शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

जो प्रेम की हो ली, वो है होली

रुकिये.....इतना बडा आलेख देख कर भागिये मत। सच पूछिये तो आनंद आयेगा। होली के पर्व पर इस तरह के आनंद को पाने की भी चेष्ठा होती है, तभी आप मेरे ब्लोग पर आये हैं। पूरा पढने का साहस करें, पसन्द आयेगा। तब तक मैं आपके और अन्य ब्लोग से होकर आता हूं।


-आनंद में डूबना, उसमे सराबोर होना, उसमें समाहित होना मनुष्य की प्रकृति है। आनन्द के लिये ही मानवजीवन के समस्त कर्म है। वो इसका प्यासा है। प्रकृति आनंद से परिपूर्ण है। वह मनमोहक है, उसमे रूप, रंग, गुण, गन्ध, स्वर, रस है। यानी समग्र प्रकृति में सौन्दर्य रचा बसा है। वह नियम से बन्धी है। उसका कर्म लय से जुडा है। राग स्वतंत्र है। और जितनी भी दैवीय शक्तियां हैं वे सारी इसी नियम के अंतर्गत भ्रमण करती है। प्रकृति का संविधान ऋत कहा जाता है। ऋग्वेदिक ऋषियों द्वारा निर्मित प्रकृति इसी संविधान का अनुगमन करती है। ग्रीष्म, वर्षा, शिशिर, हेमंत, पतझड, बसंत इसी ऋत के ऋतुरूप होते हैं। इसमे बसंत प्रकृति का यौवनकाल है, तरुणाई उमंग का उत्थान है। प्रकृति अपना सबकुछ बसंत पर न्योछावर कर देती है। मानो नववधु पहली बार अपने प्रियतम से मिलन को ललचा रही हो। वो उसे पाकर नवजीवन सा अहसास पाती है। खिल उठती है। खिलखिला उठती है। अल्हडपन, मस्ती, दीवानगी यानी यौवन का चरम होली है। बसंत ऋतु का उल्लासशिखर होली है। जम्बुद्विप भरतखंड का उत्साह, उल्लास, और उमंग़ होली है। मस्तक पर चन्दन का टीका हो, गाल गुलाल से लाल हों, नृत्य में झूमते, गाते लोग हों, टोलियां हों, हंसी-ठिठोली हो..यही होली है। जीवन का उत्साह ही होली है।
हिन्दू धर्म व्यापक है। सनातन है। यहां जीवन को पूजा जाता है। जीवन का पर्व मनाया जाता है। यहां राम आगमन की दीवाली होती है तो कृष्ण की बांसुरी से निकले स्वर हृदयों में प्रेम घोल देते हैं, रास रचता है, रंग बिखरते हैं। जन-मन सब एक हो जाते हैं। द्वेत भाव नहीं दिखता, अद्वेत हो जाता है प्रकृति का कण-कण। यही होली है। ढेर सारे रंगों का मिलना और एक होकर उल्लास का नृत्य ही होली है। राधा-कान्हा का रास, अमीर-गरीब की गलबहियां। धरती-आकाश की प्रीति, वाकदेवी के सातों सुर झृंकत हो उठते हैं और शिव भी सुधबुध खो कर इस मस्ती में डूब जाते हैं। वात्सायन के कामसूत्र (1.4.42) में बसंत का यही उल्लास क्रीडा पर्व है। भारतवर्ष का महानतम प्रेमपर्व। मानों आकाश के तमाम देवी-देवता धरती पर उतरकर रंगों से खेल रहे हों। बैरभाव कहीं लुप्त होकर दैत्यों का मन भी ललचा रहे हों इस पावन पर्व पर थिरकने को। यही होली है।
होली को कुछ विद्वानों ने मिस्त्र या यूनान से आयातित बताया है। मिस्त्र में होली जैसा उत्सव था, यूनान में भी था। क्योकि ऐसे देशों से भारत के व्यापारिक सम्बन्ध रहे थे। सत्यकेतु विद्यालंकार के "वैदिक युग" (पृष्ठ- 232) में लिखा है कि वर्तमान ईराक़ और तुर्की राज्य के कुछ क्षेत्रों से प्राप्त भग्नावशेष व पुरातन सभ्यताओं से हमें पता चलता है कि उनके भारत से व्यापारिक सम्बन्ध थे। ऋगवेद (1.25.4) में पक्षियों के उडने वाले आकाश मार्ग और समुद्री नौका मार्ग के उल्लेख हैं। जेमिनी ने होलिका पर्व का उल्लेख (400-200 ईसापूर्व) किया और लिखा कि होलिका सभी आर्यों का उत्सव है। आचार्य हेमाद्री ने (1260-70 ई.) पुराण के उदाहरण से होली की प्रधानता बतलाई है। हज़ारों वर्ष पुरानी होली की परम्परा इसी भरत की भूमि से उपजी। मिस्त्र-यूनान ने नक़ल की। भारतीय दर्शन, साहित्य, संस्कृति कला, गीत, संगीत तथा उत्सवों, पर्वों से सराबोर है। यहीं आनंद की ऊर्जा उफान मारती है। उसका मद रस झलकाता है। प्राणीमात्र में बहकर वो प्रकृति के उच्चतम उत्साह को पाता है और होली स्दृश्य बन जन जन में व्याप्त हो जाती है।
