाई गरमी
'उसके' सारे धर्मों को
जला चुकी है।

सच तो यह है कि
अब वो बात नहीं रही तुममे,
या उस बात को कहीं कैद कर
दफन करने की कोशिश है।
हां, तुम्हारी आंखों में
आधुनिक जगत का
कलात्मक काजल है,
खूबसूरत है मगर
जिसमे मेरा देहाती
गांवठी-गंवार सा मन
प्रतिबिम्बित नहीं होता।

बातें हैं, खूब सारी
मगर जो मन को छू ले
ठंडी सी बयार से
रोम रोम रोमांचित कर दे
वह विलक्षणता धूमिल हो गई है।
न इधर, न उधर
दोनों तरफ से जमी हुई काई
फिसलन पैदा कर चुकी है।
और जो असल में
होनी चाहिये वो फसल
फासलों के बीच सूख कर
जमींदोज़ होने लगी है।

फिर भी
बेहतर लगता है और और ढोने में
सुकून मिलता है शायद,
क्योंकि इसके आदी होने लगे हैं हम-तुम-सब।

मंगलवार, 3 मई 2011

लेखा-बही

बहुत दिनों से लिखना नहीं हो पा रहा है। इधर रीवा से श्रद्धेय डॉ.पियुष श्रीवास्तव की एक शोध व बोधपरक पुस्तक "अनंत यात्रा, धर्म का विज्ञान" प्राप्त हुए कई दिन हो गये तथा उसे दो-तीन बार पढ भी लिया, किंतु उस पर कुछ लिखने की इच्छा मेरे कार्यों की व्यस्तताओं के कारणवश अधर में है। अपनी इच्छा को शब्द रूप देकर शीघ्र संपादित करुंगा ही, इसके पहले वर्ष 2001 में एक छोटी सी रचना लिखी थी जो डायरी पलटते हुए दिखी तो सोचा ब्लॉग पर चिटका दूं.., न जाने क्यूं मुझे इसकी पंक्तियां अच्छी लगी. ..हालांकि बहुत ही साधारण है मगर अपनी मुर्गी है सो अच्छी लगनी ही है...खैर

"अकेला नहीं
मगर
भीड में नहीं,
अस्तित्व अपना
अदना ही सही।
कुछ जानें
कुछ न जानें..
अपना यही
लेखा-बही।"

