मंगलवार, 30 मार्च 2010

मेरी नज़र में-नाटककार चरणदास सिद्धू (भाग-2)

अनुभव जब एकत्र हो जाते हैं तो वे रिसने लगते हैं। मस्तिष्क में छिद्र बना लेते हैं और ढुलकने लगते हैं, कभी-कभी हमे लगता है अपनी खूबियों को बखानने के लिये व्यक्ति लिख रहा है, बोल रहा है या समझा रहा है। किंतु असल होता यह है कि अनुभव बहते हैं जिसे रोक पाना लगभग असम्भव होता है। नदियां बहुत सारी हैं, कुछ बेहद पवित्र मानी जाती है इसलिये उसमें डुबकी लगाना जीवन सार्थक करना माना जाता है। हालांकि तमाम नदियां लगभग एक सी होती हैं, कल कल कर बहना जानती हैं, उन्हें हम पवित्र-साधारण-अपवित्र आदि भले ही कह लें किंतु किसी भी नदी को इससे कोई मतलब नहीं होता कि उसे कैसा माना जा रहा है या वो कैसी है? वो तो निरंतर बहती है, सागर में जा मिलती है। आप चाहे तो उसके पानी का सदुपयोग कर लें या उसे व्यय कर लें, या फिर नज़रअंदाज़ कर लें, यह सब कुछ हम पर निर्भर होता है। ठीक ऐसे ही आदमी के अनुभव होते हैं, जो रिसते हैं, कलम के माध्यम से या प्रवचन के माध्यम से या किसी भी प्रकार के चल-अचल माध्यम से। कौन किसका अनुभव, किस प्रकार गाह्य करता है यह उसकी मानसिक स्थिति या शक़्ति पर निर्भर है। " मेरी दृष्टि में, एक सुखी जिन्दगी वो होती है जिसमें जरूरी आराम की चीज़े हों, मगर ऐशपरस्ती न हो। इसमें किसी किस्म का अभाव महसूस न हो। सब्र संतोष हो। इसके लिये आवश्यक है कि आदमी तगडा काम करे जो इंसानियत की भलाई की खातिर हो। सबसे अहम बात-एक सुखी जीवन रिश्तेदारों और दोस्तों की संगत में, दूसरों के वास्ते जिया जाय।" ( 'नाटककार चरणदास सिद्धू, शब्द चित्र', - सुखी जीवन-मेरा नज़रिया पृ.17) डॉ. चरणदास सिद्धू अब जाकर यह कह सके, यानी 44-45 वर्षों बाद, तो इसे क्या उनके जीवन का निचोड नहीं माना जा सकता? मगर ये ' दूसरों के वास्ते जिया जाय' वाला कथन मुझे थोडा सा खनकता है क्योंकि पूरी जिन्दगी उन्होंने नाटक को समर्पित की, उनका परिवार उनके समर्पण में सलंग्न रहा तो इसे मैं दूसरों के वास्ते जीना नहीं बल्कि अपने लक्ष्य के वास्ते जीना ज्यादा समझता हूं। वैसे भी जब आप किसी लक्ष्य पर निशाना साधते हैं तो शरीर की तमाम इन्द्रियां आपके मस्तिष्क की गिरफ्त में होती है और आपको सिर्फ और सिर्फ लक्ष्य दिखता है, ऐसे में दूसरा कुछ कैसे सूझ सकता है? यह सुखद रहा कि सिद्धू साहब को जैसा परिवार मिला वो उनके हित के अनुरूप मिला। यानी यदि जितने भी वे सफल रहे हैं उनके परिवार की वज़ह भी उनकी सफलता के पीछे है और यह उन्होंने स्वीकारा भी है। खैर..। पर यह तो नीरा दर्शन हुआ, जिसमें जीवन के लौकिक रास्तों से हटकर बात होती है। पर असल यही है कि सिद्धू साहब बिरले व्यक्ति ठहरे जिनका अपना दर्शन किसी गीता या कुरान, बाइबल से कम नहीं। यथार्थवादी दर्शन। और यह सब भी इसलिये कि उन्होंने जिन्दगी को जिया है, नाटकों में नाटक करके, तो यथार्थ में उसे मंचित करके। उनकी पुस्तक 'नाट्य कला और मेरा तजुरबा' जब पढ रहा था तो उसमे पहले पहल लगा कि व्यक्ति अपनी महत्ता का बखान कर रहा है, या करवा रहा है। किताब सबसे उत्तम जरिया होता है। मगर बाद में लगा कि व्यक्ति यदि अपनी महत्ता बखान भी रहा है तो फिज़ुल नहीं, बल्कि वो वैसा है भी। और यदि वो वैसा है तो उसका फर्ज़ बनता है कि वैसा ही लिखे या लिखवाये। कोई भी कलाकार हो, उसे अपनी कला का प्रतिष्ठित प्रतिफल मिले, यह भाव सदैव उसके दिलो दिमाग में पलता रहता है। यानी यह चाहत कोई अपराध नहीं। सामान्य सी चाहत है। इस सामान्य सी चाहत में रह कर असामान्य जिन्दगी जी लेने वाले शख्स को ही मैरी नज़र महान मानती है। महान मानना दो तरह से होता है, एक तो आप उक्त व्यक्ति से प्रभावित हो जायें, दूसरे आप व्यक्ति का बारिकी से अध्ययन करें, उसके गुण-दोषों की विवेचना करें। मैं दूसरे तरह को ज्यादा महत्व देता हूं। इसीलिये जल्दी किसी से प्रभावित भी नहीं होता, या यूं कहें प्रभावित होता ही नहीं हूं, क्योंकि यहां आपका अस्तित्व शून्य हो जाता है, आप अपनी सोच से हट जाते हैं और प्रभाववश उक्त व्यक्ति के तमाम अच्छे-बुरे विचार स्वीकार करते चले जाते हैं। ऐसे में तो न उस व्यक्ति की सही पहचान हो सकती है, न वह व्यक्ति खुद अपने लक्ष्य में सफल माना जा सकता है। फिर एक धारणा यह भी बनाई जा सकती है कि आखिर मैं किस लाभ के लिये किसी व्यक्ति के सन्दर्भ में बात कर रहा हूं? और क्या मुझे ऐसा कोई अधिकार है कि किसी व्यक्ति के जीवन को लेकर उसकी अच्छाई-बुराई लिखूं? नहीं, मुझे किसी प्रकार का कोई अधिकार नहीं है। न ही ऐसा करने से मुझे कोई लाभ है। फिर? आमतौर पर आदमी लाभ के मद्देनज़र कार्य करता है। उसे करना भी चाहिये। जब वो ईश्वर को अपने छोटे-मोटे लाभ के लिये पटाता नज़र आता है तो किसी व्यक्ति के बारे में लिख पढकर लाभ क्यों नहीं कमाना चाहेगा? मुझे भी लाभ है। वो लाभ यह कि मुझे सुख मिलता है। किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में लिख कर जिसके माध्यम से अन्य जीवन को किसी प्रकार का रास्ता प्राप्त हो सके, बस इसका सुख। न कभी मैं सिद्धू साहब से मिला, न ही दूर दूर तक ऐसी कोई सम्भावना है कि मिलना हो। और मैं जो भी लिख रहा हूं वो सारा का सारा उनकी किताब में ही समाहित है। मैं तो सिर्फ उस लिखे को सामने रख अपनी व्याख्या कर रहा हूं, जो किसी भी प्रकार से गलत नहीं माना जा सकता। यह मैरा धर्म है कि जब किसी पुस्तक को पढता हूं तो उसे सिर्फ पढकर अलमारी के किसी कोने में सजाकर नहीं रख देता बल्कि उसके रस से अपनी छोटी ही बुद्धि से सही, सभी को सराबोर या अभिभूत करा सकने का प्रयत्न करता हूं क्योंकि कोई भी पुस्तक किसी पाठक से यही चाहती है। यह मेरी, नितांत मेरी एक ईमानदार सोच है। और मेरा कर्म, धर्म लिखना ही तो है सो मैं इसे निसंकोच निभाता हूं। और लाभ यह कि सुख मिलता है। जैसा कि सिद्धू साहब ने लिखा- " सुख तो एक सोचने की आदत है, स्थाई तौर पर अच्छा महसूस करने की हालत। सुख कभी न छूटने वाली वो आदत है जिसके जरिये आप हमेशा चीज़ों के रौशन रुख को ताकते रहें...।" मेरा रुख यही है। सुख की सोच। रोशन रुख को ताकते हुए। तो क्या, सिद्धू साहब दार्शनिक हैं? नहीं। उनका जीवन दार्शनिक है। उनके अनुभव दर्शन है। मैने उनकी किताबों से जो व्यक्तित्व पाया है उसके आधार पर ही मैं कुछ कह सकता हूं। वरना लिखना तो उन लोगों के बारे में होता है जिन्हें आप अच्छी तरह से जानते हों। और यदि मैं कहूं, मैं उनके बारे में कैसे लिख रहा हूं तो वो सिर्फ इसलिये कि मेरी जिन्दगी में उनकी किताबे आईं और उन्हीं किताबों के जरिये अपनी छोटी सी बुद्धि के सहारे बतौर समीक्षक शब्दों में उतार रहा हूं। "नाटक लिखा नहीं जाता नाटक गढा जाता है" ( नाट्य कला और मेरा तजुरबा,मुलाकातें-पृ.165) सिद्धू साहब बताते हैं। जब अपनी धुन, अपने तरह का जीवन जिसने गढ रखा हो वो कोई चीज कैसे लिख सकता है? गढ ही सकता है। काश के मुझे उनके नाटक देखने का सौभाग्य प्राप्त हो पाता? भविष्य में ही सही इंतजार किया जा सकता है। किंतु इधर 1973 से 1991 तक के सफर में उनके द्वारा जो करीब 33 नाटक रचे, लिखे गये हैं उन्हें पढने की उत्सुकता बढ गई है और यह भी तय है कि सबको धीरे धीरे पढ लूंगा। शायद तब डॉ. सिद्धू सर के नाटकों पर लिखा जा सकता है, अभी तो उनके जीवन पर ही लिखी गई किताबें मेरे पास है सो मैं सिर्फ वही लिख सकता हूं। जैसी किताब है। तो अगली पोस्ट में मिलिये और यह भी जानिये कि, हां आदमी जो ठान लेता है, वो करके ही दम लेता है। और जब दम लेता है तो उसके वो दम में बला की तसल्ली होती है। किंतु इस दम लेने के बीच उसे उम्र का बहुत बडा भाग तपा देना होता है। " स्वर्ण तप-तप कर ही तो निखरता है।" कैसे तपे सिद्धूजी? और कैसे निखरे? जरूर पढिये अगली पोस्ट में।

शनिवार, 27 मार्च 2010

मेरी नजर में- नाटककार डॉ.चरणदास सिद्धू

किसी भी व्यक्ति को उसकी किताब से पूरा-पूरा नहीं जाना जा सकता। वैसे भी किसी व्यक्ति को पूरा कब जाना जा सका है, हां उसके करीब रह कर उसकी प्रकृति, उसका स्वभाव, उसकी आदतें आदि जानी जा सकती है और जब ऐसे व्यक्ति किसी के बारे कुछ लिखते हैं तो हम उक्त व्यक्ति के सन्दर्भ में अपनी रूप रेखा बना सकते हैं। बस यही रूप-रेखा खींची है मैने डॉ. चरणदास सिद्धू को लेकर। इस देश में कई ख्यातिनाम नाटककार हुए हैं। उनमे से एक यदि मैं चरणदास सिद्धू को गिन लूं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। ठीक है कि मैने कभी सिद्धू साहब के नाटक नहीं देखे, कभी इसके पहले तक उनके नाम से परिचय नहीं हुआ, कभी उनसे मुलाकात नहीं हुई, किंतु यह कतई जरूरी नहीं होता कि आपके जीवन में कभी कोई महान व्यक्ति आ ही नहीं सकता। समय-समय की बात होती है जब आपको मिलने, पढने आदि को प्राप्त होता है और तब आप कह उठते हैं कि अरे, मैं इनसे पहले क्यों नहीं मिल पाया या मैं इतना अज्ञानी रहा कि अब जा कर इनके बारे में पता चला? खैर देर आयद दुरुस्त आयद। धन्यवाद दूंगा सुशील छौक्कर जी का जिनके माध्यम से मैं डॉ.चरणदास सिद्धू के नाम से परिचित हुआ, फिर उनकी 'नाट्य कला और मेरा तजुरबा' तथा 'नाटककार चरणदास सिद्धू, शब्दचित्र' जैसी किताब पढ पाया। दोनों किताबें सुशीलजी के सौजन्य से ही मुझे प्राप्त हुई। एक आदमी जिसने अपना पूरा जीवन नाटकों को समर्पित कर दिया, जिसने नाटक के अलावा कुछ और सोचा ही नहीं, जिसने अपने सामने आए कई सारे बडे प्रतिष्ठित पदों को ठुकरा दिया, जिसने अपने घर-परिवार तक को नाटक की दीवानगी में दूसरे पायदान पर रखा और जो आज भी नाटक के लिये ही जी रहा है क्या ऐसे व्यक्ति के बारे में जानना-समझना कोई नहीं चाहेगा? क्या ऐसे व्यक्ति बिरले नहीं? मैं समझता हूं कि किसी भी कार्य को करने के लिये सनक होनी चाहिये, सनक यानी दीवानगी आपको कार्य की सफलता तक छोडती है और यदि सफलता की चमक में आपकी आंखे चौन्धियाती नहीं है तो समझो आप सचमुच के आदमी है। बस यही 'आदमी' माना जा सकता है चरणदास सिद्धू को। सुशीलजी ने इनकी बारे में काफी कुछ बताया। फिर पढा। और फिर इनके बारे में, इनके करीबी रहे, छात्र रहे, दोस्त रहे, जानने-समझने वाले रहे व्यक्तियों ने जो कुछ भी लिखा, उसे भी पढा। फिर इनको मनन किया। और तब खींची रूप रेखा जो आपके सम्मुख लाने से रोक नहीं पाया।
इस देश में बेहतरीन नाटककार शेष ही कितने हैं? नाटककारों पर लिखने वाले भी शेष कितने है? और नाटककारों को जानने-समझने के लिये कितनों के पास वक्त है? ऐसे प्रश्न क्यों नहीं कौन्धते है आमजन में? खैर इससे नाटककारों या चरणदास सिद्धू जैसों को कोई मतलब भी नहीं क्योंकि ये तो बस धुनी रमाये हुए हैं, तप में लीन है। दुर्भाग्य हमारा है कि हम वंचित रह जाते हैं ऐसे दुर्लभ जीवन से, जिसके माध्यम से हम जीवन के कई सारे अनबुझे पहलुओं को जान सकते हैं, समझ सकते हैं। क्योंकि नाटककार सिर्फ नाटक मंचित नहीं करता बल्कि अपने जीवन को, अपने परिवेश को, अपने अनुभवों को या कहें एक समग्र जीवन दर्शन को कथानक में उतारकर पेश करता है। वो अभिनय करता या कराता तो है किंतु कहीं वो अपने ही जीवन के साथ खेल भी रहा होता है। कौन खेलता है अपने जीवन के साथ? आज जब मैं अपने चारों ओर भागते-दौडते-खाते-पीते- कमाते- गंवाते लोगों की भीड देखता हूं तो यही ख्याल आता है कि जी कौन रहा है? खेल कौन रहा है? जीवन काट रहें है सब। कट रहा है सबकुछ बस। खेलने के अर्थ बदल गये हैं। खैर..। मैने चरणदास जी के बारे में सुना व पढा है। फक्कड सा जीवन। किंतु ऐसी फक्कडता नहीं कि जीवन का लक्ष्य ही लुप्त हो जाये। अपने लक्ष्य के लिये तमाम बाधाओं को पार करने वाला व्यक्तित्व, अपने शौक के लिये आसमान को ज़मीन पर झुका देने वाला साहसिक जांबाज, अपनी एक अलग दुनिया बना कर चलने वाला दुनियादार इंसान...., क्या कभी मिल भी सकुंगा उनसे? क्योंकि जितना पढा-सुना है वो उनसे मिलने के लिये व्यग्र तो कर ही देता है किंतु अपनी भी बडी बेकार आदत है कि किसी के बारे में जानने-समझने के इस चक्कर में यदि कभी कहीं उसके ही विचारों के कई सारे विरोधाभास जब सामने आते हैं तो उसे कहने-बोलने से भी हिचकिचाता नहीं। कभी-कभी इस आदत के चलते सामने वाला मिलना नहीं चाहता। जबकि मिलकर मुझे बहुत कुछ और जानने-समझने को मिल सकता है जो ज्यादा असल होता है। पर..स्पष्टवादिता की प्रवृत्ति स्वभाव में प्राकृतिक रूप से जो ठहरी। कभी कभी गुडगोबर भी कर देती है। क्योंकि ज़माना औपचारिकता का है और अपने को औपचारिकता की ए बी सी डी नहीं आती। यानी हम जमाने के साथ नहीं है, यह हम जानते हैं। शायद इसीलिये बहुत पीछे हैं। वैसे इस पीछडेपन को हम स्लो-साइक्लिंग रेस मानते हैं। जिसमे जीतता कौन है? आप जानते ही हैं। खैर..डॉ.चरणदास सिद्धू के बारे में सुशीलजी से सुनकर, उनकी किताबो को पढकर उनके बारे में जो चित्र खींचा है वो वाकई दिलचस्प है और जिसे एकमुश्त पोस्ट मे ढालकर पेश नहीं किया जा सकता, सो अगली पोस्ट का इंतजार जरूर कीजियेगा।

