मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

अश्के खूं

यूं बदन से मोहब्बत क्या हुई
रूह पता नही कहां खो गई ।

अब लडाई है, झगडे है, आशिके- महजूं है
दो जिस्म एक जान की तक़रीर बदल गई ।

उतारा था खुदा ने हमें इश्क के वास्ते
हिज्र की आस्मां पर क्यों बदली छा गई ।

तूने न जाना हमारी असलियतों को जाना
खामोश रहकर आँखे अश्के खूं पी गई ।

7 टिप्‍पणियां:

महावीर ने कहा…

अच्छी रचना है।
लगता है कि आपने शब्दों को ग़ज़ल का जामा पहनाने की कोशिश की है। आपके पास ग़ज़ल के लिए ख़ूबसूरत शब्द, सुंदर भाव, भावाव्यक्ति की सामर्थ्य सब कुछ है, सिर्फ़ ग़ज़ल के बेसिक नियमों का अभाव है। बेसिक नियमों से अवगत
होने के बाद ग़ज़ल लिख कर उसमें निखार पैदा किया जा सकता है। और उसके बाद बारीकियों और सही शब्दों का प्रयोग आदि पर भी ध्यान देना आवश्यक हो जाता है।
अब हिंदी में भी ग़ज़ल का अच्छा ख़ासा प्रचलन है जिसकी वजह से नियमों में भी हल्का सा बदलाव दिखाई दे रहा है।

MUFLIS ने कहा…

"यूँ बदन से मुहोब्बत क्या हुई ,
रूह पता नही कहाँ खो गयी ..."

बड़ी सच्चाई और सादगी से कही हुई खरी
और सच्ची बातें कही हैं आपने ....
बधाई . . . . . . .
shri Mahavirji ki baaton par zroor gaur farmaaeiN...aise Gurujan sb ko naseeb nahi hote huzoor...
Mahavirji ko abhiavaadan.....
---मुफलिस---

sudhir ने कहा…

RUH SE MOHABBAT AB VAKAI GUM HO GAYI....
AAJ KE BHOTIKWAD ME RUH SE RISHTA AB KISSE KAHANIYO KI BAAT HO GAYI..

sudhir ने कहा…
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sudhir ने कहा…
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the pink orchid ने कहा…

यूं बदन से मोहब्बत क्या हुई
रूह पता नही कहां खो गई ।
waah waah...

sudhir ने कहा…

साधुवाद ! अपनी रचनाओ से इसी तरह मानस को गुलजार करते रहे.