गुरुवार, 17 सितंबर 2009

पर्वत को छू पाकर बदली बरस गई।

पूरी भरने से पहले ही गगरी छलक गई
बैरिन लट गुंथने के पहले औचक उलझ गई।

माना मूल्य समर्पण का है
यह तन बस अर्पण का है
किंतु देव-पूजन से पहले
सिर का घूंघट क्यों सरका है?

पद-प्रक्षालन से पहले यह कैसी झिझक हुई
चरण पकड कर बैठ गई मैं अन्यमनस्क हुई।

बून्दों के गिरने से पहले
खुली सीप से कुछ तो कह ले
बन्धन से मोती है फिर भी
अच्छी खोटी सीप परख ले।

गिरने से पहले ही क्यों यों चकनाचूर हुई,
दरपण के सम्मोहन में मैं खुद से दूर हुई।

जीवन में बन्धन का स्वर है
मिलन-बन्ध में जीव अमर है
यम की पूजा के पहले ही
ब्रह्माराधन सर्व अजर है।

मिलने से पहले ही बावरी यों मदहोश हुई
जन्मों की उलझी गुत्थी ज्यों पल में सुलझ गई।

आओ तो मैं चांद सितारे
गोदी भर लूं सारे सारे
यही समर्पण बने विसर्जन
अनजानी पहिचान पुकारे।

जैसे सागर की सीमा लख नदिया उमग गई
जैसे पर्वत को छू पाकर बदली बरस गई।

31 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

जैसे सागर की सीमा लख नदिया उमग गई
जैसे पर्वत को छू पाकर बदली बरस गई।

-बहुत बेहतरीन उम्दा भाव!! जबरदस्त अभिव्यक्ति!!

वाणी गीत ने कहा…

जीवन में बंधन का स्वर...समर्पण बने विसर्जन बेहतर भाव..बेहतर अभिव्यक्ति..शुभकामनायें..!!

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

मन का कण कण पावन हो गया
इस अभिव्‍यक्ति का आस्‍वादन करके।

seema gupta ने कहा…

आओ तो मैं चांद सितारे
गोदी भर लूं सारे सारे
यही समर्पण बने विसर्जन
अनजानी पहिचान पुकारे।
" बेहतरीन ......कोमल भावनाएं जैसे अपनी बात कह रही हो सुन्दर अभिव्यक्ति..
regards

raj ने कहा…

आओ तो मैं चांद सितारे
गोदी भर लूं सारे सारे
यही समर्पण बने विसर्जन
अनजानी पहिचान पुकारे।....samparpan hi visarjan bane...ye bhav apne aap me bahut gahre hai.....apki ek behtreen kavita...

Darpan Sah ने कहा…

ikse baare main 4-5 baar padh ke hi tippani kar paaonga !!

abhi to maun hoon bhai !!

is maun ko jo aap samjhe !!

ek taraf apoorv bhai hain ek taraf aap !!

"extremist", "perfectionist".
abhi to kavitqa ki geyta main uljha hoon....
...bhav paksh aur kala paksh ki baat baad main.
haan magar "..........." phir ek maun !!

शोभना चौरे ने कहा…

पद-प्रक्षालन से पहले यह कैसी झिझक हुई
चरण पकड कर बैठ गई मैं अन्यमनस्क हुई।

बहुत सारे सवालो को जन्म दे गई ये पँकतिया |

kintu aage chlkar khud hi jvab dhundhne me safl huai ye panktiya
गिरने से पहले ही क्यों यों चकनाचूर हुई,
दरपण के सम्मोहन में मैं खुद से दूर हुई।
aur jaise jaise kavita aage bdhi usne apne bandhan khol liye aur sahity ki utkrshtta ko pa gai
जीवन में बन्धन का स्वर है
मिलन-बन्ध में जीव अमर है
यम की पूजा के पहले ही
ब्रह्माराधन सर्व अजर है।
aur smrpn kar purnta ko pa gai .
sarvshressht rchna .
badhai aur shubhkamnaye

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...
मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी"में पिरो दिया है।
आप का स्वागत है...