बुधवार, 9 मार्च 2011

थैली के चट्टे-बट्टे

जितना अपने चुनावी दांव-पेंच और मतदाताओं को उल्लू बना सकने में गंभीरता अपनाई और दिमाग लगाया जाता है उतना यदि देश के लिये कांग्रेस सोचे तो सच में आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिल सकते हैं, किंतु अफसोस यही है कि कांग्रेस का हर नेता देश के लिये नहीं बल्कि अपने चुनावी और अपने गठबंधन को ध्यान में रखकर अपनी काबिलियत सोनिया गांधी के सामने बघारने की कोशिश करता रहता है। अफसोस यह भी है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के लिये भी बढिया नेता होने का मापदंड यही है कि उक्त नेता कांग्रेस को कितना फायदा पहुंचा सकता है और जब भी गठबंधन में कभी गडबड हो तो चुनाव जीतने तथा मतदाताओं को बेवकूफ बना सकने में वो कितना पारंगत है? कांग्रेस यहां तो हमेशा सोच समझकर, आगा-पीछा देख कर कदम उठाती है, मगर जब भी देश की बात आती है तो टालमटोली करती दिखती है, यहां तक कि उसका प्रधानमंत्री यह कह कर टाल जाता है कि उन्हें कुछ भी पता नहीं था। थॉमस मामले में यही हुआ। महंगाई हो, या बढता भ्रष्टाचार यूपीए की ऐसी कोई नीति अभी तक देखने को नहीं मिली है जो इस पर अंकुश लगा सके। यह विडंबना है इस देश की कि जनता भी कांग्रेस की इस कुचाल में फंस जाती है और वह देश में कोई बडा बदलाव लाने की फिक्र से ऐन वक़्त मुंह मोड लेती है। सच यह भी है कि कांग्रेस भारतीय जनमानस को अच्छी तरह से जानती-समझती है। यही वजह है कि उसके जाल में वो पार्टियां भी अपना हित साधने के लिये फंस जाती है जो आये दिन उसका विरोध करती रहती हैं। जैसा कि हाल ही में देखने को मिला जब पीएम ने माफी मांगी और विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने उन्हें माफ कर दिया। यह मामला सिर्फ माफी मांगने और माफी देने तक का ही था क्या? उधर डीएमके कल तक कांग्रेस से अपनी सीटों के बंटवारे में एकमुश्त शर्त की बात कर रहा था और सरकार से अलग हट जाने की बात ताल ठोंक कर दर्शा रहा था, किंतु अचानक सबकुछ तय हो गया और डीएमके कांग्रेस के साथ हाथ मिलाते नज़र आने लगी। उधर आप समाजवादी पार्टी का उदाहरण ले लीजिये, जब डीएमके ने अपना हाथ खींचने की बात कही तो इसका राजनीतिक फायदा उठाने के लिये मुलायम सिंह यादव ने झट से यह घोषणा कर दी कि वो यूपीए गठबंधन के साथ बने रहेगे और सरकार को किसी अनहोनी का सामना नहीं करना पडेगा। सपा की नीति, उसका कार्य और उसकी विचारमीमांसा रहस्यवादी है, शायद वो नहीं जानती कि स्वार्थगत राजनीति में अपना भविष्य तलाशने वाली पार्टियों को कभी न कभी मुंह की खानी ही पडती है। खैर, फिलहाल सपा ने जो सोचा था कि वो सोनिया गांधी की नज़रों में विश्वासपात्र बन जायेगी, डीएमके के राजी होने के बाद उसका भी कचरा हो गया है। दरअसल यह सब इसलिये होता है कि आज यूपीए गठबंधन की हर पार्टी किसी न किसी घोटाले या विवाद से दो हाथ कर रही है और अगर कांग्रेस से वो अलग हट जाती हैं तो उनका सत्यानाश अवश्य संभव है, लिहाज़ा खिसायाते हुए सब नतमस्तक होते रहते हैं और सोनिया गांधी को खुश करने में ही अपनी राजनीतिक भलाई मानते हैं।
