शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

फिजूल

फिजूल में
जुटे होते है हम
बैल की तरह ।
पूरी जिंदगी
इसका- उसका
तेरा- मेरा
करते रहते है ।
मन का हुआ
तो खुशी
न हुआ तो गम ...
ओर सबकुछ
टिका होता है
दूसरो के व्यवहारों से ॥
पाने- खोने की
लालसा में ।
बस...
फिजूल में ही.....

5 टिप्‍पणियां:

अजित वडनेरकर ने कहा…

बहुत बढ़िया...
ताज़गी है आपकी कहन में। बहुत दिनों बाद यूं शब्दों को कविता की शक्ल में देखा। अतुकांत कविता हो तो ऐसी हो।
बधाई।
अच्छा लगा यहां आकर।

बेनामी ने कहा…

wah janab wah..
bahut khoob likhte he aap..
esi kavitaye likhna bhi pratibhavaan hone ka sanket he..

rupbahadur singh ने कहा…

fijul me hi kyu apni ray du...magar nahi ye fijul nahi hoga kyuki aapki kavitao me jivan ka sach chhupa hota he

Ajay Saxena ने कहा…

अच्छा है..बधाई।

superior ने कहा…

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