मंगलवार, 31 जुलाई 2018

वक्त

वक्त देना जीवन का सबसे बड़ा तोहफा होता है। कौन किसे वक्त देता है अपना ? इस जूझती, दौड़ती, भागती दुनिया में जो ये लोग आपस में मिलते जुलते , गलबहियां डाले दीखते हैं उनकी पीठ पर चिपकी होती हैं लालसाएं, लदे होते हैं स्वार्थ के बोरे, किसी न किसी काम के साए में होती है मीटिंग्स। मिलते सब हैं मगर वक्त नहीं देते , वक्त लेते हैं।
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-तुम मिलोगे?
-हाँ, पक्का ।
-सच में?
-हाँ।
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कितनी सारी योजनाएं बनती है । दिमाग में मिलने के लिए दौड़ते हैं बहाने, जीवन के मकड़ जालों से कुछ देर बाहर निकलने की उत्सुकता और सालों साल बाद मिलने के क्षण को न गंवा देने की अथक कोशिशें। ये मिलन वक्त का सबसे शुद्ध मिलन माना जाता है जिसमे कोई स्वार्थ नहीं ,सिर्फ मिलने की उत्कंठा और उस सुख को पुनः जीवित कर देना जो कभी जिंदगी के खेल में दफ़्न हो चुका था।
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ज्यादा देर तो हम साथ नहीं रह सकते किन्तु मिलना जरूरी था, पता नहीं अब कब मुलाकात हो ...!
हाँ, इस बीच कितना कुछ बदल गया....उम्र चढ़ आई चेहरों पर ...
मगर जो ठहरी हुई मित्रता थी वो आज भी तो वैसी ही हरी हरी है ...है न ..
मैंने कुछ बहाने बनाए हैं ..कुछ बहाने घर पहुंच बनाने होंगे।
लंच साथ में करने का वादा था...लो वो पूरा भी हुआ।
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इधर उधर की बातों ने मिलने के थोड़े से निकले वक्त को फुर्र से उड़ा दिया और अब अपने अपने रास्ते जाना है ..ये सच किसी भी स्नेहात्मक सम्बन्धो का सबसे कठिन किन्तु अटल सच होता है। कौन किसे आज ऐसा वक्त देता है भला ...
जरा अपना हाथ बढ़ाओ...
कलाई पर एक घड़ी बाँध दी गई ।
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वक्त पर वक्त को ढालने वाली भेंट, वक्त को फ्रेम में जड़ कर स्मृतियों की दीवार पर टांगने वाली भेंट..ये ही असल पूँजी होती है दोस्त ...बाकी जीवन में कुच्छ भी न धरा ...
बस्स अपनों को वक्त दो !
- टुकड़ा टुकड़ा डायरी /28जुलाई2018

बाँध

हम सब बहने वाली चीजो को रोकने का प्रयत्न करते हैं...
बाँध बनाते हैं
किंतु इन बांधो से सैकड़ों जमीनें डूब जाती है।
बाँध आवश्यक हैं,
आवश्यक वो जमीनें भी हैं। 
फिर करें क्या ?
कविताएं बाँध क्यों हैं,
वो सारे के सारे बह रहे विचार नहीं समाते कविता में जिन्हें बाँध के बाद डूब जाना होता है।
डूबी जमीन को बचाइए, विस्थापित न कीजिए ...
कविता दरअसल डूबी जमीन है ।
(टुकड़ा टुकड़ा डायरी /29 जुलाई18)

पुरुष की पीड़ा

पुरुष की पीड़ा
घुप्प अँधेरे में होने वाली घटना है।
वह इतनी एकाकी है कि
उसे स्वयं पीना है।
घूँट की कोई प्रतिध्वनि नहीं।
प्रचारित नहीं है वो
और न ही लेखनी से
प्रसारित की जा सकती है।
वो हलक में रोक देने वाली
नीलकंठी प्रक्रिया है।
पुरुष की पीड़ा
कोख में दफ़्न हो जाने वाली
अबोली स्थिति है ।
(टुकड़ा टुकड़ा डायरी/28 जुलाई 18)

पत्थर है जगत

तराशे जाने वाले पत्थर
आकर्षक मूर्ति का रूप जरूर लेते हैं
पर जीवन नहीं होता उनमें,
वो भ्रम पैदा करते हैं
रहते पत्थर ही हैं।
पत्थर है जगत।
(टुकड़ा टुकड़ा डायरी /30 जुलाई 18)

दुनिया एक सांप है

सुनो ,
गिरगिट सी व्यवस्था और
विषभरे सम्बन्ध से नहीं बच सकते तुम।
यहां प्रेम चिकना, चमकीली त्वचा का है 
रेंगता है,
तुम्हे ही नहीं
बल्कि अपनी केंचुली तक वो छोड़ देता है।
दोस्त,
दुनिया एक सांप है
जिसकी पूंछ पकड़नी चाहिए।
(टुकड़ा टुकड़ा डायरी / ३१-जुलाई-१८)

रविवार, 22 जुलाई 2018

समझी क्या बारिश ?

कहा था
हांफ जाओगी।
कमर में पल्लू खोंस के झूमने लगी
इतना कि गोया कोई रिकार्ड बनाना हो।
जियादा नृत्य भी ठीक नहीं होता
वहां तो कतई नहीं जहाँ स्टेज न हो ।
जहाँ हैं वहां तुम नहीं झूमती।
लोग जो तुम्हारे नृत्य पर झूम रहे थे
दूसरे तीसरे दिन उठ कर जाने लगे।
तेज बाजे का शोर
धूम धड़ाका और बेतरतीब नाच
भाता नहीं है।
अब देखो न
आयोजकों से लेकर घटिया मंच तक की
पोल खोल गया
मगर तुम न रुकी।
अब कैसे तो थक चुकी हो
हांफ रही हो
मगर थिरकना गया नहीं है ।
दर्शक जा चुके हैं
सबके अपने काम होते हैं ।
तुम भी जाओ
वहां जहाँ तुम्हारे नृत्य की जरूरत है
वहां जहाँ तुम्हे बुला रहे हैं
वहां जहाँ प्यासे है तुम्हे देखभर लेने के
मायानगरी में लोग सिर्फ
मनोरंजन भर करते हैं
वो हुआ।
समझी क्या बारिश ?
(टुकड़ा टुकड़ा डायरी -11/07/18)

यहाँ कौन है तेरा मुसाफिर ...