रविवार, 21 मार्च 2010

उथले हैं वे जो कहते हैं


किसी भी साहित्यिक रचना या रचना संग्रह को इमानदारी से पढने वाला पाठक अगर मिल जाता है और वो उस रचना पर अपनी राय भी व्यक्त कर देता है तो यह सोने पे सुहागा हो जाता है। उस संग्रह को फिर किसी दूजे पुरस्कार आदि की आवश्यकता ही नहीं होती। मेरे पूज्य पिताजी डॉ. जे पी श्रीवास्तव के काव्य खंड " रागाकाश" के प्रकाशन के लिये जब इस पर मैं वर्क कर रहा था तो कई सारी कठिनाइयां आ रही थीं। पहली तो यही थी कि मैं बगैर पिताजी की आज्ञा के उनकी धरोहर को छापना चाह रहा था। उनकी अपने दौर में लिखी गई कई सारी रचनायें, जिसमें कइयों के कागज़ भी पुराने होकर फटने लगे थे को सहेज कर मुम्बई तो ले आया था अब बस पिताजी की आज्ञा की देर थी। पहले जब उनका साहित्ययुग पूरे उफान पर था, देश-विदेश के बडे से बडे साहित्यकार आदि से मेल मिलाप था, तब परिवारिक परिस्तिथियों ने उनके किसी भी तरह के प्रकाशन सम्बन्धित कार्य को नहीं होने दिया। और जब परिस्थितयां सुधरी तो काफी देर हो चुकी थी, पूरा का पूरा युग मानों बदल गया था, फिर भी उनका लेखन सतत जारी रहा, आज भी पठन-पाठन वैसा ही है जैसा पहले था किंतु लेखन अब ज्यादा नहीं होता। इस दौर में किसी प्रकाशन के प्रति भी उनका रुख उदासीन रहा। फिर भी मेरा प्रयास जारी था, उधर मेरे बडे भाई ने ढांढस बन्धाया कि अभी काम पे लग जाओ बाद में अपनी मंशा पिताजी को बतायेंगे, कुछ हो न हो कम से कम रचनायें व्यवस्थित तो हो जायेंगी। हमारे लिये यही जरूरी था। सो टाइप और इसकी साज सज्जा मैने अपने कमप्युटर पर दिन रात बैठ कर तैयार कर ली। अब? यदि पुस्तक का रूप देना है तो खास समस्या थी प्रकाशक की। दरअसल मेरे पास एक साहित्यक निधि थी, साहित्य के रसिकों के लिये बेहद उपयुक्त व विशुद्ध धरोहर थी सो चाहता था कि अच्छा प्रकाशक मिले। किंतु इस 'बाज़ार' में प्रकाशकों की शर्तों व आनाकानी का जो सीधा अनुभव मैने किया वो संस्मरण योग्य है। खैर..अगर बेहतर सामग्री हो तो उसे बेहतर कलेवर देना ही आवश्यक होता है जिसमे मैं कोई समझौता नहीं करना चाहता था। लिहाज़ा एक प्रकाशक की भूमिका अख्तियातर करने की मानसिकता लिये मैं छापाखानों पर भटकने लगा। कई जगह अलग अलग लागत निकालता रहा और अंत में तय किया कि अब हो न हो अपना प्रकाशन शुरू कर इस दस्तावेज को पुस्तकाकार देना ही है। चाहे जितना पैसा लगे। सो पुस्तक छपने डाल दी। अब सामने था पिताजी को बताना और बाद में विमोचन या लोकार्पण ताकि साहित्य को उसका पूरा पूरा सम्मान मिल सके। कहते हैं न यदि आप अपने कार्य के प्रति इमानदार हों और वो सदमार्गीय हो तो ईश्वर रास्ते निकालते जाता है। रास्ते निकले। पिताजी माने। बडे भाई की मेहनत रंग लाई। फिर तो बाद में आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जी जैसे महान साहित्यकार की अद्वितीय कलम ने 'पुरोवाक' लिखा। "रागाकाश" छपकर आई। विमोचन भी बडे साहित्यकारों की संगत में हुआ। समीक्षायें हुई। किसी ने कहा कि ऐन समारोह पर किताब को डिसकाउंट में बेचा जा सकता है। काफी बिक सकती है। किंतु पिताजी ने साफ इंकार कर दिया। हम भाई भी इस मूड में नहीं थे कि किताब बेचें। साहित्यकार, इसके रसिक परिचितों, मित्रों के साथ साथ देश की कई पत्रिकाओं-समाचार पत्रों में 'रागाकाश' प्रेषित की गई। कुछ ने समीक्षा की, कुछ पचा गये। परिचितों, मित्रो आदि में से किसने कितना लाभ लिया यह उनका अनुभव होगा। किंतु जिस प्रयास की शुरुआत मैने की थी वो 2008 के अप्रैल महीने में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। किताब के बारे में राय आती रही यानी उसकी सार्थकता सिद्ध होती रही। यह नहीं पता था, और न ही इसका कोई प्रयास था कि किसी प्रकार के पुरस्कार के लिये कोई अतिरिक्त उपक्रम किया जाये। वैसे भी पिताजी को पुरस्कार आदि का कभी मोह नहीं रहा, और मैने भी ज्यादा यही सोचा कि 'रागाकाश" पठनप्रेमियों तक ज्यादा से ज्यादा पहुंचे। लिहाज़ा सम्मान या पुरस्कार आदि के सन्दर्भ में कभी हमने सोचा ही नहीं था। पिताजी का मानना रहा है कि- होई वही जो राम रची राखा। सो दो वर्ष बीत जाने के बाद अचानक अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जयपुर राजस्थान की ओर से स्व.सेठ घनश्यामदास बंसल स्मृति 2009-10 का पुरस्कार काव्य संग्रह " रागाकाश" को प्राप्त हुआ है, कि खबर डाक द्वारा आई। श्री नरेन्द्र शर्मा, डॉ. आनंद मंगल वाजपेयी, डॉ. त्रिभुवन राय और डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के सूक्ष्म परिक्षण के बाद तय हुआ रागाकाश को पुरस्कृत करना। इस पुरस्कार से और कुछ हो न हो किंतु यह जरूर ज्ञात होता है कि आज भी बेहतर साहित्य को पूछने-परखने वाले लोग हैं और यथासम्भव उनकी वजह से ही भारत में साहित्य जिन्दा है। क्योंकि साहित्य के जिन्दा रहने के लिये सुधी पाठकों की आवश्यकता होती है। बहरहाल, यह भी एक अनुभव रहा था मेरा जिसने सिखाया कि कार्य इमानदारी से करो, प्रतिफल जो भी हो जैसा भी हो, अच्छा ही होता है। इसी सम्बल से फिलवक़्त उनके एक निबन्ध संग्रह के कार्य में भी रत हूं। देखता हूं कब वो पुस्तक का आकार लेता है? अच्छे प्रकाशक की तलाश तब भी रहेगी ही। और न मिलेगा तो अपना दम है ही।
अब 'रागाकाश' के दूसरे खंड 'रागानुगा" की एक छोटी रचना भी चलते चलते आपको नज़र करता हूं, यह मुझे बहुत पसन्द है, शायद आपको भी पसन्द आयेगी-

" उथले हैं वे जो कहते हैं
वर्ना दुख तो सब सहते हैं
किसको है मिल गया किनारा
सब धारा ही में बहते हैं।

सूखेगा जो हरा बना है
टूटेगा जो अभी तना है
कोई काम नहीं आता है
बडबोलापन यहां मना है।

सृष्टि किसी की नहीं, यहां सब
नश्वर है, टिकता है क्या कब?
जाने किसके हाथ डोर है
दिखा रहा प्रतिक्षण नव करतब।

हार-हार कर हार न मानी
मृत्यु वरण करने की ठानी
ऐसे पुरुषार्थी भी डूबे
डूबे पीर, औलिया, ज्ञानी।

काल अजय है, अजय विधाता
माया है सब रिश्ता-नाता
धीरे-जल्दी, हंसके-रोके
आया है जो, निश्चित जाता॥"

मंगलवार, 16 मार्च 2010

सृष्टि सर्जन का पहला मुहूर्त

बचपन से ही सृष्टि के सन्दर्भ में जानने-समझने की जिज्ञासा रही है। यह विषय मेरे लिये हरहमेश रोमांचित कर देने वाला रहा है। बहुत कुछ पढा-लिखा, अध्ययन किया, साथ ही इस सन्दर्भ में पंडित, ज्योतिष, वैज्ञानिक, ज्ञानियों आदि इत्यादि से समय समय पर अपनी जिज्ञासा शांत करने के उपक्रम भी करता रहा हूं, बावजूद सृष्टि मेरे लिये अबूझ ही बनी हुई है। यानी संतुष्ट नहीं हो पाया हूं कि आखिर ऐसा अजूबा जन्मा कैसे? हालांकि अपने-अपने तरीकों से लगभग सारे शास्त्रों, ज्ञानी महापुरुषों ने इसके बारे में बताया है। समझाया है। विज्ञान का भी अपना तर्क है। जितना अधिक मिल सका उतना मैने पढा भी। किंतु इस क्षुधा का क्या जो शांत ही नहीं होती? खैर..। आज इस व्यक्त सृष्टि का पहला ऊषाकाल है। सवंतसर। समग्र जगत का प्रथम सूर्योदय। भारतीय नव वर्ष का प्राम्भिक दिन। आप गर्व कर सकते हैं कि इसका प्रारम्भ किसी ऋषि-मुनि, पंडित, महात्मा आदि की किसी जन्मतिथि आदि से नहीं है बल्कि जिस क्षण सृष्टि शुरू हुई उसी समय संवतसर का प्रारम्भ हो गया। हां इस तिथि मे कई महाज्ञानी जन्में, मृत्यु को धारित हुए। यहां तक कि युधिष्ठिर विक्रमादित्य समेत कइयों ने अपने अपने संवतसर चलाये भी, किंतु इस प्रथम संवतसर की पहली सौर्यकिरण, पहला दिन, तिथि गणना सचमुच बेहद ही दिलचस्प और अनूठी है। गणना के अनुसार सृष्टि की आयु 1 अरब 95 करोड, 58 लाख, 85 हजार एक सौ 12 वर्ष हो चुकी है। वैज्ञानिक अनुमान भी यही है। आज के दिन से ही काल की भी शुरुआत हुई थी। जी हां वही काल जिसे हम समय, टाइम आदि नाम से जानते हैं। भारतीय दर्शन में काल और ब्रह्म पर्याय हैं। लोकजीवन में काल और मृत्यु को पर्याय माना जाता है। सृष्टि सर्जन से पूर्व काल बोध नहीं था। संवतसर भी नहीं। फिर उसके पहले था क्या? मेरी जिज्ञासा का सूत्रपात इसी प्रश्न से हुआ था। ऋगवेद के नासदीय सूक्त (10.129) में बहुत खूबसूरत चित्रण किया गया है कि- तब न सत था, न असत। न भूमि, न आकाश- "नो व्योमा परो यत।" न मृत्यु थी न अमरत्व। न रात, न दिन। वायु भी नहीं थी किंतु वह एक स्वयं अवात अवस्था में अपनी शक्ति से प्राण ले रहा था- "आनीदवातं स्वधया तदेकं।" अब आप देखिये कितना मजेदार है यह, कि 'वह एक- तदेकं' कौन? .., ऋगवेद में है यह, कि वह बिना हवा के सांस ले रहा था। इसी 'वह एक' को विद्वानजन कभी विप्र इन्द्र, मित्र, अग्नि तो कभी वरूण आदि देव नामों से पुकारते हैं। किंतु वह 'एक सद'- एक ही सत्य है- एकसद विप्रा बहुधा वदंति। (ऋ.1.164.46) सृष्टि सर्जन के मंगलाचरण के साथ का आईना ही परिवर्तन की शुरूआत है। प्रारम्भ है। जब परिवर्तन है तो तय है कोई गति अवश्य है। जहां गति है वहीं समय है। और यही समय का दर्पण ही तो संवतसर है।
विज्ञान में देखें। प्रत्येक सर्जन या बदलाव यानी परिवर्तन के पीछे एक ऊर्जा है। शक्ति के केन्द्र लगातार ऊर्जा दे रहे हैं तो क्या एक दिन इस संचित ऊर्जा का भी क्षय होगा? हो सकता है। होगा ही। एंगेल्स की ' डायलेक्टिस आफ नेचर' में लिखा है करोडों वर्ष बीतेंगे, सूर्य की ऊर्जा क्षीण होगी। सूर्य का ताप ध्रूवों के हिम को गला न पायेगा। हिम बढेगा, मानव जाति को जीवन के लिये पर्याप्त ऊष्मा नहीं मिलेगी। वो आगे लिखते हैं कि- धरती चन्द्रमा के समान, निर्जीव हिम पिंड की तरह निर्जीव होते सूर्य के चारों ओर निरंतर घटती हुई कक्षा में चक्कर लगायेगी और अंत में उसी में जा गिरेगी। कुछ ग्रह इसके पहले ही वहां गिर चुके होंगे। वैदिक दर्शन इसे प्रलय कहता है। किंतु प्रलय काल सम्पूर्ण ऊर्जा का नाशक नहीं है यानी उसके बाद भी ऊर्जा शेष रहती है और यही वजह है कि प्रलय के बाद पुनः सृष्टि का जन्म होता है। भारत के सांख्य दर्शन में कपिल ने यही बात बहुत पहले ही कही थी। सृष्टि और प्रलय प्रकृति की इकाई में चलते हैं इसीलिये प्रकृति मे द्वंद्व दिखाई देता है। बडी अजीब है न सृष्टि। और आज उसके काल के प्रवाह में बहते बहते हम यहां तक आ गये। भारतीय कालबोध का क्षण सृष्टि का प्रारम्भ है। फिर इसके बाद युग हैं। महाभारत युद्ध के 36 वर्ष बाद यानी ईसा पूर्व 3102 वर्ष से कलियुग चल रहा है। युगाब्ध के अनुसार भारत की 52 वीं सदी है यह। विक्रमसम्वत के अनुसार यह 2067 सम्वत है। यही शक संवत्सर 1932 है। किंतु दुनिया ईसाकाल की दृष्टि से देखती है जिसके अनुसार 21 वीं सदी है। जो भी हो किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि आज के दिन से सृष्टि का प्रारम्भ हुआ था जो हमारे लिये नववर्ष का प्रारम्भ है। तो आइये इसे मनायें। हमारे भारतीय संवत्सर का स्वागत करें। खूब नाचे-झूमें-गायें। सभीको मेरी ओर से आत्मीय शुभकामनायें।

शनिवार, 6 मार्च 2010

फिर दिल की नहीं, दिशा की जरूरत है

हॉकी का विश्वकप चल रहा है और भारत अपने तीन मैचों में सिर्फ एक पाकिस्तान से जीता है बाकी के ऑस्ट्रेलिया और स्पेन से बुरी तरह हारा। यानी उसके सेमीफाइनल के रास्ते अब कठिन हो चुके हैं। आज उसका इंग्लैंड के साथ मुकाबला है। इधर हीरो होंडा के विज्ञापन में दिखाया गया है कि फिर दिल दो हॉकी को....। कैसे? हीरो होंडा खरीद कर या हॉकी के लिये नया दिमाग देकर? खैर। भारतीय हॉकी जिस परम्परागत शैली में खेली जाती है उसे बदलने की जरूरत है। बदलाव की इस दरकार को समझकर प्रयत्न भी हुए किंतु सबसे बडी समस्या हमारी जलवायु की है। गरम देश में स्टेमिना को बरकरार रख पाना थोडा कठिन हो जाता है। फिटनेस भी इसीके चलते अपना अहम रोल निभाती है। लगातार तेज़ हॉकी खेलते रहना सम्भव नहीं हो पाता। किंतु यह सब कारण बहाने की लिस्ट में रखे जा सकते हैं। हां, भारतीय हॉकी संघ और खिलाडियों में मानसिक बिखराव भी अहम भूमिका निभाता है। हॉकी को लेकर गम्भीर चिंतन, समाधान, आर्थिक सहयोग आदि जैसे तमाम प्रयत्न किये जाते रहे हैं, बावजूद हम इसमे सुधार नहीं कर पाये। यही हाल पाकिस्तानी हॉकी का भी है। उसकी शैली भी ठीक हमारी शैली से मिलती जुलती है किंतु पाकिस्तान में जीतने की जिजीविशा हमसे ज्यादा है और यही कारण है कि उसकी हॉकी मरी नहीं है। भारतीय हॉकी से अपेक्षायें कुछ ज्यादा कर ली जाती है, वैसे पिछले डेढ दशक से जिस गति से उसका पतन हुआ है उससे अपेक्षायें जैसी बात बहुत हद तक कम हो चुकी है। किंतु फिर भी हॉकी को फिर से दिल देने की जरूरत नहीं है क्योंकि वो हमारा दिल है ही। हां, लगातार पराजय किसी भी खेल से ध्यान भंग करा देती है, बस हॉकी के साथ भी यही हो रहा है। हॉकी महासंघ विवादों में रहता है। उसकी अपनी राजनीति है। इस तथ्य को थोडी देर के लिये भूल जाइये क्योंकि मैं उस कारण की ओर ध्यान खींचना चाहता हूं जो आज की हॉकी के लिये बेहद जरूरी है। हॉकी के ख्यातिनाम खिलाडी धनराज पिल्लै मेरे मित्र हैं। उनसे भी कई बार इस मुद्दे पर चर्चा हुई है। विवाद अपनी जगह है, मुद्दे अपनी जगह है जिस पर धनराज ने भी कईबार अपनी राय व्यक्त की है, ऐसे और भी कई हॉकी के खिलाडी हैं जिन्होंने हॉकी की रजनीति को अव्वल कारण बताया है किंतु फिर भी इसे मैं फिलहाल परे रखूंगा क्योंकि मैं मानता हूं कि उससे ज्यादा जरूरी है हमारी खेल शैली में बदलाव की। धनराज भी मानते हैं कि 'यूरोपीय शैली आज के दौर में हमारी परम्परागत शैली को पीछे छोड चुकी है। किंतु उनका मानना यह भी कि इसके बावजूद हम बेहतर खेल सकते हैं और जीत सकते हैं। अगर सूझबूझ के साथ खेलें तो।' मैने पूछा भी था कि क्या सूझबूझ नहीं होती? उन्होने कहा था कि होती तो है मगर हम विरोधी टीम की रणनीति में उलझकर रह जाते हैं। और उसे भंग करने के चक्कर में कईबार खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते। खैर यह पहलू तो है ही, इसके साथ ही साथ मेरा सोचना है या यूं कहूं हॉकी के सन्दर्भ में बारिकी से जानना है कि हमारी हार के पीछे सबसे बडा कारण है जीतने की जिद का न होना। साथ ही यूरोपीय शैली को समझने के बावजूद उसका तोड न ढूंढ पाना। तोड के लिये या तो आप भी उतने ही तेज़ हों या तकनीकी रूप से आप पूरे 70 मिनिट तक ढीले न पडें। हमारी टीम की स्वभावगत कमजोरी है कि हम विरोधी टीम पर या तो दबाव नहीं बना पाते या फिर यदि बनाते भी हैं तो उसे कायम नहीं रख पाते। उल्टे खुद बहुत जल्दी दबाव में आ जाते हैं। आज भी फिनिशिंग नहीं है। ट्रेपिंग नहीं है। साझापन नहीं है और रणनीति को साधे नहीं रख पाते। या बीच खेल में अपनी रणनीति को बदल नहीं पाते। खिलाडियों में आपस में कोई समझदारी दिखती ही नहीं जो विरोधी टीम को धोखे में रख सके। न तो हमारे पास लम्बे शॉट्स हैं, न स्कूप को रोकने की सधी कला, न ही पेनल्टी कार्नर को गोल में बदलने की धारधार क्षमता। और जब विरोधी टीम की डी में हम घुसते हैं तो बिखर जाते हैं। वहां इतनी हडबडाहट होती है कि गेन्द को अपनी हॉकी से चिपकाये भी नहीं रख पाते। ऑस्ट्रेलिया से मैच की बात हो या स्पेन से, हम यदि हारे तो हमारी परम्परागत गलतियों की वज़ह से। हां हमारी रक्षापंक्ति हमेशा मजबूत रही है यह कहा जा सकता है किंतु उसकी मजबूती बनी रहे इसके लिये हमारे फारवर्ड खिलाडियों को और ज्यादा मेहनत करनी जरूरी हो जाती है। वैसे भी आज की हॉकी, उसके नियमों में भारी बदलाव हैं और जिसमें अब किसी भी खिलाडी की कोई फिक्स जगह नहीं रह गई है, यह वजह भी है कि हम अभी तक इन नियमों में पारंगत नहीं हो पायें हैं। दूसरी बात जो सबसे प्रमुख है कि यूरोप में हॉकी फुटबाल की रणनीति की तरह खेली जाने लगी है। इसका उदाहरण स्पेन के साथ हुए मुकाबले में देखा जा सकता था। कौनसा खिलाडी कहां से कब निकल कर गेन्द पर झपटता है या कौन किसे कब गेन्द पास कर रहा है यह दौडते रहते खिलाडियों में सूझबूझ का कमाल है जो हम नहीं समझ पाते, यही वजह है कि विरोधी टीमे हम पर अक्सर फिल्ड गोल दागती रहती हैं। कुलमिलाकर भारतीय हॉकी को अभी सुधरने में काफी वक्त लगेगा, और यह भी तब होगा जब हॉकी संघ की राजनीति अहम, स्वार्थ, कमाई की लडाई से बाहर निकल जाये। फिर चाहे कोच बदल लें, देशी-विदेशी कोच रख लें, खिलाडियों को बाहर कर दें, नये खिलाडी ले आयें, कोई फर्क़ नहीं पडने वाला। इस तरह के तमाम दोषों पर जब तक गम्भीर नहीं होंगे तब तक हम विश्व विजेता बनने के सपने देखना छोड ही दें तो अच्छा है। हम जानते हैं कि इस राजनीति ने कई बेहतरीन खिलाडियों के करियर को खा लिया है। जिसमें धनराज जैसे ताज़ा उदाहरण सामने हैं। और यही कारण रहा कि भारतीय हॉकी आज अपने ही अस्तित्व को तलाशने में जुटी हुई है। सो मुद्दे की बात यह है कि हॉकी को दिल नहीं दिशा देने की जरूरत है। आप भी कुछ सोचते होंगे? सो लिख डालिये ताकि हमारी हॉकी के लिये कुछ बेहतर हो सके। क्योंकि यह तय है कि मैं समय समय पर तमाम बातों को लेकर हॉकी की जड में सम्पादित करने की किसी भी तरह की कोशिश करता ही रहता हूं।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

