गुरुवार, 3 सितंबर 2009

आग सिर्फ भस्म करती है

तुमने बडे प्रेम से
आग लगा दी,
मेरे तन में भी और
अपने तन में भी।
अब जलो...।

ये पद-प्रतिष्ठा की
प्रदक्षिणा,
खोने-पाने की
प्रतिस्पर्धा,
लूटने-खसोट्ने की
प्रलोभना,
बढती भूख का
प्रलाप,
प्राप्त प्रक्रुति का
प्रकोप,
चहूंओर सिर्फ और
सिर्फ आग का प्रमाण,
जलते रहो।

जीवन आग है,
जिसकी जितनी ऊंची
लपटें,
उसकी उतनी प्रतिभा।
जो जितना जला सके
उसका उतना प्रकाश।
जो ना जला सके
उसमे भी जलन,
वाह,
हर् कोई जल रहा,
इस दावानल मे।

आग सिर्फ
भस्म करती है,
भस्म।
चाहे जलो या जलाओ।


( ढेर सारे विचार गुत्थमगुत्था थे। मैंने उन्हें एकत्रित नहीं किया और उतार दिया। या यूं कहूं कि समय का अभाव है, और 'पोस्ट' करने की जल्दी। निश्चित रूप से बिखराव का आभास होगा। किंतु इतना तय है कि शब्दों के नेपथ्य में छुपा जीवन का गूढ् आपकी पैनी नज़रों से बचेगा नहीं।)

16 टिप्‍पणियां:

Rane (The Orchid with All Shades Pink) ने कहा…

bilkul nahi bacha.. jeevan ka bahut bada rahasya samajha gaye aap in panktiyon mein.. ye aisi jalan jiski aanch humaaari lagaaayi huyi hai...maachis bhi hum hain...aur dhuaan bhi hum hi ho rahein hain...aapki panktiyaan jhakjhor gayi...

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;
aaj janmdin hai mera, Bhaiyya.... to aapke aashirwaad ki abhilaasha liye bhaagi chali aayi..

aasha hai aap sakushal hain..

Aapki behen
Kajal

एकलव्य ने कहा…

भाई आग तो आग होती है बढ़िया पोस्ट.

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

wah amitabh ji....
agar zaldi main itna accha likhte ho to zaldi main hi likha karo//main zayada hi iske antas main ghus gaya tha tabhi ek aur rachna hui...

//ek choti si treveni//ise blog ke uppar laga di:

Ek treveni (courtsy you):

हर पल मुझमें एक आग लगती है,

हर दूसरे पल बुझ जाती है,

तुमने भी तो मुझे चैन स्मोकर कहा था.


jab aapki rachna prerit kar sakti hai kuch likhne ke liye to wo apne aap mai kya hogi?

Apoorv ने कहा…

वो चीज ए गमगुसार जिसने हर एक इन्साँ को फूँक डाला,
तुझे शिकायत है मौत थी वो, मुझे गुमाँ है हयात होगी.

..जिंदगी की सुर्ख तपिश आपकी कविता मे महसूस होती है..बहुत खूब.

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

सच पूछिए तो हम भी खूब जल रहे है इस वक्त। देखिए ना बाहर खूब बारिश हो रही है और हम अंदर बैठ कूढ रहे है। आप समझ ही सकते है क्यों जल रहे है। खैर जल्दी में लिखी ये रचना जब इतनी बेहतरीन है तो माशा अल्लाह फुर्सत में क्या कमाल हो सकता है। वैसे आपने हमेशा की तरह गहरी बात कह दी। हम अब भी आग में जल रहे है और बाद में भी आग में ही जलना है।
जीवन आग है,
जिसकी जितनी ऊंची
लपटें,
उसकी उतनी प्रतिभा।
जो जितना जला सके
उसका उतना प्रकाश।
जो ना जला सके
उसमे भी जलन,

सच्ची बात। और हाँ ऐसे ही जल्दी जल्दी लिखते रहिए। और हाँ लगता है पीसी दोड्ने लगा।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा!

seema gupta ने कहा…

जीवन आग है,
जिसकी जितनी ऊंची
लपटें,
उसकी उतनी प्रतिभा।
जो जितना जला सके
उसका उतना प्रकाश।
जो ना जला सके
उसमे भी जलन,
वाह,
हर् कोई जल रहा,
इस दावानल मे।
" ह्रदय को स्पर्श करते यथार्थ से अवगत कराती पंक्तियाँ.....सुंदर अभिव्यक्ति.."
regards

raj ने कहा…

आग सिर्फ
भस्म करती है,
भस्म।
चाहे जलो या जलाओ।....zindgee aag hi to hai....mahsoos kiya apki kavita me bhi aag thi..

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

"आग सिर्फ
भस्म करती है,
भस्म।
चाहे जलो या जलाओ।"
सुन्दर रचना.....बहुत बहुत बधाई...

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

गहरी विचारधारा रखने वाली कविता है

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

अमिताभ जी,

बहुत ही गहरी बात कही है भले ही विचारों की गुत्थम-गुत्थ रही हो आपने अपनी बात प्रभावी तरीके से कह दी :-

जीवन आग है,
जिसकी जितनी ऊंची
लपटें,
उसकी उतनी प्रतिभा।
जो जितना जला सके
उसका उतना प्रकाश।
जो ना जला सके
उसमे भी जलन,
वाह,
हर् कोई जल रहा,
इस दावानल मे।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

sandhya ने कहा…

आग सिर्फ
भस्म करती है,
भस्म।
चाहे जलो या जलाओ।
bahut hi sachhi bat aapne kha hai .......

शोभना चौरे ने कहा…

जो जितना जला सके
उसका उतना प्रकाश।
जो ना जला सके
उसमे भी जलन,
वाह,
हर् कोई जल रहा,
इस दावानल मे।
bahut kuch kh gai sare jeevan ka sar
samjha gai ye bikhri hui vichar dhara .kabhi kbhi bikhra hua hi sukun de jata hai .
is aag se kbhi koi bach paya hai .
bhut acha likh hai .
badhai shubhkamnaye

दिगम्बर नासवा ने कहा…

PRATISPARDHA TO EK AAG I HAI .... AUR JITNI UNCHEE PRATISTHAA HOGI USKO STITI PAR RAKNE KE LIYE ROZ I JALNA HOGA ......... DOOSRE KI JYOTI SE TEZ JYOTI JALAANI HOGI ..... TABHI TO TUMHAARA PRAKAASH DIKAAI DEGA ....

SACH KAA AI AMITAABH JI ....... AAJ HAR KOI IS AAG SE JAL RAHA AI ... AUR ANT MEIN SAB KO BHASM HI HONA AI APNI I AAG SE .....

BAHOOT HI GAHRA ESAAS SAMETE .... LAJAWAAB RACHNA ...

sudhir ने कहा…

धरती के आँचल में
खिलता है पलाश
जब सिमटती है साँझ
उषा की बाहों में ,
तपन दुपहरी भी
भला कैसे छोड़ती
उषा को
अंक में अपने भी तो
जकड़ती है !
सुर्खी लिए पलाश का
खिलना और खिलखिलाना
यकीनन
दाग व दागदार
की नुमाइश नहीं करता !
---------आप खिलते रहे मित्र
और कविता की सुरभि से इसी तरह
हमे मह्काते रहे !
शुभकामनाए !

जहान ने कहा…

aamitabh ji aap bahut samvedansheel rachnayen likhte hain jise pad kar mujae ek sher yad aa gaya
'kisi chirag ki roshni na pahunchi mujh tak
main apna dil na jalata to aur kya karta'