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

बैरिन लट गुंथने के पहले औचक उलझ गई।
wow !!!
what a 'methaphor' !!!
"किंतु देव-पूजन से पहले
सिर का घूंघट क्यों सरका है?"
kuch paane se zayad kuch khone main anand hai ye to pata tha...
...par dene ki itni aturta, ita adhiraj !!
beshak "बैरिन लट गुंथने के पहले औचक उलझ गई।" par kavita guthi hui hai, bhav, geyata aur kala paksh aise ki kisi sukumari ke kesh ke teen hisse aaps main gunth kar kavita-kavita ho gaye honn...
...मैं अन्यमनस्क हुई।
wakai !! main bhi !!
phir aata hoon...
abhi 2,3,4 stanza baaki hai dost !!

अल्पना वर्मा ने कहा…

जीवन में बन्धन का स्वर है
मिलन-बन्ध में जीव अमर है
यम की पूजा के पहले ही
ब्रह्माराधन सर्व अजर है।

-उत्कृष्ट रचना !
आप की जैसी कवितायेँ तो हम लिख भी नहीं सकते..उसकी व्याख्या कैसे कर सकेंगे?

ओम आर्य ने कहा…

आओ तो मैं चांद सितारे
गोदी भर लूं सारे सारे
यही समर्पण बने विसर्जन
अनजानी पहिचान पुकारे।

जैसे सागर की सीमा लख नदिया उमग गई
जैसे पर्वत को छू पाकर बदली बरस गई।

आपके भाव शब्दो के साथ मिलकर सम्मोहन पैदा करते है ........इन पंक्तियो ने मेरे मन को मोह लिया पर पूरी की पूरी कविता अपने आप मे अनुपम है........ऐसे ही लिखते रहे ......और अपनी रचनाओ से सराबोर करते रहे!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

माना मूल्य समर्पण का है
यह तन बस अर्पण का है
किंतु देव-पूजन से पहले
सिर का घूंघट क्यों सरका है?
SATY SE KIYA HAI YE PRASH .... DEVTA KE AAGE BAS SAMARPAN KA HI MOOLY HAI
आओ तो मैं चांद सितारे
गोदी भर लूं सारे सारे
MAN JAB KALPANA MEIN UDAAN BHARTA HAI TO AISA HI HOTA HAI ...

AMITAABH JI ... AAPNE YE GEET BAHOOT HI SAMARPAN KE BHAAV SE LIKHA LAGTA HAI ... TABHI GAGRI BHARNE SE PAHLE CHALAK GAYEE LAGTI HAI ... PREMI MAN TO AISE HI CHALAKTA RAHTA HAI ... BAHOOT HI BHAAVPOORN ABHIVYAKTI HAI ...

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

कुछ अलग ही रंगो के भावों को सुन्दर शब्दों से बुन दिया। पक्तियों में एक लहर से बनी हुई है। जिसको पढते हुए अलग अनुभव हो रहा है। कई भावों को एक ही रचना में लिख दिया। किस एक को उठाऊँ समझ नही आता है। हर एक अपने आप में जुदा है। कुछ शब्द तो वाकई दिल को छू गए और ये शब्द बडे दिनों के बाद पढने को मिले भी। ज्यादा कुछ और नही कह पाऊँगा। सिर........ ।

Apoorv ने कहा…

क्या बात है अमिताभ जी..पता नही था कि शहद मे भी एक खास किस्म का नशा होता है..बार-बार जितना पढ़ता हूँ..उतनी ही प्यास बढ़ती है..
इन पंक्तियों के सौन्दर्य का क्या कहूँ:
बैरिन लट गुंथने के पहले औचक उलझ गई।
यहाँ बैरिन लट का औचक उलझना बस इस पंक्ति मे ऐसा औचक उलझा देता है कि बस...
फिर इस पंक्ति का दर्शन:
बन्धन से मोती है फिर भी
अच्छी खोटी सीप परख ले।
बूंद के अवश्यम्भावी भवितव्य से पहले की दुविधा....
और फिर इस पंक्ति मे आत्ममोह मे दबी आत्मविस्मृति:
गिरने से पहले ही क्यों यों चकनाचूर हुई,
दरपण के सम्मोहन में मैं खुद से दूर हुई।
और अंत मे जैसे सच का सामना:
यही समर्पण बने विसर्जन
अनजानी पहिचान पुकारे।
एक-एक बात जैसे समंदर मथ कर एक-एक रत्न निकाला हो..
..फिर-फिर आना पड़ेगा इसे पढ़ने के लिये..

