शनिवार, 6 मार्च 2010

फिर दिल की नहीं, दिशा की जरूरत है

हॉकी का विश्वकप चल रहा है और भारत अपने तीन मैचों में सिर्फ एक पाकिस्तान से जीता है बाकी के ऑस्ट्रेलिया और स्पेन से बुरी तरह हारा। यानी उसके सेमीफाइनल के रास्ते अब कठिन हो चुके हैं। आज उसका इंग्लैंड के साथ मुकाबला है। इधर हीरो होंडा के विज्ञापन में दिखाया गया है कि फिर दिल दो हॉकी को....। कैसे? हीरो होंडा खरीद कर या हॉकी के लिये नया दिमाग देकर? खैर। भारतीय हॉकी जिस परम्परागत शैली में खेली जाती है उसे बदलने की जरूरत है। बदलाव की इस दरकार को समझकर प्रयत्न भी हुए किंतु सबसे बडी समस्या हमारी जलवायु की है। गरम देश में स्टेमिना को बरकरार रख पाना थोडा कठिन हो जाता है। फिटनेस भी इसीके चलते अपना अहम रोल निभाती है। लगातार तेज़ हॉकी खेलते रहना सम्भव नहीं हो पाता। किंतु यह सब कारण बहाने की लिस्ट में रखे जा सकते हैं। हां, भारतीय हॉकी संघ और खिलाडियों में मानसिक बिखराव भी अहम भूमिका निभाता है। हॉकी को लेकर गम्भीर चिंतन, समाधान, आर्थिक सहयोग आदि जैसे तमाम प्रयत्न किये जाते रहे हैं, बावजूद हम इसमे सुधार नहीं कर पाये। यही हाल पाकिस्तानी हॉकी का भी है। उसकी शैली भी ठीक हमारी शैली से मिलती जुलती है किंतु पाकिस्तान में जीतने की जिजीविशा हमसे ज्यादा है और यही कारण है कि उसकी हॉकी मरी नहीं है। भारतीय हॉकी से अपेक्षायें कुछ ज्यादा कर ली जाती है, वैसे पिछले डेढ दशक से जिस गति से उसका पतन हुआ है उससे अपेक्षायें जैसी बात बहुत हद तक कम हो चुकी है। किंतु फिर भी हॉकी को फिर से दिल देने की जरूरत नहीं है क्योंकि वो हमारा दिल है ही। हां, लगातार पराजय किसी भी खेल से ध्यान भंग करा देती है, बस हॉकी के साथ भी यही हो रहा है। हॉकी महासंघ विवादों में रहता है। उसकी अपनी राजनीति है। इस तथ्य को थोडी देर के लिये भूल जाइये क्योंकि मैं उस कारण की ओर ध्यान खींचना चाहता हूं जो आज की हॉकी के लिये बेहद जरूरी है। हॉकी के ख्यातिनाम खिलाडी धनराज पिल्लै मेरे मित्र हैं। उनसे भी कई बार इस मुद्दे पर चर्चा हुई है। विवाद अपनी जगह है, मुद्दे अपनी जगह है जिस पर धनराज ने भी कईबार अपनी राय व्यक्त की है, ऐसे और भी कई हॉकी के खिलाडी हैं जिन्होंने हॉकी की रजनीति को अव्वल कारण बताया है किंतु फिर भी इसे मैं फिलहाल परे रखूंगा क्योंकि मैं मानता हूं कि उससे ज्यादा जरूरी है हमारी खेल शैली में बदलाव की। धनराज भी मानते हैं कि 'यूरोपीय शैली आज के दौर में हमारी परम्परागत शैली को पीछे छोड चुकी है। किंतु उनका मानना यह भी कि इसके बावजूद हम बेहतर खेल सकते हैं और जीत सकते हैं। अगर सूझबूझ के साथ खेलें तो।' मैने पूछा भी था कि क्या सूझबूझ नहीं होती? उन्होने कहा था कि होती तो है मगर हम विरोधी टीम की रणनीति में उलझकर रह जाते हैं। और उसे भंग करने के चक्कर में कईबार खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते। खैर यह पहलू तो है ही, इसके साथ ही साथ मेरा सोचना है या यूं कहूं हॉकी के