जो प्रेम की हो ली, वो है होली

रुकिये.....इतना बडा आलेख देख कर भागिये मत। सच पूछिये तो आनंद आयेगा। होली के पर्व पर इस तरह के आनंद को पाने की भी चेष्ठा होती है, तभी आप मेरे ब्लोग पर आये हैं। पूरा पढने का साहस करें, पसन्द आयेगा। तब तक मैं आपके और अन्य ब्लोग से होकर आता हूं।


-आनंद में डूबना, उसमे सराबोर होना, उसमें समाहित होना मनुष्य की प्रकृति है। आनन्द के लिये ही मानवजीवन के समस्त कर्म है। वो इसका प्यासा है। प्रकृति आनंद से परिपूर्ण है। वह मनमोहक है, उसमे रूप, रंग, गुण, गन्ध, स्वर, रस है। यानी समग्र प्रकृति में सौन्दर्य रचा बसा है। वह नियम से बन्धी है। उसका कर्म लय से जुडा है। राग स्वतंत्र है। और जितनी भी दैवीय शक्तियां हैं वे सारी इसी नियम के अंतर्गत भ्रमण करती है। प्रकृति का संविधान ऋत कहा जाता है। ऋग्वेदिक ऋषियों द्वारा निर्मित प्रकृति इसी संविधान का अनुगमन करती है। ग्रीष्म, वर्षा, शिशिर, हेमंत, पतझड, बसंत इसी ऋत के ऋतुरूप होते हैं। इसमे बसंत प्रकृति का यौवनकाल है, तरुणाई उमंग का उत्थान है। प्रकृति अपना सबकुछ बसंत पर न्योछावर कर देती है। मानो नववधु पहली बार अपने प्रियतम से मिलन को ललचा रही हो। वो उसे पाकर नवजीवन सा अहसास पाती है। खिल उठती है। खिलखिला उठती है। अल्हडपन, मस्ती, दीवानगी यानी यौवन का चरम होली है। बसंत ऋतु का उल्लासशिखर होली है। जम्बुद्विप भरतखंड का उत्साह, उल्लास, और उमंग़ होली है। मस्तक पर चन्दन का टीका हो, गाल गुलाल से लाल हों, नृत्य में झूमते, गाते लोग हों, टोलियां हों, हंसी-ठिठोली हो..यही होली है। जीवन का उत्साह ही होली है।
हिन्दू धर्म व्यापक है। सनातन है। यहां जीवन को पूजा जाता है। जीवन का पर्व मनाया जाता है। यहां राम आगमन की दीवाली होती है तो कृष्ण की बांसुरी से निकले स्वर हृदयों में प्रेम घोल देते हैं, रास रचता है, रंग बिखरते हैं। जन-मन सब एक हो जाते हैं। द्वेत भाव नहीं दिखता, अद्वेत हो जाता है प्रकृति का कण-कण। यही होली है। ढेर सारे रंगों का मिलना और एक होकर उल्लास का नृत्य ही होली है। राधा-कान्हा का रास, अमीर-गरीब की गलबहियां। धरती-आकाश की प्रीति, वाकदेवी के सातों सुर झृंकत हो उठते हैं और शिव भी सुधबुध खो कर इस मस्ती में डूब जाते हैं। वात्सायन के कामसूत्र (1.4.42) में बसंत का यही उल्लास क्रीडा पर्व है। भारतवर्ष का महानतम प्रेमपर्व। मानों आकाश के तमाम देवी-देवता धरती पर उतरकर रंगों से खेल रहे हों। बैरभाव कहीं लुप्त होकर दैत्यों का मन भी ललचा रहे हों इस पावन पर्व पर थिरकने को। यही होली है।
होली को कुछ विद्वानों ने मिस्त्र या यूनान से आयातित बताया है। मिस्त्र में होली जैसा उत्सव था, यूनान में भी था। क्योकि ऐसे देशों से भारत के व्यापारिक सम्बन्ध रहे थे। सत्यकेतु विद्यालंकार के "वैदिक युग" (पृष्ठ- 232) में लिखा है कि वर्तमान ईराक़ और तुर्की राज्य के कुछ क्षेत्रों से प्राप्त भग्नावशेष व पुरातन सभ्यताओं से हमें पता चलता है कि उनके भारत से व्यापारिक सम्बन्ध थे। ऋगवेद (1.25.4) में पक्षियों के उडने वाले आकाश मार्ग और समुद्री नौका मार्ग के उल्लेख हैं। जेमिनी ने होलिका पर्व का उल्लेख (400-200 ईसापूर्व) किया और लिखा कि होलिका सभी आर्यों का उत्सव है। आचार्य हेमाद्री ने (1260-70 ई.) पुराण के उदाहरण से होली की प्रधानता बतलाई है। हज़ारों वर्ष पुरानी होली की परम्परा इसी भरत की भूमि से उपजी। मिस्त्र-यूनान ने नक़ल की। भारतीय दर्शन, साहित्य, संस्कृति कला, गीत, संगीत तथा उत्सवों, पर्वों से सराबोर है। यहीं आनंद की ऊर्जा उफान मारती है। उसका मद रस झलकाता है। प्राणीमात्र में बहकर वो प्रकृति के उच्चतम उत्साह को पाता है और होली स्दृश्य बन जन जन में व्याप्त हो जाती है।
संवेदनशीलता प्रकृतिप्रदत्त है। चार्ल्स डारविन ने ' द ओरिजिनल आफ द स्पेसिस एंड द रिसेन्मेंट' में बताया है कि ' प्राणियों को भावोत्तेजना में आनंद आता है।' आनंद का केन्द्रबिन्दु मानव के भीतर है। इसके उपाय, साधन प्रकृति में हैं। धरती सगन्धा है, पवन गन्ध प्रसारित करती है। मनुष्य में मदन गन्ध है, पुष्पों में सुगन्ध है। सूर्य ऊर्जावान है, ऊषा में सौन्दर्य झलकता है। चंद्रमा शीतल है, सुन्दर है। पूर्णीमा धवल चान्दनी बिखेरती है। प्रकृति के सारे जीव सवेंदित होते हैं। यही होली है। होली में नृत्य है। मगन होने का बोध है। महाप्राण निराला तो मानों अपने शब्दों में प्रक़ृति के इस आनंद के साथ खेलते हैं कि- 'वर्ण गन्ध धर, मधुरन्द भर, तरु-उर की अरुणिमा तरुणतर, खुली रूप-कलियों में पर भर, स्तर-स्तर सपुरिकरा, रंग गई पग-पग धन्य धरा।" निराला ही क्या तुलसी, कालीदास ने भी इस यौवनमयी प्रकृति को अंगीकार करते हुए शब्दचित्र खींचे हैं। तुलसी कहते हैं-" सीतल जागे मनोभव मुएंहु मन वन सुभगता न परे कही, सुगन्ध सुगन्द मारुत मदन अनल सखा सही। विकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकदा, कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपसरा।" कालीदास का कुमारसम्भव तो बसंत के रस-रंग में नहाया हुआ है-" पवन स्वभाव से ही आग भडकाऊ है, बसंत कामदेव के साथ आया है। उसने नई कोपलों के पंख लगाकर आम्र मंजरियों के वाण तैयार किये हैं। आम्र मंजिर खाने से ही नर कोकिल का सुर मीठा हुआ। उसकी कूक पर रूठी नारियां भी रूठना भूल जाती हैं।" यही होली है। रूठना, गिले-शिकवा, बैरभाव जहां प्रेम के रंगों में समाहित हो जायें और एक रंग बन जायें, होली मन जाती है। सांस्कृतिक राष्ट्रभाव की उल्लासधर्मिता या उसकी अभिव्यक्ति ही होली है। और जब इस पर बाज़ारवाद चढ जाता है तो यह पूरी की पूरी स्वच्छंदता पर, संस्कृति पर आक्रमण है। संस्कृति कभी उत्सवों की प्रेरक नहीं रही, किंतु ये बाज़ार अपने उत्सव गढता है। कभी फादर्स डे होता है तो कभी मदर्स। कभी वैलेनटाइन बिकता है तो कभी होली डे। मीडिया से लेकर पूरा बाज़ारतंत्र त्योहारों को बेचने लगता है। दुकानें खुल जाती हैं। उमंग की दुकाने, उत्साह की दुकानें। रंगों की दुकानें। प्रेम की दुकानें। और खरीददारों की भीड उमडती है। माल खरीदा जाता है। उपभोग किया जाता है। और जब उपभोग के बाद माल खत्म तो उत्साह खत्म, उमंग खत्म, प्रेम के गीत खत्म। नाच खत्म। थक हार कर बैठ जाना होता है। गाल पर लगे गुलाल पौछ दिये जाते हैं, रंग नहा धो कर निकाल दिये जाते हैं। फिर से तैयार होकर मनुष्य अपने बाज़ारीकरण में मशगूल हो जाता है। या मज़बूर हो जाता है। अब जब दुकानें सजेंगी तब खरीरदारी होगी। यह होली नहीं। होलिका है जो हमारे देश के पावन पर्वों को बाज़ार की आग में झौंकती है। प्रह्लाद बनिये और इससे बचिये। होली मनाइये। इसकी अल्हडता, प्रकृति की चरम बसंतोंपूर्ण मादकता का रसभोग लेने और इसके प्रेम, दुलारमयी भांग के नशे में 12 मास रहने के लिये बस प्यार करें। भारत की महान संस्कृति, सभ्यता का रसपान करें। होली खेलें। प्रेम, भक्ति, गीत, नृत्य, सेवा, समर्पण को पूजा मान गलमिलौवल करें।
ऐसी ही सार्थक, जीवंत होली दिवस पर मेरी आत्मीय शुभकामनाये आप सब स्वीकार करें।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

आंखों में कल का सपना है


ओफिस से रात में लौटना होता है, अमूमन आधी रात चढ जाया करती है। जब गांव वाले अपनी नींद को बिदाई देने के लिये अंतिम खर्राटे लिया करते हैं तब मैं अपने घर पहुंच कर या तो दरवाजा खटखटाता हूं या फिर बेल बजाता हूं। अज़ीब सी जिन्दगी है महानगरों की। खैर..लौटा ही था कि अपने पोस्ट बाक्स में कोई किताब आई हुई दिखी, झट से बाक्स ओपेन किया। सीढियां चढते चढते ही उसका कवर खोला और दरवाजे की बेल बजाने से पहले आंखों के सामने थी 'आंखों में कल का सपना है' गज़ल संग्रह। डा.अमर ज्योति 'नदीम' का गज़ल संग्रह। दरअसल यह आर्कुट का कमाल है जब डाक्टर साहब से परिचय हुआ। और उनके ब्लोग तक जा पहुंचा। उनके बारे में लिखा हुआ पढा और थोडा बहुत उन्हे जाना। फिर जी मेल से चेट पर उन्हें पक़डा और उनसे शुरू हुई बातचीत। गम्भीर और सधे हुए उनके शब्दों ने प्रभावित किया। आदमी की उम्र और उसके अनुभव परिपक्वता प्रदान करते हैं,और ज्ञान बन कर बरसते हैं। मुझे तो इसी बरसात में नहाना अच्छा लगता है सो डाक्टर साहब जब भी नेट पर दिखते हैं मैं उन्हें पकड लेता हूं। वे भी मुझसे बात करते हैं बिल्कुल ऐसे जैसे मुझे बरसों से जानते हों। यह उनका बडप्पन है। हालांकि आजकल ऐसे लोग कम ही मिल पाते हैं। मेरा तगडा अनुभव है कि ज्यादातर लोग अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिये छोटा होना नहीं चाहते। पद का, प्रतिष्ठा का, पैसों का या फिर ज्ञान का ऐसा मद उनमें भरा होता है कि वे झुकना नहीं चाहते। झुकने को अक्सर छोटापन मान लिया जाता है जबकि कहा जाता है कि ज्ञानी हमेशा सरल और लचीला होता है। किंतु आज नमस्कार भी ऐसे किया जाने लगा हैं मानों एहसान जता रहे हों। खैर..मैने कहीं पढा था कि छोटा होना या झुकना जब आदमी भूल जाता है उसका पतन वहीं से शुरू हो जाता है। ख्यातिनाम ला त्सू का एक कथन भी प्रसंगवश कहता हूं कि "झुकना समूचे को सुरक्षित रखना होता है।" अपन तो छोटे हैं इसलिये पतन का प्रश्न ही नहीं है। न नाक कटने का डर, न अहम भंग होने का भय। और किस्मत भी अच्छी कि डाक़्टर साहब जैसे लोग भी मुझे मिल जाते हैं। जिनमें किसी तरह की दुनियाई स्वर्ण परत नहीं चढी होती,और आदमी होने का 24 कैरेट खरापन भी होता है। दरअसल मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं यह भी बताता चलूं, डाक्टर साहब की जिन गज़लों को मैने पढा उनमे बहुत सारी गज़ले मेरे मनोभावों को छूती हुई गईं। यानी आज के दौर में सामाजिक स्तर पर पतन हो या व्यवहारिक स्तर पर टूटन या नौकरी पेशे में चल रही अव्यवस्थायें हों, आदमीयत कैसे खत्म होती जा रही है उसे बखूबी से उन्होंने शब्दों में उतार कर लक्ष्य पर सीधे चोट की है। जैसे-
" चूक हो जाये न शिष्टाचार में, दुम दबा कर जाइये दरबार में।
कुर्सियों के कद गगनचुम्बी हुए, आदमी बौना हुआ आकार में...।"
हां उनसे उनके गज़ल संग्रह के बारे में एक बार पूछा था, सो उन्होने डाकविभाग का सदुपयोग करते हुए मुझे अपनी हस्ताक्षरयुक्त किताब प्रेषित कर दी। मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और आप सब के लिये किताब का निचोड प्रस्तुत करने की कोशिश कर बैठा। हालांकि मैं जानता हूं यह कोशिश किताब की पूरी तरह निचोड नहीं है उसके लिये तो वह पढनी ही होगी फिर भी जो कर पाया, जितना कर सका, आपके लिये नज़र है।
मैने उनकी कृति पढनी शुरू की तो हिन्दी और ऊर्दू सम्मिश्रण युक्त उनके शब्द खिलखिलाते हुए मेरी आंखों के सामने थे जो उनके जीवन का बहुत सारा भाग उढेल रहे थे। जिसमे जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, दुष्यंत कुमार ,प्रेमचन्द और मैक्सिकम गार्की से ली गई प्रेरणा स्पष्ट झलक रही थी। उनकी ज्यादतर गज़लें समाज़ और दुनिया की अव्यवस्थाओं के खिलाफ आक्रोश से भरी हुई महसूस होती है। और सचमुच उनकी आंखों में कल का सपना है जो उम्मीद व्यक्त करता है कि बदलाव सुखद हो।
प्रसादजी का छ्न्दबोध गज़लों में समाहित करना कठिन होता है किंतु
"जो कुछ भी करना है, कर ले
इसी जनम में, जी ले, मर ले।"

डाक्टर साहब का यह शे'र प्रसाद्जी के श्रद्धा और मनु के बीच से निकलती जीवन धारा माना जा सकता है। किंतु इसी के आगे उन्होने प्रेमचन्द का यथार्थबोध भी करवाया कि-
" अवतारों की राह देख मत
छीन-झपट कर झोली भर ले।"

गार्की का मर्म और समाज़ की पीडा इस किताब में ज्यादा है जो व्यवस्था के साथ भिडती हुई प्रतीत होती है। तो दुष्यंतजी शे'रों के साथ चलते नज़र आते हैं। यह अद्भुत है कि गोर्की और दुष्यंतजी को पढने वाले उनका अक़्स अमर ज्योति साहब के शब्दों के नेपथ्य में ढूंढ सकते हैं।
"कह गया था, मगर नहीं आया
वो कभी लौट कर नहीं आया।"

तो
" नहीं कोई भी तेरे आसपास, क्यों आखिर?
सडक पर तन्हा खडा है उदास, क्यों आखिर?"