पीड़ाएं बाहर नहीं दिखती ।
अन्तस् का रास्ता
इतना सँकरा है कि
कौन पहुंच सकता है ?
तिस पर घुप्प अँधेरा।
जब हाथ को हाथ नहीं सूझता
तब कैसे सूझेगा किसी का सन्नाटा?
खैर छोडो ..
आओ, बैठो
चाय पियो !
(टुकड़ा टुकड़ा डायरी , 13/07/18)

अश्क का शे'र


गुंजाइश

जब कोई भी गुंजाइश शेष न हो ...
बावजूद इसके
उम्मीद की बैसाखी पकड़े
पीठ पर प्रतीक्षा लादे
विकट काली, भयावह पहाड़ियों के
दुर्गम उबड़ खाबड़ रास्तों पर चलना
और सूख चुके हलक में
सूरज की तपती किरणों के घूँट उतारना
दुनिया के लिए पागलपन है।
किन्तु जो कुछ
खोने की लालसा में
अद्भुत से सुख का निर्माण कर रहा है
उसे ज्ञात है
कि क्षितिज के पार भी दुनिया है
जिसके तहखाने में है वो प्रेम पेटी ..
एक 'हाँ' के लिए होता है जीवनसारा
क्योंकि जानता है पथिक
विधाता की डिक्शनरी में 'ना' नहीं है।
(टुकड़ा टुकड़ा डायरी- 18/7/18)

बारिश


नीरज का जाना

पीड़ा के संग रास रचाया, आँख भरी तो झूम के गाया
जैसे मैं जी लिया किसी से, क्या इस तरह जिया जाएगा..

मंदिर


बुधवार, 11 जुलाई 2018

तुम भी न बारिश

तुम भी न बारिश
हो क्या चीज ?
बताओ तो !
पानी तो नहीं हो तुम ।
होती तो कैसे जलाती हॄदय इतने
मन में क्यों आग लगाती?
भला पानी भी
लौ फूंकता है क्या!
(टुकड़ा-टुकड़ा डायरी, ०९-०७-१८ )

सोमवार, 2 जुलाई 2018

कभी कभी इश्क़

कभी कभी इश्क़
अचानक होता है ..
अचानक ।
एकदम से।
देखते ही।
उतर जाता है अंदर ,
समा जाता है ।
बहने लगता है रक्त की तरह रगों में ..
कोई प्रश्न नहीं - किससे हुआ, क्यों हुआ और ये क्या हुआ ?
बस होता है ।
सच मानना
इश्क़ बुरा नहीं होता ।
कभी उसे अपनी हथेली पर रखकर
आँखों के करीब लाकर
ग़ौर से देखना ..
उसका रंग पानी है ..
हवा है ..
जीवन है।
मृत्यु के बाद सा जीवन।

उम्र बूँद बूँद

माथे के उपर
भिनभिनाते सत्य को तुम
मच्छर उड़ाने की भांति
हाथों से झटकते, भगाते ,उड़ाते रहते हो
कि कहीं डँस न ले ..
आहा,
जीवन कितना भोला है
नासमझ है , नादान है
कि जैसे मिला तो मिल ही गया।
तुम मानो या न मानो प्रिये !
अमृत कलश में जरूर
छोटा सा छिद्र है
रिसती है जहाँ से उम्र बूँद बूँद ।

छिपे प्यार

हर एक कविता के बाद
छोड़ देते हो तुम
प्रतीक्षा ।
हाँ न ...तुम्हे खबर नहीं है 
मुझे प्रेम हो गया है
तुम्हारी कविताओं से ।
मानो या न मानो
किन्तु लिखे शब्द और उनके अर्थ
जैसे छू कर मुझसे
जाते हैं
जैसे सिरहन सी दौड़ती है पूरी देह में ।
जानते बूझते भी कि
मेरे लिए नहीं है ये शब्द ,
न ये डोली भाव की
जो सामने से गुजरती है
गुजर जाती है।
फिर भी
देर तक खड़ा महसूसता रहता हूँ
गंध को कविता की ।
जैसे फिर लौटोगे तुम अपनी कविता के साथ
इसी रास्ते से
और मैं दूर खड़ा निहारूँगा
डूब जाऊँगा , पढ़ जाऊँगा।
और तुम्हे खबर भी न होगी
छिपे इस प्यार की।

बहुत मज़ा

और मैं आँख बंद कर ट्रैफिक के बीच दौड़ लगाता हूँ
गाड़ी घोड़े वाले जब मुझे बचाते हुए चलते हैं तो
मज़ा आता है।
हवलदार की घुड़की को
अपनी सॉरी सॉरी से डिलीट करने का
मज़ा कौन क्या जाने।
बोलो कूदोगे मेरे संग गहरे
ख़ौफ़नाक सागर में
कि तैरना भी नहीं आता मुझे
किसी को बचा तो सकता ही नहीं।
सोचकर जो सिरहन सी दौड़ती हैं उस रोमांच की
मज़ा विलग है दोस्त।
खाली जेब किसी पंचतारा में घुस जाना
और किसी बुक्ड टेबल पर बैठकर
आर्डर देने का मज़ा क्या है
जानते हो ?
मैं तो ऐसा ही हूँ जीने के लिए ।
प्रेमिका को सागर किनारे नहीं ले जाता
जाते हैं किसी अनाथालय या वृद्धाश्रम..
या फिर यतीम बच्चो के साथ बीच सड़क पर
गुल्लीडंडा , गेंदमार खेलते हुए जोर से
गला फाड़ चिल्लाते हैं तो
चलते लोगों का बिदकना
मुंह बनाना
उनकी
डांट सुनने का मज़ा ...!
आहा ....
इस आहा को पाना है तो
किसी दिन कमर कस लेना
आवारागर्दी के लिए
फेंक आना अपने पद-प्रतिष्ठा -पैसा आदि को
शहर के बड़े गंदे से नाले में
हाहाहा ..
हंसो भी यार क्योंकि
इस पूरे ब्रह्माण्ड में
हंस सकता है तो सिर्फ मनुष्य ही।
इस प्राप्य अद्भुत गिफ्ट को
गंवाना मत कभी ।
बहुत मज़ा है इसमें।

चुपके से

चुपके से जाकर 
छूट चुकी पिछली पोस्टों को 
लाइक कर आना 
उसे दीवार पर फिर से चिपका आना होता है।
फिर से जन्म ले लेती हैं वो सारी।
जिन्होंने पढी और जिन्होंने नहीं पढ़ी
फिर फिर जी लेते हैं उसे।
इस तरह अपन ही
ब्रह्मा हो जाते हैं -
लिखे को बिसरने न देने
उसे जिलाने के।

स्त्री-पुरुष

अपने जीवन, प्रेम और संसार में
कितनी व्यस्त हो तुम
बावजूद वक्त निकालती हो मेरे लिए!
पता है वो कितना खरा है ?
मेरे लिए ठीक ठीक वैसा
जैसे समुद्र मंथन से निकला अमृत!
ये तो जाना मैंने!
किन्तु क्यों न जान सका कि
मुझे अमृत देकर तुमने
विष का क्या किया ?
निकलता तो वो भी है।
कभी बताती नहीं स्त्री
और
पूछता भी कहाँ है पुरुष।

मारीचिकाएं

गर्म रेत में धँसते पैर
और सिर पर धरे सूरज की तपन
सूखा गला
और रूंधे गले में फंसी आवाज़
किसे पुकार पाती भला।
दूर दूर तक सन्नाटा
धुंधली, मिचमिचाती आँखों में
हवा के तांडव से उड़ते रेत कण
भनभना रहे इस समय को
इतना सूना बना चुके कि
कहीं से तितली उड़ कर आ जाती
जिसके पीछे चल पड़ते हैं कदम।
मानो रेगिस्तान के इस भयावह मार्ग से वो निकाल बाहर करेगी।
उम्मीदें आदमी को जिंदा रखती हैं।
प्रेम रेगिस्तान में भी उपजता है ।
आदमी की खुशफहमी भी एक गलतफहमी हो सकती है।
कि तितली आई, बैठी , उड़ी
कि किसी सरोवर तट से टकरा कर पवन ने ठन्डे झौंके दिए।
कि कदम में जान आ गयी
और चल पड़ा उस दूरस्थ झील की ओर
सोचकर कि
होगी महक फुलवारी की
तितली वहीं तो जाएगी।
किन्तु
कहाँ जान पाता है एक अनजाना आदमी
कि रेगिस्तान में होती हैं मारीचिकाएं।

