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शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

मेरा प्रेम


उसे
न कभी देखा,
न मिला और
न ही जाना।

हां,
अपने आसपास
उसके होने का अहसास
हमेशा रहता है।

हवा संग वो
कभी शरीर से लिपटती है
तो कभी खुशबू बन
नथुनों से होकर
सीधे हृदय तक
जा उतरती है।

रोमांचित मन
मस्तिष्क में बैठ
उसकी आकृतियां
उकेरने लगता है।

और
जब इन आकृतियों को
कैनवास पर
उतारता हूं
तो चेहरा नहीं बनाता।

क्योंकि
प्रेम में
चेहरे की जरूरत
मुझे कभी
महसूस नहीं हुई।