बुधवार, 7 जनवरी 2009

याद

माता पिता की याद आती है बिल्कुल बच्चो की तरह बच्चा तो हूँ ही बड़ा पद या प्रतिष्ठित व्यक्ति बन जाने पर आदमी बड़ा हो जाता है क्या? वो भी अपने माता पिता के लिए ? मेरी उम्र का अन्तर आज भी उतना ही है जब में पैदा हुआ था आज भी उनकी उंगलियों को पकड़ कर ही चलना होता है फर्क बस यह है की उंगलियों का मतलब बदल कर अनुभवों से हो गया है सच में खूब याद आती है

मेरी इस याद को लेकर कई है जो मुझे नादाँ समझते है कुछ तो हँसते भी है मगर उनके समझने न समझने से मुझे क्या? मुझे तो आज भी लगता है की पिता की सर पर छत्रछाया हो ओर माँ की गोद में सर हो , उनके हाथो की थपकियों से जो सुख रिसता है वो इस संसार के सुखो से भिन्न है एसा सुख जिसे पाने के लिए इश्वर भी लालायित रहता हे पैसा, ऐश्वर्य... क्या सुख असल में दे पाते है? सच तो ये है की ख़रीदा गया सुख भी कोई सुख होता है

आज बहुत याद आ रही है मन करता है भाग कर उनके पास चला जाऊ उनके आँचल में अपने आप को समां दू

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1 टिप्पणी:

Umashankar Mishra ने कहा…

A maa teri surat se alag bhagwaan ki surat kya hogi... maa-baap ka saaya bachchon ke sar per hamesha bana rahe yehi meri kaamna hai... badhai ho Amit ji!