संवेदनशीलता प्रकृतिप्रदत्त है। चार्ल्स डारविन ने ' द ओरिजिनल आफ द स्पेसिस एंड द रिसेन्मेंट' में बताया है कि ' प्राणियों को भावोत्तेजना में आनंद आता है।' आनंद का केन्द्रबिन्दु मानव के भीतर है। इसके उपाय, साधन प्रकृति में हैं। धरती सगन्धा है, पवन गन्ध प्रसारित करती है। मनुष्य में मदन गन्ध है, पुष्पों में सुगन्ध है। सूर्य ऊर्जावान है, ऊषा में सौन्दर्य झलकता है। चंद्रमा शीतल है, सुन्दर है। पूर्णीमा धवल चान्दनी बिखेरती है। प्रकृति के सारे जीव सवेंदित होते हैं। यही होली है। होली में नृत्य है। मगन होने का बोध है। महाप्राण निराला तो मानों अपने शब्दों में प्रक़ृति के इस आनंद के साथ खेलते हैं कि- 'वर्ण गन्ध धर, मधुरन्द भर, तरु-उर की अरुणिमा तरुणतर, खुली रूप-कलियों में पर भर, स्तर-स्तर सपुरिकरा, रंग गई पग-पग धन्य धरा।" निराला ही क्या तुलसी, कालीदास ने भी इस यौवनमयी प्रकृति को अंगीकार करते हुए शब्दचित्र खींचे हैं। तुलसी कहते हैं-" सीतल जागे मनोभव मुएंहु मन वन सुभगता न परे कही, सुगन्ध सुगन्द मारुत मदन अनल सखा सही। विकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकदा, कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपसरा।" कालीदास का कुमारसम्भव तो बसंत के रस-रंग में नहाया हुआ है-" पवन स्वभाव से ही आग भडकाऊ है, बसंत कामदेव के साथ आया है। उसने नई कोपलों के पंख लगाकर आम्र मंजरियों के वाण तैयार किये हैं। आम्र मंजिर खाने से ही नर कोकिल का सुर मीठा हुआ। उसकी कूक पर रूठी नारियां भी रूठना भूल जाती हैं।" यही होली है। रूठना, गिले-शिकवा, बैरभाव जहां प्रेम के रंगों में समाहित हो जायें और एक रंग बन जायें, होली मन जाती है। सांस्कृतिक राष्ट्रभाव की उल्लासधर्मिता या उसकी अभिव्यक्ति ही होली है। और जब इस पर बाज़ारवाद चढ जाता है तो यह पूरी की पूरी स्वच्छंदता पर, संस्कृति पर आक्रमण है। संस्कृति कभी उत्सवों की प्रेरक नहीं रही, किंतु ये बाज़ार अपने उत्सव गढता है। कभी फादर्स डे होता है तो कभी मदर्स। कभी वैलेनटाइन बिकता है तो कभी होली डे। मीडिया से लेकर पूरा बाज़ारतंत्र त्योहारों को बेचने लगता है। दुकानें खुल जाती हैं। उमंग की दुकाने, उत्साह की दुकानें। रंगों की दुकानें। प्रेम की दुकानें। और खरीददारों की भीड उमडती है। माल खरीदा जाता है। उपभोग किया जाता है। और जब उपभोग के बाद माल खत्म तो उत्साह खत्म, उमंग खत्म, प्रेम के गीत खत्म। नाच खत्म। थक हार कर बैठ जाना होता है। गाल पर लगे गुलाल पौछ दिये जाते हैं, रंग नहा धो कर निकाल दिये जाते हैं। फिर से तैयार होकर मनुष्य अपने बाज़ारीकरण में मशगूल हो जाता है। या मज़बूर हो जाता है। अब जब दुकानें सजेंगी तब खरीरदारी होगी। यह होली नहीं। होलिका है जो हमारे देश के पावन पर्वों को बाज़ार की आग में झौंकती है। प्रह्लाद बनिये और इससे बचिये। होली मनाइये। इसकी अल्हडता, प्रकृति की चरम बसंतोंपूर्ण मादकता का रसभोग लेने और इसके प्रेम, दुलारमयी भांग के नशे में 12 मास रहने के लिये बस प्यार करें। भारत की महान संस्कृति, सभ्यता का रसपान करें। होली खेलें। प्रेम, भक्ति, गीत, नृत्य, सेवा, समर्पण को पूजा मान गलमिलौवल करें।
ऐसी ही सार्थक, जीवंत होली दिवस पर मेरी आत्मीय शुभकामनाये आप सब स्वीकार करें।

