गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

ऐसे कैसे लोग ?

घटनाये घटित होती है, अपने आसपास की आबो हवा में कई सारी ऐसी बाते होती है जिन्हें मस्तिष्क शब्दों के माध्यम से बाँधने का प्रयत्न करता है। उछलने कूदने वाले शब्दों को साधना होता है, किन्तु इसके लिए एकांत और अनुकूल वक़्त चाहिए। व्यस्तता में शब्द सधते नहीं बंध जरूर जाते है। बंधे हुए शब्दों में भटकाव भी स्वाभाविक होता है। मेरी इस रचना में संभव है, भटकाव नज़र आये। क्योकि परिस्थितिया व्यस्तता में कैद है। घुमड़ घुमड़ कर पैदा होने वाले विचारो को मस्तिष्क ने बाँधने का यत्न किया है, जिसे एक रचना के भेस में आपके सामने परोस रहा हूँ। चाहता भी हूँ कि यदि आप मेरे बंधे शब्दों को साध सके तो और बेहतर होगा। कम से कम जिन विचारों को लेकर मेने प्रयास किया है, उन्हें पूर्णता मिल जाए।


" ऊंचे- ऊंचे पद पर बैठे
बौने-बौने जैसे लोग।
खुद को पर्वत मान लेते है
कंकर- कंकर जैसे लोग।
पढना- लिखना बेकार हुआ है
कार में अंगूठा सवार हुआ है,
चाट- चाट तलुवो को बने है
देखो सांठ गाँठ वाले लोग।
बिक रहा ईमान यहाँ
धूल में सना सम्मान यहाँ
कौडी सी कीमत लगाते
दो कौडी के जैसे लोग।
हुई तरक्की ,चाँद पर पहुंचे
देश हमारा महान हुआ
शुक्र है चाँद से नज़र ना आते
भूखे नंगे फिरते लोग।
चलो यहाँ से भाग चले
भाग कर भी कहां चले,
प्यार के पीछे पड़े हैं देखो
यहाँ धंधे- चंदे वाले लोग।
गलती नहीं ज़माने की
आदत पड़ी जो 'खाने' की ,
रिश्वत - घूस ठूंस ठूंस कर
सेठ कहलाते पेट वाले लोग।


21 टिप्‍पणियां:

Pawan Nishant ने कहा…

baut badhiya

pawan nishant

अजित वडनेरकर ने कहा…

बहुत बढ़िया। आज के हालात का सटीक चित्रण। इससे ज्यादा तल्ख हुआ नहीं जा सकता वरना रचनाकर्म और गाली में फर्क नहीं रह जाएगा। बाकी जिस व्यवस्था पर आपकी संवेदना बोल रही है वह है गालियों के ही लायक।

रामावतार त्यागी की ग़ज़ल याद आ रही है-
पहाड़ों के क़दों की खाइयां हैं
बुलंदी पर बहुत नीचाइयां हैं

शुभकामनाएं...

manu ने कहा…

बुलंदी पर बहुत नीचाइयां हैं,
वाह,,,
अमिताभ जी ,
बहुत तीखा बोला जी आपने ,,,मगर जिनके लिए बोला ,,,
उन्हें सब हजम है आराम से,,,,
बल्कि उन्हें तो शायद पता भी ना चले के आप क्या कह गए,,,,
बस तालियाँ बजा देंगे,,,,,,
पर आप यूं ही लगे रहिये,,,,,

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बिक रहा ईमान यहाँ
धूल में सना सम्मान यहाँ
कौडी सी कीमत लगाते
दो कौडी के जैसे लोग।

अमिताभ जी
बहूत गहरी रचना है ........आपके शब्दों में गहरी वेदना छुपी है, सत्य ही लिखा है अपने .....कटाक्ष किया है समय पर, आज के हालत का यथार्थ चित्रण है इस रचना में

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

कई सच कह दिये इस रचना में। ये तीखापन जारी रहना चाहिए।
ऊंचे- ऊंचे पद पर बैठे बौने-बौने जैसे लोग।
खुद को पर्वत मान लेते है कंकर- कंकर जैसे लोग।

सच पता नही किस चीज का गुबान हो जाता है इन्हें।

बिक रहा ईमान यहाँ धूल में सना सम्मान यहाँ कौडी सी कीमत लगाते दो कौडी के जैसे लोग।

बहुत बेहतरीन लिखा आज तो। क्या कटाक्ष मारे है। सच दिल खुश हो गया।

hemant ने कहा…

lagta hai ye aawaz bahut ander se aye hai, very good.

sudhir ने कहा…

रचना में कोई भटकाव नहीं
पाया है सत्य
इसमें कोई छुपाव नहीं !

