रविवार, 21 मार्च 2010

उथले हैं वे जो कहते हैं


किसी भी साहित्यिक रचना या रचना संग्रह को इमानदारी से पढने वाला पाठक अगर मिल जाता है और वो उस रचना पर अपनी राय भी व्यक्त कर देता है तो यह सोने पे सुहागा हो जाता है। उस संग्रह को फिर किसी दूजे पुरस्कार आदि की आवश्यकता ही नहीं होती। मेरे पूज्य पिताजी डॉ. जे पी श्रीवास्तव के काव्य खंड " रागाकाश" के प्रकाशन के लिये जब इस पर मैं वर्क कर रहा था तो कई सारी कठिनाइयां आ रही थीं। पहली तो यही थी कि मैं बगैर पिताजी की आज्ञा के उनकी धरोहर को छापना चाह रहा था। उनकी अपने दौर में लिखी गई कई सारी रचनायें, जिसमें कइयों के कागज़ भी पुराने होकर फटने लगे थे को सहेज कर मुम्बई तो ले आया था अब बस पिताजी की आज्ञा की देर थी। पहले जब उनका साहित्ययुग पूरे उफान पर था, देश-विदेश के बडे से बडे साहित्यकार आदि से मेल मिलाप था, तब परिवारिक परिस्तिथियों ने उनके किसी भी तरह के प्रकाशन सम्बन्धित कार्य को नहीं होने दिया। और जब परिस्थितयां सुधरी तो काफी देर हो चुकी थी, पूरा का पूरा युग मानों बदल गया था, फिर भी उनका लेखन सतत जारी रहा, आज भी पठन-पाठन वैसा ही है जैसा पहले था किंतु लेखन अब ज्यादा नहीं होता। इस दौर में किसी प्रकाशन के प्रति भी उनका रुख उदासीन रहा। फिर भी मेरा प्रयास जारी था, उधर मेरे बडे भाई ने ढांढस बन्धाया कि अभी काम पे लग जाओ बाद में अपनी मंशा पिताजी को बतायेंगे, कुछ हो न हो कम से कम रचनायें व्यवस्थित तो हो जायेंगी। हमारे लिये यही जरूरी था। सो टाइप और इसकी साज सज्जा मैने अपने कमप्युटर पर दिन रात बैठ कर तैयार कर ली। अब? यदि पुस्तक का रूप देना है तो खास समस्या थी प्रकाशक की। दरअसल मेरे पास एक साहित्यक निधि थी, साहित्य के रसिकों के लिये बेहद उपयुक्त व विशुद्ध धरोहर थी सो चाहता था कि अच्छा प्रकाशक मिले। किंतु इस 'बाज़ार' में प्रकाशकों की शर्तों व आनाकानी का जो सीधा अनुभव मैने किया वो संस्मरण योग्य है। खैर..अगर बेहतर सामग्री हो तो उसे बेहतर कलेवर देना ही आवश्यक होता है जिसमे मैं कोई समझौता नहीं करना चाहता था। लिहाज़ा एक प्रकाशक की भूमिका अख्तियातर करने की मानसिकता लिये मैं छापाखानों पर भटकने लगा। कई जगह अलग अलग लागत निकालता रहा और अंत में तय किया कि अब हो न हो अपना प्रकाशन शुरू कर इस दस्तावेज को पुस्तकाकार देना ही है। चाहे जितना पैसा लगे। सो पुस्तक छपने डाल दी। अब सामने था पिताजी को बताना और बाद में विमोचन या लोकार्पण ताकि साहित्य को उसका पूरा पूरा सम्मान मिल सके। कहते हैं न यदि आप अपने कार्य के प्रति इमानदार हों और वो सदमार्गीय हो तो ईश्वर रास्ते निकालते जाता है। रास्ते निकले। पिताजी