बहरहाल, कांग्रेस-द्रमुक का गतिरोध लगभग खत्म हो चुका है, इससे जयललिता को भी झटका लगा होगा जो यह सोच कर बैठ गईं थी कि अब इस गतिरोध का फायदा उन्हें अपने राज्य में जरूर मिलने वाला है। प्रणब मुखर्जी का दिमाग और उनका कांग्रेस के प्रति समर्पित जीवन ही ऐसा रामबाण है जो करुणानिधि को साध गया। यह सोनिया गांधी भी जानती थी कि ऐसे समय उनके पास तुरुप का इक्का प्रणब मुखर्जी के रूप में मौजूद है, इसलिये ही वे द्रमुक की हवाबाजी से चिंतित नहीं हुई। डीएमके ने कांग्रेस को 63 सीटे दे दी। पिछली बार उसके खाते में 48 सीटे थी, आप सोच सकते हैं कि जो भी सौदेबाजी हुई होगी वो कितनी उच्चस्तरीय रही होगी। करुणानिधि की पत्नी भी 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच दायरे में है और करुणानिधि चाहते हैं कि इस दायरे से उनकी पत्नी को दूर रखा जाये। मज़ेदार बात यह है कि यहां आपस में लडाई वो करते हैं जो खुद के गिरेबां में कलंकित है, और यह जानते हैं कि एकदूसरे की ही उन्हें जरुरत है। वे बस जनता को बेवकूफ बना सके और अपनी महत्ता को दर्शा सकने के लिये हाथ-पैर चलाते रहें, उनका यही परम कर्तव्य है।
अब इस गतिरोध के बीच जयललिता को देखिये जिन्होंने कांग्रेस को अपने 9 सांसद देने की बात से राहत पहुंचाने का काम किया था। कांग्रेस जयललिता के फेंके जाल में फंस जाती मगर उसने देखा कि जयललिता ने अभिनेता विजयकांत की डीएमडीके को 41 सीटे दे रखी है तो उसे यह सौदेबाजी रास नहीं आई। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस विजयकांत से हाथ मिलाती इसके पहले यह बाज़ी जयललिता ने मार ली थी, विजयकांत की पार्टी तमिलनाडु राजनीति में डीएमके और एआईडीएमके के बाद तीसरी सबसे बडी पार्टी के रूप में उभरी थी। ऐसे में कांग्रेस के पास उस वक्त डीएमके से जुडना लाचारी थी, अब चूंकि उसने देखा कि जयललिता के साथ अगर वह हाथ मिलाती है तो चुनाव में इसका खामियाजा उठाना पडेगा, क्योंकि उसके हाथ से डीएमके जैसे दूसरी बडी पार्टी छूट जायेगी, उधर जयललिता चाहती थी कि यदि वह कांग्रेस को पटा लेगी तो इस बार के विधानसभा चुनाव में फिर सत्ता पर आसानी से काबिज हो सकती है। किंतु कांग्रेस के लिये यह फायदेमंद सौदा नहीं था सो उसने डीएमके को पकडे रखा, डीएमके के लिये भी कांग्रेस को खोना उसकी अपनी नींद हराम होने जैसा ही था, एक तो वामपंथी पार्टियों ने उसका दामन छोड रखा है, दूसरे