शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

कांक्रीट क्रांति

यादों ने जहां जन्म लिया
वह तीर्थ स्थल
कांक्रीट क्रांति में
शहीद हो चुका है।
किंतु मस्तिष्क के
किसी
कोने में
धुन्धलाती सी
तस्वीर है,
जिसे मैं चाह कर भी
कागज़ पर नहीं
उकेर सकता।

कैसे उकेरुंगा?

क्या
कडकडाती
ठिठुरती वह रात,
शहर के बाहर की
सुनसान
अन्धेरे में डूबी
काली स्याह सडक
पर उसका मिलना,
धडकते दिल की
आवाज़ का
लगभग सर्द हो चुकी
नासिका से निकलती
गर्म सांस के साथ
मिलकर व्यक्त होना
किसी कागज़ पर
चित्र रूप में
छ्प सकता है?

क्या
सन्नाटे में खोई
सडक पर
अंजानी मंज़िल की ओर
दौडती मेरी
एलएमएल टी 5
स्कूटर पर
किसी अलाव का अहसास
देता उसका साथ,
रेखांकन हो
ड्रांइंग बुक में
समा सकता है?

क्या
सडक के आसपास बने
डरावने लगते
खेत की अनजानी सी
पगडंडी पर
स्कूटर घुसा देना
और किसी
सूखी नहर के बीच
जाकर उस बर्फ सी
रात में
प्रेम का इज़हार करने
पथरीली जगह ढूंढ्ना
कोई पेंसिल की नोंक
व्यक्त कर सकती है?

क्या
रात में दिखाई दे रहे
वे सारे काले
भयावह पेड
जो किसी भूत की
आकृति का
आभास देते हैं
और जिनसे
डर कर मेरे
अन्दर समाने की
उसकी बाल-चंचल चेष्ठा,
या
कहीं दूर
किसी गांव से आ रही
हवा के साथ
हिलौरे खाती
तूतक तूतक तूतिया......जैसे
फिल्मी गीत की
आवाज़ का
उस क्षण को
रसीला बना देने के बावज़ूद
सर्द रात से बचने
न सोने, सुबह जल्दी होने
जैसी उस अज़ीब सी
बैचेनभरी स्थिति को
कौन चित्रकार
तूलिका दे सकता है?

क्या
सूरज के जागते ही
ठंड से
जम चुके दो शरीर का
हडबडा के उठना
और यह पाना कि
हम कहां, किधर, कैसे
इस अज्ञात स्थान पर
आ बैठे,
और बस अब जल्दी
भाग चलो
जैसी मानसिकता में
प्रेम का ना तो कोई
इजहार कर पाना
ना ही कोई बात करना
बस मुस्कुरा कर
रह जाना
कभी पोट्रेट की
शक़्ल ले सकता है?

नहीं, बिल्कुल नहीं
वो तो ह्रुदय की
शीराओं में समा सकता है
या फिर
शरीर के तंतुओं
नसों में दौड
लगा सकता है।
ज्यादा है तो उस
स्थान पर ले
जा सकता है जहां
सुनहरी याद का जन्म हुआ था।
पर हाय रे विकास का दौर
मेरी ऐसी कितनी ही
यादों को लील गया।
खेत-खलीहान
गांव के गांव को
उजाड गया।
उसने वो पावन
बयार को भी
अपने वातानुकूलित यंत्र में
कैद कर लिया जो
बह कर नव-सृजन
किया करती थी,
हमें पवित्र
बनाया करती थी
आज सबकुछ नष्ट हो गया
पश्चीम का दानव
पूर्व की इज्जत को
हडप गया।
और मेरा तीर्थ स्थल
कांक्रीट क्रांति में
शहीद हो गया।

14 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

कांक्रिट क्रांति ने हम सभी के उन तीर्थ स्थलों का गला घोंट दिया है...अब तो अवशेष भी नजर नहीं आते.

बहुत भावपूर्ण रचना!!

kshama ने कहा…

कौन चित्रकार
तूलिका दे सकता है?
Concrete ke jangalon ne kitnehee komal ehsaas tahas nahas kar diye hain!

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

अरे नही, बिल्कुल नहीं, कभी भी नही..
बेहद सशक्त रचना..मेरे बधाई..!

Jayant Chaudhary ने कहा…

Toooo much.

Amit Ji,

Main bahut dinon baad aapko padh paayaa hun.
Aanand aa gayaa...
Ati aanand aa gayaa.

Following lines are very good.

"अंजानी मंज़िल की ओर
दौडती मेरी
एलएमएल टी 5
स्कूटर पर
किसी अलाव का अहसास
देता उसका साथ,"

Dhanyawaad,
Jayant

Ravi Rajbhar ने कहा…

Bahut hi sunder bhawpoorna rachna..
badhai swikaren..!
Yah satya hai ameet ji...pashchimi sbhyata se hamari sanskriti ko bahut bada khatra hai...aur yah hum aur aap milkar hi paida kar rahen hn. jarurat h ishpar gahrai se vichar karne ki na ki nakal.

