शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

मुफलिस जी की कविता से प्रेरित होकर लिखने का मन हुआ। इसके पूर्व प्रख्यात रचनाकार विजय देवनारायण साही की कुछ पंक्तिया स्मृति में आ रही है, उन्हें जरूर लिखूंगा , जिसके अर्थ तथा गंभीरता की गहराई में जाकर मेरी सीधी व सपाट कविता के संग आप किनारे लग सकते है।
" सच मानो प्रिय
इन आघातों से टूट- टूट कर
रोने में कुछ शर्म नहीं ,
कितने कमरों में बंद हिमालय रोते है।
मेजों से लग कर सो जाते कितने पठार
कितने सूरज गल रहे है अंधेरो में छिपकर
हर आंसू कायरता की खीझ नहीं होता। "
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क्या ऐसे ही प्रतिभाये

रोती रहेंगी?

चाटुकारों- चापलूसों की चांदी कटेगी?

शिक्षाये धंधे बाजों के खेत सींचती रहेंगी ?

कुर्सी पर मूर्खाधिराज का शासन होगा?

प्रिये मंज़र खौफनाक है ।

ऐसे में ईमान लहुलुहान होता दिख रहा है

तो कोई नई बात नही।

प्रतिभाये बिखरते बिखरते रेत बन चुकी है।

रेगिस्तान हो गई है आदमियत,

जिसपे मुह मारने वाले ऊँटो का काफिला

अट्टहास करते गुजरता है।

और बदनीयत मंजिल पा रही है।

किंतु प्रिये अभी भी उम्मीदे शेष है

अन्धकार के घटाटोप बादल छंटेंगे जरूर

क्योकि पचती नही है

हराम की कमाई।

जुलाब होता है और नासूर बन

रिसती है शरीर के हर कोने से।

सच्चाई है यह,

इससे मुह मोडे जो खड़ा है, खड़ा रहने दो।

बस तुम प्रतीक्षा करो।

11 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अमिताभ जी
बहुत गहरी वेदना छिपी है आपकी रचना में.............
आज के समय का यथार्थ...........कडुवा सच सामने ला कर खडा कर दिया

पर आशा फिर भी जीवित है........बहुत ही उम्मीद, आशा भी है इस रचना में.....बहुत खूब

the pink orchid ने कहा…

bahut bahut bahut khooob.. itni kadvaahat bhari saacchayi ko ughaarne ke liye dhanyawaad.. aasha ko bhi shaamil kiya aapne antim panktiyon mein.. bahut mahaan kavi bante ja rahein hain aap amitabh ji... meri shubhkaamnaayein aapke saath hain..

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

उम्मीद अभी नहीं टूटी। बहुत गहरी बात कहती हुई एक सार्थक उजाले की आस। बहुत उम्दा।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बहुत कुछ सोचने को विवश करती एक बेहतरीन रचना.......आशाओं के दीप अगर जलते रहें तो अंधेरा एक न एक दिन जरूर मिट ही जाएगा.

Bicycle Wallpaper ने कहा…

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pankaj shrivastava ने कहा…

प्रिय अमिताभजी,
यह वेदना बहुत गहरी है,
इस कष्ट के हम भी हैं भागी
अब तो कष्ट भी है अनुरागी
जीवन में यह सब तो चलेगा ही
अकेले पंची भाड़ फोदेगा नहीं
निरंतर बदलाव जीवन का क्रम है
अब तो corruption पैसा ही आदर्श और पराक्रम ही

आप की कविता पर मुझे हरिवंश जी की कविता याद आ रही है.
तूफानों की और घुमा दो नाविक निज पतवार --
आज सिंध में और ह्रदय में साथ उठा है ज्वार
मिटटी के पुतले मानव ने कभी ना मानी हार --
प्रिय अमिताभ जी हार मत मानिए और सृजन करते रहिये..

Harkirat Haqeer ने कहा…

क्या ऐसे ही प्रतिभाये
रोती रहेंगी?
चाटुकारों- चापलूसों की चांदी कटेगी?
शिक्षाये धंधे बाजों के खेत सींचती रहेंगी ?
कुर्सी पर मूर्खाधिराज का शासन होगा?
प्रिये मंज़र खौफनाक है ।

सच कहा अमिताभ जी ये मंज़र है तो खौफनाक पर हमें इस मंज़र को तय करना है....!!

गौतम राजरिशी ने कहा…

जबरदस्त अभिव्यक्ति अमिताभ जी

the pink orchid ने कहा…

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aasha hai aapko aasaani hogi.. nahi to main hoon hi.. koi bhi pareshaani ho turant batayein..

kajal..

sudhir ने कहा…

उम्मीदों के साथ व्यवस्था
पर कटाक्ष !
श्रीखंड एवं छाछ का सुन्दर
संयोजन !
बहुत खूब ---!

MUFLIS ने कहा…

प्रतिभाये बिखरते बिखरते रेत बन चुकी है।
रेगिस्तान हो गई है आदमियत,
जिसपे मुह मारने वाले ऊँटो का काफिला
अट्टहास करते गुजरता है।.....

बहुत---बहुत----बहुत बधाई ...
इस नायाब रचना के लेखन के लिए ...
शब्द-संयोजन और भावार्थ से सजी आपकी ये कविता अपना सन्देश छोड़ने में bilkuल सफल रही है .....

कला-पक्ष भी अत्यंत सराहनीय है और आपकी रचना-शीलता की प्रगति को इंगित करता है
और.....मुझ साधारण-से लेखक को इतना मान दिया आपने .....!!
मुझे मालूम है "शुक्रिया" कहना काफी नहीं ....लेकिन ............

अभिवादन स्वीकारें
---मुफलिस---