फिलॉसॉफीकल दलील

वो जब मिटटी गूंथते दीखते हैं
तो लगता है किसी मूर्ति को आकार देंगे।
वो ऐसा नहीं करते।
मूर्ति को नहीं बल्कि जिन्दा लोगो को
जिन्दा रखने के लिए 
दुनिया गोल की तरह
गोल गोल रोटियों को आकार देते हैं।
मिट्टी में नमक
नमकहलाल की तरह ही तो है
जो मिलाकर पेट की भूख को थापने की
जद्दोजहद करते हैं वो।
कितना काला काल है
कि लोग रिपोर्ट बनाते हैं।
तस्वीरे खींचते है
बच्चे, जवान ,बूढ़ों को
मिट्टी की रोटी खाते देखती है दुनिया
मगर कोई समाधान नहीं।
मजबूर लोगो के पेट से
मिट्टी हटा कर आटा भरने की
कोई तो हो कवायद !
कि मिट्टी के लोग
मिट्टी में मिल जाने की
फिलॉसॉफीकल दलील
लीलती रहेगी जिंदगियां?
( हैती, जहाँ मिट्टी की रोटी बनाकर खाने पर मजबूर हैं लोग ,ये दुनिया के विकास की सबसे दर्दनाक खबर है-मगर जिजीविषा देखो..उफ़।)

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

भेड़ों का वसुधैव कुटुम्बकम

कितने लोगो के पास
कितनी सारी संवेदनाएं हैं
जिन्हे बेहिचक व्यक्त की जाती है।
कितने लोगो के पास 
कितनी सारी हिदायतें हैं
जिन्हे बे हिचक दी जाती है।
कितने लोगो के पास
कितने सारे प्यार हैं
जिन्हे शब्दाकार दिया जाता है।
कितने लोगो के पास
कितना अकेलापन है
जिन्हे दूर नहीं किया जाता है।
कितने लोगो के मुस्कुराते चेहरे
कितने मुखौटों से लदे हैं
जिन्हे उतारा नहीं जा सकता है।
आप आप , मैं मैं
और कितनी सारी तू तू
के बावजूद
कितने सारे लोग हैं जो नहीं समझते
कि समझना आखिर क्या है ?
भेड़ ही भेड़
भेड़ों का वसुधैव कुटुम्बकम

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

हुआ प्रेम अकेला होता है

हुआ प्रेम अकेला होता है
उससे नहीं होता किसीको प्रेम।
क्योंकि होने वाले प्रेम में
करने वाले जैसे तत्व नहीं होते
न ही होता कोई आकर्षण। 
न ही ये मन्मथ है , न रतिसखा
न ही मदन , न ही पुष्पधन्वा
और न कदर्प , न अनंग
ये तो निपट बदरंग होता है।
असंग होता है।
इसलिए नहीं होता अब किसीको प्रेम
इसलिए हुआ प्रेम अकेला होता है।

