सोमवार, 25 जनवरी 2010

"दिल्ली कितनी दूर"?

कल 26 जनवरी है। गणतंत्र दिवस। और इधर जब मैं कुछ पुरानी किताबें अपनी आदतानुसार टटोल रहा था तो मिले कविवर मधुर जी। जी हां, बलिया के श्री रामसिन्हासन सहाय 'मधुर'। इनसे हिन्दी साहित्य पढ्ने वाले परिचित होंगे। या मेरे जैसे कबाडी। खैर..मधुरजी की कविताये अनुभूति की भेदने वाली सच्चाई व उक्ति की वक्रता के लिये पढी जाती रही है। वर्ष 1920 का काल था जब मधुरजी ने रचनायें लिखना शुरू किया था। हालांकि ज्यादा रचनाये उन्होने नहीं लिखी किंतु जितनी भी लिखी या छपी उसमे देशकाल से लेकर जीवन के कई आयामों का चित्रण देखने को मिल जाता है, मुझे उनकी "दिल्ली कितनी दूर" नामक कविता आज पता नहीं क्यो प्रासंगिक लग रही है सो आप तक पहुंचा रहा हूं।

वह अंतिम बलिदान हमारा, इम्फल का मैदान हिला था
उत्तर का हिमवान हिला था, सारा हिन्दुस्तान हिला था।
रजकण में कितने सोये हैं सैनिक चकनाचूर
सपने में सिसकी लेते हैं, दिल्ली कितनी दूर।
सूम सनन चल री पुरवाई, सेनापति का नाम न पूछो,
कोहनूर की क्या कीमत है, आज़ादी का दाम न पूछो।
आज कंठ से कंठ मिलाओ, अमर शहीदों की जय बोलो,
लाट, किला, मीनारों वाली दिल्ली का दरवाजा खोलो।
भीम मांगता गदा, द्रोपदी मांग रही है चीर,
बापू, आज लुटा दो झोली, दो अर्जुन को तीर।
नील गगन कितना ऊंचा है, पुष्पक से फिर हम साधेंगे,
सागर में जलयान हमारे सप्तसिन्धु को फिर बान्धेंगे।
आज देश स्वाधीन हो गया, हम किसान-मजदूर-
दिल्ली में ही पूछ रहे हैं, "दिल्ली कितनी दूर"?

इसकी अंतिम पंक्तियां क्या आज की सच्चाई नहीं लगती? बस इन्हीं पंक़्तियों ने मुझे यह पोस्ट करने के लिये प्रेरित किया। साथ ही साथ गणतंत्र दिवस की शुभकामनाये भी देता चलूं।

14 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाये..


मधुरजी की रचना के लिए आभार!

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

.... प्रभावशाली प्रस्तुति !!!

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

वैसे अमिताभ जी
दिल्‍ली दूर नहीं है
मुझे तो लगा कि
आप दिल्‍ली आ रहे हैं
पर आप आयें अथवा
नहीं आयें पर आप
तो दिल्‍ली वालों के
दिल में समाये हुये हैं।

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

बिल्कुल सच कहा बहुत बडी संख्या में भारतीयों के लिए दिल्ली बहुत दूर है। वैसे अब भी ये लोग नही उठे आवाज लगाने के लिए तो सच दिल्ली बहुत दूर होती जाऐगी।
आज देश स्वाधीन हो गया, हम किसान-मजदूर-
दिल्ली में ही पूछ रहे हैं, "दिल्ली कितनी दूर"?

ज्यादा कुछ नही कह पाऊँगा बस यही कहूँगा कि इतनी बेहतरीन रचना से आपने परिचय करा दिया। और हाँ आपका भी गणतंत्र दिवस की शुभकामनाये।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाये .. .... अमिताभ जी ......... मधुर जी की बेहतरीन और सामयिक रचना है ......... असल की दिल्ली तो सचमुच दूर ही है ........

psingh ने कहा…

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें
बहुत बहुत बधाई ..............

निर्मला कपिला ने कहा…

मधुर जी की इस रचना के लिये आभार गन्तन्त्र दिवस की शुभकामनायें

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

एक उम्दा प्रस्तुति...शुभकामनायें....

डॉ टी एस दराल ने कहा…

दिल्ली में ही पूछ रहे हैं, "दिल्ली कितनी दूर"?

बहुत खूब। गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें।

BrijmohanShrivastava ने कहा…

कई ऐसी ही रचनाये होती है जो सदैव प्रासंगिक होती है

शोभना चौरे ने कहा…

shi smay par shi kvita se prichay krvane ke liye abhar .
gantantra divas ki shubhkamnaye

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति! आपको और आपके परिवार को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

amitabh ji sadar pranam
aaj pehli baar apke blog par aayi hu aur aap ko jana hai... bahut acchha laga apke bare me jan kar khas taur ki aap shudhh deshi ghee hai aur straight forward hai.

apki ye madhur ji wali post bahut acchhi lagi..dil me ek tufan lati hai.

amitabh ji apka bahut bahut shukriya jo aapne mujhe meri rachna DHAKE JAZBAT hindyugm ki unikavi rachna par bebak review diya. aapki saraahna ki bahut bahut aabhari hu..

me janti hu aap mere blog per b kayi baar aaye hai. aur umeed karti hu aage bhi aap vivechna karke mujhe anugraheet karenge.

shukriya.

निपुण पाण्डेय ने कहा…

आज देश स्वाधीन हो गया, हम किसान-मजदूर-
दिल्ली में ही पूछ रहे हैं, "दिल्ली कितनी दूर"?

सचमुच बहुत सुन्दर रचना और प्रासंगिक भी !

यही हालत हैं आज .....

एक सुन्दर रचना हम तक पहुचने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !