शनिवार, 12 दिसंबर 2009

'कीबोर्ड के खटरागी' से मुलाकात


आज का ही तो दिन था, कुर्ला रेलवे स्टेशन के बाहर 'नुक्कड' पर जब 'कीबोर्ड के खटरागी' से मुलाकात हुई तो यकीन मानिये ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार किसी व्यक्ति से मिल रहा हूं। सूचना क्रांति के इस दौर की तारीफ तो करनी ही होगी कि उसने बगैर मिले लोगों को आपस में मिला दिया है। दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है। औसतन कद-काठी, गले में टंगा चश्मा, कमर में बान्ध रखा बैग, अपनत्व की मुस्कान और मिलनसार व्यक्तित्व की ऊर्जा लिये दमकता चेहरा मेरी आंखों में आज भी कैद है। कैद है कानों में खनकती स्नेहिल आवाज़ और मिलते ही प्रस्फुटित हुए शब्द ' जैसा फोटो में दिखते हो वैसे ही लगते हो', कुछ देर तो मुझे लगा कि सचमुच फोटो और प्रत्यक्ष दिखने में बहुत अंतर होता है। अमूमन तस्वीरें हक़ीक़त बयान नहीं करती, किंतु मुझे अच्छा लगा कि मेरी तस्वीर हक़ीक़त में भी मेरी ही है। खैर.. 'तेताले' से बाहर निकल मुम्बई आए इस इंसान से मैं मिलने का इच्छुक तो था ही, इसके पीछे मुख्य कारण यह भी था कि इनकी रचनाधर्मिता के साथ- साथ 'पिताजी' नामक ब्लोग से ये अंतर्मन की जो भावनाये प्रसारित करते रहे हैं वो दिल को छूने वाली रही हैं। मैने जब ब्लोग की शुरुआत की थी तो यकीनन यह कतई नहीं सोचा था कि लोग जुडेंगे जो मित्र भी, आदरणीय भी बनते जायेंगे। ठीक है, फोन पर या चेट पर या फिर ब्लोग के माध्यम से ही जुडना होगा, किंतु प्रत्यक्ष भेंट के बारे में सोचना अपने बहुत कम प्रतिशत के साथ मस्तिष्क में था। दरअसल, होता यह है कि साहित्य के इस दौर में या यूं कहें बौद्धिक बाज़ार में लोगों का मन मस्तिष्क पता नहीं किस 'ईगो' से घिरा होता है जो बडे छोटे जैसे मनोभाव से पीडित रहते हैं और भेद कर मिलन जैसी आनन्द की अनुभूति से दूर रह जाते हैं। इस तथ्य को भी उनके आने-मिलने और बाद में 'ब्लोगर्स मीट' के सफल आयोजन ने तोड दिया। ब्लोग और ब्लोगर्स सचमुच अनोखे हैं। मुझे उनके मिलने और मिलते रह कर सबको जोडने की यह फितरत अप्रत्याक्षित तौर पर एक ऐसी मुहिम लगी जो अब तक 'ब्लोग वाणी' या 'चिट्ठा चर्चा' जैसे मंच निभाते आ रहे हैं। मगर ये मंच तो ब्लोग्स को एक सूत्र में पिरो रहे हैं, इससे दो कदम आगे इस व्यक्ति ने भौतिक, मानसिक रूप से सेतु बनने का जिम्मा उठाया और ब्लोग्स के साथ साथ ब्लोगर्स को एक धागे में बुनने का कार्य प्रारम्भ किया। मानो फाह्यान का आधुनिक अवतार हो या व्हेन सांग की आत्मा ने इस युग में पुनर्जन्म ले लिया हो, जो न केवल लोगों को जोड रहा है बल्कि मित्रता की नई दिशाएं तैयार कर उसका बखूबी चित्रण भी कर रहा है। दिलचस्प यह कि इसका कोई दम्भ भी नहीं। बस एक मुहिम और मिलते जा रहे ब्लोगर्स का रैला। हंसता हुआ, हाथ मिलाता हुआ यह 'कीबोर्ड का खटरागी' सचमुच एक नई दुनिया बना रहा है। इस दुनिया के बाशिन्दे बनने और बने रहने की अज़ीब सी खुशी है मुझे। यह खुशी ' अविनाशी' है। इच्छा है यह खुशी बिखरती रहे, ब्लोगजगत में महकती रहे। हम सब आपस में कभी न कभी मिलते-जुलते रहें, फुनियाते रहें, चेटियाते रहे, बतियाते रहें, लिखते रहे और पढते रहें, बुद्धि और स्नेह से मिलकर बन रही चाश्नी से नहाते रहे, साहित्य को अपने अंतरतम तक महसूस करते रहें।
हां, यह सच है कि हमारी मुलाकात 5 दिसम्बर को हुई थी, वह भी दोपहर 2 बजकर 10 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 5 मिनट तक। आज 12 दिसम्बर है। इतने दिनों बाद मुलाकात के सन्दर्भ में पोस्ट डालने का एक कारण भी था। मैं चाहता था अविनाश वाचस्पति सकुशल अपनी यात्रा सम्पन्न कर लें. इस यात्रा के दौरान होने वाले घटनाक्रम भी सकुशल सम्पन्न हों, परिणाम बेहद सुखद रूप से सामने आये, मिलनेवाले तमाम साथी अपनी अपनी रिपोर्ट पोस्ट कर दें और सबकुछ हुआ भी ऐसा ही। अबसे ऐसा ही होता रहे। आमीन।

16 टिप्‍पणियां:

कुलवंत हैप्पी ने कहा…

बहुत उम्दा लेखन। और मुलाकात का वर्णन
मेरे पिता और पक्षी फीनिक्स

prabhat gopal ने कहा…

mulakat ke bare me jan kar acha laga...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपने बहुत ही लाजवाब और रोचक अंदाज़ से ब्लॉगेर मीट का विवरण दिया है ......... आपकी सब से मुलाकात हो गयी बहुत ही अच्छा लगा जान कर ........... बहुत बार जिससे आप चैट करो या बात करो उसको मिलने का मन करता है और अगर मुलाकात हो जाए तो मन और भी प्रसन्न हो जाता है ............

AlbelaKhatri.com ने कहा…

waah waah !
bahut hi achhi mulaakat !

vivran ke liye dhnyavad !

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छा अंदाजे बयां हैं उस मुलाकात का. बहुत अच्छा लगा जानकर.

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

अविनाश वाचस्पति को पहली बार मैं शायद तीन दशक पहले मिला था... कालेज के दिनों में. उनमें आज भी वही सरलता व वही ऊर्जा है...यह वरदान हर किसी को नहीं मिलता.

anitakumar ने कहा…

इस दुनिया के बाशिन्दे बनने और बने रहने की अज़ीब सी खुशी है मुझे। यह खुशी ' अविनाशी' है। इच्छा है यह खुशी बिखरती रहे, ब्लोगजगत में महकती रहे। हम सब आपस में कभी न कभी मिलते-जुलते रहें, फुनियाते रहें, चेटियाते रहे, बतियाते रहें, लिखते रहे और पढते रहें, बुद्धि और स्नेह से मिलकर बन रही चाश्नी से नहाते रहे, साहित्य को अपने अंतरतम तक महसूस करते रहें।


आमीन

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... मुलाकातें जारी रहें,नये दौर बनते रहें, नई दास्तां लिखती रहें !!!

Dr. Mahesh Sinha ने कहा…

भावनाओं के फूलों को आपने एक माला में पिरो दिया , शब्दहीन हूँ

shama ने कहा…

Ab to hame bhee Amitabhji se milneka man kar raha hai!

शरद कोकास ने कहा…

मुबारक हो यह मुलाकात

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

पढने के साथ साथ एक नया शब्द दिमाग को अच्छा लगा और घूमता रहा। पर अमिताभ जी उसका अर्थ मुझे नही पता। अर्थ जरुर बताना जी। शब्द "खटरागी"। क्या इसका मतलब खट खट करने वाला। ये सच है "सूचना क्रांति के इस दौर की तारीफ तो करनी ही होगी कि उसने बगैर मिले लोगों को आपस में मिला दिया है। दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है।" और ब्लोग की इस दुनिया ने कहीं दिल को हल्का कर दिया और कही भारी भी। पर कुछ भी हो इस ब्लोग की दुनिया का आना सुखद ही है। अच्छा,प्यारा, सुन्दर लेखन को पढने को मिल रहा है। और साथ ही साथ अपनी बात कहना का मौका भी मिल रहा है। जो पहले पत्र पत्रिकाओं में नही मिलता था..... खैर ऐसी मुलाकातें यूँ ही चलती रहे। और अविनाश जी से तो हम भी कई बार मिले हुए है। और समय की कमी की वजह कमेंट देने में देरी हो गई जी। अब भी तसल्ली से कमेंट नही लिख पाया। माफी जी।

मीत ने कहा…

जब अविनाश जी आपके साथ थे तो कहीं आपके मुह से पानी की पिचकारी तो नहीं छूटी...
वो अक्सर छुड़ा दिया करते हैं...
दुआ है ये मुलाकातें कभी ख़त्म न हों...
मीत

ज्योति सिंह ने कहा…

ye mulakat ek bahana hai ,dil ko dil ke kareeb lana .
hai intjaar aankho se ab koi baat bane ,kuchh aese hi khayaal se juda ye lekh ,jahan aagaz ,anjaam dono khoobsurat hai .naya varsha aane ke poorv naya ahsaas ,sundar .

दर्शन ने कहा…

जैसा फोटो में दिखते हो वैसे ही लगते हो',
ye kai baar mere saath bhi ho chuka hai, mano photo sach nahi bhi ho sakti ho. Haan ab sahi hai, ab tum saamne ho.


दरअसल, होता यह है कि साहित्य के इस दौर में या यूं कहें बौद्धिक बाज़ार में लोगों का मन मस्तिष्क पता नहीं किस 'ईगो' से घिरा होता है जो बडे छोटे जैसे मनोभाव से पीडित रहते हैं और भेद कर मिलन जैसी आनन्द की अनुभूति से दूर रह जाते हैं।

sehmat !!



अबसे ऐसा ही होता रहे। आमीन।

Summamin !!

Baat karne se baat badhti hai, Roz baatein kiya karo humse

Badhiya rahi ye mulakaat aur phir is mulaakat ki baat bhi !!

anitakumar ने कहा…

टेबल पर रखा मिठाई का हमें ललचा रहा है। भई, मेरे हिस्से की मिठाई कहां है