शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009

ओहदे वाला आदमी

ओहदे वाला आदमी
'आदमी' नहीं होता
वो
'ओहदे वाला आदमी' होता है।

'आदमी' होने के लिये
सिर्फ 'आदमी" होना होता है।
और
ओहदे पर जो 'आदमी" होता है
वो ओहदे के नीचे होता है,
दबा सा।
उपर उसके होता है
अहम और दम्भ का चमकता
हीरा।
हीरा... जैसे मिलावटी चीजों पर
ब्रांडेड रैपर लगा हुआ
'ग्रीन' चिन्हित पैकेट।

सच तो यह भी है कि
पैसा, यश, कीर्ति
होंगे किसी जन्म के पुण्य।
किंतु पाप की तरह
वो भी तो कटते हैं,
ओहदे वाले ये क्यों
नहीं समझते हैं।

प्रारब्ध जिसका जो
उसे मिलता है,
पर हर क्षण होता
एक प्रारंभ है
जो बनता 'प्रारब्ध" है
यह 'आदमी' सोचता है।

इसीलिये यह कहना
कि
ओहदे पर बैठना
और 'आदमी' बने रहना
कठिन है।
जैसे
सांप का बगैर ज़हर के होना।

24 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

आज की हकीकत बेहतरीन शब्दों से बयान कर दी। सच आज के दौर में सबसे बड़ा कठिन कोई अगर है तो वो है आदमी होना। इससे पढकर दिल की एक बात याद आ गई। पहले वही लोग सरकारी नौकरी करने जाते थे जो सच में देश सेवा और सेवा करना चाहते थे बैशक चाहे वो फोजी हो या अन्य सेवा। पर आज जमाना बदल गया है लोग रोजगार के लिए जाते है और ओहदे के लालच के लिए। और आपने सही चोट की बेहतरीन शब्दों से।
ओहदे वाला आदमी
'आदमी' नहीं होता
वो
'ओहदे वाला आदमी' होता है।

बहुत खूब।

ओहदे पर जो 'आदमी" होता है
वो ओहदे के नीचे होता है,
दबा सा।
उपर उसके होता है
अहम और दम्भ का चमकता
हीरा।
हीरा... जैसे मिलावटी चीजों पर
ब्रांडेड रैपर लगा हुआ
'ग्रीन' चिन्हित पैकेट।

सोलह आने सच्ची बात वो भी इतनी खूबसूरती से।

सच तो यह भी है कि
पैसा, यश, कीर्ति
होंगे किसी जन्म के पुण्य।
किंतु पाप की तरह
वो भी तो कटते हैं,
ओहदे वाले ये क्यों
नहीं समझते हैं।

सच तो ये है वो सब समझते है बस अनजान बने रहते है। या फिर ओहदे का नशा ही ऐसा होता है कि बस सबकुछ भूल जाते है बस याद रहता है तो ओहदा। बहुत ही करारी चोट की है आपने आज इन ओहदे वालो पर। और जब आप लिखते है तो दिल से लिखते है। अदंर की तड़फ साफ नजर आती है।
और जब बात चली है तो ये भी कहता जाऊँ नही तो बैचेन रहूँगा कि सब नेता लोग कहते है कि वो देश और देश की जनता की सेवा के लिए नेतागिरी करने आते है समझ नही आता सेवा बगैर ओहदे के क्यों नही हो सकती है। सच तो यही है हम सबको ओहदे से ही प्यार होता है। उसे जुडी अहम और दम्भ की चमक से प्यार। बाकी सब बकवास है।

आमीन ने कहा…

बेहतरीन
करारी चोट

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत जोरदार रचना है।बधाई।

AlbelaKhatri.com ने कहा…

अगर आपको कविताई का जादूगर कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी...........

वाह !

आदमी और ओहदे के बीच का जो अवकाश है
उसे भरपूर प्रकाश में ले आए आप

___अभिनन्दन !

Apoorv ने कहा…

एकदम कबीर दास टाइप बात कह दी आपने सर जी..सच-सच खरी-खरी..
आदमी के लिये आदमी बने रहना बहुत मुश्किल है..एक डर तारी रहता है, ओहदे लुभाते रहते हैं, बाजार चूसता रहता है और शासन एक भय बन कर नसों मे दौड़ता है..
यहाँ सच कहा आपने

ओहदे पर बैठना
और 'आदमी' बने रहना
कठिन है।
जैसे
सांप का बगैर ज़हर के होना।
और

ओहदे पर जो 'आदमी" होता है
वो ओहदे के नीचे होता है,
दबा सा।

मैं तो कहूंगा के आदमी बस वह है जिसके नीचे कोई आदमी नही है..

M VERMA ने कहा…

ओहदे पर बैठना
और 'आदमी' बने रहना
कठिन है।
जैसे
सांप का बगैर ज़हर के होना।
ओहदा वाकई आदमी को आदमी नही रहने देती है.

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... behatreen abhivyakti !!!!!!

ओम आर्य ने कहा…

बिल्कुल सही है आप .........आज का आदमी हर एक जगह पर हर एक पल किसी न किसी चीज से दबा ही है ...........वह आदमी से अलग अलग कुछ है .........बहुत बडी सच्चाई को उकेरती रचना!

