शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

सवाल आपसे हैं, उनसे नहीं जो सवाल पैदा कर रहे हैं

कल मुम्बई में अफरा-तफरी मच गई। मध्य-रेल अचानक ठप्प हो गई। सुबह के उस समय यह सब हुआ जब लाखों लोग अपने कार्यस्थल की ओर रवाना होते हैं। एक निर्माणाधीन पुराना पाईपलाइन वाला पुल टूट कर लोकल ट्रेन पर गिर जाता है, हाहाकार मच जाता है। मचे भी क्यों नहीं आखिर ट्रेन हादसे मे मौत भी हुई और घायल भी हुए। ऐसा लगा मानों किसी परिवार के मुख्य व्यक्ति को हार्ट अटैक आया और परिवार वालों में भगदड मच गई। बदहवासी छा गई। सारा कामकाज रुक गया। सबकुछ उलट-पलट सा गया। मुम्बई की लोकल ट्रेन को भी तो जीवन रेखा ही माना जाता है। यही वजह है कि कल लोग किस हाल में थे, और किस हाल में घर पहुंचे..बडी करुणामयी कहानी है। अफसोसजनक यह कि इस कहानी की आदत हो गई है, हर गम पचाने की मज़बूरी हो गई है। रोज़ ब रोज़ कहानी दोहराती है, सो जीवन में यह आम हो गई है। वाह री विडम्बना। किंतु मैं मुख्य घटना के केन्द्र की बात करना चाह रहा हूं। उस कैब की बात करना चाह रहा हूं जिसमें मोटरमैन (ड्राईवर) फसां था और मौत से लड रहा था। वो जीत जाता यदि उसके विभाग वाले चुस्त दुरुस्त होते। दुख होता है यह कहने में कि देश का सबसे बडा नेटवर्क, सबसे बडा लापरवाह है जो अपने आदमी की जान की कीमत भी नहीं समझता और महज़ 5 लाख सहायता राशि देकर मामले की इतिश्री मान लेता है। वह एक निरापद मौत थी। करीब 3 घंटों तक दचके हुए कैब में दबा हुआ मोटरमैन सहायता के लिये गुहार लगा रहा था, और रेलप्रशासन मामले की पुष्टी के लिये मीडिया से मुखातिब होना ज्यादा बेहतर मान रहा था। कहने को वहां सब थे। रेल विभाग का आपातकालीन दस्ता भी था, पुलिस प्रशासन भी था, अग्निशमक दल के लोग भी थे और जनसामान्य की भीड भी थी। अगर वहां कोई नहीं था तो उस जिन्दगी को बचाने वाला, जिसकी सूझबूझ की वजह से बहुत बडी दुर्घटना टल चुकी थी। हास्यास्पद है जिस नेटवर्क के बारे में कहा जाता है कि यहां हर कार्य के लिये एक प्रशिक्षित व्यक्ति मौज़ूद है, साधन उपलब्ध हैं, वहां उसके पास कैब को काटकर जान बचाने के लिये जो औज़ार हैं वो सिर्फ दिखावा, कैब को काटने के लिये ड्रील मशीन लाई गई, गैस की टंकी लाई गई, पर वाह रे रेल विभाग, वो टंकी खाली निकली। मौत से लडने वाले ड्राईवर की थमती सांस की मानो किसी को कोई परवाह नहीं, पुलिस भीड को हटाने में व्यस्त, अग्निशमन दल रेल विभाग की कार्यवाही की प्रतीक्षा में, तो रेल विभाग का बचाव दल अपने ही बचाव में दिखाई दिया। अन्दर दबा कुचला उसका खुद का आदमी अंतिम सांसे गिन रहा होता है और बाहर उसे बचाने के नाम पर सिर्फ नाटक खेला जाता है। और जब कैब काट लिया जाता है, अन्दर फंसे ड्राईवर को बाहर निकाला जाता है तो हाथ में सिर्फ लाश आती है, क्योंकि निकालते समय उसका हाथ कट जाता है, पैर मे चोट पहुंचती है, वैसे भी काफी देर हो चुकी होती है। वाह रे रेल विभाग की सफलता। उस लाश को अस्पताल भेजा जाता है, फिर घरवालों को सौंप दिया जाता है। परिवार के बहते आंसुओं के बीच दो शब्द संवेदना के टपका कर रेलविभाग अपनी कर्मठता का प्रदर्शन करता है। अब परिवार को सहायता राशि घोषित कर दी गई है, किसी को नौकरी का आश्वासन भी दे दिया जायेगा। बस्स..धीरे धीरे सबकुछ ठीक..खत्म...। वाह री...मानवता....। मुझे समझ में यह नहीं आता कि करोडों बज़ट वाले रेलविभाग में इतनी दुर्घटनायें हो चुकी है, बावज़ूद इससे निपटने के लिये आवश्यक साधन भी उपलब्ध नहीं? प्रशिक्षित कर्मचारी भी नहीं? जो ऐसी घटनाओं के होते ही चुटकी में जान बचा सकता हो? होनी को कौन टाल सकता है, यह सच है किंतु होनी के बाद अगली होनी से बचाने के उपाय खडे किये जा सकते हैं। किंतु लापरवाहों की आंखे नहीं होती, दिमाग नहीं होता, होता है तो जेब भरने, काम चलने की बस एक तुच्छ मानसिकता होती है। मानवीय भूल होती है, किंतु कोई ड्राईवर मौत को आमंत्रण देता हो, ऐसा नहीं होता। अभी पिछले दिनो जब मथुरा में हादसा हुआ तो रेलविभाग ने ड्राईवर को दोषी मान कर अपनी कार्यवाही शुरू कर दी, किंतु जब मुम्बई में खुद रेलविभाग दोषी था तो कौन कार्यवाही करेगा?
सवाल सिर्फ रेलविभाग को ही नहीं साधता, बल्कि हमारे आसपास फैले इस पूरे तंत्र को साधता है जो आदमी की जिन्दगी को कौडी की कीमत से तौलता है। हर जगह मौत खडी है। उसके खडे होने के संकेत भी दीखते हैं, उसे खडे करने वाले लोग भी दीखते हैं..किंतु नहीं दिखते इन पर पाबन्दी लगाने वाले। पूरी मानवता की यह सबसे बडी हार है। और हम अपनी ही हार रोज़ देखते है खडे होकर..., हंसते हुए..। क्या अब भी आप मौन साधना ही हितकर समझते हैं या ऐसी तमाम खडी मौतों के खिलाफ आवाज़ बुलन्द कर प्रशासन को चेताना चाहते हैं? सवाल आपसे हैं, उनसे नहीं जो सवाल पैदा कर रहे हैं।

