सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

कभी- कभी

कभी - कभी
मस्तिष्क के
अतीत कोष से बहकर
मधुर स्मृतिया
ह्रदय के
खारेपन से जा मिलती है,
ओर किसी
लेमन जूस की तरह
जीवन की तपती
दोपहर में
ताजगी का
अहसास करा जाती है।
कभी - कभी
लगता है मानो
मेरे ही साथ
चलने वाली छाया भी
किसी साए का
हाथ थामे चल रही है,
ओर मे कुछ
ज्यादा देर तक
सूरज की तेज़
किरणों को सहन कर
चलता रहता हूँ।
कभी - कभी
मेरे अकेलेपन में
बर्फ सी ठंडी हवा
इन्द्रियों को बहलाकर
चुरा ले जाती है
ओर न जाने किस
ऊर्जा स्त्रोत में बहकर
में कुछ ज्यादा ही देर तक
अकेला बैठा रह जाता हूँ।
शायद ये वही
ह्रदय के खारेपन में
घुले लेमन जूस का कमाल है
जो मुझे
मेरी बिछड़ चुकी
यादो को ताज़ा कर
एकबार फिर
नया जीवन जीने को
प्रेरित कर रही है।
शायद
कभी -कभी
ऐसा हो जाता है।

6 टिप्‍पणियां:

the pink orchid ने कहा…

ati sundar amitabh ji.. tareef karne ke liye shabd kam pad rahein hain ....

आशुतोष दुबे "सादिक" ने कहा…

bahut hi acchi kavita likhi hai aapne,aap mere blog ke follower ban kar hame apna sahyog dijiye.
हिन्दी साहित्य .....प्रयोग की दृष्टि से

गौतम राजरिशी ने कहा…

वाह अमिताभ जी,क्या बात है
अनूठे बिंबों का प्रयोग "ह्रदय के
खारेपन से जा मिलती है,
ओर किसी
लेमन जूस की तरह
जीवन की तपती
दोपहर में
ताजगी का
अहसास करा जाती है"

वाह...

seema gupta ने कहा…

कभी - कभी
लगता है मानो
मेरे ही साथ
चलने वाली छाया भी
किसी साए का
हाथ थामे चल रही है,
ओर मे कुछ
ज्यादा देर तक
सूरज की तेज़
किरणों को सहन कर
चलता रहता हूँ।
" बहुत सुंदर ख्यालात....यही एक भ्रम जीवन की राह आसान भी कर देता है....."
Regards

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत सुंदर भाव और उतने ही सुंदर बिम्ब लिए हैं आपने ..बढ़िया लिखा है

Harkirat Haqeer ने कहा…

Amitabh ji bhot sunder rachna khas kr ye paktiyan....

कभी - कभी
लगता है मानो
मेरे ही साथ
चलने वाली छाया भी
किसी साए का
हाथ थामे चल रही है,
ओर मे कुछ
ज्यादा देर तक
सूरज की तेज़
किरणों को सहन कर
चलता रहता हूँ।