आप देखिये डाक्टर साहब का आक्रोश, वेदना और राजनीतिक,सामाजिक तंत्र के प्रति धधकते सवाल कि-
"राम के मन्दिर से सारे पाप कट जायेंगे क्या?
बन गया मन्दिर तो चकले बन्द हो जायेंगे क्या?
कितने लव-कुश धो रहे हैं आज भी प्लेट-ओ- गिलास
दूध थोडा, कुछ खिलौने उनको मिल पायेंगे क्या?
चिमटा,छापा,तिलक,तिर्शुल,गांजे की चिलम
रहनुमा-ए-मुल्क अब इस भेस में आयेंगे क्या?
अस्पतालों, और सडकों, और नहरों के लिये
बोलिये तो कारसेवा आप करवायेंगे क्या?"

अध्यापन और इसके बाद बैंक की नौकरी विचित्र लग सकती है किंतु पठन पाठन, दर्शन और फिर गणित का गुणा-भाग वाला व्यक्ति जीवन के हर स्तर को अनुभव करने में ज्यादा समर्थ हो जाता है जिसका निष्कर्ष, परिणाम यही निकलता है कि-
"खूब मचलने की कोशिश कर
और उबलने की कोशिश कर
व्याख्यायें मत कर दुनिया की
इसे बदलने की कोशिश कर।"

सचमुच डा.अमर ज्योति 'नदीम' की आंखें (कृति) कल का सपना देखती हैं और अपने अनुभवों से आने वाले पीढी की दिशा तय करती हैं। कुल 86 गज़लों से बनाया गया है यह गुलदस्ता जिसके प्रत्येक फूल ताज़े, महकते हुए हैं। या यूं कहें अमर हैं, ज्योति की तरह रोशनी बिखेरते से हैं। अब आप सोचिये कैसे मूरख हैं वे प्रकाशक जो सिर्फ बाज़ारवाद को देखते हुए बेहतरीन कृतियों को नज़रअन्दाज़ करते हैं, जिन्हे जन-जन में जाने से रोकते हैं। और ये आजकल की नई पीढी के फेशनेबल, आधुनिक मानेजाने वाले हाडमांस के अर्धजीवित पुतले हिन्दी साहित्य से क्यों दूर हैं? शुक्रिया अयन प्रकाशन का जिसने इस कृति को आकार दिया। और शुक्रिया डाक्टर साहब का भी जिन्होनें मुझे अपनी कृति से परिचय कराया।

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

रंगोली

अनमना सा मैं। डूबा तो अपने शहर के उन दिनों तक जा पहुंचा जो दिलोदिमाग में जड से गये हैं, पिघला तो पिघलता ही चला गया। होता है कभी कभी ऐसा भी। फिर शब्दों ने नहीं देखा कि उसकी बनावट कैसी है, वो किस रूप में हैं। जब यथार्थ के धरातल पर आकर शब्दों की ओर नज़र गईं तो सुधारना चाहा, किंतु किसे सुधारुं? बना हुआ अतीत कब बिगडता या सुधरता है? सो जस का तस। आपके लिये।

"गोबर से सने हाथ
लिपा हुआ आंगन
और आंगन मे बनाती
रंगोली,
कितनी रंगीली लगती थी वो।

उसकी चटक धूप से
मखमली सांझ तक की मेहनत
रंग लाती मुझे दिखती थी तब
जब रंगोली बनकर
तैयार हो जाती थी
और चेहरे पर संतोष की लकीरें
मुस्कान के साथ खिलती थी,
कितनी मासूम सी लगती थी वो।

निहारता था मैं
रंगोली को नहीं
ज्यादा उसे,
और पता भी नहीं चलता था जग को
कि किसे देख रहा हूं।

जब कोई उसकी कृति की
तारीफ करता
तो मैं भी करता,
रंगोली की नहीं,
उसकी जिसने बनाई थी।

मैं जानता था
वो नही जानती
कि मैं उसे देखने आता था
उसकी रंगोली के बहाने।
और
प्रेम के रंगों से
हृदय में नित बनाया करता था
उसकी-अपनी सपनों की रंगोली।

हां तब जब
उसकी बनाई रंगोली कोई
मिटा जाता तो
फिर बना लेती थी वो।

मगर

मगर
मेरी बनाई रंगोली जब मिटी
आज तक नहीं बन पाई है।"

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

जनता या जमूरा?

किसी को अपनी
फिल्म चलानी है,
पार्टियों को राजनीति करनी है
चैनलों को मसाला कूटना है
और आपको?
आप तो ज़मूरे हैं।
इशारों पर नाचने वाले ज़मूरे,
इनके धंधों में
बेमोल बिकने वाले ज़मूरे।
क्या ज़मुरुओं की
कोई औकात होती है?



मुम्बई पिछले कुछ दिनो से हैरान है। आप जानते हैं क्यों है? यह भी बता दूं कि टीवी चैनलों पर जो आप देख रहे है वो असली हालात नहीं है बल्कि हालात बिगाडने के लिये बनाये गये द्रुश्य है। अपने वीज़न के अनुसार गढी जा रही मानसिकता को बखूबी प्रकट किया जा रहा है जिससे देखने वालों को लगे कि मुम्बई सचमुच आफत में है और अब बस तहस नहस ही होना है। उधर राजनीतिक स्तर पर कांग्रेस का खेल है, असली मुद्दे फिलहाल पूरी तरह डिब्बा पैक हो गये हैं, यहां तक कि जनता भी सवाल नहीं कर रही। क्या बिजली, क्या पानी, क्या महंगाई सब कुछ इस बनाये गये हालात की भेंट चढ गये।
शाहरुख खान को चिंता है? अमेरिका, दुबई घूम घूम अपने स्टेटस और कमाई में जुटे इस हीरो को क्या सचमुच चिंता है? मगर हम उसके लिये परेशान है। क्यों?
क्या कभी अपने आप पर भी हंसी आई है? आई है, किंतु दबा ली गई है। क्योंकि जनता को ज़मूरा बना दिया गया है।
इधर सब इस हालत का जायजा कुछ इसप्रकार ले रहे है मानों देश की यही एक समस्या है और इसके हल हो जाने पर सबकुछ ठीक हो जायेगा।
बडी बडी बातें, बडे बडे विचार प्रस्तुत किये जा रहे हैं। यह सब आखिर क्यों? अब तर्क पर तर्क मिलेंगे.... खैर।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

चीनी कम

अमिताभ बच्चन और तब्बू की फिल्म थी 'चीनी कम'। मैने देखी नहीं। फिल्म देखने का शौक नहीं है सो नहीं देखी। उसकी कहानी भी पता नहीं। किंतु देश में चल रही सरकारी फिल्म 'चीनी कम' से जरूर दो चार हो रहा हूं। लगता है यह फिल्म ज्यादा लम्बी है। खत्म होने का नाम नहीं लेती। ऊपर से इसकी रील भी बढाई जा रही है। निर्माता देश की सरकार है तो निर्देशक हैं कृषि मंत्री शरद पवार। आपको बता दूं कि इस फिल्म के डायलाग गज़ब के हैं। शरद पवार खेमे के एक अखबार 'राष्ट्रवादी' में प्रकाशित हुए हैं- ' चीनी महंगी हो गई है तो चिल्लाते क्यों हो, चीनी कम खाओ, कम चीनी खाने से कोई मरता नहीं है।' है न जबरदस्त डायलाग। भारत की जनता खूब शक्कर खाती है। उसे इससे डायबटिज़ न हो जाये इसके लिये चिंतित है निर्देशक। फिल्म के साथ साथ मानवधर्म भी तो कुछ होता है। सरकार उपाय बताती है। अरहर की दाल महंगी है इसलिये पीली मटर की दाल खाओ। यानी आप दुआ कर सकते हो कि कहीं कपडे और अधिक महंगे न हो जाये वरना सरकार कहेगी नंगा घूमो। शायद इसकी नौबत पर भी सरकार का ध्यान है। वो सोच रही है कि फिल्म में आजकल अंग प्रदर्शन भी होता है, ग्लैमर भी तो होना चाहिये न। नहीं तो फिल्म चलेगी कैसे? निर्देशक का अखबार कहता है कि ''शक्कर के दाम यदि 10-15 रुपये बढते भी हैं तो इतनी हाय तौबा क्यों? एक परिवार का यदि चीनी के लिये प्रतिमाह का खर्च 90 से 100 रुपये बढ जाता है तो इससे क्या फर्क़ पडेगा? सौन्दर्य प्रसाधन का खर्च भी तो वहन किया जा रहा है।'' अब सोचने की जरूरत जनता की है। जनता सोचती बहुत है। सोचने का पैसा नहीं लगता है ना इसीलिये सरकार ने यह काम जनता को सौंप रखा है। जनता सोचती है कि- 'क्या एक परिवार महीने में एक किलो ही शक्कर खाता है?' मुझसे पूछें तो अनुमान लगा कर कह सकता हूं कि एक परिवार में चार-पांच किलो शक्कर की खपत तो होती ही होगी। राशन लेने जाता होता तो सही बता सकता था। किंतु अनुमान में कम से कम इतनी खपत तो होगी ही। कम सोचने में क्या बुराई? तो पांच किलो शक्कर कितने की हो गई? यदि 50 रुपये से जोडे तो 250 रुपये की। यह खर्च उनके लिये ठीक है जिनका पेट भरा रहता है या जो सवाल उठाने में शर्म नहीं करते। भला निर्देशक का अखबार शर्म क्यों करेगा? शर्म करे जनता। पर सवाल तो यह है कि एक सामान्य आदमी या वो जो दो रोटी की जुगाड में दिन रात एक करते हैं उनकी भूख का क्या? सवाल करने वालों को विश्वास है कि आदमी सिर्फ शक्कर खा कर पेट भर लेता है। अजी सौन्दर्य प्रसाधन तो दूर की बात है आज जीवनावश्यक वस्तुओं की हालत देख लीजिये। रसोई घर का बज़ट तीन गुना बढ चुका है। मैं जानता हूं आज से एक दशक पहले तक मैरे घर डेढ से दो हज़ार रुपये में महीनेभर का आवश्यक राशन आ जाता था, धीरे-धीरे वो अब बढ कर 6 से 7 हज़ार पहुंच गया है। गेहूं, चावल, दाल, तेल यहां तक कि सब्जियां भी अपने तेवर दिखा रही हैं। सरकारी फिल्म तर्क दे सकती है कि 'कम खाओ। ज्यादा खाने से मोटे हो जाते हैं।' किंतु कम खाने से? अरे भाई ज़ीरो फिगर का ज़माना जो है। आप कम खाओगे तो कैलोरिज़ कम होगी। हो सकता है कि कुपोषित हो जायें। और कुपोषित हो भी जायें तो यह इत्मिनान रखिये कि मरोगे नहीं। फिर भी यदि मर गये तो सरकार घोषणा कर सकती है कि यह भूख से नहीं बीमारी से मरा है। आखिर देश की इज्जत का भी तो प्रश्न है। अब बीमारी तो हर देश में है। भूखे हर देश में थोडी हैं। खैर, आपको बताता चलूं कि महंगाई के इस दौर में करीब 70 फीसदी आबादी की आय 20 रुपये प्रति दिन से भी कम है। सोचिये..सोचिये वो क्या खायें? कैसे रहें? नहीं सरकार नहीं सोचेगी। क्यों सोचेगी वो? वो इतना निम्नस्तर का नहीं सोचती। वो हमेशा बडा सोचती है। सटोरियों, मुनाफाखोरों, मिल मालिकों..आदि के बारे में। अरे भाई इनकी कौन चिंता करेगा, सरकार ही न। इनकी चिंता सरकारी काम है। जनता तो जी ही लेती है। उसके भाग्य में बदा है कि बेटों मरते मरते भी जियो।
बहरहाल, 'चीनी कम' मुद्दा गहराया हुआ है। मेरे पास जो जानकारी है उसके मुताबिक भारत में प्रतिवर्ष 220 लाख टन शक्कर का उत्पादन होता है। इस साल देश में लगभग 240 लाख टन चीनी मौज़ूद है। आप पूछेंगे कि तब चीनी का दाम क्यों बढा? हां, गन्ने का उत्पादन घटा है न इसलिये। गन्ना उत्पादकों का संकट देखिये, दो साल पहले खबर थी कि गन्ना उत्पादक अपनी उपज की एवज में 120 रुपये प्रति क्विंटल की मांग कर रहे थे। मगर सरकार ने उनकी मांग नहीं मानी। लिहाज़ा गन्ना उत्पादकों ने उत्पादन में ढिलाई बरती। इस साल हम जो शक्कर खा रहे हैं वो पिछले साल की बनी हुई है। और यदि तमाम खर्च मिला लें तो यह शक्कर हमें 25 रुपये तक मिलनी चाहिये। नहीं मिल रही। वो तो 45 रुपये में मिलेगी।
देश 2009 में पर्याप्त चीनी भंडार से लबालब था। और तो और तब 48 लाख टन चीनी 12 रुपये के भाव से निर्यात भी की गई। जब लगा कि चीनी घटने वाली है तो सरकार ने 30 रुपये किलो की दर से चीनी आयात की कुल 50 लाख टन। यानी 12 के भाव में बेची और 30 में खरीदी। इसके लिये क्या आप सरकार को मूर्ख कहेंगे या उसकी पीठ थपथपायेंगे? आप भले ही न थपथपायें मगर जनता की पीठ पर महंगाई के कोडे अवश्य बरसते रहेंगे। जनता अभिश्प्त है। भले ही आप सोचें कि इस देश का प्रधानमंत्री खुद भी एक गम्भीर अर्थवेत्ता है और जिसे निपुण वित्तमंत्री प्रनब मुखर्ज़ी जैसा बुद्धिजीवी का साथ मिला हुआ है, उसके बावज़ूद यह हालत? भाई दरअसल, यह 'चीनी कम' फिल्म बडे सस्पेंस की है। इसमे पता नहीं चलता कि हीरो मरता है या विलन? हां दर्शक के जीवन की गारंटी नहीं। तो है न कमाल की फिल्म?

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

शुक्रिया जनसत्ता


जनसत्ता के 5 फरवरी के अंक में मेरी पोस्ट 'मुश्फिक़ की फिक़्र" प्रकाशित की गई। इसे जनसत्ता ने ब्लोग से ही उठाया। यह खुशी की बात है कि पत्रकारों मे अभी भी कुछ ऐसे लोग बचे हैं जो अच्छा लिखने का, लिखते रहने का हौसला देते हैं और रचनाओं की कद्र करते हैं। उन्हें धन्यवाद। शुक्रिया जनसत्ता।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

विडम्बना

गधों और घोडों के
खुरों के बीच
रौन्दी जा रही
प्रतिभा।

नोंच-नोंच उसे
खा रहे गिद्ध
आसमान
नाप रहे।

सिसकियां भी
चाटे जा रहे
रात के अन्धेरे में
चमगादड।

खरगोश सा कोमल
मुलायम मांस वाला
ईमान,
कब तक कहां-कहां
फुदकेगा?

आखिर सीधे खडे
कान पकड के उसे
भून दिया जायेगा
सरकारी भट्टी में।

बचना है
या कोई सम्मान
पाना है तो
कुत्ते की दुम की
तरह टेढे हो जाओ,
या अवसर जान
उसे दबा लो
या फिर
हिलाओ
कुं कुं करते।

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

'मुश्फिक' की फिक्र

जी हां, गज़ल को लेकर पत्र-पत्रिकायें थोडी कंज़ूस तो रहती हैं किंतु गज़ल निर्बाध रूप से बह रही हैं, इसे भी स्वीकार किया जाना चाहिये। मुझे लगता है कि गज़ल को अपनी दिशा का भान है। उसके अपने दीवाने हैं। वर्ग विशेष होने का यह फायदा भी है कि उसके रूप, रंग, उसकी रवानी, फसाहत और कायदे पर अभी तक किसी प्रकार की ज्यादती नहीं हुई है, और विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि उसके मुस्तकबिल पर कभी कोई आंच नहीं आने वाली। बहरहाल, आज मैं आपका एक ऐसे शायर से परिचय करा रहा हूं जिनके बारे में आज की गज़ल प्रेमी पीढी शायद न जानती हो। जिन्होने रिवायती और क्लासिकी शायरी से हटकर समाज और मुल्की हालात को अपने मखसूस अन्दाज़ में पेश किया, जिनकी शायरी सेहतमन्द और संज़ीदा अदब से हमेशा लबरेज़ रही। जनाब मुस्तफा हुसैन 'मुश्फिक'। रायगढ (छत्तीसगढ) के गांजा चौक का एक जानापहचाना नाम। अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों, आकाशवाणी आदि मंचों की रौनक। हिन्दी, ऊर्दू और छत्तीसगढी में समान गति से लिखने वाले शायर, गीतकार और कवि। गज़ल क्षेत्र की यह बहुत बडी क्षति है कि मुश्फिक साहब इस दुनिया में नहीं हैं। महज़ चौथी तक की शिक्षा और जीवनयापन के लिये टेलरिंग का व्यवसाय। ताउम्र गुरबत के साये में रहे, और शायद यही वजह रही कि उनके अनुभव ने जीवन को कलाम में बान्धकर कागज़ पर हूबहू उतार दिया। उन्हें कभी गोपालदास नीरज की बगल मिली तो कभी रूपनारायण त्रिपाठी, मुकुटबिहारी सरोज जैसे उम्दा फनकारों के बीच बैठ कर शायरी करने का मौका। यानी आप जान ही गये होंगे कि डिग्रियां हासिल कर लेने वाला ही पढा-लिखा नहीं माना जा सकता, बल्कि कबीर जैसे अनेक लोग भी साहित्य के पुरोधा हैं, उनमें से मैं मुश्फिक को भी एक मानता हूं। पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहने वाले मुश्फिक के लिये गज़ल पर कोई किताब टेडी खीर ही थी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान में 26 दिसम्बर 1959 को पहली रचना प्रकाशित हुई थी, इसके बाद रचनाये छपती रहीं, गज़ले वे कहते, सुनाते रहे मगर उन्हें किताबी शक़्ल कभी नहीं दे पाये। चार दशक बाद यह सब भी हुआ। 1 मई 1998 को "मेरी फिक़्र शायरी" के नाम से उनका कलाम किताबी शक़्ल में शाये हुआ। इसके दो वर्ष पूर्व मेरे विवाह के अवसर पर वे भी शामिल हुए थे। मुझे नहीं पता था कि वो अंतिम मुलाकात होगी। खैर, उनकी किताब और स्मृतियां मौज़ूद हैं।
जनाब मुश्फिक़ ने जैसी जिंदगी देखी उसे ठीक वैसे ही उतार दिया। मुझे लगता है कि आदमी मुख्तालिफ परेशानियों की गिरफ्त के बावज़ूद, अपनी जीने की ललक नहीं छोडता, वो मुसीबतों से दो चार होता है और हंसने की पुरजोर कोशिशे करता रहता है, मुश्फिक कहते हैं कि-

" इस गरानी में भी, नातवानी में भी
लोग जिन्दा हैं, जिन्दादिली देखिये।"

गज़लों में यह खासियत तो सनी हुई है कि वो जीवन के करीब, बिल्कुल सट कर चलती है। खैर, मुश्फिक ने उम्र के करीब छह दशक बाद जब थोडी राहत महसूस की ही थी जहां वो कह सके कि-
" कितने मलाल हमको जमाने से मिले हैं
अब जाके लोग ठीक ठीकाने से मिले हैं।"

कि सांसों ने उनका साथ छोड दिया। बहरहाल, आज उनकी वो गज़ल जो मुझे ज्यादा पसन्द है आप तक पहुंचा रहा हूं, शायद मेरी ही तरह आपको भी पसन्द आयें?