25 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

Our communication - Wireless
Our business - Cashless
Our telephone - Cordless
Our cooking - Fireless
Our youth - Jobless
Our religion - Creedless
Our food - Fatless
Our faith - Godless
Our labour - Effortless
Our conduct - Worthless
Our relation - Loveless
Our attitude - Careless
Our feelings - Heartless
Our politics - Shameless
Our education - Valueless
Our Follies - Countless
Our arguments - Baseless
Our commitment - Aimless
Our poor - Voiceless
Our life - Meaningless

And finally, Our existence - Useless????

इस मर्ज की कोई दवा नहीं !

Mired Mirage ने कहा…

लज्जा से सिर झुक जाता है। अपने को प्रगतिशील मानने वाला यह देश तभी प्रगतिशील कहलाएगा जब वह अपने नागरिकों की जान की कीमत समझे, कीमत पाँच लाख रूपए नहीं, हर हाल में जान बचाने की कोशिश करे, जान बचाने के साधन उपलब्ध व दुरुस्त रखे और हर ऐसी मृत्यु की जवाबदेही माँगे। आस्ट्रेलिया से आशा करना कि वह भारतीयों की जान बचाने का उत्तरदायित्व ले किन्तु स्वयं अपने नागरिकों को इतना सस्ता मानें कि एक विभाग दूसरे को केवल पत्र लिखता रहे और टूटफूट को ठीक तुम कराओ तुम कराओ कहता रहे, बेहद लज्जाजनक है।
यही काँड किसी निजि क्षेत्र में हुआ होता तो अब तक न जाने कितनों की हालत खस्ता हो चुकी होती।
घुघूती बासूती

kshama ने कहा…

Ye sab ghatte hue dekha aur dard ke maare niwala gale se utraa nahee..kayee baaten samajh nahee payee ...usme se ek: panee kyon nahee band kiya jaa raha thaa?