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत भावपूर्ण रचना है...बहुत सुन्दर!!
बहुत सही कहा है.....

आज सबकुछ नष्ट हो गया
पश्चीम का दानव
पूर्व की इज्जत को
हडप गया।
और मेरा तीर्थ स्थल
कांक्रीट क्रांति में
शहीद हो गया।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बात तो सही है। लेकिन भाई, बदलाव भी ज़रूरी है।
हाँ, हम अपनी संस्कृति को बनाये रखें तो दोनों जहाँ का मज़ा लूट सकते हैं।
अच्छी रचना।

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

wah....achhi kavita..

दर्शन ने कहा…

Avyakat ke sab kuch ko vyakt kiya aur phir bhi aap poochte hain:
कैसे उकेरुंगा?

किसी कागज़ पर
चित्र रूप में
छ्प सकता है?

कोई पेंसिल की नोंक
व्यक्त कर सकती है?

कौन चित्रकार
तूलिका दे सकता है?


Aur isi kankreet ki kranti ki 'Samayikta' aur uspar aapke udghosh ke uppar kuch shabd nikle hain abhi abhi man se...

lambe lambe hathon se,
sir tak pahunchte pisachi nakhoon,
sir se zayada dimag ko khujlate hue.
Sir main hi ug gaye hon mano.
tab koi kagzon main rekahiyen kheenchne wala,
koi 'Plan execute' karne wala...
kisi 'Shilp kaar' se,
haath bhar upar ho jata hai.
aur tab bhi,
har haath kaam mangta hai,
dimag dasannan hai,
maang aur poorti ka samikaran,
gadbada gaya hai.
isliye,
kuch haat fir toot gaye,
nahi to,
shyada jahan aaj 'shopping complex' hai,
wahan
ek aur.
'Tajmahal hota.'

iska naam
'The Taj Complex' Rakhein kya?

lo,
Dimag ka ek haath aur badh gaya...

(Der se aane ke liye kshama maane ya ek dost ka gift):

anitakumar ने कहा…

बहुत ही सशक्त रेखाचित्र और संवेदनशील रचना। इस कांक्रीट क्रांति ने न सिर्फ़ हमारी यादों का सफ़ाया कर दिया है बल्कि हमारे हवा पानी और रौशनी पर भी कब्जा कर लिया है, जिन्दगी पिजरों में दब कर सिसकने पर मजबूर्।
इस सुंदर रचना के लिए आभार

शरद कोकास ने कहा…

पता नही यह कंक्रीट क्रांति है या कुछ और क्रांति ऐसी तो नही होती ..अच्छी रचना है यह ।

mamna ने कहा…

tumhari ek aur sundar si rachna ke intzar me

दिगम्बर नासवा ने कहा…

पश्चीम का दानव
पूर्व की इज्जत को
हडप गया।
और मेरा तीर्थ स्थल
कांक्रीट क्रांति में
शहीद हो गया ...

सच कहा है जिस तेज़ी के साथ पाश्चात्य सभ्यता का विकास हो रहा है ......... पूर्व अपने रंग खोता जा रहा है ..... सब कुछ ख़त्म होता जा रहा है ..... भावनाएँ, समाज सब कुछ कंक्रीट में बदल रहा है ...........
आपने बहुत ही शशक्त और प्रभावी तरह से अपनी बात रखी है .........
अमिताभ जी आप में ये खूबी ही की आप बात की गहराई को बहुत पैनी नार से देखते हैं और उतनी ही ते धार से काग़ज़ पर उतारते हैं ........... सोचने को विवश करती है आपकी हर रचना ............

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

जिस थीम पर आपने लिखा है जी उस पर कई बार हम सोचकर ही रह गए और आज जब आप लिखा देखा तो लगा जैसे हमने ही लिखा है जी। जिस भाव को आपने शब्दों से उकेरा है हम तो आँख बँद करके उसकी तस्वीर बनाने की कोशिश कर रहे है। खैर इन शब्दों को पढने के बाद आँखे के आगे एक तस्वीर तो बनती जाती है जी। वैसे आपने एक दर्द एक तड़फ को बेहतरीन शब्दों से उकेरा है। सच यही आप कहीं भी चले जाईए आपको कंक्रीट के जगल मिलते चले जाऐगे। कुछ दिनों से अपने घर की दुनिया से बाहर निकलने का मौका मिला तो यही देखा मैने। और जब आज आपकी रचना पढी तो वो जंगल भी याद आए। रचना हमेशा की तरह बहुत पसंद आई। अगर एक शब्द में कहूँ तो "अद्भुत" लिखी है आपने ये रचना। हर शब्द अपनी कहानी कहते हुए। कई बार पढ चुका हूँ। और हर बार एक टीस सी निकलती गई। और एक बात तो सोचने लगा कि हम कहाँ जा रहे, कैसी तरक्की कैसी क्रांति चाहते है? पर ये फिर कभी। और चलते चलते एक बात आप बीते हुए खजाने में से हमेशा एक गहरी बात कह जाते है।