माने। बडे भाई की मेहनत रंग लाई। फिर तो बाद में आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जी जैसे महान साहित्यकार की अद्वितीय कलम ने 'पुरोवाक' लिखा। "रागाकाश" छपकर आई। विमोचन भी बडे साहित्यकारों की संगत में हुआ। समीक्षायें हुई। किसी ने कहा कि ऐन समारोह पर किताब को डिसकाउंट में बेचा जा सकता है। काफी बिक सकती है। किंतु पिताजी ने साफ इंकार कर दिया। हम भाई भी इस मूड में नहीं थे कि किताब बेचें। साहित्यकार, इसके रसिक परिचितों, मित्रों के साथ साथ देश की कई पत्रिकाओं-समाचार पत्रों में 'रागाकाश' प्रेषित की गई। कुछ ने समीक्षा की, कुछ पचा गये। परिचितों, मित्रो आदि में से किसने कितना लाभ लिया यह उनका अनुभव होगा। किंतु जिस प्रयास की शुरुआत मैने की थी वो 2008 के अप्रैल महीने में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। किताब के बारे में राय आती रही यानी उसकी सार्थकता सिद्ध होती रही। यह नहीं पता था, और न ही इसका कोई प्रयास था कि किसी प्रकार के पुरस्कार के लिये कोई अतिरिक्त उपक्रम किया जाये। वैसे भी पिताजी को पुरस्कार आदि का कभी मोह नहीं रहा, और मैने भी ज्यादा यही सोचा कि 'रागाकाश" पठनप्रेमियों तक ज्यादा से ज्यादा पहुंचे। लिहाज़ा सम्मान या पुरस्कार आदि के सन्दर्भ में कभी हमने सोचा ही नहीं था। पिताजी का मानना रहा है कि- होई वही जो राम रची राखा। सो दो वर्ष बीत जाने के बाद अचानक अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जयपुर राजस्थान की ओर से स्व.सेठ घनश्यामदास बंसल स्मृति 2009-10 का पुरस्कार काव्य संग्रह " रागाकाश" को प्राप्त हुआ है, कि खबर डाक द्वारा आई। श्री नरेन्द्र शर्मा, डॉ. आनंद मंगल वाजपेयी, डॉ. त्रिभुवन राय और डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के सूक्ष्म परिक्षण के बाद तय हुआ रागाकाश को पुरस्कृत करना। इस पुरस्कार से और कुछ हो न हो किंतु यह जरूर ज्ञात होता है कि आज भी बेहतर साहित्य को पूछने-परखने वाले लोग हैं और यथासम्भव उनकी वजह से ही भारत में साहित्य जिन्दा है। क्योंकि साहित्य के जिन्दा रहने के लिये सुधी पाठकों की आवश्यकता होती है। बहरहाल, यह भी एक अनुभव रहा था मेरा जिसने सिखाया कि कार्य इमानदारी से करो, प्रतिफल जो भी हो जैसा भी हो, अच्छा ही होता है। इसी सम्बल से फिलवक़्त उनके एक निबन्ध संग्रह के कार्य में भी रत हूं। देखता हूं कब वो पुस्तक का आकार लेता है? अच्छे प्रकाशक की तलाश तब भी रहेगी ही। और न मिलेगा तो अपना दम है ही।
अब 'रागाकाश' के दूसरे खंड 'रागानुगा" की एक छोटी रचना भी चलते चलते आपको नज़र करता हूं, यह मुझे बहुत पसन्द है, शायद आपको भी पसन्द आयेगी-