जयललिता ने स्थानीय पार्टियों को अपने खेमे में ले रखा है, डीएमके के लिये अकेले चुनाव लडना आसान भी नहीं था, सो थोडी हुडकी देने के बाद कांग्रेस को कांग्रेस की शर्तों पर सीटे दे दी, जब जयललिता ने यह प्रेम-मोहब्बत देखी तो वो फिर से कांग्रेस की दुश्मन पार्टी बन गई हैं। एक तरफ दोस्ती का हाथ बढाया जाता है और जब मामला करवट बदलता है तो झट से हाथ खींच लिया जाता है या हाथ मलते हुए मतदाताओं को रिझाने के लिये तर्कों-कुतर्कों का सहारा लिया जाने लगता है। राजनीति इसीको कहते हैं। मुलायम हो या जयललिता जैसे नेता सत्ता और सत्ता में बने रहकर अपने खिलाफ कोई मुहिम न चल पडे जैसी सोच के तहत कांग्रेस के आगे झुकते रहते हैं। आप यह भी देखिये कि कांग्रेस कितनी पारंगत है, कितनी मंझी हुई है कि वो तमाम विवाद के बावजूद हमेशा जीत हासिल करती है, इसका एकमात्र कारण यह है कि इस देश में उसका कोई मज़बूत विकल्प नहीं है। एक भारतीय जनता पार्टी है किंतु वो भी अपने स्थान पर अडिग रहने वाली नहीं है। उसकी करवटों से देश भलिभांति परिचित है। पहले राममंदिर का मुद्दा था तो जमकर वोट कबाड लिये गये, अब वो मुद्दा उनकी प्राथमिकता से हट गया है। इंडिया शायनिंग का गुब्बारा भी फुस्स हो चुका है और वे विपक्ष में आ बैठी। अब जब उसके पास ढेरों अवसर हैं तो उसे भुनाने में भी वो देश को अपने स्वार्थ से पीछे धकेल कर सोचती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सीवीसी के थॉमस मामले में लगभग फंस चुके थे और भाजपा ने जिस तरह से उसे प्रचारित करके अपनी छवि संसद में कठोर बनाई थी उसकी हवा पीएम की माफी मांग लेने से ही निकल गई। भाजपा में भी इस विचार के दो धडे हो गये हैं, सुषमा स्वराज के अचानक माफ कर देने वाले लहज़े को दूसरे कुछ नेता समझ नहीं पा रहे हैं। समझे भी कैसे जब आप किसी मुद्दे को देश के साथ जोडते हैं और संसद तक को ठप करके कार्यवाही चाहते हैं,तब अचानक उस मुद्दे को कैसे ठंडा किया जा सकता है? जबकि उसके लिये आपने देश के जनमानस तक को झंझोड कर रखा। क्या वो मुद्दा अपका निजी था? जो आपके माफ कर देने से खत्म हो गया? भाजपा ने इस मुद्दे को अंजाम अपनी स्वार्थगत राजनीति खेल कर दिया। कुलमिलाकर आज चल यही रहा है आप इस देश को, देशवासियों को किस तरह से चूना लगा कर उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड कर सकते हैं, उनकी आंखों में धूल झौंककर अपनी रोटियां सेंक सकते हैं। आप इसमे जितने निपुण हैं उतने ही सफल हैं। और बेचारे सामान्य देशवासी? उनके लिये रोज अखबार पढना, चैनल देखना और किसी चौपाल पर बैठकर राजनीति की बहस कर लेना, फिर उसी महंगाई, रोज-रोज की आपाधापी में ही जीवन गुजार देना भर है। दूसरी ओर तमाम दल एक थैली के चट्टे-बट्टे से अधिक कुछ नज़र नहीं आते।