Apoorv ने कहा…

beshak "बैरिन लट गुंथने के पहले औचक उलझ गई।" par kavita guthi hui hai, bhav, geyata aur kala paksh aise ki kisi sukumari ke kesh ke teen hisse aaps main gunth kar kavita-kavita ho gaye honn...
दर्पण जी ने बहुत सलीके से सुलझाया आपकी इस पंक्ति का जादू..

शरद कोकास ने कहा…

अमिताभ जी आपकी कवितायें तो मै पढ़ूंगा ही सबसे पहले इस बात के लिये मैं आपकी सराहना करना चाहता हूँ कि आपने माता पिता की तस्वीर ब्लॉग में सबसे ऊपर लगा रखी है .. बुजुर्गों का आशीश सबसे बड़ी नियामत है । -शरद कोकास

Babli ने कहा…

अमिताभ जी आपने इतना सुंदर रचना लिखा है कि आपकी तारीफ के लिए अल्फाज़ कम पर गए! इस लाजवाब और बेहतरीन रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ !

गौतम राजरिशी ने कहा…

बड़े दिनों बाद एक खूबसूरत गीत गुनगुनाने को मिला है और इस "बैरिन लट गुंथने के पहले औचक उलझ गई।" पे तो उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़...!

आपकी लेखनी को सलाम, अमिताभ!

...और हाँ, तस्वीरों ने (माँ-बाबूजी) ने एक अलग ही आवरण दे रखा है आपके पृष्ठ को।

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

बून्दों के गिरने से पहले
खुली सीप से कुछ तो कह ले
बन्धन से मोती है फिर भी
अच्छी खोटी सीप परख ले।

अति सुन्दर कविता. गहन भावों से भरी हुई
किन किन पंक्तियों की तारीफ करुँ.............

माना मूल्य समर्पण का है
यह तन बस अर्पण का है
किंतु देव-पूजन से पहले
सिर का घूंघट क्यों सरका है?

सभी तो बेमिदल हैं

हार्दिक बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

Subhash ने कहा…

is shreshth chintak aur paripakva vicharak ko apna nazdiki mitra pakar main atyant khush hi nahin varan dhanya hoon. paudha jitna baahar dikh rahaa hai usse kai guna andar gahraai mien uski jaden hai.. bahvishya me yah ped kitna vishaal roop lega iski kalpna ki ja sakti hai.. meri aur se hardik shubhkamnayen.. Subhash Chaudhary

Dr.T.S. Daral ने कहा…

जैसे सागर की सीमा लख नदिया उमग गई
जैसे पर्वत को छू पाकर बदली बरस गई।
बेहतरीन पंक्तियाँ.

sudhir ने कहा…

बिन बोले
बंद अधरों से
जो बात कही /
कविता हुई !------------
बावरे मन
और
संभले मन की अंतर्द्वंद्ता
का उत्कृष्ट पल्लवन !
अर्पण व समर्पण का
सुन्दर संयोजन !
बोधता और अबोधता के
सारगर्भित भावों का
मोहक प्रकटीकरण !
वाकई बदली बरस गई ,
शब्द धरा को तृप्त कर गई !

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

बून्दों के गिरने से पहले
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बन्धन से मोती है फिर भी
अच्छी खोटी सीप परख ले।

गिरने से पहले ही क्यों यों चकनाचूर हुई,
दरपण के सम्मोहन में मैं खुद से दूर हुई।


ye antara sabse zayada accha lagi. Shayad main biased ho gaya apna naam dekh ke....

:)

बन्धन से मोती है फिर भी
अच्छी खोटी सीप परख ले।
ye line to bahut door talak jaati hai...
...agar main samjhne main kamyaab raha hoon.....

3,4 baaki....
To be Continiued !!

kshama ने कहा…

Bas ek shabd hai"wah"!!

बेनामी ने कहा…

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