बुधवार, 9 अगस्त 2017

लोकार्पण


सभागृह में गहमागहमी थी।  डायस को सुमित ने संभाल रखा था। मंच पर अतिथि आ चुके थे।  कुछ साहित्यकार, कुछ साहित्यकार टाइप के लोग , कुछ पत्रकार और कुछ दोस्त-यारों से श्रोतागण सज्जित थे। 
''ये प्रेम कहानी है।  सिर्फ एक आदमी की कहानी। सिर्फ एक प्रेम की कहानी। ताज्जुब हो सकता  है कि उसे  जिस लड़की से प्रेम है , वो लड़की उससे प्रेम नहीं करती है। ये एक सामान्य  सी घटना हो सकती है।  किन्तु सामान्य नहीं है। असामान्य इसलिए कि वो जानता है कि लड़की उससे प्रेम नहीं  करती है और न ही कर सकती है।  वो जानता है कि उसकी उम्र इतनी है कि जोड़ी बेमेल है। वो जानता है कि वो खुद एक विवाहित व्यक्ति है। और उसके बारे में ये सब लड़की भी जानती है।  इसके बावजूद उसे प्रेम है। इसलिए कि उसके प्रेम की परिभाषा में न तो ये लिखा है कि प्रेम आप तभी कर सकते हैं जब आप हमउम्र हों , न ये लिखा है कि प्रेम आप तभी कर सकते हैं जब आप विवाहित न हो , और न ये लिखा है कि प्रेम आप तभी कर सकते हैं जब आपको भी कोई लड़की चाहे। उसकी डिक्शनरी में प्रेम सिर्फ एक से ही हो , ऐसा भी नहीं लिखा है। ये भी लिखा है कि जरूरी नहीं कि आपको  जिससे प्रेम हो वो  आपको भी  प्रेम करे। वो मानता रहा कि प्रेम आत्मिक अनुभव है।  प्रेम मीरा है। और ताज्जुब ये भी है कि जिस लड़की से वो प्रेम करता है , वो उस पर हंसती है।  उसकी उम्र और उसका विवाहित जीवन देख सोचती है कि ये पागल है। जबकि वो खुद किसीसे प्रेम करती है।  वो जिससे प्रेम करती है , वो भी उसे दिलोजान से चाहता है।  दोनों में प्रेम है। किन्तु इसके प्रेम और उसके प्रेम में फर्क करती है तो इसलिए कि उसके प्रेम के मापदंड पर वो खरा नहीं उतरता है। मज़ा ये है कि प्रेम का खरापन हो या कोई मापदंड जैसा विषय , खरा तो वो ही है , क्योंकि वो सबकुछ जानकार भी उससे बेइंतेहा प्रेम करता है। इसलिए भी नहीं कि  उसे पा लिया जाए।  बल्कि इसलिए कि उसे बस प्रेम है।  वो जानता है कि उसे खोना ही खोना है। खोना - प्रेम के साथ चिपका ऐसा तत्व है जिसने सदियों से प्रेमियों को मारा है। मरना ही प्रेम है। प्रेम में आप पा कुछ भी नहीं सकते।  और यदि पाने के लिए प्रेम करते हैं तो ये प्रेम हो ही नहीं सकता। दरअसल प्रेम में तो  कोई चाहत ही नहीं होती । वह तो पूरा खाली होता है।  शून्य। शून्य सिर्फ शून्य है।  आगे-पीछे लगा लेने से अंको पर प्रभाव जरूर पड़ सकता है किन्तु वो शून्य ही है। निच्छल। पवित्र और एकदम खरा। हास्यास्पद स्थिति ये है कि इसके बावजूद वो पाप का भागीदार है और जिसे वो लड़की प्रेम करती है वह प्रेम पुण्यवान।  कैसे ? जबकि उसके प्रेम में लालच है , देह का आकर्षण है। एक  चाहत है।  चाहत प्रेम नहीं होता , इसे स्पष्ट कर लेना चाहिए उन तमाम प्रेमियों को जो इस शब्द के साथ प्रेम को लपेटते हैं। हाँ , तो वो जिस लड़की को प्रेम करता है उस लड़की के अपने प्रेम में एक भविष्य का सपना है। और विवाह करने का एकमात्र प्रेम परिणाम है। ये पाठको को सोचना है कि प्रेम आखिर होता क्या है ? जिसमे कोई अपेक्षा हो या वो जिसमे कोई अपेक्षा न हो ,जो निरापद हो। जो निर्गुण , निराकार हो। सिर्फ प्रेम। और कुछ भी नहीं .... ''  
श्रोताओं में फुसफुसाहट भी है।  किसीने धीरे से कहा - 'लेखक सचमुच पागल है।'  
'चुपचाप बैठिये और सुनिए।'  पास बैठे सज्जन ने जवाब दिया। वो महोदय फिर सुमित की बातें सुनने लगे।  
''उसे ज्ञात है कि जिससे प्रेम है वो उसे नहीं मिल सकती। और सबसे बड़ी बात तो ये है कि वो इसलिए उससे प्रेम करता भी नहीं कि वो मिले।  प्रेम में मिलना हो , जरूरी नहीं। प्रेम में सौदा हो , जरूरी नहीं।  प्रेम में सिर्फ प्रेम हो..... '' 
'अजी श्रीमान लेखक सचमुच या तो पागल है , या मूर्ख। जब कोई उससे मिलना ही न चाहे , जब किसीको उससे प्रेम ही न हो तो ऐसे प्रेम का क्या अर्थ ? ये तो  बेवकूफी है , अपने समय का व्यय है।' उस महोदय को सुमित की समीक्षा शायद रास नहीं आ रही थी , उससे रहा नहीं गया और खड़े होकर बोलने लगा। 
''एक्जैक्टली।''  सुमित ने कहा - ''ये किताब बेवकूफी से भरी है। समर्पण से भरी है।  त्याग से भरी है।  मूर्खता से लबालब है।  क्योंकि  लेखक प्रेम करता है।  क्योंकि लेखक दर्शाना चाहता है कि प्रेम में मांग नहीं है। प्रेम ऐसी पूजा है , ऐसी साधना है जो बस प्रेम के लिए है...... " 
'दरअसल श्रीमान , प्रेम में जब तक दो मन एक न हो तब तक प्रेम का परिणाम क्या है? ' महोदय ने सुमित की और देखते हुए पूछा।  मंच पर अब हलचल है।  सबकी निगाहें उस महोदय पर थी।  सुमित ने किताब के पन्ने खोलते हुए कुछ पढ़ा और कहा - ''ये संभव है कि ऐसे प्रेम से प्रेम हो तो जीवन का सबसे गहरा अनुभव पात्रों को प्राप्त हो सकता है किन्तु ये भी सच है प्रेम द्वैत नहीं। अद्वैत है। और जिसने इसे जाना-समझा  वो उसमे ही मग्न रहा।  डूबा रहा और या तो कबीर हो गया , या मीरा ... '' 
'धत्त ...  ऐसे कबीर और ऐसी मीरा से क्या लाभ ?' उस व्यक्ति ने कहा और धम्म से अपनी कुर्सी पर बैठ गया।  
सुमित ने अपनी बात जारी रखी - '' प्रेम यदि लाभ देखता हो तो कैसा प्रेम ? यकीनन दुनिया में निच्छल  प्रेम को पाप कहा जाता है , दुर्गुण माना जाता है , दोषी करार दे दिया जाता है। जबकि प्रेम होना किसी भी प्रकार से गलत नहीं है , तब तक जब तक कि वो किसीको कोई हानि नहीं पहुंचा रहा है। तो दोस्तों, प्रेम की इस अद्भुत किताब का आज लोकार्पण करते हुए इसलिए भी हर्ष है क्योंकि ये हम सब को प्रेम में होना सिखाती है। प्रेम करना नहीं।''  
'लेखक से कुछ सवाल करने है , वो उपस्थित क्यों नहीं हुए।  और वो जिस लड़की से प्रेम करते हैं , उस लड़की  की क्या प्रतिक्रया है। क्या इस किताब में लिखी गयी है या सिर्फ कहानी ही है। ' फुसफुसाहट के मध्य एक आवाज आई।  
सुमित ने कहा - ''दरअसल लेखक उपस्थित नहीं है।  और आप शायद आश्चर्य करेंगे कि इस किताब का लेखक पुरुष नहीं है , बल्कि एक स्त्री है। और ये जो स्त्री है वही वो लड़की है जिसके पात्र को उससे प्रेम है। आप किताब पढ़ेंगे तो पाएंगे कि उसका पुरुष पात्र अब इस दुनिया में नहीं है। और ये उसी लड़की द्वारा लिखी कहानी है जिसने अपने सुपात्र को खोया है और एक अलौकिक प्रेम से वंचित रही है। '' 
एक लम्बी सांस छोड़ते हुए सुमीत ने बुदबुदाते हुए कहा - ''सच्चे प्रेम में आखिर होता ही क्या है? यही न।'' 
अब सभागृह सन्नाटे में डूबा हुआ है। 
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गुरुवार, 13 जुलाई 2017

वो हैं तो सब है

चित्र -कैट एम 



















वो हैं 
इसलिए अहसास नहीं है कि 
जिनके पास नहीं उनका दुःख कैसा।

वो हैं 
इसलिए है सारा गुस्सा ,
जिद और इच्छाएं ।

ज़रा पूछ भर लेना 
जिनके पास नहीं है 
उनके गुस्से का प्रभाव है भी या नहीं ?
उनकी जिदो का अर्थ है भी या नहीं ?
उनकी इच्छाएं पूरी होती भी है या नहीं ?

वो हैं 
इसलिए दिए जाते हैं दुःख उन्हें 
इसलिए  रूठ जाया जाता है 
इसलिए अपनी चाह मनवाने के लिए 
पीड़ा पहुंचाई जाती है 
और वो हैं 
इसीलिये तुम हो , छाहँ है 
तुम्हारी सारी चाहते हैं 
मान है मनौव्वल है। 

जिनके पास नहीं है 
ज़रा पता करना 
कौन पूछता है उनसे 
इतने प्यार से कि 
भूखा है -कुछ खा ले ...

वो हैं इसीलिये 
अपनी जिद , 
अपने गुस्से , 
अपने अहंकार , 
अपने रौब , 
अपने सारे दर्द -दुःख देने वाले कृत्य 
अपने सही होने के प्रमाण देते हैं। 

वो नहीं होंगे तो 
कौनसा आधार रह जाएगा ?
कौन तुम्हारे गुस्से 
तुम्हारी जिदो और 
तुम्हारी बेतुकी हरकतों को सहन करेगा ?