shyam kori 'uday' ने कहा…

कौडी( लाखों ) सी कीमत लगाते
दो कौडी के जैसे लोग।
... बहुत सुन्दर रचना है, बेहद प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति है ।

महावीर ने कहा…

बहुत ही सत्य बात की है। सच्चाई में तलख़ी तो होती है और होनी भी चाहिए। एक एक पंक्ति दिल से निकल कर कलम की राह से यहां पाठकों के दिलों को छू गई। बहुत सुंदर रचना है। बधाई।

अल्पना वर्मा ने कहा…

तीखा व्यंग्य .आज के हालात का सटीक चित्रण.
अच्छी कविता..भटकाव नज़र नहीं आया.यह तो गद्यात्मक कविता है.

Harkirat Haqeer ने कहा…

बिक रहा ईमान यहाँ
धूल में सना सम्मान यहाँ
कौडी सी कीमत लगाते
दो कौडी के जैसे लोग।

वाह वाह....!
अमिताभ जी ये किस पर इतना सटीक व्यंग किया है....???

शोभना चौरे ने कहा…

bhut sunder likha hai

RC ने कहा…

Beautiful Poem, I liked the punch line "... jaise log"

Liked these lines
कौडी सी कीमत लगाते
दो कौडी के जैसे लोग।

हुई तरक्की ,चाँद पर पहुंचे
देश हमारा महान हुआ
शुक्र है चाँद से नज़र ना आते
भूखे नंगे फिरते लोग।

God bless
RC

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

बिक रहा ईमान यहाँ
धूल में सना सम्मान यहाँ
कौडी सी कीमत लगाते
दो कौडी के जैसे लोग।
अमिताभ जी ,
आपके शब्दों में गहरी वेदना छुपी है|आप
जैसा ही कुछ मेरा भी हाल है।
मैनें आप का ब्लाग देखा। बहुत अच्छा लगा।
आप मेरे ब्लाग पर आयें,यकीनन अच्छा लगेगा और अपने विचार जरूर दें।प्लीज.............
हर रविवार को नई ग़ज़ल अपने ब्लाग पर
डालता हूँ। मुझे यकीन है कि आप को जरूर
पसंद आयेंगे....

kumar Dheeraj ने कहा…

अमिताभ जी गदगद कर दिया आपने । बिल्कुल सच्ची और हकीकत कविता आपने लिखी है । दुनिया फरेब और धोखेवाजो से भरी पड़ी है । इसमें लोगो का धर्म और ईमान कुछ नही शेष रह गया है । धूस के बल पर लोग मोटे होते जा रहे है । पैरवी के बल पर लोग चांद पर चढ़ने को उतारू है । लेकिन दिक्कत यही है कि वही लोग तो तरक्री कर रहे है धन्यवाद

the pink orchid ने कहा…

maafi chaahti hoon... kaise ya panktiyaan chhoot gayi mujhse..

shabdon ka safar,
bhaavnaao ke musaafir,
kalam ke saaye mein,
rahe lafzo mein bikhar....


Amitabh ji aapki is kavita mein to itna kadve satya ka varnan hai ki jee chaahta hai kisi tarah aapki ye kavita desh ke har jawaan khoon ki awaaz ban jaye...

badhayi ho aapko,ki aapki soch itni gehri aur itni tthos hai..

bhatke huye shabd nahi the balki kaafi bandhe huye sateek bhaav the jo aapne bakhubi ek kavita mein dhaal diya..

the pink orchid ने कहा…

अमिताभ जी , आपकी उन पंक्तियों की जितनी तारीफ की जाये उतना कम है..

मैं बनी रहूंगी,
इस सफ़र में,
हर लिखित पल में..

शुक्रिया ..

गौतम राजरिशी ने कहा…

भटकाव तो कहीं दिखा नहीं....हाँ, कविता का खास तेवर छू जरूर गया अंदर तक

जय हो

hem pandey ने कहा…

'बिक रहा ईमान यहाँ
धूल में सना सम्मान यहाँ
कौडी सी कीमत लगाते
दो कौडी के जैसे लोग।'
-सुन्दर.

Nirmla Kapila ने कहा…

tतरक्की हुई चान्द पर पहुंचे------ बहुत ही बडिया लिखा है वेसे तो सारा व्यंग ही काबिले तरीफ है जो आजकल की रज्नीति का जीता जागता चित्र हराभार और शुभकामनायें

BrijmohanShrivastava ने कहा…

वाह भाई=बहुत बढ़िया ==दरख्तों से या कहलो दरख्तों की = करते है बातें =गमलों में उगे हुए लोग