शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

तुम देर न करो

" शक न करो
एतबार करो,
जिन्दगी की
नई शुरुआत करो।
दूर नहीं
मंजिले इश्क की,
फासले दरमियान
थोड़े कम करो।
तन्हाई में
डूबा मंज़र है,
आकर इसे
आबाद करो।
आंसुओ से
झुकती नहीं दुनिया,
जंग कर इसपे
राज़ करो।
आ जाओ अब
छोड़ के सबको,
खडा हूँ इन्तजार में
तुम देर न करो। "

9 टिप्‍पणियां:

विनय ने कहा…

अमिताभ जी बहुत अच्छी कविता लिखी है


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गुलाबी कोंपलें
सरकारी नौकरियाँ

sudhir ने कहा…

एतबार नही होता
इसीलिए इंतजार होता है !
एतबार और इंतजार
का फासला
भी तो एक ज़ंग होता है !

COMMON MAN ने कहा…

अभी तीन पोस्टें पढ़ीं, इश्क-ए-ताकत (ताकत का इश्क) की जगह मेरे मुताबिक ताकत-ए-इश्क होना चाहिये (इश्क की ताकत).हो सकता है कि मेरा अंदाजा गलत हो.

the pink orchid ने कहा…

bahut khoob amitabh ji, ishq ka ek rang utara hai aapne apne shabdont ke dwara.. parh kar anayaas hi ek muskaan aa gayi chehre par.. likhte rahiye..

दिगम्बर नासवा ने कहा…

दूर नहीं मंजिले इश्क की,
फासले दरमियान थोड़े कम करो

अमिताभ जी

सुंदर प्रस्तुति..........
अच्छी कविता है, दिल के ज़ज्बात खूब उतारे हैं आपने

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाहवा बहुत सुंदर कविता है भाई...

महावीर ने कहा…

अच्छी रचना है। सकारात्मक भाव दिए हैं। जीवन के सौंदर्य के प्रवाह में शक बड़ा बाधक है, उसको स्थान देते ही 'मंज़िले-इश्क' अदृश्य हो जाती है। कविता के ऊपर चित्र भी बहुत सुंदर लगा।

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

आंसुओ से
झुकती नहीं दुनिया,
जंग कर इसपे
राज़ करो।
आ जाओ अब
छोड़ के सबको,
खडा हूँ इन्तजार में
तुम देर न करो। "


वाह क्या बात है वाकई दिल जीत लिया।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बहुत बढिया.... भावों को बहुत ही सुन्दरता से अभिव्यक्त किया है आपने.....