गुरुवार, 29 जनवरी 2009

हां में हूँ ना

उसकी कोमल उंगलियों ने

पहली बार

जब मेरे चेहरे को छुआ

मानो टटोलकर विश्वास किया

अपने पापा के होने का।

हां , में हूँ मेरी बेटी

तुम्हारा पापा।

गोद में उठा

कंधो पर बिठा

पीठ पर मुझे घोडा बना ,

उंगलियों को पकड़ कर

वो दोड़ती हुई

समय के रथ पर सवार होकर

अपने संसार में कब प्रवेश कर गई

मुझे नही पता चला,

में तो उसकी रुकावटों को,

आने वाली बाधाओं को

अपने जवान हाथो से

दूर करता हुआ

कब बूडा हो गया

नही पता।

अब

अपने कमजोर हाथो से

उसके चहरे को

टटोलता हूँ

और अहसास पाता हूँ

उसके होने का ,

'बेटी' है वो

इसलिए कहती है

हां में हूँ ना, मेरे पापा

तुम्हारे पास।

5 टिप्‍पणियां:

विनय ने कहा…

भावना का सागर है आपकी कविता!

sareetha ने कहा…

आपकी कविताएं भावपूर्ण और दिल को छू लेने वाली हैं । आपका प्रोफ़ाइल बेहद दिलचस्प है । जिस प्रत्रकार की लेखनी अपने बारे में इस तरह चल सकती है ,उसकी कलम की धार के तेवर ब्लाग पर भी दिखें ,तो क्या बात हो । शुद्ध घी का स्वाद पहचानने वाले तो ब्लाग जगत पर ही हैं । अपनी विशुद्ध महक यहां फ़ैलाएं ।
मज़े की बात है दुनिया मुझे मुर्दा समझती है
मुझे अपने सिवा कोई भी ज़िन्दा नहीं लगता ।

अवाम ने कहा…

बहुत ही सुंदर कविता है आपकी.
शुभ बसंत पंचमी
टिप्पणी के लिए धन्यवाद

शोभना चौरे ने कहा…

vah ji bahut sachhe ahsas jo ki pita hone ka garv krate hai .
badhai

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

सच पूछिए तो इससे पढकर उस रात की याद आ गई जब नैना हुई थी ठंड में कांप रहा था पर जब पता चला कि बेटी हुई तो लगा चलो एक पुकार तो सुनी मेरी। खैर आपकी रचना में जो कोमलता है वो वैसी ही जब छोटे बच्चे लेते हुए होती है।