रात जब अकेले हो तो 
अपने सारे बेवक़ूफीभरे विचारों को परे रख 
उनके न होने के अहसास की कल्पना करना 
क्षणभर ही सही। 

फिर तुम सही हो या न हो 
जो चाहे मान लेना। 

स्मरण रखें 
मां-बाप के रहते ही तुम बच्चे हो 
बड़ो और बूढ़ो को पूछता कौन है। 

शनिवार, 1 जुलाई 2017

बारिश तो उन दिनों होती थी

बारिश से मचा कीचड़ मखमली था उन दिनों..
उन दिनों फ़िक्र नहीं थी कि
कीचड से सने कपडे धुलते कैसे हैं या
मां नहलाती कैसे हैं ?
फ़िक्र नहीं थी कि आसमान भले बरसता हो
किन्तु नगर पालिका का नल नहीं बहता है ।
उन दिनों पूरा मोहल्ला भीगता था ..
लोहे की पतली छड़ जमीन में धंसती थी
और हमारी किलकारियोँ के बीच एक खेल संपन्न होता था।
उन दिनों स्कूल की नोट बुक के पन्ने
नावों की शक्ल में कैसे आते थे
और मास्टरजी की डपट से लेकर
शिकायत घर तक कैसे पहुँचती थी
ज्ञात नहीं था।
उन दिनों बारिश भी होती थी
नदी नाले पुर होते थे।
शहर के बाहर बने पुल के ऊपर से बहता पानी देखने भागना
और घर में माँ की चिंता पर सवार
बारिश में पसीना बहाते पिता के ढूंढने निकलने की फ़िक्र किसे थी ?
उन दिनों टपकती छत किसी फव्वारे से कम नहीं लगती थी
घर में घुसा पानी परेशानी का सबब भी होता था। कौन जानें।
'उन दिनों' वाले वो दिन अब नहीं हैं ...
अब बारिश और देह के बीच
रेन कोट या छाते जैसी दीवार है।
मजबूत छतो पर बरसते पानी का कोई संगीत नहीं है।
पुल तो है , पुल पर से पानी भी बहता है
किन्तु न दौड़ है , न भागना है।
दफ्तर में बैठे खबरों का संसार है
खबरों में ही बारिश है।
इतना सब व्यस्थित है कि
उन दिनों वाली अव्यवस्था की स्मृतियाँ चुभ चुभ बार बार
अहसास दिलाती है कि
बारिश उन दिनों ही होती थी
इन दिनों तो बस बहती है।
स्मृतियाँ जैसे बहकर उन दिनों तक पहुंचती है
झूला झूलती है
और चुपचाप लौट आती है
सूखे सूखे घर में....
कुछ भी तो भीगा नहीं है अब तक
उम्र की इस प्रौढ़ावस्था बारिश में
मन और स्मृतियों के अतिरिक्त।

रविवार, 26 जून 2016

अंततः


कितनी बलियां दे दी 
इच्छाओं की ,
आहूत किया श्रम 
और स्वेद कितना ,
जीवन कुंड इन समिधाओं से 
धधकता रहा 
किन्तु 
भाग्य था जो 
प्रसन्न नहीं हुआ। 

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

रास्ता और मौन

आँगन से लेकर 
बरामदे तक 
बिछी नाकामयाबियों की चादर पर 
बैठ कर उम्मीदों के  
सहारे अब रहा नहीं जाता। 
बहुत कुछ बनाने के फेरे में 
बहुत कुछ छूट गया। 
छूट गए साथी , संगी , प्रेमी 
जो चिपक गया है 
वह बदकिस्मती और असफलताओं के तमगे है। 
अब न प्रयास है , न कोई रोशनी की किरण 
अब सिर्फ अन्धेरा है। 
किसी की बैसाखी पर आश्रित 
चलने और कभी चले जाने का ही एक मात्र शेष है  रास्ता। 
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उससे क्या कहूं ?
किसीसे से क्या कहूं ?
झूठ कि सब ठीक है ?
सच कि कुछ भी नहीं है ?
कहने -सुनने का वक्त भी किसके पास ?
और अगर कह -सुन भी लिया तो क्या ?
जीने और इच्छाओं की पूर्ति 
फटी जेब में टिकती  नहीं है। 
इसलिए मौन अच्छा। 
मेरे लिए भी 
उसके लिए भी। 

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

मेरे अंदर के कब्रिस्तान के

रोज एक आत्महत्या  होती है 
मेरे अंदर। 
सूली पर लटक जाते हैं विचार 
सोच गहरी खाई में कूद पड़ती है 
ट्रेन की पटरी पर लेट जाती है इच्छाएं 
कट जाती है कामनाएं 
महत्वकांक्षाएं पंखे से लटक कर झूलती हैं  
और किसीको कानो कान खबर नहीं होती। 
क्योंकि खबर ही नहीं बनती 
न कोई पोस्टमार्टम होता है 
न कोई केस दर्ज होता है 
न कोई लिखा लेटर छूटा होता है 
और न ही चहरे पर आंसुओं की झड़ी। 
आखिर मुस्कुराता हुआ आदमी 
कैसे मारा जा  सकता है भला ?
सब अपने कामो में मशगूल हैं 
दुनिया चल रही है 
कहीं सन्नाटा नहीं है। 
सिवाय मेरे अंदर के कब्रिस्तान के,
जहां दफन होता रहता हूँ रोज। 

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

और पिता ???

मेरे जन्मदिन पर दिया गया 
उसका ग्रीटिंग देखता हूँ 
और सोच में डूब जाता हूँ। 
उसके बालमन ने लिखा या सचमुच उसके लिए मैं 
दुनिया का सबसे अच्छा पिता हूँ ?
क्या वो मेरे पिता होने पर लकी है ?
उसकी छोटी छोटी इच्छाओं का 
गला घोंट दिया करता हूँ 
अपनी वाकपटुता से ,
और वो है कि हर बार मान जाती है। 
अपनी खाली जेब 
और अपनी बदकिस्मती से रुआंसी  हुई प्रतिभा 
उसकी मायूसी पढ़ तो लेती है किन्तु 
अपने सफल न होने के कारण 
उसके भविष्य पर जो स्पीड ब्रेकर खड़े करते जा रहा हूँ 
या कहूँ ब्रेकर स्वतः ही बनते जा रहे हैं उसका क्या ? 
वो अब नहीं कहती मुझसे कि 
पापा आज चॉकलेट खरीद दो 
पापा आज किसी होटल में चलो 
पापा कहीं आउटिंग पर निकालो 
पापा मेरी सारी फ्रेंड कितनी अच्छी अच्छी ड्रेसेस पहनती है 
आज ऐसी ही कोई मेरे लिए ले लो,
या फिर कभी उसने कहा हो -
पापा कोई अच्छी पिक्चर देखने चलो  
हाँ वह यह जरूर कहती है 
पापा पिछले कितने सालों से आपने अपने लिए 
कुछ नहीं खरीदा , कुछ नया नहीं पहना 
मेरी गुल्लक कब काम आएगी ? 
तब सोचता हूँ 'लकी ' कौन है ?
वो या मैं ? 
फिर क्यों कहती है वो कि मैं लकी हूँ ?
हाँ, एक समय था जब उसकी हर छोटी मोटी इच्छाएं 
पूरी कर खुद में संतुष्ट हो जाता था। 
किन्तु आज समय ने ऐसी करवट ली है 
कि न नौकरी है , न कोई काम न ही कोई धाम 
रोज रोज कड़ी दौड़ धूप 
और सतत किये जा रहे प्रयास 
उस दुनिया को बेध  नहीं पाते 
जो मेरे स्वाभिमान को अपनी चौखट पर गिरवी रखने को कहती है ,
जो चाटुकारिता और राजनीति की मलाई मांगती है 
और जो नहीं देखती 
एक छोटे  हुनरमंद भविष्य का 
एक पिता की असफलताओं से धीरे धीरे अन्धकार में जाना 
या उसके लिए संघर्ष खड़ा कर देना।
यह दुनिया कुछ नहीं देखती।  
उसके नन्हे हाथों की उंगली पकड़ जब पहली बार जमीन पर चलाया था 
तो सोचा था उसे दुनिया में कभी कोई परेशानी आने नहीं दूंगा। 
तब शायद वो लकी थी। 
किन्तु आज मेरी वजहें उसके भविष्य में व्यवधान पैदा करने को आतुर हैं 
फिर भला कैसे मैं उसके लिए लकी हूँ ?
बावजूद कहती है वो पापा आईएम लकी गर्ल। 
और मुझे लगता है 
नहीं पगली तुम नहीं हो लकी 
बदकिस्मती देखो कि लकी मैं हूँ 
और अपने इस लक को भी 
पूरी दुनिया न दे सकने वाला 
अभागा भी।  
(बेटियां सचमुच पिता के लिए लक होती हैं और पिता ??????)