अर्शिया ने कहा…

अदभुत निष्कर्ष, ओहदे वाला आदमी वाकई बहुत खतरनाक होता है।
--------
स्त्री के चरित्र पर लांछन लगाती तकनीक।
चार्वाक: जिसे धर्मराज के सामने पीट-पीट कर मार डाला गया।

sada ने कहा…

ओहदे पर जो 'आदमी" होता है
वो ओहदे के नीचे होता है,
दबा सा।

बहुत ही सुन्‍दर सत्‍यता के बेहद निकट हर एक शब्‍द अन्‍तर्मन को झंझोड़ता, लाजवाब प्रस्‍तुति, बधाई ।

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

आज बड़े दिनों बाद आपके ब्लॉग पे आया हूँ....
देर तक डेरा ज़माने वाला हूँ
क्षमा प्रार्थी हूँ की इतने दिनों नहीं आ पाया पर एक तरह से सही ही है आज फुर्सत से देर तक बैठूंगा ...
आज का दिन आपके ब्लॉग के नाम.
:)
पढ़ कर पोस्ट्स के उप्पर कमेन्ट करता हूँ !

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

ओहदे वाला आदमी
'आदमी' नहीं होता
वो
'ओहदे वाला आदमी' होता है।


Quote of the day !

balki main to ye kehta hoon (aapki pehli baar alochna kar raha hoon)
ki yadi kavita yahi pe samapt ho jaati to maza hi aa jata.
Baaki ek aur kavita...

Par ye meri vyaktigaht rai hai.
haha

aur main ise do kavitaoon ki tarah treat kar raha hoon...

isliye dossri kavita ke liye doosra comment !!

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

हीरा... जैसे मिलावटी चीजों पर
ब्रांडेड रैपर लगा हुआ
'ग्रीन' चिन्हित पैकेट।

bus yahi soch raha hoon ki aadmi (wo bhi aap jaisa) samvedna-pyaaz ki kitni partein khol khol ke hamari bawonaaon ke kitne aansoon nikal sakta hai?
Ye aansu jo drishya nahi hai....
...Aakhir rone jaise koi baat bhi to nahi !!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

OHDE VAALA AADNI SACH MEIN AADMI NA HO KAR US OHDE KA PARYAAY BAN KAR JEENA CHAAHTA HAI .... US SATTA, US MAD KA UPBHOG KARNA CHAAHTA HAI .... JO USE US OHDE SE MILTI HAI ....

BAHOOT HI KHARI, KORI AUR SACHEE BAAT BINA KISI LAGAAV LAPET KE LIKNA AAPKI KGOOBI HAI AMITAABH JI .... AUR IS KHOOBI KE HUM DIWAANE HAIN ....

शरद कोकास ने कहा…

आपका यह "आदमीनामा " अच्छा लगा नज़ीर अकबराबादी की आदमी पर लिखी नज़्म कहीं मिले तो पढॆ । हबीब तनवीर ने आगरा बाज़ार मे उसका इस्तेमाल किया था । शायद आपके यहाँ हो ।

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

सांप तो बेजहर मिलता है
ओहदे से बेअसर फरिश्‍ता है
वो धरती पर कहां मिलता है?

sudhir ने कहा…

वो पहले मजूर थे , अब हजुर हो गए !
कभी थे चने के झाड़ , अब खजूर हो गए !
वाकई आदमी से आदमियत खल्लास.... हो गई !
रचना के लिए साधुवाद !

शोभना चौरे ने कहा…

abhi to nishbd hoo is ohde vale aadmi ki is pribhsha par .

BrijmohanShrivastava ने कहा…

अहम और दम्भ का चमकता हीरा ,ग्रीन चिन्हित पैकेट ।प्रारब्ध के अनुसार ही पाता है ""जिसका जितना आंचल था उतनी ही सौगात मिली ""ओहदे पर बैठ कर आदमी बने रहना कठिन है । ""प्रभुता पाहि काहि मद नाही ""और उसका भी एक कारण है पद मिलते ही लोगों का व्यवहार बदल जाता है उसका भी प्रभाव पड्ता है ""करमनास जलु सुरसरि परई/ तेहि को कहउ सीस नहि धरई ""ओहदे वाले ये क्योनही सोचते _जब कलयुग ने राजा के मुकुट मे प्रवेश किया था तभी बुध्धि भ्रमित हो गई थी । पद पैसा यह एक नशा है ,स्वर्ण की तुलना कवियों ने धतूरे से की है ""कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय/ ये खाये बौरात है ,वो पाये बौरात । आपकी रचना बहुत अच्छी लगी

Babli ने कहा…

वाह वाह क्या बात है! बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रचना लिखा है!

सुलभ सतरंगी ने कहा…

सही बखान किया है आपने.
धन्यवाद आपका.

अल्पना वर्मा ने कहा…

आप की कवितायेँ गूढ़ भाव और अर्थ लिए होती हैं,यह मैं पहले भी कह चुकी हूँ-
-इस बार कविता को समझने में थोडा दिमाग लगाना पडा.लेकिन टिप्पणियां पढ़ कर बहुत अच्छे से समझ आ गयी.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

इसीलिये यह कहना
कि
ओहदे पर बैठना
और 'आदमी' बने रहना
कठिन है।
जैसे
सांप का बगैर ज़हर के होना।

भाई, ये तो गज़ब की सच्चाई बयाँ कर दी.
इसलिए तो हम भी कभी कभी ओहदे से घबरा जाते हैं,
क्योंकि इस सिस्टम में ओहदे पर बैठ आदमी बने रहना बड़ा कठिन है.

अम्बरीश अम्बुज ने कहा…

waah.. kya chot ki hai.. bahut khoob..