इंसा भी मसीयत का अनमोल खिलौना है
हर खेल का आखिर है और खेल भी होना है।

फितरत का करिश्मा है जादू है ना होना है
सोना कभी मिट्टी है मिट्टी कभी सोना है।

जो दिल पे गुजरती है नग्मों में पिरोना है
पत्थर के कलेजे को हंसना है न रोना है।

गुजरी हैं कई सुबहें हर शाम गुजरती है
हम खानाबदोशों का तकिया न बिछौना है।

वीराना ही अच्छा है बदकार इमारत से
सुख चैन की नींदे हैं और ख्वाब सलोना है।

जिसने निबाह दी है हर गर्दिशे दौरां से
उस सच को ढूंढना भी अपनों ही को खोना है।

मुद्दत से ये हसरत है हो ताबे नज़र 'मुश्फिक'
फिर उसके नज़ारों से हो जाये जो होना है।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

"दिल्ली कितनी दूर"?

कल 26 जनवरी है। गणतंत्र दिवस। और इधर जब मैं कुछ पुरानी किताबें अपनी आदतानुसार टटोल रहा था तो मिले कविवर मधुर जी। जी हां, बलिया के श्री रामसिन्हासन सहाय 'मधुर'। इनसे हिन्दी साहित्य पढ्ने वाले परिचित होंगे। या मेरे जैसे कबाडी। खैर..मधुरजी की कविताये अनुभूति की भेदने वाली सच्चाई व उक्ति की वक्रता के लिये पढी जाती रही है। वर्ष 1920 का काल था जब मधुरजी ने रचनायें लिखना शुरू किया था। हालांकि ज्यादा रचनाये उन्होने नहीं लिखी किंतु जितनी भी लिखी या छपी उसमे देशकाल से लेकर जीवन के कई आयामों का चित्रण देखने को मिल जाता है, मुझे उनकी "दिल्ली कितनी दूर" नामक कविता आज पता नहीं क्यो प्रासंगिक लग रही है सो आप तक पहुंचा रहा हूं।

वह अंतिम बलिदान हमारा, इम्फल का मैदान हिला था
उत्तर का हिमवान हिला था, सारा हिन्दुस्तान हिला था।
रजकण में कितने सोये हैं सैनिक चकनाचूर
सपने में सिसकी लेते हैं, दिल्ली कितनी दूर।
सूम सनन चल री पुरवाई, सेनापति का नाम न पूछो,
कोहनूर की क्या कीमत है, आज़ादी का दाम न पूछो।
आज कंठ से कंठ मिलाओ, अमर शहीदों की जय बोलो,
लाट, किला, मीनारों वाली दिल्ली का दरवाजा खोलो।
भीम मांगता गदा, द्रोपदी मांग रही है चीर,
बापू, आज लुटा दो झोली, दो अर्जुन को तीर।
नील गगन कितना ऊंचा है, पुष्पक से फिर हम साधेंगे,
सागर में जलयान हमारे सप्तसिन्धु को फिर बान्धेंगे।
आज देश स्वाधीन हो गया, हम किसान-मजदूर-
दिल्ली में ही पूछ रहे हैं, "दिल्ली कितनी दूर"?

इसकी अंतिम पंक्तियां क्या आज की सच्चाई नहीं लगती? बस इन्हीं पंक़्तियों ने मुझे यह पोस्ट करने के लिये प्रेरित किया। साथ ही साथ गणतंत्र दिवस की शुभकामनाये भी देता चलूं।

सोमवार, 18 जनवरी 2010

मेरी प्रिय पुस्तक में से----

जब भी कभी खालीपन का अहसास हुआ, मुझे अपनी रुचिकर किताबों ने सम्भाला। जब भी कभी मन भारी होता है मैने हमेशा किताबों की शरण ली है। किताबें मुझे ज्यादा प्रियकर इसलिये भी लगती है कि उनमे स्वार्थ नहीं होता, उनमें छल नहीं होता, कपट नहीं होता, वे जैसी भी होती हैं पूरी की पूरी समर्पित होती हैं। उसके एक एक शब्द मानों जीवन की परतें खोलते हैं। मन की उदासी, खालीपन के भाव यूं रफुचक्कर होजाते हैं कि पता ही नहीं चलता। मैं फिर से तैयार हो जाता हूं। नये सिरे से अपने को संवारने लग जाता हूं। पिछले दिनो अपने पूज्य पिताजी के काव्यखंड "रागाकाश" को पढ रहा था तो मुझे लगा कि उसमें से कुछ रचनायें अपने आदरणीयजन, बन्धुओं व मित्रों के लिये भी पोस्ट करुं। "रागाकाश" पूरा एक जीवन है। तीन खन्डों में विभाजित है यह। पहला रागात्मा, दूसरा रागानुगा और तीसरा खंड रागापरा। मैं अक्सर पढता रहता हूं, और हमेशा ही मुझे लगता है और-और पढूं। आज आपके लिये इस पुस्तक के तीनों खंडों में से एक-एक रचना प्रेषित कर रहा हूं।

"रागात्मा" से-

अब न अन्धेरे से डर और न उजाले से
न कल्पना और न यथार्थ से
अब तो स्त्री से भी डर नहीं लगता।
अब-
आस्वाद और रस
या तो तृप्त हैं या अर्थहीन।
सारी भौतिक उत्तेजनायें और तनाव
जैसे एक आध्यात्मिक शांति में डूब गये हैं।
अतृप्त आकाक्षायें,
जीवन की विभीषिकायें
ऐश्वर्य-विलास
हार-जीत
सब जैसे
एक अनकह विराम में समाहित हो गये हैं।
सारे तीव्र-मध्दम काल-प्रवाह
जैसे एक शांत समुद्र में थिर हो गये हैं।
कुछ बान्धता नहीं अब
न घर, न बाहर,
न माया, न ममता
न वर्तमान, न भविष्य।
दिशा की भ्रांति हो यह
या पारिस्थितिक विवशता
पर,
सब कुछ जैसे एक निस्तब्धता में
विलीन हो गये हैं।
अब यह सोच
कि ' अब क्या होगा?'
कितना निरर्थक है।

"रागानुगा" से-

मैं दिखा,
लजा गई अरुणाई
ऐसी कुछ चमक
सद्य: धुले चेहरे पर आई
जैसे
मन्दिर के ओस-भीगे कलश से
सो के जगी ऊषा की,
पहली-पहली किरण टकराई॥

"रागापरा" से-

मत किनारे आओ
भंवर में रस लो
उसमें चक्कर जरूर है
पर गति वहीं है।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

मेरा प्रेम


उसे
न कभी देखा,
न मिला और
न ही जाना।

हां,
अपने आसपास
उसके होने का अहसास
हमेशा रहता है।

हवा संग वो
कभी शरीर से लिपटती है
तो कभी खुशबू बन
नथुनों से होकर
सीधे हृदय तक
जा उतरती है।

रोमांचित मन
मस्तिष्क में बैठ
उसकी आकृतियां
उकेरने लगता है।

और
जब इन आकृतियों को
कैनवास पर
उतारता हूं
तो चेहरा नहीं बनाता।

क्योंकि
प्रेम में
चेहरे की जरूरत
मुझे कभी
महसूस नहीं हुई।

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

नए साल का सूरज

चलिए मै भी
मना लेता हूँ,
या यूं कहू
मान लेता हूँ
इस नव वर्ष को|

वैसे तो
रोज़ ही
उगता है अलसाते हुए
और किसी
मजदूर की तरह
दिनभर थक कर चूर
शाम होते होते
ढह जाता है वो,
अब खुमारी में
डुबो को कहा दीखता है
नए साल का सूरज?

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

राजनीति का त्रिफला

सरकार सोई या बीमार नहीं है,
वो जाग रही है।
उसने तो
सत्ता, नोट और बाहुबल के
त्रिफला चूर्ण से
अपना हाजमा सुधार रखा है।
वो पचा लेती है
तिल-तिल कर मर रहे
भूखे लोगों का दर्द।
वो देखती है
बिल्कुल करीब से
महंगाई के इस दौर में
गरीब का आटा गिला होते।
आंकडे एकत्र करती है
और
संसद में पेश करती है कि
आज कितने किसानों ने
खुद्कुशी की।
वो अनुसन्धान में रत है
कि आखिर
बेरोजगारी से कितने परिवार
तबाह होते हैं या
कितने युवा काम की तलाश में
उसके किसी मोर्चे में,
किसी आन्दोलन में
चन्द पैसों के लिये
मर भी सकते हैं।
वो अध्ययन करती है
कि ऐसे कौनसे मुद्दे हो सकते हैं
जो प्रजा के मर्म पर
प्रहार कर नाजुक भावनाओं को
तहस-नहस कर सके।
वो परखती है कि
महंगाई के बावज़ूद
आम आदमी
कैसे जिन्दा रह लेता है?
वो अपने साथ
अपने परिजनों को भी
मुफ्त हवाई यात्रा करा कर
देश में फैली अस्थिरता के
दर्शन कराती है।
सच में
सरकार सोई नहीं है।
उसे चिंता है देश की।
सोई तो प्रजा है
जिसे कुछ भान भी नहीं कि
देश चलता कैसे है?
धन स्वीस बैकों में पहुचता कैसे है?
कैसे नेता बनते ही
धनवान बना जा सकता है?
और कैसे
आदमी को उल्लू
बनाया जाता है?
उसने बडी लगन से
वैज्ञानिक अविष्कार किया है कि
हवा के ज्यादा दबाव में
कैसे विकल्पहीनता
पैदा की जा सकती है?
सचमुच
राजनीति का त्रिफला
बहुत् फलता है।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

कुपोषण

रीढ से चिपके
पिचके पेट लिये,
कंकाल हो गये
चमडी चढे शरीर वाले
इन बच्चों की
आंखों के आंसू भी
सूख कर
गीजड बन चुके हैं,
जिन पर भिनभिनाती
मक्खियों को तो उनका
भोजन मिल जाता है
किंतु
भूख की आग में
दहन हो रहे
इन नन्हे भविष्यों को
एक दाना तक
मुहाल नहीं है।
इन्हें मिलता है
अनाज़ की जगह आश्वासन,
पानी की जगह प्यास
और
कभी न पूरी हो पाने वाली
कमबख्त आस
कि
21 वीं सदी का भारत
उन्हे मुक्त कर देगा
कुपोषण से।

मगर धन्य है
इस कुपोषण का भी
शोषण जारी है।

ये जन्मे ही शायद इसीलिये हैं।
क्योंकि
इन्हीं की बदौलत
लच्छेदार भाषणों में
उलझा कर
जिन्दा रह सकते हैं नेता,

इनकी तस्वीरें निकाल
दुनियाभर में प्रसारित कर
पा सकता है
कोई फोटोग्राफर पुरस्कार।

इनकी दुर्दशा का
ब्योरा लिख
मर्म को हिला कर
बेस्ट रिपोर्टिंग का हक़दार
बन सकता है पत्रकार।

दुसरी ओर
हमारी सरकार...
फिक़्रमन्द है।

खबर है
कसाब पर करोडों खर्च
अफज़ल को शाही बिरयानी.......।

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

विरह

अमूमन
प्रेम की समिधायें
विरह के अग्निकुंड में
अर्पित होते देखी हैं।

सदियां बीत गई
कभी किसी अग्निदेव को
प्रकट होते नहीं देखा,
न ही देखा
प्रेम का यौवन लौटते हुए,
न उसे किसी वरदान से
दमकते हुए।

हां, देखा तो बस
'स्वाहा' का उच्चारण करते हुए
निच्छल हृदयों को
'स्वाहा' होते हुए।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

कांक्रीट क्रांति

यादों ने जहां जन्म लिया
वह तीर्थ स्थल
कांक्रीट क्रांति में
शहीद हो चुका है।
किंतु मस्तिष्क के
किसी
कोने में
धुन्धलाती सी
तस्वीर है,
जिसे मैं चाह कर भी
कागज़ पर नहीं
उकेर सकता।

कैसे उकेरुंगा?

क्या
कडकडाती
ठिठुरती वह रात,
शहर के बाहर की
सुनसान
अन्धेरे में डूबी
काली स्याह सडक
पर उसका मिलना,
धडकते दिल की
आवाज़ का
लगभग सर्द हो चुकी
नासिका से निकलती
गर्म सांस के साथ
मिलकर व्यक्त होना
किसी कागज़ पर
चित्र रूप में
छ्प सकता है?

क्या
सन्नाटे में खोई
सडक पर
अंजानी मंज़िल की ओर
दौडती मेरी
एलएमएल टी 5
स्कूटर पर
किसी अलाव का अहसास
देता उसका साथ,
रेखांकन हो
ड्रांइंग बुक में
समा सकता है?

क्या
सडक के आसपास बने
डरावने लगते
खेत की अनजानी सी
पगडंडी पर
स्कूटर घुसा देना
और किसी
सूखी नहर के बीच
जाकर उस बर्फ सी
रात में
प्रेम का इज़हार करने
पथरीली जगह ढूंढ्ना
कोई पेंसिल की नोंक
व्यक्त कर सकती है?

क्या
रात में दिखाई दे रहे
वे सारे काले
भयावह पेड
जो किसी भूत की
आकृति का
आभास देते हैं
और जिनसे
डर कर मेरे
अन्दर समाने की
उसकी बाल-चंचल चेष्ठा,
या
कहीं दूर
किसी गांव से आ रही
हवा के साथ
हिलौरे खाती
तूतक तूतक तूतिया......जैसे
फिल्मी गीत की
आवाज़ का
उस क्षण को
रसीला बना देने के बावज़ूद
सर्द रात से बचने
न सोने, सुबह जल्दी होने
जैसी उस अज़ीब सी
बैचेनभरी स्थिति को
कौन चित्रकार
तूलिका दे सकता है?

क्या
सूरज के जागते ही
ठंड से
जम चुके दो शरीर का
हडबडा के उठना
और यह पाना कि
हम कहां, किधर, कैसे
इस अज्ञात स्थान पर
आ बैठे,
और बस अब जल्दी
भाग चलो
जैसी मानसिकता में
प्रेम का ना तो कोई
इजहार कर पाना
ना ही कोई बात करना
बस मुस्कुरा कर
रह जाना
कभी पोट्रेट की
शक़्ल ले सकता है?