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

सूक्ष्म ग्रह

जिस गठरी में भर कर लाया था 
कुछ यौवन , कुछ यादें , कुछ शौक और कुछ आदतें 
वो बीच सफर में समय के डकैतों ने छीन ली। 
और अचानक , एकदम से 
चलते चलते कंगाल हो गया। 
न यौवन रहा , न यादें रहीं , न कोई शौक और न मसखरी आदतें। 
कौन पूछता है 
खाली लटकने वाले जेब को ?
जो कभी तलहटी पर ही दिखा जाता था 
वह आज  पहाड़ पर चढने के बाद भी 
दिखता नहीं। 
क्योंकि कंगाल आदमी 
ब्रह्माण्ड का वह सूक्ष्म ग्रह  है जिसकी खोज नहीं होती। 

रविवार, 11 अक्तूबर 2015

सादगी इश्क की

जितनी रेखाएं 
उभरी हैं आज तक 
वो स्याही 
तेरी स्मृतियों की है। 
कैनवास पर 
उकेरी गयी तस्वीरें 
इश्क़ के रंगो में डूबी हैं। 
यूं तो समय के दरम्यां 
सालों साल का है खालीपन 
ये उम्र की सफेदी तो 
सादगी इश्क की है। 

सोमवार, 15 जून 2015

आमंत्रण

मुझे बुलाता है कैलाश मानसरोवर
और मैं आमंत्रण को हाथ में धरे खड़ा हूँ ,
कहाँ से शुरू करू यात्रा ?
रास्तो के तमाम नक़्शे हैं
यात्रा वृत्तांतों के टेके हैं 
लुभाती तस्वीरें हैं
और सारी सुविधाएं हैं
किन्तु सबकुछ होने के बाद भी
जरूरी नहीं होता कि सब कुछ हो जाए।
जो होता है , वो होने देना चाहिए
जैसे नहीं जा पाना
कभी जा पाना भी होगा।
ये 'होगा ' भी होना है।
शुक्र है
आमंत्रण सदा है। जैसे शिव।
( फिर एक यात्रा वृत्तांत , ढेर-ढेर वृत्तांत पढ़ लेना... … किताबो के हर पन्ने एक एक आमंत्रण बन जाते हैं )

गुरुवार, 4 जून 2015

'ऐसा नहीं है '

उदासी में बोझिल ही हुआ जाता है ऐसा नहीं है। 
ऐसा नहीं है कि प्रेमी निर्मोही न हो। 
निराशाएं तोड़ती हों 
असफलताएँ धैर्य खो देती हों 
और आदमी किसी काम का न हो 
ऐसा नहीं है।
बहुत कुछ है जो 'ऐसा नहीं है '
फिर क्यों इल्ज़ामात
कि तुम ऐसे हो , वैसे हो , कैसे हो ?
जैसा है , वह उसके होने का
उसके अस्तित्व का
उसके अपने ईश्वर का होना है
और उसे पूरे का पूरा स्वीकारना ही आदमीयत है।
शायद ।

शनिवार, 30 मई 2015

इश्क का दूर होना

तुम्हे पता है
जिससे प्रेम होता है
वही दूर हो जाता है ?
देखो चाँद भी 
धरा से कितना दूर है
और भी दूर होते जा रहा है।
कभी धरा के गले लगा था
आज विरह गीत गुनगुनाता है।
कितना अजीब है न ये प्रिये
कि प्रेम के दुश्मन अरबो वर्ष पहले भी थे
कोई साढें चार अरब पूर्व क्यों आया था थिया?
धरती से टकरा कर चाँद को छीन ले गया।
और तब से अब तक कितने ही चकोरों को
बस ताकते रहने के लिए छोड़ गया ।
इसलिए इश्क मत करना ,
करना भी है तो
जुदाई में रोना मत। समझी।
(चन्द्रमा का वैज्ञानिक पक्ष पढ़ते रहने में भी दिख जाती है उसकी कोमल परतें , गजब है चाँद भई )

बुधवार, 27 मई 2015

नींद की सिलाई

सूरज की सिगड़ी पर 
रात ने लई बनाई और 
उससे चाँद को आसमान पर चिपका दिया , 
कुछ तारें टाँके 
बड़ा सा पंखा तीन की स्पीड से चला दिया....

(कभी कभी बच्चे सी सोच भी उधड़ी हुई नींद की सिलाई कर दिया करती है)

इसलिए अपनी आँखे खोलो

तुम्हारे और मेरे मध्य
अंतरिक्ष है।
इसीलिये गहरा सन्नाटा है।
न कोई वातावरण ,
न ही ध्वनि यात्रा का कोई माध्यम। 
शून्य
निपट सूने
सन्नाटे में डूबे
इस अंतरिक्ष में
रेडियो तरंगे ही होती हैं
जो संवाद स्थापित कर सकती हैं
इसलिए
अपनी आँखे खोलो।
(सुबह का आलाप : ध्यानावस्था में आँखे अंदर तो खोलनी पड़ती है )