शनिवार, 5 मार्च 2011

वाह रे मनमोहना

देश का प्रधानमंत्री तब स्वीकार करता है, तब अपनी जिम्मेदारी मानता है जब सुप्रीम कोर्ट उसके कान उमेठता है। अगर मान लीजिये ऐसा नहीं होता, अदालत बीच में नहीं आती तो क्या कोई जान पाता कि एक धीर-गंभीर, सुशील, बुद्धिमान दिखाई देने वाले प्रधानमंत्री के दो चेहरे भी हैं? आप मान सकते हैं कि यह कैसा मुखिया है जो जैसा दिखता है वैसा है नहीं। अब तक सिर्फ माना जाता था किंतु अब तो खुद उनके स्वीकार कर लेने के बाद स्थितियां साफ हो गई कि बेशर्मी की कितनी हद है। पी जे थॉमस की नियुक्ति अवैध थी, क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नहीं जानते थे? यदि नहीं जानते थे तो क्यों नहीं जानते थे? जानने के लिये जब सुषमा स्वराज ने अपनी आपत्ति जाहिर की और मामले की तमाम जानकारी दी तब भी उनकी आंखे बंद क्यों रही? और जब सुप्रीम कोर्ट ने हंटर चलाया तब ही उन्हें अपनी जिम्मेदारी का अहसास क्यों हुआ? और क्या इस अहसास के बाद वे प्रायश्चित करेंगे? यदि करेंगे तो वो प्रायश्चित क्या होगा? जो भी होगा, किंतु यह सच है कि अगर विपक्ष या यह देश उन्हें सबसे अशक्त प्रधानमंत्री का तमगा देता है तो कोई गलती नहीं करता है। आप अगर मनमोहन सिंह को इसके बाद भी बेहतर प्रधानंमंत्री मानते हैं तो कम से कम अब आपको अपनी राय बदल लेनी चाहिये।
दिलचस्प होगा यह जानना कि मनमोहन सिंह के इस कबूलनामे के बाद राजनीतिक परिदृष्य कैसा होगा? वैसे भी यूपीए सरकार के दिन गर्दिश में दिखाई दे रहे हैं उपर से उसके सबसे मज़बूत धडे करुणानिधि ने भी अपना समर्थन वापस लेने की बात कर दी है, उधर पहले ही कांग्रेस भ्रष्टाचार के दलदल से उबरने का असफल प्रयत्न कर रही है और एक के बाद एक कई खादीधारी कालेधन के जाल में फंसते नज़र आ रहे हैं। ऐसे कार्बनयुक्त माहौल में अब खुद मनमोहन सिंह के हाथ कालिख लगती हैं तो यकीनन यह कहा ही जा सकता है कि सरकार की दाल में काला ही नहीं बल्कि पूरी दाल काली है।
बहरहाल, क्यों थॉमस को लेकर सरकार ने सीवीसी की गरिमा का ख्याल नहीं रखा? क्यों मनमोहन सिंह मौन रहे? और यदि अब जाकर उन्होंने जिम्मेदारी कबूली है तो इसकी सजा क्या है? जिम्मेदारी कबूलना ही यह साबित करता है कि मनमोहन सिंह पहले से जानते रहे हैं कि थॉमस नामक चीज क्या है? यानी देश को अंधेरे में रखा गया, क्यों रखा गया? ऐसे कितने ही सवाल अपनी तेज बौछारों के साथ प्रधानमंत्री के माथे पर ओले की तरह पड रहे हैं। सरकार ने जो काम किया है वह निस्संदेह शर्मनाक है, विपक्ष तो यह चाहेगा ही फिर भी जनमानस मानता है कि अगर प्रधानमंत्री में थोडी भी शर्म शेष है तो अपने पद से हट जाने की हिम्मत दिखाई जा सकती है, मगर सत्तालोभ और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेस के लिये यह संभव नहीं। वो तो शुक्र है कि हमारे देश में न्यायपलिका का इमानदाराना रौब चलता है अन्यथा देश का तो भगवान ही मालिक होता। जब राजा ही सो रहा हो तो उसके मंत्री-संत्री सब इसका फायदा उठाते हैं, थॉमस जिस दादागिरी के साथ अपने पद पर अडिग थे वो स्पष्ट करता है कि उनके सिर पर किसी बलवान का वरदहस्त था। और यह बलवान कौन? प्रधानमंत्री के अतिरिक्त और कौन हो सकता है? दिक्कत यह है कि अब वे ऐसा मान भी नहीं सकते कि वे कुछ नहीं जानते थे, या उन्हें समझने में देर लगी, या फिर वे किसी दबाव में थे। अफसोसजनक तो यह भी है कि 3 सितंबर 2010 से आज तक के इतने समय के बाद तथा इतने वाद-विवाद के बाद जब अदालत की फटकार लगती है तब उन्हें अपने फर्ज़ की याद आती है और वे अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। पर हास्यस्पद यह भी है कि एक ओर सरकार कह रही है कि थॉमस हटाये जा चुके हैं किंतु अभी भी यह भ्रम कायम है (सरकार सोमवार को संसद में जवाब देने वाली है) क्योंकि थॉमस महोदय की ओर से अपने पद से इस्तीफे की बात अभी भी बाहर नहीं आई है। उन्होंने इस्तीफा दे दिया है, इसका कोई सबूत दिखाई नहीं दिया है यानी यह एक घिनौना मज़ाक नहीं तो क्या है? देश का सीधे सीधे मखौल उडाया जा रहा है, और अपनी दादागिरी व्यक्त की जा रही है, मानो थॉमस महोदय देश और देश की न्याय व्यवस्था से कोई उपर के आदमी हैं। ऐसे आदमी को तुरंत घसीटकर चौराहे पर लाकर फटकार लगाने की जरुरत होती है, किंतु ऐसा हो नहीं रहा। क्यों नहीं हो रहा? क्योंकि निश्चित रूप से थॉमस के पास कोई जादू की छडी है जिससे सरकार सहमी हुई है। थॉमस की नियुक्ति के नेपथ्य में यह तय है कि कोई बहुत बडा गेम छुपा है जो सरकार खेलने जा रही थी। पर देश का सौभाग्य है कि उसके लोकतंत्र के सबसे मज़बूत स्तंभ न्यायपालिका को डिगाना संभव नहीं है।
केरल के 1990 में हुए पामोलीन आयात घोटाले के आरोपी हैं थॉमस। उनका दामन दागदार तो है ही साथ ही उन्हें तो किसी प्रकार की सतर्कता या जांच-पडताल का अनुभव भी नहीं है, जो किसी भी सीवीसी के करतार के लिये आवश्यक होता है, बावजूद उनकी नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम ने जल्दबाजी दिखाई साथ ही नियुक्ति के लिये गठित पैनल की तीसरी सदस्य सुषमा स्वराज की बार-बार मनाही को सिरे से खारिज करते हुए थॉमस की नियुक्ति पर ठप्पा लगा दिया गया। जिस व्यक्ति पर एफआईआर दाखिल हो, जिसकी जमानत विचारधीन हो, जिस पर भ्रष्टाचार का मामला चल रहा हो क्या उससे आप उम्मीद कर सकते हैं कि वो सीवीसी के तहत जो भी कार्य करेगा पाक-साफ करेगा? दरअसल यह सब 2 जी स्पेक्ट्रम जैसे बडे-बडे घोटाले पर पानी फेरने और देश को गुमराह करने की कवायद ज्यादा जान पडती है जो सरकार के भ्रष्ट रूप को दबा सके। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह सब आखिर क्यों किया? किसके दबाव में किया? क्यों उन्होने देश को भुलावे में रखने का प्रयत्न क्या? और अब यदि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी कबूली है तो वे इसका उदाहरण किस रूप में देंगे? क्या वे जानते हैं कि खुद को अगर वे इमानदाराना साबित करना चाहते है तो उन्हें पहले अपनी मजबुरी बयां करनी होगी, फिर अपने उपर पडे विशेष दबाव का खुलासा करना होगा। मगर विडंबना यह है कि ऐसा होगा नहीं, क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेस का कचूमर निकल जायेगा। ऐसी कांग्रेस के पास हिम्मत नहीं कि वो देश के लिये अपना बलिदान दे सके, इसका मतलब यह हुआ कि देश को अब नया खेल देखने को तैयार हो जाना चाहिये। आप यूपीए गठबंधन का कालिख लगा दामन किसी सर्फ एक्सेल से धुला हुआ देख सकते हैं। क्योंकि यह तय है कि सरकार अब थॉमस की जगह नये की नियुक्ति कर देगी और इस पूरे विवाद को पीछे छोड देगी। प्रधानमंत्री की ली गई जिम्मेदारी से उठे सवाल जैसे थे वैसे ही रखे रह जायेंगे और एकबार फिर देश की जनता किसी बडे सच से अनजान रह कर नये फेरे में अपनी नज़र गाढ लेगी। यह देश का दुर्भाग्य है। और इसे कांग्रेस अच्छी तरह से समझती है कि भारतीय लोगों को भूलने की आदत है, उन्हें आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। वैसे भी तुलसीदास की चौपाई चरितार्थ होती है कि " समरथ को नहिं दोष गुंसाई...।"

