सोमवार, 13 सितंबर 2010

आत्म सत्य

अक्सर..
हां अक्सर ही तो,
जब
देखता हूं खुद को
खुद के भीतर,
तो पाता हूं
भीतर
गहरे भीतर
एक सबसे अच्छा गुण..
जिसमे दुर्गुण की
कोई गन्ध आती है।

14 टिप्‍पणियां:

Babli ने कहा…

भगवान श्री गणेश आपको एवं आपके परिवार को सुख-स्मृद्धि प्रदान करें! गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें!
गहरे भाव के साथ उम्दा प्रस्तुती!

Parul ने कहा…

aur mahak hum tak hai..

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

सबसे अच्छा गुण..
जिसमे दुर्गुण की
कोई गन्ध आती है...
यही मानव स्वभाव है अमिताभ जी...
एक शायर ने कहा है-
अल्लाह मैं इंसां हूं फ़रिश्ता तो नहीं हूं
इंसां न करेगा तो ख़ता कौन करेगा.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ... अपने सत्य को जानते हैं सब ... पर उसपर लिखते कम ही हैं ... सब के अंदर दुर्गुन छिपे होते हैं ....

निपुण पाण्डेय ने कहा…

बेहद गहरा सच! आपने हमेशा की तरह इस बार तो और कम पंक्तियों में समेट दिया है !

वास्तव में जहाँ हम अच्छे होते हैं कुछ ना कुछ कमी भी वही निकल जाती है |
ऐसे ही लिखते रहें !:)
हम सीखते रहेंगे आपसे , आपके अनुभव से और आपकी बातों से ...

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

हर आदमी का गहरा सच बयान कर दिया। कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाना आपकी खासियत है। इस खासियत के हम कायल है।

सुधीर महाजन ने कहा…

Ese hi anaavrat hote rahe..!
SABHI BLOGGERS KO GANESHOTSAVA KI SHUBHAKAMNAE ..!

रचना दीक्षित ने कहा…

सबसे अच्छा गुण..
जिसमे दुर्गुण की
कोई गन्ध आती है...
बहुत गहरी और बड़ी बात और उतने ही कम शब्द बड़ी संयत भाषा

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीय अमिताभ श्रीवास्तव जी
नमस्कार !
बहुत श्रेष्ठ भावों से सृजित एक ईमानदार रचना के लिए साधुवाद !

पाता हूं गहरे भीतर
एक सबसे अच्छा गुण…
जिसमे दुर्गुण की
कोई गन्ध आती है ।


एक श्रेष्ठ गुणी उपलब्ध हो तो मैं मन का संशय / सवाल रखे बिना नहीं रह पाता …

# एक लघु कविता में तीन-तीन चार-चार शब्दों की आवृत्ति खटकती नहीं क्या ?
अक्सर अक्सर , ख़ुद ख़ुद , भीतर भीतर गहरे भीतर ।
अनेक विद्वानों को कहते सुना है कि कविता में शब्दों का अपव्यय न हो तो कविता और भी श्रेष्ठ हो जाती है ।
kyaa yah kathan Galat hai ?
आशा है , अन्यथा नहीं लेंगे …

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

राजेन्द्रजी,
आपका कथन गलत नहीं है। किंतु इसके लिये आपको रचना के भाव देखने होते हैं। जब यथार्थ की क्रियात्मक अवस्था का भाव दर्शाना होता है और वो भी बिल्कुल आम बोलचाल के साथ तो इस तरह का प्रयोग किया जा सकता है, जहां चाहे शब्द एक हों मगर उसका प्रभाव भिन्न होता है। मेरी रचना में प्रारंभ से एक ऐसी मानसिक स्थिति का वर्णन हैं जहां सोच है और सोच का स्थाईभाव है। फिर भीतर याने सिर्फ भीतर भी नहीं होता, कवितायें हमें स्वतंत्र रखती है शब्दों के भाव के अंतर को स्पष्ट करने के लिये, भीतर के भीतर भी कुछ है, उसके गहरे भीतर माने आप इसे पाताल समझ सकते हैं। यह वो अवस्था है जहां अंतिम स्थान है। माने आपकी आत्मा।
आप यह भी मान सकते हैं कि विद्वानजन ने जो कह दिया वो पत्थर की लकीर नहीं हो सकता, क्योंकि प्रयोग निरंतर होते हैं और निरंतर कोई अपने नये प्रयोग से विद्वता हासिल करता जाता है। और निरंतर किसी नये विद्वान की बात सर्वोत्तम उक्ति, विचार के साथ स्थापित होती रहती हैं। मैंरा यह व्यक्तिगत मानना रहा है कि आपको अपना रास्ता चुनना है। अगर वो सही और सदमार्गीय है तो उससे भी मंज़िल पाई जा सकती है। इसके लिये किसी लक़ीर पर चलना मुझे सचमुच नहीं आता।
आपके द्वारा संशययुक्त प्रश्न पूछना मैं अपनी रचना की सार्थकता मानता हूं। धन्यवाद।

MUFLIS ने कहा…

जब
देखता हूं खुद को
खुद के भीतर,....

मानव मन में छिपे संशय और विश्वास के
मिले-जुले, लेकिन अनसुलझे भावों को
विस्तृत रूप से समझाने का सफल प्रयत्न
करती हुई आपकी यह अनूठी काव्य-रचना
निश्चित तौर पर प्रभावशाली है ....
मुक्त-छंद काव्य में शब्दों के दुहराव का औचित्य
इसी में निहित है कि उन एक-एक शब्द को अलग-अलग सम्पूर्ण(एक तरह से) वाक्य में ही पढने कीकोशिश की जाए ...
यह 'अक्सर...' और 'हाँ अक्सर ही तो...'
इस रचना की महत्वपूर्ण आवश्यकता ही है ,,,
और ये प्रक्रिया,
भावार्थ की पूर्णता में सहायक रहती है
अक्सर.... हाँ, अक्सर ही तो..... !
और ...
आदरणीय राजेंद्र जी की जिज्ञासा भी
उतनी हीमहत्वपूर्ण है ,,,,
उनके विचार हमेशा ही प्रेरणादायक होते हैं
किसी भी रचना पर श्री राजेंद्र जी द्वारा की गयी टिप्पणी उस रचना के स्तरीय होने को hi प्रमाणित करती है ,,
इस में कोई संदेह नहीं है

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

अमिताभ जी , बहुत देर से आपकी इस कविता को पढ़ रहा हूँ , आपने जो गहरा सच इतने कम शब्दों में लिखा है , वो प्रशंशा के आगे है . मानव मन को इतनी गहनता से शब्दों में ढालना ,वाकई , बहुत म्हणत का काम है ..आपको दिल से बधाई ..

शरद कोकास ने कहा…

देर से पढ़ी यह कविता लेकिन अच्छी लगी ।

अपूर्व ने कहा…

एक तो आपकी टिप्पणी ही काफ़ी कुछ सिखा देती है यहाँ..कि कविता को पढ़ पाना सार्थक लगता है..और आत्मसत्य के बारे मे समझ पाना मेरे लिये मुश्किल तो है..मगर कोशिश जरूर कर सकता हूँ..खुद को एक आइने मे देखना जो हमेशा सच ही बोलता है..मगर हम वही सुनना चाहते हैं उससे जो हमें अच्छा लगता है..मगर जहाँ रोशनी आती है..उसकी परछाई दबे पाँव चली आती है..पीछे-पीछे!!