मंगलवार, 26 मई 2015

ब्लैक होल

तुमने मेरी असफलताओं को
ब्लैक होल की संज्ञा दे दी
अच्छा ही किया।
जानते हो न
कि 
ब्लैक होल कोई छेद नहीं है।
यह तो मरी हुई इच्छाओं के वे अवशेष हैं
जो टूट चुके तारों की तरह जमा हैं।
और पता है ?
किसी सुपरनोवा की तरह चमकते हुए ख़त्म हुआ था मैं।
न न ख़त्म हुआ भी कहाँ ?
अस्तित्व कब किसीका मिटा है ?
हाँ यह जरूर है कि अब न कोई आयतन है
न आकार , रूप -रंग ,
किन्तु अनंत घनत्व के साथ
तुम्हारे अंतरिक्ष के तमाम
चाँद-तारे-सूरज और असंख्य पिंडो को
अपनी ओर खींचने का माद्दा है मुझमे।
ब्लेक होल तो ऐसे ही होते हैं।
( अंधड़ से फड़फड़ाते डायरी के पन्नों की आवाज भी कभी कभी कोई राग दे जाती है )

गुरुवार, 14 मई 2015

सब्र

'बेरोजगार के चेहरे पर मुस्कराहट उसकी लापरवाही नहीं होती बल्कि उसका धैर्य होता है।''
''किस धैर्य की बात करते हो ? हाथ-पैर बाँध कर बैठे रहना और ईश्वर से प्रार्थना करते रहना कि कोई नौकरी मिले ?''
''इसमे भी क्या बुराई है ?''
''बुराई , अरे ये बेवकूफी है , मूर्खता है।''
''ये तुम कैसे कह सकते हो कि ये मूर्खता है ? क्या मूर्खता यह नहीं की बगैर किसीके बुलावे पर आप नौकरी की भीख माँगने जाओ और वो आपको वहां से भगा दे।  देखो , याचना आदमी को झुका देती है , दो कौड़ी का आदमी एक याचक का बाप बन जाता है। समझे।''
''कामयाबी के लिए संघर्ष जरूरी होता है, यही सब संघर्ष है। इतना मैं जानता हूँ।''
''हाँ, जरूरी है, मैंने कब मना किया और वैसे भी हर कामयाब आदमी प्रेरक बन जाता है और वो अपने संघर्ष को  ढेर सारे रंग दे देकर कहता फिरता है।  किन्तु असल में होता कुछ नहीं है , कामयाबी संघर्ष के बाद ही मिलती हो ऐसा नहीं है।  कामयाबी प्रत्येक कार्य का परिणाम है।  चाहे वो हार हो या जीत। कार्य ही   कामयाबी भी  है। यानी उसका परिणाम। हार भी कामयाबी ही होती है दोस्त।''
''मुझे समझ नहीं आता तेरा तर्क।''
''हाँ, ये जो समझ है वह भी बड़ी विचित्र होती है।  प्रत्येक आदमी जो सोचता है , उसके लिए वही एकमात्र सच और सही होता है।  उसके भिन्न वो कुछ सुनना ही नहीं चाहता।  आप ठीक वैसा करो जैसा कोई बोलता है और नहीं किया तो वो आपको ताने भी मारने लगता है। संभव है किसीके प्रति गलत फहमियां पलने की यह शुरुआत भी हो। यह स्वभाव है आदमी का।  इसे पूर्वाग्रह कहते हैं।  और हाँ, ऐसा तब अधिक होता है जब दो परस्पर व्यक्तियों में एक रोजगार-सफल हो और दूसरा बेरोजगार।  अगर दोनों एक जैसे हों तो तर्क और एक दूसरे को समझ सकते हैं। क्योंकि दोनों एक दुसरे की मनोस्थिति को समझने लायक होते हैं। इसलिए मनोविज्ञान में कहा गया है कि आप किसीको समझाएं तो पहले उसकी तरह आप सोचने और समझने लायक बनें।''
''अजीब है , आदमी फालतू होने पर दार्शनिक भी बन जाता है , यह आज पहली बार देख रहा हूँ मैं।''  हँसते हुए रोहन विक्रम की पीठ पर हाथ रखते हुए उठता है - ''अच्छा अब मैं चलता हूँ , आफिस में लेट हो जाऊंगा।''
''ठीक है , रात को फ्री रहे तो आना।''  विक्रम भी उसके साथ खड़ा होता है और रोहन को दरवाजे तक छोड़ने जाता है।
''विक्रम कहीं अपनी जिंदगी बिगाड़ न ले ....''  रोहन बाइक ड्राइव करते हुए सोच रहा है- ''पहले वो ऐसा नहीं था।  मेरी बात मानता था , बहस तो करता ही नहीं था।  मगर आज , पता नहीं क्या हो गया है उसे। शायद बेरोजगार होना चिड़चिड़ा भी बना देता है आदमी को ? और दार्शनिक भी......''
विक्रम रोहन को विदा कर अपने कमरे में लौट आया है।  नीचे बिछी चटाई पर धम्म से बैठता है और चित लेट जाता है।  कमरे की छत पर उसकी निगाहें टिक जाती है।  ''रोहन मेरे लिए सोचता है , मैं उसकी हर बात को काटने लगा हूँ।  क्या मैं सही कर रहा हूँ ? मैं जो सोचता हूँ क्या वही एकमात्र सही है या रोहन जो कहता है -समझाता है वो सही है ? वो गलत नहीं कहता-आखिर मेरे भले के लिए ही तो कहता है। पर मैं करू तो क्या करूँ ? हालात ने मुझे पंगु बना दिया है।  वैसे रोहन कहता है - तू फालतू रहकर दार्शनिक हो चला है।  उसे क्या पता  कि  अगर मैं तर्क और दर्शन या फिर आध्यात्मिक होकर नहीं सोचूंगा तो शायद मैं खड़ा रहने लायक भी नहीं रह पाउँगा।  यह सब कुछ मेरा धैर्य है , धैर्य थामे रखने के लिए आदमी को किसी न किसी का सहारा तो लेना ही पड़ता है।  ईश्वर का है तो क्या बुरा  . और ईश्वर  आपको अकेला नहीं होने देता- आप को ताउम्र लगता है की वो कुछ भला करेगा। और आप इस आस में खड़े रहते हैं।  गिरते नहीं। इसे रोहन मूर्खता भले कहे मगर यह मूर्खता ही आदमी का सहारा अधिक है.....''
विक्रम के चहरे पर हलकी सी मुस्कान उभर आई है जो उसे शायद पता भी नहीं , पता तो उसे यह भी नहीं चला  कि इसी मुस्कान के साथ लेटे हुए सोचते सोचते  उसकी आँख कब लग गयी।