नहीं, बिल्कुल नहीं
वो तो ह्रुदय की
शीराओं में समा सकता है
या फिर
शरीर के तंतुओं
नसों में दौड
लगा सकता है।
ज्यादा है तो उस
स्थान पर ले
जा सकता है जहां
सुनहरी याद का जन्म हुआ था।
पर हाय रे विकास का दौर
मेरी ऐसी कितनी ही
यादों को लील गया।
खेत-खलीहान
गांव के गांव को
उजाड गया।
उसने वो पावन
बयार को भी
अपने वातानुकूलित यंत्र में
कैद कर लिया जो
बह कर नव-सृजन
किया करती थी,
हमें पवित्र
बनाया करती थी
आज सबकुछ नष्ट हो गया
पश्चीम का दानव
पूर्व की इज्जत को
हडप गया।
और मेरा तीर्थ स्थल
कांक्रीट क्रांति में
शहीद हो गया।

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

'कीबोर्ड के खटरागी' से मुलाकात


आज का ही तो दिन था, कुर्ला रेलवे स्टेशन के बाहर 'नुक्कड' पर जब 'कीबोर्ड के खटरागी' से मुलाकात हुई तो यकीन मानिये ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार किसी व्यक्ति से मिल रहा हूं। सूचना क्रांति के इस दौर की तारीफ तो करनी ही होगी कि उसने बगैर मिले लोगों को आपस में मिला दिया है। दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है। औसतन कद-काठी, गले में टंगा चश्मा, कमर में बान्ध रखा बैग, अपनत्व की मुस्कान और मिलनसार व्यक्तित्व की ऊर्जा लिये दमकता चेहरा मेरी आंखों में आज भी कैद है। कैद है कानों में खनकती स्नेहिल आवाज़ और मिलते ही प्रस्फुटित हुए शब्द ' जैसा फोटो में दिखते हो वैसे ही लगते हो', कुछ देर तो मुझे लगा कि सचमुच फोटो और प्रत्यक्ष दिखने में बहुत अंतर होता है। अमूमन तस्वीरें हक़ीक़त बयान नहीं करती, किंतु मुझे अच्छा लगा कि मेरी तस्वीर हक़ीक़त में भी मेरी ही है। खैर.. 'तेताले' से बाहर निकल मुम्बई आए इस इंसान से मैं मिलने का इच्छुक तो था ही, इसके पीछे मुख्य कारण यह भी था कि इनकी रचनाधर्मिता के साथ- साथ 'पिताजी' नामक ब्लोग से ये अंतर्मन की जो भावनाये प्रसारित करते रहे हैं वो दिल को छूने वाली रही हैं। मैने जब ब्लोग की शुरुआत की थी तो यकीनन यह कतई नहीं सोचा था कि लोग जुडेंगे जो मित्र भी, आदरणीय भी बनते जायेंगे। ठीक है, फोन पर या चेट पर या फिर ब्लोग के माध्यम से ही जुडना होगा, किंतु प्रत्यक्ष भेंट के बारे में सोचना अपने बहुत कम प्रतिशत के साथ मस्तिष्क में था। दरअसल, होता यह है कि साहित्य के इस दौर में या यूं कहें बौद्धिक बाज़ार में लोगों का मन मस्तिष्क पता नहीं किस 'ईगो' से घिरा होता है जो बडे छोटे जैसे मनोभाव से पीडित रहते हैं और भेद कर मिलन जैसी आनन्द की अनुभूति से दूर रह जाते हैं। इस तथ्य को भी उनके आने-मिलने और बाद में 'ब्लोगर्स मीट' के सफल आयोजन ने तोड दिया। ब्लोग और ब्लोगर्स सचमुच अनोखे हैं। मुझे उनके मिलने और मिलते रह कर सबको जोडने की यह फितरत अप्रत्याक्षित तौर पर एक ऐसी मुहिम लगी जो अब तक 'ब्लोग वाणी' या 'चिट्ठा चर्चा' जैसे मंच निभाते आ रहे हैं। मगर ये मंच तो ब्लोग्स को एक सूत्र में पिरो रहे हैं, इससे दो कदम आगे इस व्यक्ति ने भौतिक, मानसिक रूप से सेतु बनने का जिम्मा उठाया और ब्लोग्स के साथ साथ ब्लोगर्स को एक धागे में बुनने का कार्य प्रारम्भ किया। मानो फाह्यान का आधुनिक अवतार हो या व्हेन सांग की आत्मा ने इस युग में पुनर्जन्म ले लिया हो, जो न केवल लोगों को जोड रहा है बल्कि मित्रता की नई दिशाएं तैयार कर उसका बखूबी चित्रण भी कर रहा है। दिलचस्प यह कि इसका कोई दम्भ भी नहीं। बस एक मुहिम और मिलते जा रहे ब्लोगर्स का रैला। हंसता हुआ, हाथ मिलाता हुआ यह 'कीबोर्ड का खटरागी' सचमुच एक नई दुनिया बना रहा है। इस दुनिया के बाशिन्दे बनने और बने रहने की अज़ीब सी खुशी है मुझे। यह खुशी ' अविनाशी' है। इच्छा है यह खुशी बिखरती रहे, ब्लोगजगत में महकती रहे। हम सब आपस में कभी न कभी मिलते-जुलते रहें, फुनियाते रहें, चेटियाते रहे, बतियाते रहें, लिखते रहे और पढते रहें, बुद्धि और स्नेह से मिलकर बन रही चाश्नी से नहाते रहे, साहित्य को अपने अंतरतम तक महसूस करते रहें।
हां, यह सच है कि हमारी मुलाकात 5 दिसम्बर को हुई थी, वह भी दोपहर 2 बजकर 10 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 5 मिनट तक। आज 12 दिसम्बर है। इतने दिनों बाद मुलाकात के सन्दर्भ में पोस्ट डालने का एक कारण भी था। मैं चाहता था अविनाश वाचस्पति सकुशल अपनी यात्रा सम्पन्न कर लें. इस यात्रा के दौरान होने वाले घटनाक्रम भी सकुशल सम्पन्न हों, परिणाम बेहद सुखद रूप से सामने आये, मिलनेवाले तमाम साथी अपनी अपनी रिपोर्ट पोस्ट कर दें और सबकुछ हुआ भी ऐसा ही। अबसे ऐसा ही होता रहे। आमीन।

शनिवार, 28 नवंबर 2009

सुशीलजी की 'अमिताभ यात्रा"


यह भी अज़ीब संयोग है कि कानपुर में भारतीय क्रिकेट टीम ने अपनी 100 वीं टेस्ट जीत अर्जित की और मैने ब्लोग पिच पर अपनी 100 वीं रचना। हालांकि टीम इंडिया ने 1932-33 से अपने टेस्ट जीवन की शुरुआत की थी और 1952 में पहली जीत हासिल की थी। मैं 2008 में ब्लोग पिच पर उतरा था और अक्टूबर को पहली रचना पोस्ट की थी। भारत की 432 वें टेस्ट मैच में 100 वीं जीत है और मेरी करीब 400 दिनों में 100 वीं रचना। है न अज़ीब संयोग। खैर..।
जीवन में घटनाये होना अवश्यंभावी है। प्रकृति घटनाओं में समाई होती है। घटनायें घटित होने के बाद ही हमें ज्ञात होता है कि कुछ हुआ है। यह प्रकृति का गुण है, और शायद इसीलिये प्रकृति को रहस्यमयी माना जाता है। किंतु जो भी घटनायें घटनी होती है उसके घटने का क्रम न जाने कब से प्रारंभ हो चुका होता है। अज्ञात ही सही मगर एक एक तिनके जुडने लगते हैं। काल उसे बुनने लगता है। क्रमानुसार उसके छोटे से छोटे अंश आपस में टकराने लगते हैं और एक विशेष दिन को उद्घाटित करने के लिये पूरा का पूरा प्राकृतिक तंत्र जुट जाता है। कहते हैं इस प्रकृति में जो भी घटता है उसका कोई न कोई अर्थ अवश्य होता है। निरर्थक कुछ नहीं करती प्रकृति। शायद यही वजह है कि सुशील छौक्कर जी और अमिताभ श्रीवास्तव की प्रत्यक्ष भेंट के लिये प्रकृति ने अपना काम बहुत पहले से शुरू कर दिया होगा। ब्लोग की दुनिया से भी पहले। मिलने के लिये कब कब और कौन कौन सी जरुरते होनी है स्वतह ही निर्मित होती चली गई होंगी , हमारे अनजाने ही। दुनिया बहुत छोटी है। सैकडों लोग रोज़ टकराते हैं। किंतु किससे कब कैसे मुलाकात होनी है यह अज्ञात ही होता है और एकदिन जब मुलाकात हो जाती है तो आश्चर्य होता है। इसके बाद किसी दूसरी प्राकृतिक आवश्यकता की पूर्ति के लिये समय दिन बुनने लगता है। स्मृतियां भी बनती है और भविष्य भी निर्मित होता चला जाता है। कुछ जो कर्म होने है वो सम्पादित भी होते चले जाते हैं। हमे बगैर खबर हुए ही हमसे प्रकृति कार्य करवा लेती है। क्योंकि हम प्रकृति के हाथों में कैद हैं। उसके कर्मों के एक माध्यम हैं। उसके लिये कोई बडा या कोई छोटा नहीं होता। सब के सब सामान्य, उसके हाथों के खिलौने। फिर कैसे कहें कि हमने कोई बडा नहार मार लिया? या हम किस शान, किस अहम में जीते हैं? सबकुछ बेमानी। प्रेम ही एकमात्र ऐसा वाहक है जो ईश्वरीय शक़्ति का अहसास कराता है और इस प्रकृति मे तमाम प्राणी इस अद्भुत प्रेम शक़्ति से बन्धे होते हैं। अब यह समय के उपर है कि कब कौन किससे मिलता है?
सुशीलजी से मुलाकात हुई मुम्बई, कल्याण स्टेशन के प्लेट्फार्म नं-5 पर। पंजाब मेल का 24-25 घंटों का लम्बा सफर तय करते हुए 22 नवम्बर की सुबह करीब 7.30 बजे वे दिल्ली से अमिताभ तक आये। अमिताभ इसलिये कह रहा हूं कि वे सिर्फ और सिर्फ मेरे लिये मुम्बई आये थे। अन्यथा होता यह है कि मुम्बई आना होता है, यहां कोई रहता है तो चलो उनसे भी मिल लिया जाये जैसी मानसिकता होती है। हालांकि मिलने के लिये यह मानसिकता भी कोई बुरी नही किंतु सुशीलजी विशुद्ध रूप से मुझसे मिलने आये थे। लिहाज़ा प्रसन्नता को व्यक्त करने के लिये शब्द गुम हो जाते हैं। जहां निस्वार्थ प्रेम भाव होता है वहां किसी के प्रति कोई अन्देशा या भ्रम की स्थिति भी नहीं होती। लिहाज़ा हमारी मुलाकात में औपचारिक जैसी कोई चीज नहीं थी। उन्हे लोकल में तुरंत घुसाया। रविवार था वरना उन्हे 'घुसाया' ना कह कर 'ठूंसना' कहता। फिर भी भीड थी। मेरे घर तक पहुंचने के लिये कल्याण से 20 मिनिट तो लगते ही हैं। उनका यह पहला अनुभव था। 22-23 और 24 तीन दिन हम साथ रहे। और मज़ा देखिये कि मेरी छुट्टियां भी थी, अन्यथा मुम्बइया व्यस्तता में सुशीलजी को पूर्ण समय देना कठिन हो जाता। सुशीलजी ने यह सब पहले ही देखभाल लिया था। जिसका नतीज़ा रहा कि 'बस मज़ा आ गया।' खूब बतियाये, घूमे-फिरे। फोटो-सोटो खींचे। क्या इसे महज़ यह माना जाये कि हमारी मुलाकात के पीछे सिर्फ यही कारण होगा? नहीं, कोई भी मुलाकात सिर्फ मुलाकातभर नहीं होती। बल्कि जीवन के किसी भी दिन के उसके उपयोग के लिये कुछ न कुछ 'अच्छा' प्रकृति तय कर देती है। 'अच्छा' इसलिये कि प्रकृति में बुरा कुछ भी नहीं होता। जो भी बुरा होता है या जो हमे लगता है वो हमारे द्वारा ही किया जा रहा कुछ अप्राकृतिक कर्म है। अब इस 'अच्छे' के मनोभाव में ही सही एक रिश्ता तो बन जाता है। जो जीवन में सुनहरी यादों के इतिहास में अपना एक अलग अध्याय जोडता रहता है। बहलहाल, अज़ीब संयोग के इस सिलसिले में यह कितना बढिया रहा कि अपनी 100वीं पोस्ट सुशीलजी की "अमिताभ यात्रा" को समर्पित है।

बुधवार, 25 नवंबर 2009

वाह क्या विडम्बना है



मेरे दफ्तर पहुंचने से पहले ही वो वहां मौज़ूद था। मुझसे एकाध इंच लम्बा यानी वो होगा कोई 6 फिट 1 या 2 इंच का। गठीला बदन। साफ झलकता था कि कोई स्पोर्ट परसन है। हंसता हुआ चेहरा, उसकी मुस्कान में एक अलग ही शान थी,अपनत्व का भाव था, जिसने मुझे उसकी ओर आकर्षित किया था। मुझे देखते ही उठा और गर्मजोशी से हाथ मिलाया। माय सेल्फ फारूख दिनशा..। मैने अपनी पास वाली कुर्सी पर उसे बैठने का इशारा करते हुए औपचारिक भाव से कहा, सोरी फारूख, मुझे आने मे लेट हो गया, आपको इंतजार करना पडा होगा... आईये, बैठिये और बताईये क्या बात है? वो हंसते हुए बैठ गया और कहने लगा- अमिताभजी, आपका नाम बहुत सुना है, आपसे मिलना था इसलिये आ गया.., वैसे आपसे मिलकर ऐसा लग रहा है कि अमिताभ बच्चन से मिल लिया..., और जोर से हंसने लगा। मैं भी मुसकुरा दिया उसकी बालसुलभ हंसी पर। मेने कहा- इस बात पर चाय हो जाये? उसने कहा- श्योर। यह बात होगी कोई 1995-96 की।
मार्शल आर्ट का विख्यात खिलाडी, बेहतरीन प्रशिक्षक, उम्दा खेल लेखक। अपनी नई पुस्तक के विमोचन का आमंत्रण देने आया था वो। साथ ही उसने बताया कि मार्शल आर्ट को लेकर उसने कितना कुछ किया है और कर रहा है। बच्चों से लेकर आर्मी के जवानो तक वो अपनी प्रतिभा का पूरा पूरा उपयोग करते हुए लोगों को जीवन जीना सिखा रहा था , आत्मरक्षा की कलाये सिखा रहा था, उनमें आगे बढने, लक्ष्य पाने की राह दिखा रहा था। हालांकि मैं किसी से इतनी जल्दी प्रभावित नहीं होता लिहाज़ा उससे उसके कार्यों के सन्दर्भ में पूछता रहा और सवालों के जवाब पाता रहा। शायद उसके विषय में मेरी इतनी रुचि, ज्ञान, गम्भीरता को देखते हुए वो मुझसे प्रभावित हो गया। कह उठा- ओह ग्रेट। यू आर रियली प्योर..। मैं हंस पडा..मैने कहा- ऐसी बात नहीं है, दरअसल मैं भी थोडा बहुत जानता हूं जूडो-कराटे..., हो सकता है कि इस वजह से आपसे पूछता चला गया। खैर उस मुलाकात के बाद फोन पर बातें, उसके कार्यक्रमों में मुलाकातों ने हमे करीब ला दिया। एक दोस्ताना रिश्ता बन गया जिसमें कोई स्वार्थ नहीं दिखा। मैं उसके किसी प्रोग्राम में नहीं जा पाता तो फोन पर नाराजगी जाहिर करता, पहुंच जाता तो इतना खुश हो जाता मानो मुख्य अतिथि ही पहुंच गया हो। इंतजार, मुलाकात, फोन पर बातचीत आदि हमारी दोस्ती में नये अध्याय जोडते गये। मेरी किसी बात को वो टालता नहीं, स्मृतियां बनती गईं। मैं कुछ व्यस्त हुआ तो मिलना जुलना कम हो गया, वो भी अपने कार्यों में व्यस्त किंतु न वो भूला न मैं। यदा कदा फोन और किसी कार्यक्र्म में बुलावा। उसका समर्पणभाव, किसी के लिये कुछ करने की ललक और हमेशा उपलब्ध रहने की आदत उसके इंसान होने का जीता जागता उदाहरण था। मेरी बच्ची को मैं सिखाना चाहता था मार्शल आर्ट, इसके लिये उसने कह दिया था- अमिताभ घर भिजवा दूंगा सिखाने वाला, मुझे बस कहभर देना कि कब शुरू करना है। किंतु ऐसा हो नहीं सका। हां वर्ष 2003-04 में मुझसे मेरी एक कलिग ने ऐसी इच्छा जाहिर की और मैने फारूख को फोन मिला दिया। कोई 3-4 साल बाद मैं उसे फोन कर रहा था। उसने प्रसन्नता से कहा- भेज दो उसे। मैने अपनी कलिग से कहा- देखो वो बहुत महंगा प्रशिक्षक है , पूछ लेना कितनी फीस वगेरह है। उसने पूछा, और जवाब में उसे मिला 'अमिताभ से कह देना आइन्दा ऐसी बात वो सोचे भी नहीं।' जिन्दादिली का दूसरा नाम था फारूख, मैं अपनी किस्मत पर खुश रहता कि इतना बेहतरीन इंसान मेरा दोस्त है। 27 नवम्बर 2008 को कोई एक बडा सा कार्यक्रम था स्पोर्ट का, मुझे उसमें आतिथ्य के लिये अपने परिचित कुछ बडे खिलाडी आमंत्रित करने थे। मैं लिस्ट बना रहा था जिसमें फारूख का नाम पहले नम्बर पर था। सोचा फारूख कभी मना नहीं कर सकता, सो पहले दूसरों को बुला लूं उसे 26 की रात फोन कर तय कर लूंगा। किंतु 26 को तो इधर आतंकी घटना घटित हो गई और सबकुछ उलट-पलट सा गया। कार्यक्रम स्थगित हो चुका था। किंतु फारूख की याद आ रही थी। और यकीन मानिये जब 29 तारीख को फोन किया तो वो बन्द। लैंड लाईन एंगेज़। ऐसा पहली बार हो रहा था। और शायद अंतिम बार भी। क्योंकि फारूख......।
26 की शाम अपने दोस्त के साथ ओबेराय में खाना खाने गया था वो। दोस्त को बचाने और एके 47 से दागी जा रही आतंकी द्वारा गोलियों को वो अपने सीने पर झेल गया। यह 30 नवम्बर को पता चला। अच्छा होता कि पता ही नहीं चलता...। अब तक वो मुझे बुलाता रहा था, मगर जब मेरी बारी आई तो...,उसने उसके फोन के 'स्वीच आन' का इंतजार मुझे थमा दिया। ऐसा इंतजार..जो कभी पूरा नहीं होना है...।
कुछ ऐसा ही इंतजार उन सब का भी होगा जिनके बेटे, मित्र, भाई, पति, पत्नी, बच्चे इस हमले के शिकार हुए..। होते रहते हैं...। और हम हमेशा बरसिया मनाते रहते हैं..सालों से बरसियां मनाई जा रही हैं, नई-नई बरसी आ जाती है और हम मनाते जा रहे हैं,मनाना खत्म नहीं होता..। वाह क्या विडम्बना है।

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

आटा और रोटी

आटा गूंथना
जीवन मथने
जैसा ही तो है|
उसकी लोई बना
बेलन से आकार देना
और गर्म तवे पर
रख सेंकने भर से
रोटी नहीं बनती,
आग पर
तपना भी होता है
और इस तरह
जलना होता है
कि कही
चिटक तक न लगे|
जीवन क्या ऐसा नहीं?

