रविवार, 19 सितंबर 2010

क्षणिकायें

1,

उसने किसी के
पेट पर लात मारी।
वाह क्या बात है,
वो एक ही तीर से
कितने
शिकार कर गया।

2,

ऊंचे और ऊंचे
चोटी पर जा पहुंचे।
अफसोस कि
देखना अब नीचे ही है।

3,

हम घास,
आप दरख्त
आपका इतराना
लाज़मी है।
पर बचके,
कहते हैं
आन्धियों में टूटते
दरख्त ही हैं।

4,

तुम्हारी प्रतिष्ठा
तुम्हारा अहम
तुम्हें मोहक
बना रहा है।
किंतु 'प्लेटो' कहता है
कि
छलने वाली प्रत्येक
वस्तु को मोहक
कहा जा सकता है।

30 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

हर क्षणिका पढने के बाद मेरे लिए अमूल्य हो जाती है

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत भावपूर्ण क्षणिकाएं ।
अति सुन्दर ।

Sunil Kumar ने कहा…

sundar atisundar badhai

Patali-The-Village ने कहा…

अति सुन्दर क्षणिकाएँ|

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

ऊंचे और ऊंचे
चोटी पर जा पहुंचे।
अफसोस कि
देखना अब नीचे ही है।
वाह...वाह
कितनी खूबसूरती से ये सच कह गए आप...
हर क्षणिका...उम्दा....शानदार.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

पर बचके,
कहते हैं
आन्धियों में टूटते
दरख्त ही हैं।

सभी क्षणिकाएं सीख देती हुई ...

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

बहुत कुछ सीखना है आपसे...आपकी क्षणिकाओं की तरह...

आप ऐसी क्षणिकाएं लगाते जाइये ..शायद कुछ सीख पायें. :)

रचना दीक्षित ने कहा…

आपकी हर क्षणिका खरा सोना है.इसकी चमक यूँ ही बनाए रखिये
आभार

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

काव्य के हेतु (कारण अथवा साधन), परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

शरद कोकास ने कहा…

अच्छी क्षणिकायें है अमिताभ ।

वाणी गीत ने कहा…

हम घास,
आप दरख्त
आपका इतराना
लाज़मी है।
पर बचके,
कहते हैं
आन्धियों में टूटते
दरख्त ही हैं।

सही कहा है ...!

अल्पना वर्मा ने कहा…

आँधियों में टूटते दरख्त ही हैं...बहुत खूब!
तीखे व्यंग्य का पुट लिए सभी क्षणिकाएँ गागर में सागर हैं .

Parul ने कहा…

amitabh ji..mujhe क्षणिकाएं hamesha hi aakarshit karti hai..mujhe to rochak lagi..i wud like to read more n more :)

वन्दना ने कहा…

सारी क्षणिकायें अमूल्य हैं।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ऊंचे और ऊंचे
चोटी पर जा पहुंचे।
अफसोस कि
देखना अब नीचे ही है ..

बहुत खूब अमिताभ जी ... क्षणिकाएँ छोटी सी बात को गहराई तक कहने की क्षमता रखती हैं .... और सच कहूँ तो आपने भी बहुत गहरी ... सार्थक और लाजवाब पक्ष रखा है इन रचनाओं में ....

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

ये मात्र क्षणिकायें नहीं, कटु सच्चाई भी है।

शोभना चौरे ने कहा…

बहुत दिनों बाद" सार्थक "क्षणिकाए पढने को मिली |

सुधीर महाजन ने कहा…

VAH VAH GURU CHAAR KADWI GOLIYO KA KYA DOSE DIYA HAI BIMARU LOGO KE LIYE..!

manu ने कहा…

:)

manu ने कहा…

:)

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

सुंदर, सटीक, और धारदार। बधाई।

sumeet "satya" ने कहा…

Bahot badhiya sir.....Shandaar bhavpoorn tukbandi hai

BrijmohanShrivastava ने कहा…

बहुत लम्बी गै़रहाज़िरी के बाद हाजिर हूं ।एक तीर से दो शिकार लात एक घटना दो ।यह भी अच्छी लगी कि तुम्हारी प्रतिष्ठा तुम्हारा अहम तुम्हे मोहक बना रहा है ’’एसा तुम समझते हो "

mridula pradhan ने कहा…

wah.bahot achche.

manu ने कहा…

क्षनिकाए तो सारी ही गीली की हुई चप्पल के जैसी हैं...

लेकिन दो नंबर और चार नंबर....कई बार पढ़ चुके हैं...
कितना बड़ा सच कितनी आसानी से कह दिया आपने...


अफ़सोस...कि देखना नीचे ही है...

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

देखन में छोटी लगे, घाव करत गंम्भीर.
प्रभावशाली क्षणिकाएं

बधाई

चन्द्र मोहन गुप्त

अपूर्व ने कहा…

क्षणिकाओं को इतनी कुशलता के साथ आप इस्तेमाल करते हैं..गहरी बातें कहने के लिये..कि मेरे जैसे अल्पबुद्धि के लिये कुछ आगे कह पाना संभव ही नही दिखता...सारी की सारी ही एक से एक हैं..दुनिया के बारे मे एक समझ देती और चेतावनी भी..सारी ही यह समझाती हैं कि कि किसी एक का अधिक शक्तिशाली होना कितना घातक हो सकता है...खुद उसके लिये भी..जितने ऊँचे चढ़ते जाँय इन्सिक्योरिटी इतनी ही गहरी होती जाती है..यही ऊँचा हो जाना आँधियों से डर पैदा करता है..तो एक छलावा भी बनता है..खुद के लिये भी..एक इन्ट्रैपमेंट..
पहली वाली तो रिसेशन की याद दिलाती है..:-)

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

waao ... good one

ZEAL ने कहा…

ऊंचे और ऊंचे
चोटी पर जा पहुंचे।
अफसोस कि
देखना अब नीचे ही है।
---

जितना ही हम ऊपर जाते हैं, अकेले होते जाते हैं।

.

Priyanka Soni ने कहा…

चारो क्षणिकाएँ अति सुन्दर ! बहुत ही विचारपूर्ण और मर्मस्पर्शी !