शोभना चौरे ने कहा…

मानवीय सवेद्नाओ और मानवीयता से परे रेलवे प्रशासन
की लापरवाही की एक और दर्दनाक आँखों देखि त्रासदी
आपका सवाल पूछना बिलकुल उचित है
उनलोगों से जिन्हें अब सिर्फ समाचार देखना ही नही है
ऐसी दुर्घटनाओ के जिम्मेदार लोगो और उसे तमाशा बनाने वालो से हिसाब मांगना होगा |
रपये से इंसानों कि जान कि कीमत आंकने वालो के खिलाफ आवाज उठानी ही होगी |
उस ड्राइवर को श्रधान्जली |

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

aaj to godiyaal sa'ab tippanikar ke roop main baazi mar gaye !!

@amitabh ji lagta hai aapne apni pichli post ki charcha nahi padhi kal?
chaliye koi baat nahi main link de raha hoon padh levein...

http://anand.pankajit.com/2009/10/blog-post_23.html#comments (Swapn Badal Rahe ke antargat !)
:)

raj ने कहा…

....

वाणी गीत ने कहा…

सवाल जरुर पूछा जाना चाहिए ...कभी तो नक्कारखाने में तूती की आवाज सुनायी देगी..!!

शरद कोकास ने कहा…

इस द्रश्य की कल्पना कर मेरे रोंगटे खडे हो गये है ..गुस्सा आ रह है सो अलग । सवाल किससे करे कि ऐसा क्यो हुआ ?

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

रचना प्रभावशाली रही.
हम तो खुद ही एक प्रश्न हैं इस देश में फिर हमसे उत्तर की अपेक्षा उचित नहीं. मोती सैलरी लेने वाले, जिम्मेदार लोग ही यदि समस्या पैदा करने वाले हो गए हैं ही तो राम जाने ज़वाब कौन देगा. और कोई देगा भी तो बस यही की "जाच आयोग बैठा दिया है, पूर्ण तफसील से उसकी जो रिपोर्ट आएगी, उस पर उचित कारवाही कर किसी भी दोषी को बख्सा नहीं जायेगा....."
बस घटना का पटाक्षेप, और फिर एक और नयी घटना का इंतजार, फिर से यही सब सुनाने और सुनाने के लिए, आम जनता की यही नियति हो गयी है ............

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

ओम आर्य ने कहा…

भाई जो गोदियाल साहब ने कही है .....बिल्कुल सटिक है ......इनसे मै सहमत हूँ!

Udan Tashtari ने कहा…

जिम्मेदारी निर्धारित करना तो जरुरी है..सवाल होना ही चाहिये.

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

जिस नेटवर्क के बारे में कहा जाता है कि यहां हर कार्य के लिये एक प्रशिक्षित व्यक्ति मौज़ूद है, साधन उपलब्ध हैं, वहां उसके पास कैब को काटकर जान बचाने के लिये जो औज़ार हैं वो सिर्फ दिखावा, कैब को काटने के लिये ड्रील मशीन लाई गई, गैस की टंकी लाई गई, पर वाह रे रेल विभाग, वो टंकी खाली निकली।