सन्दर्भ में बारिकी से जानना है कि हमारी हार के पीछे सबसे बडा कारण है जीतने की जिद का न होना। साथ ही यूरोपीय शैली को समझने के बावजूद उसका तोड न ढूंढ पाना। तोड के लिये या तो आप भी उतने ही तेज़ हों या तकनीकी रूप से आप पूरे 70 मिनिट तक ढीले न पडें। हमारी टीम की स्वभावगत कमजोरी है कि हम विरोधी टीम पर या तो दबाव नहीं बना पाते या फिर यदि बनाते भी हैं तो उसे कायम नहीं रख पाते। उल्टे खुद बहुत जल्दी दबाव में आ जाते हैं। आज भी फिनिशिंग नहीं है। ट्रेपिंग नहीं है। साझापन नहीं है और रणनीति को साधे नहीं रख पाते। या बीच खेल में अपनी रणनीति को बदल नहीं पाते। खिलाडियों में आपस में कोई समझदारी दिखती ही नहीं जो विरोधी टीम को धोखे में रख सके। न तो हमारे पास लम्बे शॉट्स हैं, न स्कूप को रोकने की सधी कला, न ही पेनल्टी कार्नर को गोल में बदलने की धारधार क्षमता। और जब विरोधी टीम की डी में हम घुसते हैं तो बिखर जाते हैं। वहां इतनी हडबडाहट होती है कि गेन्द को अपनी हॉकी से चिपकाये भी नहीं रख पाते। ऑस्ट्रेलिया से मैच की बात हो या स्पेन से, हम यदि हारे तो हमारी परम्परागत गलतियों की वज़ह से। हां हमारी रक्षापंक्ति हमेशा मजबूत रही है यह कहा जा सकता है किंतु उसकी मजबूती बनी रहे इसके लिये हमारे फारवर्ड खिलाडियों को और ज्यादा मेहनत करनी जरूरी हो जाती है। वैसे भी आज की हॉकी, उसके नियमों में भारी बदलाव हैं और जिसमें अब किसी भी खिलाडी की कोई फिक्स जगह नहीं रह गई है, यह वजह भी है कि हम अभी तक इन नियमों में पारंगत नहीं हो पायें हैं। दूसरी बात जो सबसे प्रमुख है कि यूरोप में हॉकी फुटबाल की रणनीति की तरह खेली जाने लगी है। इसका उदाहरण स्पेन के साथ हुए मुकाबले में देखा जा सकता था। कौनसा खिलाडी कहां से कब निकल कर गेन्द पर झपटता है या कौन किसे कब गेन्द पास कर रहा है यह दौडते रहते खिलाडियों में सूझबूझ का कमाल है जो हम नहीं समझ पाते, यही वजह है कि विरोधी टीमे हम पर अक्सर फिल्ड गोल दागती रहती हैं। कुलमिलाकर भारतीय हॉकी को अभी सुधरने में काफी वक्त लगेगा, और यह भी तब होगा जब हॉकी संघ की राजनीति अहम, स्वार्थ, कमाई की लडाई से बाहर निकल जाये। फिर चाहे कोच बदल लें, देशी-विदेशी कोच रख लें, खिलाडियों को बाहर कर दें, नये खिलाडी ले आयें, कोई फर्क़ नहीं पडने वाला। इस तरह के तमाम दोषों पर जब तक गम्भीर नहीं होंगे तब तक हम विश्व विजेता बनने के सपने देखना छोड ही दें तो अच्छा है। हम जानते हैं कि इस राजनीति ने कई बेहतरीन खिलाडियों के करियर को खा लिया है। जिसमें धनराज जैसे ताज़ा उदाहरण सामने हैं। और यही कारण रहा कि भारतीय हॉकी आज अपने ही अस्तित्व को तलाशने में जुटी हुई है। सो मुद्दे की बात यह है कि हॉकी को दिल नहीं दिशा देने की जरूरत है। आप भी कुछ सोचते होंगे? सो लिख डालिये ताकि हमारी हॉकी के लिये कुछ बेहतर हो सके। क्योंकि यह तय है कि मैं समय समय पर तमाम बातों को लेकर हॉकी की जड में सम्पादित करने की किसी भी तरह की कोशिश करता ही रहता हूं।

