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" क्यो याद सिर्फ़
तडपाती है?
मदमदाती क्यो नही?
गुदगुदाती क्यो नही?
क्यो
दावाग्नि की तरह
हहराती लपटों से
निराधार हृदय को
भस्म करने को
आतुर होती है?
और तो और
ये दावाग्नि शांत भी होती है तो
उसकी गर्म - तपतपाती राख
हवा के साथ उड़ उड़ कर
शरीर से जा चिपकती है।
रोम- रोम में रच-बस जाती है।
मन-मस्तिष्क के
निभृत एकांत को मानो
नोच-नोच कर खाती है।
क्यो ऐसा नही होता कभी की
इस प्रलय शून्य सन्नाटे में
याद चुपके से आए
अपनी महासागरीय
उत्ताल भुजाओं से थाम ले,
भींच ले अपने अंक में,
तमाम इन्द्रिय
मोहित मृग के समान
थिरकने लग जाए,
बंशी की धुन
वीणा के झंकृत तार
सुध-बुध खो दे।
क्यो नही होता ऐसा
की
याद किसी
मेघाच्छादित
आकाश की तरह
अपने आँचल से
सरस्व ढंक ले?
अपने ममतालु, मर्म स्पर्श से,
श्रृंगार रस की बारिश कर दे?
अपनी मखमली नर्म
आगोश में लेकर
छुपा ले?
अपने मादक अधरों से
टपकते अमृत का रसपान करा दे।
तृप्त कर दे हर वो शन
जो नितांत एकाकी होकर
अपने नुकीले- तीखे
कांटो से अतीत को
कुरेदते है और हर सम्भव
पीड़ा- दर्द- तड़पन दे जाते है।
उन्मुक्त हो मुस्कुराने का
पुरस्कार क्यो नही देती यादे?
शायद इसलिए की
यादे भी निछल, समर्पित
निस्वार्थ प्रेम मांगती है।
सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रेम। "