समझे

''तुम पहाड़ पर चढ़कर आसमान को छूने की बात करती हो और मैं कहता हूँ पहाड़ से भी ऊंचा है आसमान।  हाथ नहीं पहुंचेगा।'' 
''पहाड़ पर चढ़ जाने के  सुकून से वंचित तो नहीं होउंगी। और वैसे भी आप कोई भी सफलता हासिल कर लो , और और सफलताएं , ऊपर चढ़ते-बढ़ते रहने की लालसा जाग्रत हो जाती है। बस , पहाड़ और आसमान के बीच मेरे हाथ की इतनी सी ही तो कहानी है।'' 
''तुम हर बात को इतना फिलॉसफिकल क्यों ले लेती हो ?''
''तुम हर बात को इतना सामान्य क्यों लेते हो ?''
''उफ्फ , कठिन है तुमसे बात करना।  अच्छा मैं चलता हूँ।'' 
''ठीक है , तुम सरल मार्ग से जाओ , मैं कठिन ही सही।'' 
''फिर वही बात , कभी तो रोमांटिक मूड में आया करो।'' 
''चलो , तुम्हे देर हो रही है।'' 
वीरा ने टिफिन बंद किया और वीर के हाथो पकड़ाया।  वीर बगैर कुछ बोले टिफिन को हाथ में लेकर दरवाजे से बाहर निकल गया। 
ऐसा रोज ही होता है।  किसी न किसी विषय पर बात का अंत वीरा की दार्शनिक बात और वीर की सामान्य सी सोच के साथ ख़त्म होती  है , रात जब दोनों घर आते हैं तो लगभग थके हुए होते हैं।  सो जाते हैं।  सुबह का वही चक्र।  वीरा पहले उठती है।  कमरो की सफाई के बाद फ्रेश होती है और चाय बनाती है।  वीर तब उठता है जब वीरा लगभग तैयार हो जाती है।  मगर वीर के जाने के बाद ही वीरा घर से निकलती है।  वीरा हमेशा सोचती है , अगर वो घर से पहले निकली तो वीर के बस का नहीं है टिफिन तैयार करके ले जाना।  कई बार ऐसा हुआ भी है।  वीरा को किसी मीटिंग की वजह से जल्दी जाना हुआ और वीर बगैर टिफिन के ऑफिस चला गया।  वीर बाहर खाना भी तो नहीं खाता कि वीरा निश्चिन्त रहे।  वीर जानता था कि वीरा उसका बहुत ख्याल रखती है और वह उसे टिफिन बनाकर इसीलिये देती है क्योंकि वो रात तक भूखा ही रहेगा।  महीने में वीर वीरा को कोई ८ हजार रुपये देता है।  टिफिन के।  वीरा ले भी लेती है।  क्योंकि लिव इन रिलेशन में रहना पूरा प्रैक्टिकल ही तो रहता है।  दिल की बात इसमें नहीं होती और वीरा लाना भी नहीं चाहती।  वीर कभी कभी सोचने लग जाता है कि वीरा को अपनी बना ले किन्तु कह नहीं पाता , कहने को होता है तो वीरा की दार्शनिक बातें उसे झेलनी पड़  जाती थी। वह जानता था कि वीरा में प्यार-व्यार का कोई भूत नहीं है।  वह जिंदगी को बहुत रूखा  सा लेती है। और वीरा को लगता था कि वीर अभी नादाँ है।  नादाँ तो था ही वो। 
रात बिस्तर में वीर करवट लेकर सोता है मगर वीरा उससे लिपट कर।  वीर कहता है - ''क्यों डर लगता है क्या ?'' 
''नहीं, मुझे आदत है। पापा के साथ ऐसा ही सोती हूँ।'' 
''पर मैं तुम्हारा पापा नहीं हूँ।'' 
''हाँ, मैं  भी कोई तुम्हारी बेटी नहीं हूँ।''
''फिर ?''
''फिर क्या ?''
''सो जाओ चुपचाप।'' 
अक्सर ऐसा ही होता है और सुबह हो जाती है। 
उस दिन वीरा का आख़िरी दिन था। प्रमोशन पर उसका तबादला चंडीगढ़ हो गया था।  रात देर से भी पहुँची थी।  मगर वीर को उसने घर पहुंचा न देखा तो सोच में पड़  गयी।  उसने फोन किया। 
''कहाँ हो वीर ?''
''वीरा , अभी कितना बजा है?''
''११ बज रहे हैं रात के। पर तुम हो कहाँ, ऐसे तो कभी बाहर नहीं रहे ?''
''तुम्हे पता है वीरा , वो पानी की टंकी के पीछे जो पर्वत श्रंखला दिखती है न , मैं बस उसके नीचे खड़ा हूँ।'' 
''क्यों ?'' 
''तुम आ जाओ , आज पहाड़ पर चढूंगा , आसमान को छूने। तुम साथ नहीं चलोगी ?''
''रात में ?''
''हाँ, सोचता हूँ शायद चाँद भी हाथ लग जाए।'' 
''चाँद का क्या करोगे ?''
''अपने साथ रखूंगा। तुम्हारे जाने के बाद कोई तो मेरे साथ होना चाहिए न।'' 
वीरा ने फोन बंद कर  दिया। और कुछ देर खड़ी सोचती रही।  फिर सीधे घर से बाहर निकली , बाइक उठाई और चल पडी जहां वीर था। 
''चलो मेरे साथ।''  हाथ पकड़ कर वीरा ने खींचा। 
''क्यों?''
''चाँद घर पर ही है। तुम्हे पता है डिजायरली नामक एक महान व्यक्ति हुआ है।'' 
''हाँ, तो ?'' वीर ने हैरानी से कहा। 
''तो क्या...'' माथे पर हल्की सी चपत लगाते हुए वीरा ने कहा - ''उसने कहा है - हर चीज लौट कर आती है अगर आदमी इंतज़ार करे।''  

सोमवार, 4 मई 2015

सच कहना

तुमने सुख और शान्ति को गढ़ा 
दिया नहीं, दे सकने का भ्रम रखा। 
क्योंकि कुछ दिया जा ही नहीं सकता 
जब तक कि लिया न जाए। 
लेने वालों ने तुम्हारी दी हुई चीज नहीं ली 
बल्कि वह लिया जिससे तुम दूर भागे।
दूर भागना
सत्य-शान्ति-स्नेह की तलाश में
कभी आवश्यक नहीं रहा।
फिर भी भागे और बुद्ध बने।
जब बुद्ध बन गए तब इति हो गयी,
इस बन गए ने तुम्हारे भागने के पीछे के उद्देश्य को ग्रस लिया
और भगवान बना दिए गए तुम।
तुम्हे कुछ मिला हो या न मिला हो
किन्तु तुमसे आज सबको मिल गया है
यह मिल जाना ही तुम्हारी सफलता मानूं
गले इसलिए नहीं उतरता क्योंकि
जो दिख रहा है
उसी को छोड़ तुम दूर गए थे।
तुम अकेले सिद्ध हो गए शायद।
और खुद को पुजवाने छोड़ गए
अपने धर्म-कर्म।
सच कहना - क्या तुम्हारे उद्देश्य में यही सब था ?

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

गली









उस घर से 
कोई पांच घर छोड़ 
एक गली थी , 
गली के बाद 
दो  घर छोड़ उसका घर। 
घरों की इस कतार को  
गली विभाजित करती थी। 
मगर निगाहें विभाजन की इस रेखा से पार 
दोनों घरो की चौखट पर बिछी होती थी।  
इधर से भी-
उधर से भी। 
दरवाजे खुलने का 
बेसब्र  इन्तजार  
मुस्कुराते चहरे के रूप में 
अक्सर प्रतिफल देता था। 
कितने ही सपनो से 
लिपे जाते रहे थे आँगन और 
बनाई जाती रही थी 
प्रेम रंगोलियां।  
अब  कोई नहीं है ,
न वो , न मैं। 
सूने पड़े हैं आँगन , 
घर, दरवाजे।  
किन्तु 
घरों की कतार के बीच खींची गली 
आज भी है वहां 
और उनके -मेरे  जीवन में भी।