9 टिप्‍पणियां:

anitakumar ने कहा…

बात तो आप सही कह रहे हैं राजनीति ने हॉकी को खा लिया,पर क्या ऐसा ही क्रिकेट के साथ नहीं हुआ था क्या? हमें तो लगता है कि जहां एक तरफ़ राजनीति को दूर रखना एकदम अनिवार्य है वहीं खिलाड़ियों के प्रशिक्षण में पर्याप्त पैसा खर्च करना और उन्हें शारिरीक और मानसिक रूप से तैयार करना बहुत जरूरी है। आप ने सही कहा, जीतने की ललक होना बहुत जरूरी है। हम भारतीय तो ये कहने में बहुत तेज है 'मैं क्या करूं" उस से बाहर निकलना होगा।

Udan Tashtari ने कहा…

सही कह रहे हैं आप!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

अमिताभ जी, क्रिकेट के अलावा जैसे कोई खेल बचा ही न हो. सारा दारोमदार इसी पर है.
दूसरे खेलों की चर्चा तब ज़रूर हो जाती है, जब कोई खिलाड़ी पदक जीत ले.
सम सामायिक लेख...हाकी समेत सभी खेलों को समान रूप से प्रोत्साहन दिये जाने की आवश्यक्ता है.

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लगा! आपने बड़े ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! बिल्कुल सही फ़रमाया है आपने!

शरद कोकास ने कहा…

यह बात तो तय है कि राजनीति के अलावा इस बाज़ारवाद ने भी हॉकी का नुकसान किया है । क्रिकेट जैसे मुनाफे का धन्धा हो गया है अगर हॉकी भी हो जाती तो इसके दिन फिर जाते । रही हमारे देश मे हॉकी की स्थिति तो इसके लिये गहन चिंतन व योजना की आवश्यकता है ।

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

एकदम सही कह रहे आप हाकी की दुर्दशा पर। वैसे लगता है जब सबका ध्यान एक ही खेल पर हो तो बाकी खेलों का यही हाल होता है। वैसे अगर कुछ निस्वार्थ प्रयास हो तो हाकी के दिन भी आ सकते है। काश कि हाकी भी ........।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सही लिखा है अमिताभ जी .. राजनीति, पैसा इन सब के चलते राष्ट्रीय खेल का जो मज़ाक आज हमारे देश में हो रहा है इसका उधारण कम ही देखने को मिलता है .... करोरो लोगों के देश में आज इस खेल और इसके खिलाड़ियों की दुर्दशा पर रोना आता है ....

अल्पना वर्मा ने कहा…

आप ने जो लिखा है उस से सहमत हूँ ..बस अपनी तरफ़ से यही जोड़ना चाहती हूँ की खेलों में प्रतिभा को सम्मान और स्थान मिले ..खिलाड़ियों के चुनाव निष्पक्ष हों.
विश्व प्रतियोगिता में भारत को प्रथम स्थान मिले यही शुभकामनाएँ कर सकते हैं.

अपूर्व ने कहा…

एक बहुत विचारणीय पोस्ट..हाकी को जहाँ राजनीति और सरकारी रवैये ने तो बेहद नुकसान पहुचाया ही है..अस्ट्रोटर्फ़ की जूनियर लेवल पर दुर्लभता और स्टाइल पर पावर को वरीयता भी हाकी की उपेक्षा की वजह बनी है..हालाँकि एक सवाल यह है कि इतने मँहगे और यूरोपियन शैली के विशेषज्ञ कोच को अनुबंधित करने के बावजूद रणनीति अभी भी टीम की कमजोरी क्यों है?