रविवार, 26 अप्रैल 2009

यादे

मुझे लगता है यादे दो तरह की होती है, एक वो जिसमे तड़प होती है, कसमसाहट होती है, दर्द होता है, विरह की अग्नि से जलता मन होता है, दूसरी वो जिसमे परम शान्ति होती है , सुख होता है, मुस्कान उभरती है और जीने का अपना आनंद होता है।अमूमन पहली तरह की याद ज्यादा होती है, दूसरी तरह की क्यो नही? कविता के माध्यम से खोजने का प्रयत्न है।
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" क्यो याद सिर्फ़
तडपाती है?
मदमदाती क्यो नही?
गुदगुदाती क्यो नही?
क्यो
दावाग्नि की तरह
हहराती लपटों से
निराधार हृदय को
भस्म करने को
आतुर होती है?
और तो और
ये दावाग्नि शांत भी होती है तो
उसकी गर्म - तपतपाती राख
हवा के साथ उड़ उड़ कर
शरीर से जा चिपकती है।
रोम- रोम में रच-बस जाती है।
मन-मस्तिष्क के
निभृत एकांत को मानो
नोच-नोच कर खाती है।
क्यो ऐसा नही होता कभी की
इस प्रलय शून्य सन्नाटे में
याद चुपके से आए
अपनी महासागरीय
उत्ताल भुजाओं से थाम ले,
भींच ले अपने अंक में,
तमाम इन्द्रिय
मोहित मृग के समान
थिरकने लग जाए,
बंशी की धुन
वीणा के झंकृत तार
सुध-बुध खो दे।
क्यो नही होता ऐसा
की
याद किसी
मेघाच्छादित
आकाश की तरह
अपने आँचल से
सरस्व ढंक ले?
अपने ममतालु, मर्म स्पर्श से,
श्रृंगार रस की बारिश कर दे?
अपनी मखमली नर्म
आगोश में लेकर
छुपा ले?
अपने मादक अधरों से
टपकते अमृत का रसपान करा दे।
तृप्त कर दे हर वो शन
जो नितांत एकाकी होकर
अपने नुकीले- तीखे
कांटो से अतीत को
कुरेदते है और हर सम्भव
पीड़ा- दर्द- तड़पन दे जाते है।
उन्मुक्त हो मुस्कुराने का
पुरस्कार क्यो नही देती यादे?
शायद इसलिए की
यादे भी निछल, समर्पित
निस्वार्थ प्रेम मांगती है।
सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रेम। "

शनिवार, 18 अप्रैल 2009

अधरों से मै पी लूं

अपनी चाह ---
सुख सारे तुमको दे दूं
दुःख तुमसे मै ले लूं
झर झर बहते ये अश्रु
अधरों से मै पी लूं॥
जानती हो? -----
संघर्ष सदा बदा है
जीवन संग लगा है
अथ- इति के मध्य
सुख-दुःख से रंगा है॥
और इसे भी मानो ----
मन को कुचल अपने
जीवन जो जिया है
विधि का उसने
स्वयम विधान रचा है॥
मै क्या हूँ--
अलस त्याग मै कूदा
जीवन के इस रण में
भाग्य लोट लगाता
मेरे पथ, कण कण में॥
सच तो यह है प्रिये--
कौन है जो यहाँ
कामना से हीन है
जगत-हृद के सागर में
हर कोई लीन है॥

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

ऐसे कैसे लोग ?

घटनाये घटित होती है, अपने आसपास की आबो हवा में कई सारी ऐसी बाते होती है जिन्हें मस्तिष्क शब्दों के माध्यम से बाँधने का प्रयत्न करता है। उछलने कूदने वाले शब्दों को साधना होता है, किन्तु इसके लिए एकांत और अनुकूल वक़्त चाहिए। व्यस्तता में शब्द सधते नहीं बंध जरूर जाते है। बंधे हुए शब्दों में भटकाव भी स्वाभाविक होता है। मेरी इस रचना में संभव है, भटकाव नज़र आये। क्योकि परिस्थितिया व्यस्तता में कैद है। घुमड़ घुमड़ कर पैदा होने वाले विचारो को मस्तिष्क ने बाँधने का यत्न किया है, जिसे एक रचना के भेस में आपके सामने परोस रहा हूँ। चाहता भी हूँ कि यदि आप मेरे बंधे शब्दों को साध सके तो और बेहतर होगा। कम से कम जिन विचारों को लेकर मेने प्रयास किया है, उन्हें पूर्णता मिल जाए।


" ऊंचे- ऊंचे पद पर बैठे
बौने-बौने जैसे लोग।
खुद को पर्वत मान लेते है
कंकर- कंकर जैसे लोग।
पढना- लिखना बेकार हुआ है
कार में अंगूठा सवार हुआ है,
चाट- चाट तलुवो को बने है
देखो सांठ गाँठ वाले लोग।
बिक रहा ईमान यहाँ
धूल में सना सम्मान यहाँ
कौडी सी कीमत लगाते
दो कौडी के जैसे लोग।
हुई तरक्की ,चाँद पर पहुंचे
देश हमारा महान हुआ
शुक्र है चाँद से नज़र ना आते
भूखे नंगे फिरते लोग।
चलो यहाँ से भाग चले
भाग कर भी कहां चले,
प्यार के पीछे पड़े हैं देखो
यहाँ धंधे- चंदे वाले लोग।
गलती नहीं ज़माने की
आदत पड़ी जो 'खाने' की ,
रिश्वत - घूस ठूंस ठूंस कर
सेठ कहलाते पेट वाले लोग।


शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

मुफलिस जी की कविता से प्रेरित होकर लिखने का मन हुआ। इसके पूर्व प्रख्यात रचनाकार विजय देवनारायण साही की कुछ पंक्तिया स्मृति में आ रही है, उन्हें जरूर लिखूंगा , जिसके अर्थ तथा गंभीरता की गहराई में जाकर मेरी सीधी व सपाट कविता के संग आप किनारे लग सकते है।
" सच मानो प्रिय
इन आघातों से टूट- टूट कर
रोने में कुछ शर्म नहीं ,
कितने कमरों में बंद हिमालय रोते है।
मेजों से लग कर सो जाते कितने पठार
कितने सूरज गल रहे है अंधेरो में छिपकर
हर आंसू कायरता की खीझ नहीं होता। "
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क्या ऐसे ही प्रतिभाये

रोती रहेंगी?

चाटुकारों- चापलूसों की चांदी कटेगी?

शिक्षाये धंधे बाजों के खेत सींचती रहेंगी ?

कुर्सी पर मूर्खाधिराज का शासन होगा?

प्रिये मंज़र खौफनाक है ।

ऐसे में ईमान लहुलुहान होता दिख रहा है

तो कोई नई बात नही।

प्रतिभाये बिखरते बिखरते रेत बन चुकी है।

रेगिस्तान हो गई है आदमियत,

जिसपे मुह मारने वाले ऊँटो का काफिला

अट्टहास करते गुजरता है।

और बदनीयत मंजिल पा रही है।

किंतु प्रिये अभी भी उम्मीदे शेष है

अन्धकार के घटाटोप बादल छंटेंगे जरूर

क्योकि पचती नही है

हराम की कमाई।

जुलाब होता है और नासूर बन

रिसती है शरीर के हर कोने से।

सच्चाई है यह,

इससे मुह मोडे जो खड़ा है, खड़ा रहने दो।

बस तुम प्रतीक्षा करो।