फिर दुःख ...
कहते है
रोटी को
चबा चबा कर खाना
पाचन तंत्र के लिए
ठीक होता है|
न निगलना
न उगलना..
चबा कर
रसमय कर लेना|
जीवन में दुःख भी
एक रोटी ही तो है|

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

ओहदे वाला आदमी

ओहदे वाला आदमी
'आदमी' नहीं होता
वो
'ओहदे वाला आदमी' होता है।

'आदमी' होने के लिये
सिर्फ 'आदमी" होना होता है।
और
ओहदे पर जो 'आदमी" होता है
वो ओहदे के नीचे होता है,
दबा सा।
उपर उसके होता है
अहम और दम्भ का चमकता
हीरा।
हीरा... जैसे मिलावटी चीजों पर
ब्रांडेड रैपर लगा हुआ
'ग्रीन' चिन्हित पैकेट।

सच तो यह भी है कि
पैसा, यश, कीर्ति
होंगे किसी जन्म के पुण्य।
किंतु पाप की तरह
वो भी तो कटते हैं,
ओहदे वाले ये क्यों
नहीं समझते हैं।

प्रारब्ध जिसका जो
उसे मिलता है,
पर हर क्षण होता
एक प्रारंभ है
जो बनता 'प्रारब्ध" है
यह 'आदमी' सोचता है।

इसीलिये यह कहना
कि
ओहदे पर बैठना
और 'आदमी' बने रहना
कठिन है।
जैसे
सांप का बगैर ज़हर के होना।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

सवाल आपसे हैं, उनसे नहीं जो सवाल पैदा कर रहे हैं

कल मुम्बई में अफरा-तफरी मच गई। मध्य-रेल अचानक ठप्प हो गई। सुबह के उस समय यह सब हुआ जब लाखों लोग अपने कार्यस्थल की ओर रवाना होते हैं। एक निर्माणाधीन पुराना पाईपलाइन वाला पुल टूट कर लोकल ट्रेन पर गिर जाता है, हाहाकार मच जाता है। मचे भी क्यों नहीं आखिर ट्रेन हादसे मे मौत भी हुई और घायल भी हुए। ऐसा लगा मानों किसी परिवार के मुख्य व्यक्ति को हार्ट अटैक आया और परिवार वालों में भगदड मच गई। बदहवासी छा गई। सारा कामकाज रुक गया। सबकुछ उलट-पलट सा गया। मुम्बई की लोकल ट्रेन को भी तो जीवन रेखा ही माना जाता है। यही वजह है कि कल लोग किस हाल में थे, और किस हाल में घर पहुंचे..बडी करुणामयी कहानी है। अफसोसजनक यह कि इस कहानी की आदत हो गई है, हर गम पचाने की मज़बूरी हो गई है। रोज़ ब रोज़ कहानी दोहराती है, सो जीवन में यह आम हो गई है। वाह री विडम्बना। किंतु मैं मुख्य घटना के केन्द्र की बात करना चाह रहा हूं। उस कैब की बात करना चाह रहा हूं जिसमें मोटरमैन (ड्राईवर) फसां था और मौत से लड रहा था। वो जीत जाता यदि उसके विभाग वाले चुस्त दुरुस्त होते। दुख होता है यह कहने में कि देश का सबसे बडा नेटवर्क, सबसे बडा लापरवाह है जो अपने आदमी की जान की कीमत भी नहीं समझता और महज़ 5 लाख सहायता राशि देकर मामले की इतिश्री मान लेता है। वह एक निरापद मौत थी। करीब 3 घंटों तक दचके हुए कैब में दबा हुआ मोटरमैन सहायता के लिये गुहार लगा रहा था, और रेलप्रशासन मामले की पुष्टी के लिये मीडिया से मुखातिब होना ज्यादा बेहतर मान रहा था। कहने को वहां सब थे। रेल विभाग का आपातकालीन दस्ता भी था, पुलिस प्रशासन भी था, अग्निशमक दल के लोग भी थे और जनसामान्य की भीड भी थी। अगर वहां कोई नहीं था तो उस जिन्दगी को बचाने वाला, जिसकी सूझबूझ की वजह से बहुत बडी दुर्घटना टल चुकी थी। हास्यास्पद है जिस नेटवर्क के बारे में कहा जाता है कि यहां हर कार्य के लिये एक प्रशिक्षित व्यक्ति मौज़ूद है, साधन उपलब्ध हैं, वहां उसके पास कैब को काटकर जान बचाने के लिये जो औज़ार हैं वो सिर्फ दिखावा, कैब को काटने के लिये ड्रील मशीन लाई गई, गैस की टंकी लाई गई, पर वाह रे रेल विभाग, वो टंकी खाली निकली। मौत से लडने वाले ड्राईवर की थमती सांस की मानो किसी को कोई परवाह नहीं, पुलिस भीड को हटाने में व्यस्त, अग्निशमन दल रेल विभाग की कार्यवाही की प्रतीक्षा में, तो रेल विभाग का बचाव दल अपने ही बचाव में दिखाई दिया। अन्दर दबा कुचला उसका खुद का आदमी अंतिम सांसे गिन रहा होता है और बाहर उसे बचाने के नाम पर सिर्फ नाटक खेला जाता है। और जब कैब काट लिया जाता है, अन्दर फंसे ड्राईवर को बाहर निकाला जाता है तो हाथ में सिर्फ लाश आती है, क्योंकि निकालते समय उसका हाथ कट जाता है, पैर मे चोट पहुंचती है, वैसे भी काफी देर हो चुकी होती है। वाह रे रेल विभाग की सफलता। उस लाश को अस्पताल भेजा जाता है, फिर घरवालों को सौंप दिया जाता है। परिवार के बहते आंसुओं के बीच दो शब्द संवेदना के टपका कर रेलविभाग अपनी कर्मठता का प्रदर्शन करता है। अब परिवार को सहायता राशि घोषित कर दी गई है, किसी को नौकरी का आश्वासन भी दे दिया जायेगा। बस्स..धीरे धीरे सबकुछ ठीक..खत्म...। वाह री...मानवता....। मुझे समझ में यह नहीं आता कि करोडों बज़ट वाले रेलविभाग में इतनी दुर्घटनायें हो चुकी है, बावज़ूद इससे निपटने के लिये आवश्यक साधन भी उपलब्ध नहीं? प्रशिक्षित कर्मचारी भी नहीं? जो ऐसी घटनाओं के होते ही चुटकी में जान बचा सकता हो? होनी को कौन टाल सकता है, यह सच है किंतु होनी के बाद अगली होनी से बचाने के उपाय खडे किये जा सकते हैं। किंतु लापरवाहों की आंखे नहीं होती, दिमाग नहीं होता, होता है तो जेब भरने, काम चलने की बस एक तुच्छ मानसिकता होती है। मानवीय भूल होती है, किंतु कोई ड्राईवर मौत को आमंत्रण देता हो, ऐसा नहीं होता। अभी पिछले दिनो जब मथुरा में हादसा हुआ तो रेलविभाग ने ड्राईवर को दोषी मान कर अपनी कार्यवाही शुरू कर दी, किंतु जब मुम्बई में खुद रेलविभाग दोषी था तो कौन कार्यवाही करेगा?
सवाल सिर्फ रेलविभाग को ही नहीं साधता, बल्कि हमारे आसपास फैले इस पूरे तंत्र को साधता है जो आदमी की जिन्दगी को कौडी की कीमत से तौलता है। हर जगह मौत खडी है। उसके खडे होने के संकेत भी दीखते हैं, उसे खडे करने वाले लोग भी दीखते हैं..किंतु नहीं दिखते इन पर पाबन्दी लगाने वाले। पूरी मानवता की यह सबसे बडी हार है। और हम अपनी ही हार रोज़ देखते है खडे होकर..., हंसते हुए..। क्या अब भी आप मौन साधना ही हितकर समझते हैं या ऐसी तमाम खडी मौतों के खिलाफ आवाज़ बुलन्द कर प्रशासन को चेताना चाहते हैं? सवाल आपसे हैं, उनसे नहीं जो सवाल पैदा कर रहे हैं।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

365 गेंदो में 93 रन

365 गेंदो में 93 रन, टेस्ट मैचों के लिहाज़ से ठीक-ठाक कहे जा सकते हैं। क्रीज़ पर ड्टे रहना और शतक के करीब रहना भी कम रोमांचक नहीं होता है। टेस्ट मैच वैसे भी क्रिकेट का असली रूप होता है, इसमे क्रिकेट की कलात्मकता, तकनीक निखर कर सामने आती है और ऐसा माना जाता है कि टेस्ट मैच ही क्रिकेट के असली खिलाडी की पहचान है। वैसे आजकल वन डे, ट्वेंटी-20 मैचों की भरमार है, फटाफट क्रिकेट का बाज़ार भी गरम रहता है, किंतु मुझे लगता है जिसे क्रिकेट पसन्द है, जो क्रिकेट का परम आनन्द लेना चाहता है वो तो टेस्ट मैचों में ही दिलचस्पी रखेगा और उसे ज्यादा देखेगा। लिहाज़ा 365 गेन्दों में 93 रन के करीब बना लेना और कुछ टेस्ट पसंद दर्शकों का निरंतर बने रहना, हौसलाअफज़ाई के लिये काफी है। क्रीज़ पर डटे रहने का यह रोमांच खिलाडी के लिये भी उतना ही दिलचस्प होता है जितना कि कोई प्यासा कुआं खोदते हुए पानी के करीब पहुंच जाये। जी हां, मैं भी टेस्ट मैच खेल रहा हूं, क्रीज़ पर नाबाद डटा हूं। 'समय' की टीम के गेन्दबाजों ने हालांकि काफी कोशिश की आउट करने की किंतु 'हिन्दी' की टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए मैं भी कम खिलाड नहीं कि जल्दी आउट हो जाऊं। सो उसके बाउंसर, यार्कर, गुडलैंथ, स्पिन सब कुछ झेलते हुए कभी-कभी चौका भी लगाया। सिक्सर लगे हों और तालियां बज़ी हों, ऐसे भी दो-एक मौके मैने देखे। जो भी हो पर पिच पर टिका हूं। अपने चन्द दर्शकों (पाठकों) के लिये पूरी पूरी कोशिश की है, कर रहा हूं कि उन्हे निराश ना कर दूं। हां, सचिन तेन्दुलकर नहीं हूं किंतु अपनी टीम का सिर कभी ना झुके यह विश्वास धर खेल रहा हूं। अब चूंकि टेस्ट खिलाडी हूं तो मुझे ज्यादा दर्शकों की कतई चाह भी नहीं, जो हैं वो खासे, कोरे, विशुद्ध टेस्ट पसन्द दर्शक हैं, इसका मुझे गर्व है। बस वे ही मेरी ताक़त हैं। उनसे ही सीखता हूं। वे ही प्रेरणास्त्रोत हैं।
सच पूछिये तो ये 365 दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला। इस बीच कुछ ऐसे बेहतरीन मित्र बन गये जिनकी तलाश मेरे स्वप्न में थीं। ब्लोग मेरे रोज़मर्या जीवन का हिस्सा बन गया। जब भी उदास हुआ और ब्लोग सफर किया तो उदासी भाग गई। थकान से टूटते शरीर की 'आरोमा थैरेपी' इसी ब्लोग ने की। विचारों के तूफान को यहीं शांत किया। अपनी अल्प मतिनुसार शब्दों के साथ यहीं खेला। हां, मुझे ब्लोग पर देख कइयों ने इसे बकवास कहा। क्यों टाइम पास करता है? इससे तुझे क्या मिल जायेगा? समय क्यों खर्च करता है? अरे दुनिया कितनी आगे बढ गई है, लोग पैसा कमाने की सोचते हैं, तू इसमे अपना समय बिगाड रहा है। इससे क्या तुझे कोई पुरस्कार मिल जायेगा या कोई ज्ञानपीठ सम्मान दे देगा? आखिर होगा क्या इससे? आदि आदि...। मैं चुप रहा क्योंकि बचपन में सुना था कि अच्छे कार्यों के बीच कई सारे व्यवधान आते हैं"। पिताजी कहा करते हैं कि "अच्छा साहित्य पढना और लिखना समय का कतई दुरुपयोग नहीं होता।" वे कहते हैं कि- "आप कोई कर्म कर लेने के बाद कैसा अनुभव करते है? थकान का या प्रसन्नता का? आपको प्रसन्नता हो तो समझो आपने अच्छा कर्म किया। ग्लानि हो तो समझिये आपका वो काम अच्छा नहीं।" वैसे भी हमारी मनुस्म्रुति में यह कहा गया है कि-
"यत्कर्म कुर्वतोस्य ंस्यात्पारतोषा चांतरात्मन।
तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत॥" ( मनुस्म्रुति 4.161)

"यानी कर्म के साथ आत्मतुष्टि अवश्य होनी चाहिये। कर्म करते समय यदि अंतरात्मा को संतुष्टी का अनुभव हो तो उसे प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। जिस कर्म में आत्मग्लानि या पश्चाताप हो वो नहीं करना चाहिये।" मुझे तो पढने-लिखने में आत्मसंतुष्टि का अनुभव होता है इसलिये मैं यह करता हूं। ब्लोग तो आज है, कल तक मैं अपनी डायरी मेंटेन किया करता था। अखबार की नौकरी, और वह भी बगैर किसी ज्यादा उपरी दबाव के, तो लिखने में मज़ा आता रहा। साहित्यिक पारिवारिक माहौल व पिताजी की अपनी लाइब्रेरी में किताबें भी खूब मिली पढते रहने के लिये, तो उसमे मगन रहा, फिर नई किताबें खरीदने का शौक रहा, अब जब ब्लोग है तो क्यों न अपनी फितरत को इसके माध्यम से दिशा देता रहूं। लिहाज़ा इस ब्लोग सुख की नदिया में गोता लगाते हुए और मोतियां बिनते हुए एक वर्ष हो गया। मैं उन सब का अभिनन्दन करता हूं जिन्होने मुझे सराहा। मेरे साथ बने रहे। अब यह स्नेह बना रहे, या यह कहूं कि स्नेह बढ्ता रहे। यही आकांक्षा है।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

एक ये भी दीवाली है...

फटे कपडे वाला
पसीने से लथपथ
बदहवास कहां दौडा जा रहा है,

रुक...
अबे रुक जा...।
बच के कहां जायेगा बे
बोल...क्यों भाग रहा है
और ये तेरे हाथ में....
क्या है, बता....
चोर कहीं के।

पकडे रखना
मुंडेर पर चढा था ये
वो तो अच्छा हुआ कि
दीये जल रहे थे
दिख गया...।

बोल बे..चुप क्यों है?
तेरे हाथ में क्या है?

अच्छा तेल सने हाथ...
कोई पकडे तो फिसल जाये
और भाग जाये...ऐं..।

तमाच...तमाच..तमाच

बता...
रो रहा है..दो और पडेंगे
तब बतायेगा क्या....।

दीया ?????.........?

"-सुना था
आज के दिन
दीया जला आंगन में रखते हैं...
लक्ष्मी आती है...
मां बीमार है, बाप का पता नहीं..
खाने को कुछ नहीं..
इतने सारे दीये जल रहे थे
सोचा एक उठा ले जाऊं..

माफ कर दे
हवलदारसाब....

और
ये ले बाबू तेरा दीया....।"


तमसो मा..ज्योतिर्गमय...........।

-------------------------------

ले तू भी
फेंक पत्ता..
पी ले कल का क्या भरोसा..
उपर क्या बतायेगा?
ऐं..
पी भी नहीं...।

पैसा क्या उपर ले जायेगा...?


पूजन...

किटी पार्टी में देर हो रही है
ओह ये लिपिस्टिक...

वाव..क्या लग रही है तू।

हां दीवाली है न।

ऐ...हम जा रहे हैं
घर की बत्तियां बुझा दे।

जी मेमसाब।

तमसो...मा..ज्योतिर्गमय.....।

----------------------------

बुधवार, 14 अक्टूबर 2009

रात हवा ने बहुत बात की

रात हवा ने बहुत बात की
रग-रग, छू-छू मुलाकात की।

ऐसे कोई बौराता है
जीना मुश्किल हो आता है,
ठन्डा,भीना मादक अंचल
परस-परस मन बहकाता है।

ऐसी बैरिन कौन जात की
रात हवा ने बहुत बात की।

खिलतीं कलियां शर्माती हैं
झूम,लचक झुक झुक जाती हैं,
बे-मौसम, बे-वक़्त, करकशा
हवा अगन सुलगा जाती है।

लज्जा उघरे गात गात की
रात हवा ने बहुत बात की।

अर्पित मान हुआ जाता है
मंत्र-मुग्ध मन झुक आता है,
नस-नस में बस पवन हठीला
सन-सन सी सरसा जाता है।

बात करे अब कौन प्रात की
रात हवा ने बहुत बात की।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

शांति के नये 'बाबा', जय हो ओबामा

ओम से नहीं, अब शांति ओबामा से मिलती है। इससे बडा चमत्कार और क्या हो सकता है कि जिसे दुनिया आठ-नौ महीने पहले तक जानती नहीं थी उसे शांति का सबसे बडा दूत बना दिया गया। जिसने अपने लिये, अपने कुनबे के लिये लडाई लड कर सत्ता हासिल की उसे दुनिया का महान शांति वाहक मान लिया गया। सच तो यह है कि अब मुझे काला जादू पर विश्वास होने लगा है। गोटियां फिट करने वाले फनकार की फतह कैसे होती है, जान गया हूं। यह भी समझ में आया कि दुनिया में नोबेल पुरस्कार आखिर नोबेल क्यों है? माफ करना 'बापू' आप गलत दिशा में थे, आपकी शांति, अहिंसा, सदाचार सबकुछ दुनिया के लिये, जनमानस के लिये था, अगर आप अपने लिये सोचते तो शायद आज आप भी ओबामा की तरह शांति दूत होते, नोबेल विजेता होते। वैसे आज के नेता बडे खुश हैं। वे भी सपने देख सकते हैं किसी नोबेल के। अजी उनका पूरा-पूरा हक़ है। इस नये शांति के नोबेल विजेता के गुण देखिये- ओबामा ने अमेरिका इतिहास बदला, एक अश्वेत या कहें अर्ध-श्वेत व्यक्ति ने अमेरिका जैसी महाशक्ति को अपने कब्जे में लेकर सत्ता हासिल की। केन्याई मूल के अश्वेत पिता और अम्रेरिकी श्वेत माता की संतान होना ओबामा के लिये फायदेमन्द साबित हुआ। नस्लवादी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त अमेरिका की राजनीति के बीच संघर्ष करते हुए देश की गद्दी तक पहुंचना आसान थोडे होता है। हमारे गांधीजी जैसे थोडी कि पूरी जिन्दगी जनसेवा में लगा दी, देश के दिलो दिमाग में बस जाने तथा सर्वोपरि होने के बावज़ूद किसी प्रकार के सत्ता सुख से अलग रहे। जीवनपर्यंत दूसरों के सुखों के लिये, शांति के लिये तन-मन सब कुछ अर्पित कर दिया। छी, यह भी कोई काम हुआ भला। इसलिये गान्धीजी को हमेशा नज़रन्दाज रखा गया और ओबामा को आज नोबेल दिया गया। किसकी पूजा करने से ज्यादा लाभ होता है? यह नोबेल आयोजक बखूबी जानते हैं। इसीलिये तो उन्होने लगभग ज़ोर्ज़ बुश की राह चलने वाले 48 साल के ओबामा को चुना। आप देखिये, ओबामा सत्ता में आये उधर उत्तर कोरिया ने परमाणु परिक्षण किया। और ईरान भी इसके काफी करीब है। इराक से जो अमेरिकी सेना लौट रही है अगर उसे मापदंड माना गया हो तो जय हो नोबेल वालों, क्योंकि वो पूर्वनियोजित कार्यक्रम है। ओबामा के सामने चुनौती के तौर पर अफगानिस्तान का मामला लिया जा सकता है। किंतु वहां के हालात और अधिक दयनीय हो रहे हैं। अब तक ना तालिबान का सफाया हो सका ना कोई शांति का रत्तीभर दर्शन। और तो और बुश की पाकिस्तान को लेकर जितनी गलत नीतियां थीं उससे भी दो कदम आगे हैं अपने 2009 शांति के नोबेल विजेता बराक ओबामा। पाकिस्तान को दी जाने वाली अमेरिकी सहायता राशि बढाकर तीन गुनी ज्यादा कर दी गई है। जिसे पाकिस्तान ज्यादा भारत के खिलाफ उपयोग में लाता है। ओबामा ने यह सोचने में अपनी शांति भंग नहीं की कि पाकिस्तान इस राशि का इस्तमाल पडौसी देशों में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने में नहीं करेगा। हां शांति के इस नये दूत ओबामा ने इजराईल-फिलिस्तीन वार्ता में जरूर एक नया युग शुरु करने की पहल की। मगर अफसोस यहां भी है कि अमेरिका की जो ईजराइल लाबी है वो काफी शक्तिशाली है और ओबामा उसके आगे बेबस हैं। लिहाज़ा इस वार्ता में अब तक कुछ भी खास नहीं हुआ है। उधर सिर-ऐढी का जोर लगा देने के बावज़ूद ओबामा अपने देश के लिये ओलम्पिक मेजबानी नहीं ला सके, देश को मन्दी की मार से नहीं बचा सके। चीन के आगे दबना और दलाई लामा से ना मिलना, क्या संकेत देता है यह सोचा जा सकता है? अब नोबेल आयोजकों को इतना धैर्य कहां कि फिलहाल थोडा रुक कर ओबामा को परख लेते। अभी तो उन्होने अपना जीवन शुरू ही किया है और उन्हें यह कह कर अपने मापदंड की भी ऐसी कि तैसी कर दी कि कम समय के भीतर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को मज़बूती देने के उनके 'असाधारण' प्रयासों के लिये यह नोबेले दिया गया। वाकई असाधारण ही तो है। नोबेल, नोबेल ही तो है, कोई शक़ ?????????