" उथले हैं वे जो कहते हैं
वर्ना दुख तो सब सहते हैं
किसको है मिल गया किनारा
सब धारा ही में बहते हैं।

सूखेगा जो हरा बना है
टूटेगा जो अभी तना है
कोई काम नहीं आता है
बडबोलापन यहां मना है।

सृष्टि किसी की नहीं, यहां सब
नश्वर है, टिकता है क्या कब?
जाने किसके हाथ डोर है
दिखा रहा प्रतिक्षण नव करतब।

हार-हार कर हार न मानी
मृत्यु वरण करने की ठानी
ऐसे पुरुषार्थी भी डूबे
डूबे पीर, औलिया, ज्ञानी।

काल अजय है, अजय विधाता
माया है सब रिश्ता-नाता
धीरे-जल्दी, हंसके-रोके
आया है जो, निश्चित जाता॥"

18 टिप्‍पणियां:

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

सूखेगा जो हरा बना है..टूटेगा जो अभी तना है
कोई काम नहीं आता है...बडबोलापन यहां मना है।
अमिताभ जी,
पूज्य पिता श्री और उनके विचारों की बुलंदी को सलाम.

शरद कोकास ने कहा…

अमिताभ प्रकाशन की दुनिया की राजनीति जो है सो है लेकिन आपका यह विशाव्स कि अच्छे साहित्य के कद्रदन अभी है यही लेखकों का सम्बल है । पिताजी जैसे लेखक जिन्होने निस्वार्थ भावना से ऐसे साहित्य का सृजन किया वे हमारे लिये पूजनीय है और यह हमारा कर्तव्य है कि हम उनके द्वारा रचित साहित्य को प्रकाश मे लाये । पुरखों के ऋण से उऋण होने का एकमात्र यही उपाय है ।

शरद कोकास ने कहा…

उथले हैं वे जो कहते हैं
वर्ना दुख तो सब सहते हैं
किसको है मिल गया किनारा
सब धारा ही में बहते हैं।
इन पंक्तियों मे जो जीवन दर्शन है वह मनुष्य के विश्वास का दर्शन है । यह चरित्र की और स्वभाव की गहराई के ओर संकेत करता है । और अंतिम दो पंक्तियाँ उस यथार्थ का बयान करती हैं जिसे कोई कोई ही इस जन्म मे समझ पाता है , किनारा भी उसे ही मिलता है जो यह सत्य समझ जाता है । मुझे विश्वास है इस संग्रह की सभी रचनाये सुन्दर होंगी डॉ. श्रीवास्तव को मेरा प्रणाम ।

Udan Tashtari ने कहा…

पिता जी को नमन!


हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

अनेक शुभकामनाएँ.

kshama ने कहा…

काल अजय है, अजय विधाता
माया है सब रिश्ता-नाता
धीरे-जल्दी, हंसके-रोके
आया है जो, निश्चित जाता॥"
Pitaji ko shat shat naman..."Ragakaash" mujhe kiseene bhent dee...kuchh bhi kahneke liye alfaaz ki mohtaji hai..

रचना दीक्षित ने कहा…

अमिताभ जी सबसे पहले पिता जी को चरण स्पर्श, इतनी अच्छी पोस्ट के लिए आपका आभार. अभी सिर्फ ऊपर का कुछ भाग व कविता पढ़ी.मेरा भाषा से कभी कोई करीबी रिश्ता नहीं रहा.फिर भी कुछ कुछ समझ लेती हूँ मुझे तो ऐसा लगा जैसे कविता की एक एक पंक्ति अपने आप में एक दर्शनशास्त्र समेटे हुए है.पूरी पोस्ट तो कल ही पढ़ पाऊँगी.
रचना

Babli ने कहा…

सर्वप्रथम पिताजी को मेरा शत शत नमन ! आपने बहुत ही सुन्दरता से हर एक शब्द लिखा है! मैंने सिर्फ़ एक बार नहीं बल्कि चार बार आपका पोस्ट पढ़ा जो प्रशंग्सनीय है! रचना बहुत ही सुन्दर लगा! आपकी लेखनी को सलाम! इस उम्दा पोस्ट के लिए बधाई!

विनय प्रजापति ने कहा…

आपको और आपके पिता जी कोमेरा नमस्कार!

shikha varshney ने कहा…

अमिताभ जी,
पूज्य पिता श्री और उनके विचारों की बुलंदी को सलाम

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

अमिताभ जी जब पता चला था कि बाबू जी के लेखन को सम्मानित किया गया है तो बहुत खुशी हुई थी। यह सच है कि अच्छा लेखन एक दिन अवश्य अपना रंग दिखाता है। और जिन परेशानियों का आपने जिक्र किया उनसे साक्षात कभी सामना नही हुआ पर सिंधु सर से बहुत बार इन प्रकाशकों के बहुत किस्से सुने है। और कितने पापड बेले उन्होने अपनी किताबें छ्पवाने के लिए। खैर एक बार लेखन किताब का रुप ले ले तो पाठक तो वह ढूढ ही लेता है। यह मैंने देखा है। आप बाबू जी की निंबध की किताब को भी छपवाईए। और हाँ इस बार किसी प्रकाशक से छपवाना। बाबू जी की ये वाली रचना भी सुन्दर है। एक बार फिर से पढ ली। और हाँ बाबू जी को मेरी तरफ से चरण स्पर्श कहना।

शोभना चौरे ने कहा…

अमिताभजी
सर्वप्रथम बाबूजी को कोटि कोटि प्रणाम |खुशबू कभी छुप नहीं सकती वह सर्वत्र बिखर ही जाती है वैसे ही पिताजी कि अमूल्य रचनाओ ने अपना सफर तय कर अपनी उडान भर ही ली |
आपकी मेहनत को सफलता मिली |
पिताजी कि पुस्तक के "रागापरा "कि इन पंक्तियों ने सारे आज के सारे समाज को उसकी मानसिकता को किस सच्चाई के साथ लिख दिया है मानो अब इसके आगे कुछ है ही नहीं ?
सबने सोचना छोड़ दिया है
खरीदना -बेचना शुरू कर दिया है |
"रागाकाश "कि सफलता के लिए पूरे परिवार को बधाई और पूज्य पिताजी को सादर प्रणाम |