मंगलवार, 1 मार्च 2011

क्या अच्छा सोचूं?

मन-मस्तिष्क भटके हुए हैं, भटके इन द सेंस अस्थिर हैं, जिसमें आप बैठकर कोई बेहतर लेखन नहीं कर पाते, किंतु विचारों के चक्रवात में भी फंसा है मन, जो उगल देना चाहता है जो कुछ भी हैं, जैसा भी है..। तो उस 'विज्ञापन' की तरह जिसमें रितिक रोशन की टोपी बवंडर में उडती है और वो अपनी बाइक लेकर उस बवंडर को चीरते हुए अपनी टोपी हासिल कर लेता है, ठीक वैसा ही प्रयास मेरा है, शेष आप बतायें-

"अचानक मन ने चाहा कि
कभी कुछ अच्छा भी सोचा जाये।
अच्छा यानी भला-भला सा
चाहे वो दीन-दुनिया के बारे में क्यों न हो?

किंतु क्या?

मेरे चारों ओर लगभग
सड चुके विचारों की दुर्गंध है,
बोथरी हो चुकी रचनात्मकता है
उलझे हुए जीवन हैं
और मरी हुई जिजीविषा है।

उधर सीमा पार
जब फर्लांग मार कर जाता हूं तो
काटने-मारने की आवाजें ही कानों में पडती हैं।
इधर भी ज्यादा कुछ अंतर नहीं है।

वातानुकुलित कमरों में बैठकर
खेत-खलियान की बातें हैं,
और खेत-खलियान कभी
सूरज की तपन से तो कभी
बादलों के प्रकोप से उजडे पडे हैं।
किसानों की आंखों से टपकते आंसू
उनके 'लोन' अदा नहीं कर सकते।
उनके बच्चों के पेट
मिलावटी खाद और रासायनिक पदार्थों से
भरे नहीं जा सकते।


अरे, मगर यह सब तो मुझे सोचना नहीं है
क्योंकि आज कुछ अच्छा सोचने
की दरकार करता है मन।

हां, जब फसल अच्छी होती है तो
चेहरे नाचने लगते हैं।
कम से कम उन्हें तो पता नहीं है
कि यह सब
स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है,
जो ऊंचे दाम अदा करके
खाते हैं अनाज।
वैसे भी जीवन कितना बडा होता है?
और सुखद यह कि
यह सब जानती है सरकार भी।

सडक पर निकलते समय
भले ही डर लगता है कि
कहीं कुछ हो न जाये?
भले ही घर में बीवी
लौट आने पर राहत महसूस करती है।
किंतु इससे
आतंक का खात्मा तो नहीं हो सकता न?
पर खुशफहमी है कि
खुद बच निकले।

लालच और भ्रष्ट आचार में
आकंठ डूबे हिन्दुस्तानियों की
वीरता देख कर भी लगता है कि
कोई सरकार या कोई कानून उनका
बाल बांका नहीं कर सकता,
क्योंकि
चाहे सरकार हो या कानून
सब कोई एक ही थैली के चट्टे-बट्टे से
दिखते हैं,
और क्या यह कम बडी बात है कि
हमारे हर कार्य शीघ्रता से निपट जाते हैं
और टेबल के नीचे
मुस्कुराता दिखता है शिष्टाचार।

धर्म पाखंड से खंडित है
तर्क, कुतर्कों में सध रहे हैं
वचनबद्धता बेमानी हैं
प्रवचन जारी हैं,
'रंग' भी लड रहे हैं,
यानी सबकुछ गड्डमड्ड है।
यह चूरमा है उस रोटी का जो बासी है
मगर खिलाई जा रही है शौक से।

'वो' करोडों में खेलते हैं
चाहे 'योग' के नाम या 'भोग' के नाम से,
हैं परम पूजनीय,
और यह उम्मीद कि संतों के देश का
कल्याण संभव है,
यह विचार कुछ देर तक तो शुभ लग सकते हैं न?

किंतु सच से मुख मोडा
नहीं जाता और तुलसी बाबा ध्यान आ जाते हैं
कि-
कलिमल ग्रसे धर्म सब
लुप्त भए सदग्रंथ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि
प्रगट किये बहु पंथ।
भए लोग सब मोहबस
लोभ ग्रसे सुभ कर्म,
सुनु हरिजान ग्यान निधि
कहउं कछुक कलिधर्म।


कलिधर्म का सच होता सिलसिला
बखान होगा तो
वह सोच जाती रहेगी कि
कुछ अच्छा सोचना है।
किंतु विडंबना भी है कि
क्या अच्छा सोचूं?