22 टिप्‍पणियां:

सचिन .......... ने कहा…

शानदार। ऐतिहासिक तथ्यों की तरफ ध्यान खींचने का शुक्रिया। सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है। शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है। और फिर नजीर अकबराबादी की होली पर कविता को कौन भूल सकता है। शुक्रिया जी।

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

रोचक और सार्थक आलेख।
होली की मंगलकामनायें।

kshama ने कहा…

Waaqayee aanand aa gaya! Holi mubarak ho!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

अमिताभ जी, आदाब
ज्ञानवर्धक पोस्ट.
होली पर हार्दिक शुभकामनाएं.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

भेद भाव को भूलकर , सब मीठी बोलें बोली
जेम्स, जावेद, श्याम और संता , सब मिलकर खेलें होली।

ईद और होली की मुबारक।

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

पहले तो आपने हमें रोका और गुलाल से रंग दिया। और होली के आनंद में डूबो दिया यह कह कर कि " अल्हडपन, मस्ती, दीवानगी यानी यौवन का चरम होली है।" और हम भी दीवानगी में ऐसे आए कि होली का इतिहास जान लिया। सच इससे पहले मैंने नही पढा था होली का इतिहास। बस कभी बचपन में स्कूल की किताब में कहीं कुछ पढा था। और सच कहा आपने कि बाजार बाजारी त्योहार बना लिए है। जिसका आनंद चंद पल बाद ही छूमत्तर हो जाता है......। आपकी ये पोस्ट हमने बुकमार्क कर ली है। और इस बार काफी सालों के बाद इस बार होली मना भी रहे है।

Udan Tashtari ने कहा…

आजकल तो प्रहलाद को भी भस्म कर देने से नहीं चूकते...:)


बढ़िया आलेख...बिना भागे पढ़ लिया.


ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
गले लगा लो यार, चलो हम होली खेलें.


आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

-समीर लाल ’समीर’

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

ऐसी ऐतिहासिक उपयोगी जानकारी जो और कोई नहीं बतलाता। आपको और पूरे परिवार को रंग पर्व की रंगकामनाएं।

RaniVishal ने कहा…

Dhanywad!
Aapko holi ki hardik shubhkaamnaae!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

...होली पर्व का एतिहासिक वर्णन ...प्रभावशाली लेख, बधाई!!!

अल्पना वर्मा ने कहा…

'होली को कुछ विद्वानों ने मिस्त्र या यूनान से आयातित बताया है!!!!!
--पढ़कर आश्चर्य हुआ लेकिन आगे लेख पढ़ा तो samjh आया...होली तो भारत की भूमि की ही है !
**बहुत अच्छी जानकारी मिली .
और अंत में यह संदेश--:

'होलिका है जो हमारे देश के पावन पर्वों को बाज़ार की आग में झौंकती है। प्रह्लाद बनिये और इससे बचिये। होली मनाइये।''
--पसन्द आया.

होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं

Babli ने कहा…

आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

शरद कोकास ने कहा…

होली पर यह शोध अच्छा लगा .. पर्व को जब तक इतिहास बोध के साथ न मनाया जाये उसका आनन्द नही आता । अच्छा आलेख । बधाई ।

ज्योति सिंह ने कहा…

holi ke avasar par vistri jaankaria hame mili yahan ,laazwaab post lagi ,holi ki dhero badhaiyaan

दिगम्बर नासवा ने कहा…

AMITAABH JI ... DUBAARA AAUNGA PADHNE KO ...
ABHI TO AAPKO AUR AAPKE POORE PARIVAAR KO HILI KI BAHUT BAHUT SHUBH-KAAMNAAYEN ..

अपूर्व ने कहा…

वाह आपने तो छुट्टी वाले दिन क्लास-रूम लगा दिया सर जी..गलत बात है यह..अब दक्षिणा तो देनी पड़ेगी..होली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ!!

रचना दीक्षित ने कहा…

होली के अवसर पर ये ज्ञानवर्धक पोस्ट होली का मज़ा ही दोगुना हो गया
आपको व आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें

Ravi Rajbhar ने कहा…

der se hi sahi par dil se hamare taraf se holi ki badhai swikaren...sath ki rochak jankari ke liye bahut-2 sukriya.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आज पूरी तन्मयता से पढ़ा आपको ... सच में बहुत ही अच्छा लिखा है ... होली के इतिहास से आज के बाज़ारवाद तक आए परिवर्तन और होली की मूल भावना को समझाती आपकी पोस्ट सच में होली के रंगों अनुरूप ही है ....

दर्पण साह 'दर्शन' ने कहा…

ग्रीष्म, वर्षा, शिशिर, हेमंत, पतझड, बसंत इसी ऋत के ऋतुरूप होते हैं। इसमे बसंत प्रकृति का यौवनकाल है, तरुणाई उमंग का उत्थान है।

दिन (भर) के आठ पहर भी तो मानव जीवन चक्र कि तरह होते हैं, कहीं पढ़ा था...
"Nature loves symmetry'


यहां राम आगमन की दीवाली होती है तो कृष्ण की बांसुरी से निकले स्वर हृदयों में प्रेम घोल देते हैं, रास रचता है, रंग बिखरते हैं।

बिना किसी पूर्वाग्रह के कहना चाहूँगा इस धर्म में गुड फ्राइडे या चेहल्लुम जैसा कोई दिन नहीं देखा, अच्छा या बुरा है ये पता नहीं.

प्राणियों को भावोत्तेजना में आनंद आता है।
तजरुबा है.
गीता में लिखा गया है कि भावोत्तेजना में यदि नियंत्रण कर लिया जावे तो परम आनंद आता है, तजरुबा नहीं है.

धरती सगन्धा है, पवन गन्ध प्रसारित करती है। मनुष्य में मदन गन्ध है, पुष्पों में सुगन्ध है। सूर्य ऊर्जावान है, ऊषा में सौन्दर्य झलकता है। चंद्रमा शीतल है, सुन्दर है। पूर्णीमा धवल चान्दनी बिखेरती है। प्रकृति के सारे जीव सवेंदित होते हैं। यही होली है। होली में नृत्य है। मगन होने का बोध है। महाप्राण निराला तो मानों अपने शब्दों में प्रक़ृति के इस आनंद के साथ खेलते हैं कि- 'वर्ण गन्ध धर, मधुरन्द भर, तरु-उर की अरुणिमा तरुणतर, खुली रूप-कलियों में पर भर, स्तर-स्तर सपुरिकरा, रंग गई पग-पग धन्य धरा।"
चित्रलेखा में बीजगुप्त ने इसके ठीक उलट बात कही है, उसने प्राकर्तिक चीज़ों को अपूर्ण बताया है. और उसके समर्थन में बड़े अच्छे उद्धरण दिए हैं, आपको पढने के लिए कहूँगा.

आपके लेख को विस्तार देने कि कोशिश की है. बेहतरीन पोस्ट और होली की ढेर सारी शुभकामनाएं.
होली की शुभ कामना सपरिवार मानी जावे.

manu ने कहा…

यहां जीवन को पूजा जाता है। जीवन का पर्व मनाया जाता है।

ये आपने बहुत बड़ी बात कही है..

कहते हैं नशा बुरा ही होता है..
पर जाने क्यूँ...सुना है के भांग के नशे को बहुत पवित्र माना जाता है...

k.r. billore ने कहा…

holi par aapi jankari rochak aour achi lagi kuch alg pahlu janne ko mile .jo hum sabki ho li wahi holi hai .aapko ramnavami ki hardik shubhkamana.........jaisiyaram,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,kamana billore