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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

रंगोली

अनमना सा मैं। डूबा तो अपने शहर के उन दिनों तक जा पहुंचा जो दिलोदिमाग में जड से गये हैं, पिघला तो पिघलता ही चला गया। होता है कभी कभी ऐसा भी। फिर शब्दों ने नहीं देखा कि उसकी बनावट कैसी है, वो किस रूप में हैं। जब यथार्थ के धरातल पर आकर शब्दों की ओर नज़र गईं तो सुधारना चाहा, किंतु किसे सुधारुं? बना हुआ अतीत कब बिगडता या सुधरता है? सो जस का तस। आपके लिये।

"गोबर से सने हाथ
लिपा हुआ आंगन
और आंगन मे बनाती
रंगोली,
कितनी रंगीली लगती थी वो।

उसकी चटक धूप से
मखमली सांझ तक की मेहनत
रंग लाती मुझे दिखती थी तब
जब रंगोली बनकर
तैयार हो जाती थी
और चेहरे पर संतोष की लकीरें
मुस्कान के साथ खिलती थी,
कितनी मासूम सी लगती थी वो।

निहारता था मैं
रंगोली को नहीं
ज्यादा उसे,
और पता भी नहीं चलता था जग को
कि किसे देख रहा हूं।

जब कोई उसकी कृति की
तारीफ करता
तो मैं भी करता,
रंगोली की नहीं,
उसकी जिसने बनाई थी।

मैं जानता था
वो नही जानती
कि मैं उसे देखने आता था
उसकी रंगोली के बहाने।
और
प्रेम के रंगों से
हृदय में नित बनाया करता था
उसकी-अपनी सपनों की रंगोली।

हां तब जब
उसकी बनाई रंगोली कोई
मिटा जाता तो
फिर बना लेती थी वो।

मगर

मगर
मेरी बनाई रंगोली जब मिटी
आज तक नहीं बन पाई है।"