सबसे बड़ी दुखदायक बात यही है कि एक जान गई जिसे बचाया जा सकता था। सच पूछिए तो ये सब चीजें हम सब के लिए रोजमर्रा की बातें जैसी हो गई है? जैसे रिश्वत आज हो चुकी है। सही बात तो ये है कि कोई आवाज नही उठा रहा है और जो आवाज उठा भी रहे है अहिंसक तौर से तो उनकी आवाज में इतना दम नही होता कि ऊपर बैठे हाकिम लोगो के कान में जूँ भी रेंग़े। और जो हिंसक होकर आवाज उठाए उससे हाकिम लोग जागे तो सही पर उनके जरिए कानून का डंडा चला दिया जाए। फिर आदमी करे तो क्या करे? किस राह जाकर अपनी आवाज उठाए? बैशक वो ऐसी घटनाओं के बारें में हो या फिर बिजली पानी रोजगार रिश्वत निकम्मापन आदि हो। सच पूछिए तो मुझे लगता है अगर हम सब अपने अपने कर्तव्यों अपनी दैनिक रोजर्मरा के कामों में ले आए तो काफी हद तक सब ठीक हो जाए। पर सच पूछिए तो हम अधिकारों की बात तो करते है खूब जोरों से पर कर्तव्यों को भूल जाते है। अगर टंकी वाले शख्स से अपना कर्तव्य निभाए होता तो शायद उस रेल चालक की जान बचाई जा सकती थी। अगर एक पुलिस वाला रिश्वत ना लेकर अपनी ड्यूटी का कर्तव्य निभाए तो क्या गुडागर्दी बढ सकती है। नही ना। मुझे तो बस यही लगता अगर कुछ अच्छा हो सकता है तो इस कर्तव्य की राह से कुछ हो सकता है। नही तो जैसे मैंने ऊपर बताया वैसा ही होगा। कोई राह नही है हमारे पास।

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

जिस नेटवर्क के बारे में कहा जाता है कि यहां हर कार्य के लिये एक प्रशिक्षित व्यक्ति मौज़ूद है, साधन उपलब्ध हैं, वहां उसके पास कैब को काटकर जान बचाने के लिये जो औज़ार हैं वो सिर्फ दिखावा, कैब को काटने के लिये ड्रील मशीन लाई गई, गैस की टंकी लाई गई, पर वाह रे रेल विभाग, वो टंकी खाली निकली।

सबसे बड़ी दुखदायक बात यही है कि एक जान गई जिसे बचाया जा सकता था। सच पूछिए तो ये सब चीजें हम सब के लिए रोजमर्रा की बातें जैसी हो गई है? जैसे रिश्वत आज हो चुकी है। सही बात तो ये है कि कोई आवाज नही उठा रहा है और जो आवाज उठा भी रहे है अहिंसक तौर से तो उनकी आवाज में इतना दम नही होता कि ऊपर बैठे हाकिम लोगो के कान में जूँ भी रेंग़े। और जो हिंसक होकर आवाज उठाए उससे हाकिम लोग जागे तो सही पर उनके जरिए कानून का डंडा चला दिया जाए। फिर आदमी करे तो क्या करे? किस राह जाकर अपनी आवाज उठाए? बैशक वो ऐसी घटनाओं के बारें में हो या फिर बिजली पानी रोजगार रिश्वत निकम्मापन आदि हो। सच पूछिए तो मुझे लगता है अगर हम सब अपने अपने कर्तव्यों अपनी दैनिक रोजर्मरा के कामों में ले आए तो काफी हद तक सब ठीक हो जाए। पर सच पूछिए तो हम अधिकारों की बात तो करते है खूब जोरों से पर कर्तव्यों को भूल जाते है। अगर टंकी वाले शख्स से अपना कर्तव्य निभाए होता तो शायद उस रेल चालक की जान बचाई जा सकती थी। अगर एक पुलिस वाला रिश्वत ना लेकर अपनी ड्यूटी का कर्तव्य निभाए तो क्या गुडागर्दी बढ सकती है। नही ना। मुझे तो बस यही लगता अगर कुछ अच्छा हो सकता है तो इस कर्तव्य की राह से कुछ हो सकता है। नही तो जैसे मैंने ऊपर बताया वैसा ही होगा। कोई राह नही है हमारे पास।

संगीता पुरी ने कहा…

अपने घर में एक एक बात पर सुरक्षा का ध्‍यान देनेवाले को जब अपने परिवार के जनों को ऐसी असुरक्षित व्‍यवस्‍था से गुजरते हुए मौत का सामना करते देखना पडता है तो आक्रोश तो होना ही है .. पर इतनी बडी संख्‍या में जनता को इतना लाचार देखकर ताज्‍जुब तो होता ही है !!

