शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

स्नेह आमंत्रण

शब्द मेरे
सेतु है
जिन पर
चलकर तुम
आ जाना,
कागज़ जैसे कोरे
दिल पर
गीत नया
तुम रच जाना
काली- काली
जैसे स्याही
बन के घटा
तुम छा जाना,
सूने पड़े इस
जीवन में
प्रेम रस
तुम बहा जाना।
चाहो तो
रहना सदा
चाहो तो
बस जाना,
जग ने खूब
सताया है
बस तुम
ना कभी
छल जाना॥

7 टिप्‍पणियां:

विनय ने कहा…

नहीं छल होगा अब आगे, ऐसी शुभकामना के साथ!

BrijmohanShrivastava ने कहा…

एक बहुत अच्छी रचना खास तौर पर इसलिए कि जमाने का सताया हुआ हमेशा यही चाहता है कोई तो ऐसा हो जो साथ दे वादा निभाए अपना बनाये छोड़ कर न जाए /स्याही को घटा और शब्दों को सेतु अच्छी कल्पना है /जीवन की सूनेपन में प्रेम रस की चाहत भी उत्तम है /कागज़ जैसे कोरे दिल पर ++ हर कागज़ कोरा नहीं होता इसलिए यदि ""कोरे कागज़ जैसे दिल पर "" भी (मेरी द्रष्टि) से हो सकता था

आशुतोष दुबे "सादिक" ने कहा…

बहुत अच्छी रचना.

Priya ने कहा…

hello sir..

very well written poetic lines by you...........

n thanx for ur comment on my blog...

seema gupta ने कहा…

सूने पड़े इस
जीवन में
प्रेम रस
तुम बहा जाना।
" छोटी सी ही तो ख्वाइश है .....नाजुक से बंधन की चाह है...आँखों मे एक आस है.....खुबसुरत..."

regards

महावीर ने कहा…

सुंदर कविता है। भावानुकूल शब्दों का चुनाव, भावाभिव्यक्ति और कल्पना का सुंदर सामंजस्य है। बृजमोहन श्रीवास्तव जी की "कागज़ जैसे दिल पर .." पर टिप्पणी विचारनीय है। मैं उनसे सहमत हूं।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत सुंदर लगी आपकी यह रचना