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

आंख


यों ही बहुत
सुन्दर तुम्हारी
बडी काली आंख।
कमल, खंजन,
हरिण सबको
मात करती आंख।
अनगिनत से
भाव भरती
बात करती आंख।
किंतु
उपमाहीन है
नीचे झुकी-सी आंख।



-चित्र गुगल से साभार

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

वाह रे समर्पण।

पलको से टकरा-टकरा
आखिर लुढक ही गई
आंखों के अन्दर
और
रैटीना में फैल गई
अपने पूरे विस्तार के साथ
मेरी तस्वीर।
मैं कुछ समझ पाता कि
उसने पलक बन्द कर
निगल लिया मुझे
ह्रदय के अंतरतम तक
और बुदबुदाई
अब तुम जा सकते हो।




मैं
दुनियाई बवंडर में
उलझा
अपने दायित्व, कर्म
धर्म निभाता
लगभग बूढा हो गया,
वो कभी याद नहीं आई,
क्योकि उसे कभी
भूला ही नहीं।
फिर यह विश्वास कि
मैं तो उसके
ह्रदय में ही हूं।
सोच बुदबुदाता हूं
वाह रे समर्पण।

शनिवार, 19 सितंबर 2009

"प्राणांतक सुख"

नवरात्रि की सभी को मेरी और से आत्मीय शुभकामनायें।

" हिन्दी पखवाडा चल रहा है, वैसे मेरे लिये तो हिन्दी हर क्षण रगों में बहती है, इसलिये पखवाडा चले या सालवाडा मुझे इससे कोई मतलब नहीं रहता। लिहाज़ा हिन्दी की ही एक रचना जो मुझे बेहद पसन्द है, सादर कर रहा हूं। "

अप्रतिक्रियोद्भुत
एक अहेतुकी कर्म का
अविनाशी प्रदर्शन
अग-जग में परिव्याप्त
सहज कौशल का मार्जित प्रकर
अतल गव्हरों में झंझायित
आलोडित कंदराओं का
प्रसादांत क्रन्दन
अनावरित अवतरण की
दुस्तर भूमिका
अंजुलि भर
गुम्फित वन्दन के स्वर
श्रद्धा विगलित प्रेम-पेलव
संसार का अपहरण
डूब उतरता
सहज-सिन्धु विक्षुब्ध
प्रलय जनमाता
अंतरतर कातर मन
आह..
टूटन का म्रुत्योधिक सुख
आह...
अनस्तित्व का प्राणांतक सुख।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

पर्वत को छू पाकर बदली बरस गई।

पूरी भरने से पहले ही गगरी छलक गई
बैरिन लट गुंथने के पहले औचक उलझ गई।

माना मूल्य समर्पण का है
यह तन बस अर्पण का है
किंतु देव-पूजन से पहले
सिर का घूंघट क्यों सरका है?

पद-प्रक्षालन से पहले यह कैसी झिझक हुई
चरण पकड कर बैठ गई मैं अन्यमनस्क हुई।

बून्दों के गिरने से पहले
खुली सीप से कुछ तो कह ले
बन्धन से मोती है फिर भी
अच्छी खोटी सीप परख ले।

गिरने से पहले ही क्यों यों चकनाचूर हुई,
दरपण के सम्मोहन में मैं खुद से दूर हुई।

जीवन में बन्धन का स्वर है
मिलन-बन्ध में जीव अमर है
यम की पूजा के पहले ही
ब्रह्माराधन सर्व अजर है।

मिलने से पहले ही बावरी यों मदहोश हुई
जन्मों की उलझी गुत्थी ज्यों पल में सुलझ गई।

आओ तो मैं चांद सितारे
गोदी भर लूं सारे सारे
यही समर्पण बने विसर्जन
अनजानी पहिचान पुकारे।

जैसे सागर की सीमा लख नदिया उमग गई
जैसे पर्वत को छू पाकर बदली बरस गई।

सोमवार, 14 सितंबर 2009

बुढिया हिन्दी

वो रोई,
नहीं..नहीं
उसे रुलाया गया।

रुलाया जाता रहा।

60 वर्ष की
बूढी के आंसू
पोछ्ने के नाम पर
देखो कितने
मज़में लगे हैं,
मेले लगे हैं,
सज़ी हैं दुकानें
और बिक रहे हैं
आंसू।

उसके आंसू
बेच कर
देखो तो कितने
महल खडे हो गये,
लोग कितने बडे हो गये,
पीठाधीश बन गये।
बावजूद
आंसू बेचे जा रहे हैं
खरीदने वाले
बन्द आंखे किये
खरीदे जा रहे हैं।
कोई माई का लाल नहीं
जो कोने में
पडी
रो रही उस बुढिया को
सम्भाले,
उसके आंसू पोछे
और कहे
जिसके बूते
मैं चला, जमा, खडा हुआ
जिसके बूते मैं
देशधारा में बहा,
जिसकी छाती से
दूध पिया,
उसे उसका मान सम्मान
पूरे-पूरे हक़ के साथ
यदि ना भी दिलवा पाऊं
किंतु उसे आजन्म
निसंकोच अपने
साथ रख,
ता-उम्र सेवा करता रहुंगा....।

अरे मां है वो
इतने से ही मान जायेगी
आंसू अपने पौछ डालेगी।
और गोद में उठा
पूरे आंगन में
दौड लगायेगी।
बस इतना ही तो चाहती है।

शनिवार, 12 सितंबर 2009

सुख




मेरे चेहरे के भाव
वो खूब पढ लेती है।
उसका नन्हा दिमाग
मेरे दिमाग से
कहीं तेज चलता है।
वो मेरे अनुसार अपने
कार्य ढालती है,
मुझे क्या अच्छा लगता है
क्या नहीं.
वो बारिकी से जानती है।
यहां तक कि
मुझे भी कभी पता नहीं चलता कि
मैं "ऐसा कुछ चाह" रहा था।
थकान होती है
तो सिर के पास बैठ
अपने नन्हें, कोमल हाथों से
सहलाने लगती है।
मैं
मना करता हूं
तो सीधे कुछ किताबें उठा
पढ्ने लगती है,
मुझे दिनभर की
बातें बताती है।
और जब देखती है कि
मैं हंसा तो
झट उठ कर भाग जाती है।
या फिर
कह उठ्ती है-
पापा
चलो आपको घुमा लाऊं।
मैं पूछ्ता हूं
कहां?
तो कहती है
कहीं भी बाहर,
जैसे मार्केट-वार्केट
होटल-वोटल,
मेरे लिये कुछ
खरीद वरीद लेना
कुछ खा-वा लेंगे
और क्या।
मैं हंस देता हूं और
प्यारी सी चपत
देते हुए
कहता हूं
शैतान।

बस यही तो है
जीवन के सुख।

सोमवार, 7 सितंबर 2009

और सुबह हो गई

-तरुणाई संझा ने
निर्मोही दोपहर को
धकेलते हुए
मेरे आंगन में
प्रवेश किया
और मुझे
चांदनी सौंप
खुद धीरे से
खिसक गई।


-आसमान पे चढ
आंखे फाड कर
ढूंढ रहा है चांद,
किंतु रात के मदभरे
सन्नाटे में
नव वधु की तरह
चांदनी सकुचाते हुए
मेरे अंक में
समा गई।


-सांय-सांय करती
मेरे बंद कमरे के
दरवाजे-खिडकियों पर
लात मार
दस्तक देती
चिल्ला रही है हवा,
लौटा चांद की चांदनी।
पर स्म्रतियों की
सुरा पी चांदनी
मेरे संग नशे में
खो गई।


-स्वप्न मधुबन मे
बिछी तारों की सेज़ पे
मेरी देह से लिपटी
मखमली स्पर्श
और प्रेम के परम सुख्
का रसास्वादन
देती चांदनी,
लो समर्पित
हो गई।


-ना देह की सुध रही
ना दीन-दुनिया की,
जब पक्षी चहके और
भौर की किरण ने
दरवाजे की दरार से
लुढक कर
मेरे कमरे में प्रवेश किया,
तो चांदनी के चेहरे पर
देखो कुटील हंसी
छा गई।


-मेरे गाल पे
चूमते हुए वो उठी
धीरे से बोली
सिर्फ 'चांद' ही दागदार नहीं है,
और न सिर्फ 'चांदनी' ही
परगमनिया है,
अब तुम भौर की
किरण को
सम्भालो, ऐसा कह
वो गई।


-कुछ समझ पाता
इतने में
आंखों में समा गई
किरण,
चादर की सिलवटे मिटा
चांदनी को विदा
किया ही था कि
धम्म से पलंग पर
अब किरण
पसर गई।

-और सुबह हो गई।

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

आग सिर्फ भस्म करती है

तुमने बडे प्रेम से
आग लगा दी,
मेरे तन में भी और
अपने तन में भी।
अब जलो...।

ये पद-प्रतिष्ठा की
प्रदक्षिणा,
खोने-पाने की
प्रतिस्पर्धा,
लूटने-खसोट्ने की
प्रलोभना,
बढती भूख का
प्रलाप,
प्राप्त प्रक्रुति का
प्रकोप,
चहूंओर सिर्फ और
सिर्फ आग का प्रमाण,
जलते रहो।

जीवन आग है,
जिसकी जितनी ऊंची
लपटें,
उसकी उतनी प्रतिभा।
जो जितना जला सके
उसका उतना प्रकाश।
जो ना जला सके
उसमे भी जलन,
वाह,
हर् कोई जल रहा,
इस दावानल मे।

आग सिर्फ
भस्म करती है,
भस्म।
चाहे जलो या जलाओ।


( ढेर सारे विचार गुत्थमगुत्था थे। मैंने उन्हें एकत्रित नहीं किया और उतार दिया। या यूं कहूं कि समय का अभाव है, और 'पोस्ट' करने की जल्दी। निश्चित रूप से बिखराव का आभास होगा। किंतु इतना तय है कि शब्दों के नेपथ्य में छुपा जीवन का गूढ् आपकी पैनी नज़रों से बचेगा नहीं।)

सोमवार, 31 अगस्त 2009

अगर तुम साथ दो



हौसला है मुझमें
पार कर लूंगा इस दर्द से
भरी बदरंगी नदी को,
उसकी आगत
उछाल मारती
लहरों पे नाचूंगा,
और इस चौडे दर्प से भरे
पर्वत को
चूर-चूर कर दूंगा
अपने कदमों तले,
अगर तुम साथ दो।

यूं तो क्षितिज कुछ होता नहीं
महज मरिचिका की तरह
प्रतीत होता है,
किंतु मैं
उस आकाश को
पकङ खींच लूंगा,
इस धरा पर ला पटकूंगा,
और यदि तुम
चाहो तो,
कदमों में तुम्हारे
उसे झुका दूंगा,
अगर तुम साथ दो।

जरूरी नहीं कि
प्रेम में करीब ही रहा जाए,
सांसो को आपस में
टकराया जाए,
अधरो की कंपन को
अधरों से मिटाया जाए,
मैं हवाओं के सहारे
आलिंगन कर लूंगा,
तुम्हें अपने अंतस में
बसा लूंगा,
अपनी गर्म सांसों को
सूरज की किरणों से मिला
तन तुम्हारा तर दूंगा
अगर तुम साथ दो।

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

न जाने कब ?

सातिया मांड (बना)
पटा रख
उस पर आसन बिछा कर
बैठाती थी मां,
आरती उतार कर
तिलक लगा
ढेर सारे अशीर्वाद बुदबुदाती,
मुंह में मीठाई रख देती,
फिर चारों दिशा में
धोक (प्रणाम) दिला
पीठ पर हाथ धर
अपने भगवान से
मेरे लिये कितनी
दुआयें मांगती,
मुझे नही पता।
कहती
आज के दिन
कोई संकल्प लो
और अपनी कोई भी
बुरी आदत छोड दो।
उसके आशीर्वाद
लिये मैं
बढता रहा,
लडता रहा,
जीतता रहा।
मगर न कोई
संकल्प ले पाया
न बुरी आदतें छोड पाया।
अब
जब वर्षों से दूर हूं
हर बार 'आज' उनकी
ज्यादा याद आती है,
बहुत ज्यादा
बहुत ही ज्यादा
याद आती है।
यहां रहने की
कैसी मज़बूरी है,
और क्या ये जरूरी है?
पता नहीं।
सोचता हूं,
ज्यादा सोचता ही हूं कि
दौड कर चला जाऊं
उनके पास।
कम से कम 'आज़' के दिन।
फोन पर और उनके मन मे
हर-हमेश आशीर्वाद
रहते ही हैं,
पर आज़ का विशेष दिन है,
आज फिर वो मुझे अशीर्वाद देंगी
और संकल्प व बुरी आदत
छोडने को कहेगी,
मैं भी चाहता हूं
अब संकल्प ले ही लूं,
अपनी कोई बुरी आदत
छोड ही दूं,
उनके साथ रहने का संकल्प
और छोडने में
मुम्बई रहने की
बुरी आदत।
किंतु...
न जाने कब
मेरी ये मुराद
पूरी होगी?
न जाने कब?

( जब घडी में रात के 12 बजे थे यानी 19 अगस्त शुरू हो गया था कि फोन की रिंग चहक उठी। मेरी अज़ीज़... ममता की बधाई, फिर तुरंत सुशील छोक़्कर जी की शुभकामनायें...सुधीर महाजन का एसएमएस.....मेरे इस दिन को खुशनुमा कर गये। घर से माता-पिता-बहन-भाईयों के आशीर्वाद प्राप्त हुए जो मेरी शक़्ति हैं।
मेरी बिटिया अपनी मम्मी के साथ एक दिन पहले से इस दिन की तैयारी में लग जाती है। बिटिया के लिये तो मानों कोई उत्सव हो। मुझसे छुपाकर अपने हाथों से ग्रीटिंग बनाना, मेरी जरूरत के हिसाब से कोई गिफ्ट लाना, और सोकर उठूं इसके पहले मेरे कान में अपनी आवाज़ में रिकार्ड की हुई बधाई लगा देना....., फिर ग्रीटिंग ...फिर गिफ़्ट..फिर मीठाई....फिर...., सच तो यह है कि माता-पिता के आशीर्वाद ही इस रूप में फलते हैं। और जब कोई मुझसे पूछ्ता है कि जीवन में तुमने कमाया क्या? तो मैं अपने अज़ीज़, मित्रों के नाम ले लेता हूं, यही सब तो मेरी पूंजी है।)

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

कौन दे गया शाप

' स्वाईन फ्लु' तेज़ी से बढ्ने लगा है। मुम्बई के हालात कुछ ठीक नहीं कहे जा सकते। आप यदि अस्पताल की ओर देखें तो पायेंगे बदहवास लोगों की भीड और परेशान चेहरे हर कोने पर बिखरे पडे हैं। फ्लु की तादाद भले कम हो पर दहशत हरकिसी के सिर पर सवार है। क्या बाज़ार,क्या दफ्तर,क्या सडके और क्या घर...हर जगह स्वाईन के नाम का डर। सच और अफसोस यह भी है कि रोज़ इस बीमारी से कोई ना कोई मौत हो रही है। उफ्फ..

" न बाढ
न चिलचिलाती धूप
न कोई आकाल
न कोई भूचाल।
न खबर
न आतंक
और न ही कोई आहट,
बस, चुपचाप-दबे पांव
धडाम से फट पडा
खौफ का बादल,
टूट पडा
कोने-कोने पसर गया।
हाय,
शहर मेरा फिर डर गया।
शरारत
अणु से शैतान की,
जो फैला गया
शंका, शक़ और शोक।
वो प्रेम मिलन
होठों का चुम्बन
गलबहियां
सब शूल बन गई,
चुभने लगीं।
दूर होने लगे
लोग आपस में
शनै-शनै,
बहने लगी
बदहवासी।
हाय,
शहर में मेरे बसने लगी खामोशी।
हां,
नथूनों से होकर
गले में घुस
सीधे मस्तिष्क पर
करता वार।
लाचार, बीमार
बिलखता परिवार
परेशां सरकार
करती उपचार।
फिर भी
बढता जाता है ताप,
भोग रहे बच्चे, बूढे और जवान
न जाने किसका पाप?
हाय,
शहर को मेरे कौन दे गया शाप।"