महफूज़ अली ने कहा…

Godiyal ji bilkul sahi kah rahen hain....

Mishra Pankaj ने कहा…

सही कहा आपने अगर पहले चेतते तो ये हादसा टल जाता

अल्पना वर्मा ने कहा…

शायद इंसान की जान की कीमत कुछ है ही नहीं आज कल.
आप ने इस एक किस्से का जिक्र किया जो बेहद अफसोसजनक है.
अभी हाल ही में मुम्बई में ही अग्निशमन कार्यकर्ताओं की हुई मौत का जिम्मेदार किसे कहा जाये?
हम भारतीय नियति को सब कुछ मान कर चलते हैं..शायद यही हमारी कमजोरी है.
व्यवस्था में खामियां हैं ही..उनकी क्या बात की जाये..
मानव की संवेदनाएं भी कैसे शून्य हो रही हैं ..समझ नहीं आता.

Babli ने कहा…

बहुत ही बढ़िया और सठिक लिखा है आपने ! आपका सवाल पूछना बिल्कुल जायज़ है! आखिर ऐसी दुर्घटनाएं रोज़ाना क्यूँ होता है? सभी लोग इसके ज़िम्मेदार हैं और हर रोज़ ऐसे दर्दनाक हादसे होते हैं जिससे बहुत ही तकलीफ पहुँचती है! पिछले हफ्ते ऑस्ट्रेलिया के एक चैनल में मुंबई के बारे में दिखाया जा रहा था कि रोज़ कितने लोग ट्रेन की पटरी पर मरते हैं और अपनी जान की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते हैं लोग! बस थोड़ा सा वक्त बचाने के लिए रेल की पटरी पर से गुज़रते हैं और कुछ लोग तो खुदखुशी करते हैं! ट्रेन ड्राईवर का interview लिया जा रहा था जिसमें उन्होंने अपने तीस साल के तजुर्बे में कितने लोगों को सामने मरते हुए देखा वही बताया! गोदियाल जी ने बिल्कुल सही कहा है!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

एक ऐसी शर्मनाक स्तिथि है हमारे अधिकतर सरकारी विभागों की ......... कूद ही अपराध करते हैं तो खुद को कैसे दोषी ठहराएंगे ...... पूरे देश में अगर ध्यान से देखें तो बस किसी भी सरकारी विभाग की कोई जवाबदेही नहीं है .... अगर ये हो किसी प्राइवेट कंपनी के द्बारा होता तो अब तक कुछ लोग हवालात में जरूर होते .......... कोई कार्यवाही जरूर होती ..........

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

Sarkar ke sath-sath ham bhi jimmedar banen.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत ही शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण घटना.
हमारे देश में इंसान की जान की कोई कीमत ही नहीं है.

sada ने कहा…

बहुत सही कहा आपने, इस तरह की दुर्घटनायें मन के भीतर तक झंझोड़ जाती हैं, कुछ बेकसूर जानें असमय काल के गाल में समां जाती हैं और मुआवजे के रूप में दिये नोट देकर इतिश्री कर ली जाती है ।

singhsdm ने कहा…

alarming post....

Nirmla Kapila ने कहा…

व्यवस्था या किसी समस्या की बात करते हुये ही दिल मे दर्द सा होता है आगे क्या होगा क्या कभी कोई सुनेगा लोगों के दुख दर्द। रेलेवे तो शायद गाडियों की आवाज़ से ही सुनने की क्षमता खो बैठी है आभार इस आलेख के लिये।

गौतम राजरिशी ने कहा…

हर बार...हर इक बार ऐसी कुछ घटनायें होती हैं और हम आक्रोश में भर जाते हैं। फिर धीरे-धीरे वो आक्रोश मंद पड़ता जाता है इधर-उधर निकस कर बौखलाता है और प्रतिक्षा में बैठ जाता है अगले ऐसी ही किसी घट्ना पर फिर से फट पड़ने को...हर बार...हर इक बार!!!!

साइड-बार की तस्वीरें दिल को छूती हैं, इन आक्रोशों को ठंढ़ा करती हैं।