अल्पना वर्मा ने कहा…

poora nahin padh paa rahi hun abhi...Dobara aa kar tippani dungee...

manu ने कहा…

अक्सर किसी किताब को मिले पुरूस्कार कि बात पढ़ते, सुनते हैं तो कुछ ख़ास नहीं लगता..
इसके एकदम उलट अंकल ( अंकल कह सकते हैं ना...? ) की रागाकाश को पुरूस्कार मिलने की बात पढ़कर जो सुख हासिल हुआ है..कह नहीं सकते..
कारण शायद ...'' यह नहीं पता था, और न ही इसका कोई प्रयास था कि किसी प्रकार के पुरस्कार के लिये कोई अतिरिक्त उपक्रम किया जाये।'' यही है..


अब एक मेहरबानी और कीजिएगा...

दिल्ली में ''रागाकाश'' कहाँ मिल सकती है..
इसके बारे में सूचित कीजिएगा....

किसको है मिल गया किनारा
सब धारा ही में बहते हैं।...............

बहुत सटीक...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सृष्टि किसी की नहीं, यहां सब
नश्वर है, टिकता है क्या कब?
जाने किसके हाथ डोर है
दिखा रहा प्रतिक्षण नव करतब ...

अमिताभ जी ... पिता जी के गूड़ दर्शन को आपने लिपिबध कर के सब पर बड़ा उपकार किया है .... एक पुत्र के नाते और एक पत्रकार साहित्यकार होने के नाते भी आपने इस भागीरथी प्रयास को सफल किया .... ये आपकी सबसे बड़ी पूंजी है ...
बहुत बहुत बधाई आपको और पिताजी को .... सम्मान तो बस कवि की कल्पना को समझने का मात्र अंश है ..... उनका आभार मानने का एक साधन है ... कल ही वापस दुबई आया हूँ ... ये सुखद समाचार पढ़ कर बहुत अच्छा लग रहा है ...

अल्पना वर्मा ने कहा…

पिताजी की पुस्तक प्रकाशन में आप की भाग दौड़ / मेहनत सब अब जा कर पूरी सफल हुई .बहुत बहुत बधाई .
आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जी जैसे महान साहित्यकार की अद्वितीय कलम ने 'पुरोवाक' लिखा था ."रागाकाश" के विमोचन में बडे साहित्यकारों आये और समीक्षायें हुई थीं और अब २ साल बाद
'स्व.सेठ घनश्यामदास बंसल स्मृति 2009-10 का पुरस्कार' मिल रहा है..जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई.
सच कहते हैं आप कि बेहतर साहित्य को पूछने-परखने वाले लोग अभी भी हैं.
और यह जो कविता बेहद गहन भाव लिए है.पसंद आई.
आप के पिताजी का निबंध संग्रह भी ऐसी ही सफलताएँ पाए ऐसी शुभकामनाएं हैं.
पुस्तक का कवर /रंग संयोजन बहुत ही सुन्दर है.आप की ही पसंद होगा?
-----------------

[हाँ,प्रकाशकों की शर्तों /आनाकानी वाला संस्मरण भी कभी बाँटिये !.]

अपूर्व ने कहा…

ब्लॉग जगत के कई फ़ायदे सामने आते हैं..वरना ऐसी कृतियाँ सहज उपलब्ध कहाँ हैं.और हम वही पढ़ पाते हैं जो प्रकाशक, सम्पादक हमें पढ़ाना चाहते हैं..

हार-हार कर हार न मानी
मृत्यु वरण करने की ठानी
ऐसे पुरुषार्थी भी डूबे
डूबे पीर, औलिया, ज्ञानी।

यह डूबना ही तो पार उतरना होता है..मैं बपुरा बूड़न डरा रहा किनारे बैठ!

Sanjeet Tripathi ने कहा…

naman unhe!

aapne prakashan jagat ki jis rajniti ki or jo dhyaan kheencha hai use aur aage badhaane ki jarurat hai, kynki yah rajniti aaj mahaj naamo ko behcti hai, kaam ko nahi...

RashmiVyas ने कहा…

सर को चरण स्पर्श ,रचना के बारे में हम अकिंचन कोई राय व्यक्त करनेकी ध्रष्टता कैसे करें किन्तु सराहे बिना भी कैसे रहें ?सच्ची मुच्ची बहुत ही अच्छी लगी .सम्पूर्ण पुस्तक पढने का सौभाग्य भी कभी मिलेगा ,ऐसी आशा है .