शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

भ्रम

छोटे बडे
ऊंचे ऊंचे
रेलवे ब्रिज़
रोज़ चढना
रोज़ उतरना।
और लोकल के
फर्स्टक्लास डिब्बे से
उतरकर कर भीड में
खो जाना।

जिन्दगी के सच है।

एक में
उतरना तय है
दूजे में
इस भ्रम का
दूर होना कि
हम विशेष हैं।

22 टिप्‍पणियां:

सचिन .......... ने कहा…

भ्रम बरकरार रहे। ताकि जिंदगी गलीज न लगे और जीते रहें सांस लेने की शर्त पर।

शोभना चौरे ने कहा…

भीड़ में सब एक है ,खो जाने पर भी! भ्रम का टूटना ही बेहतर है |

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

भीड़ में कौन क्या है नहीं पता रहता ..भ्रम कि हम विशेष हैं व्यर्थ है ..

रचना दीक्षित ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति. कितना नयापन लिए हुए. अक्सर ऐसा ही लगता है काश ये भ्रम बना ही रहे तो अच्छा

बेनामी ने कहा…

Wow!!!!!!!!! Amitabh ji maza aa gaya. Kya bat kahi aapne?
Well and Excilent

Sanjay Pati tiwari

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया। सच हम भ्रम में ही पूरी जिंदगी बीता देते है। कई बार भ्रम में रहना भी सुखदायक होता है बाकि इतना जानकार नहीं। वैसे एक चीज महसूस की है काफी दिनों से कि आपकी रचनाएं क्लासिक होती जा रही है। जो शब्द उन रचनाओं के लिए लिखना चाह रहा था पर सही से स्पेल नही कर रहा हूँ। खैर आपकी रचनाओं से जिंदगी के वो रंग निकल रहे जिनको रंग कर इंसान मजबूत बनता है और जिंदगी को अपनी शर्तो पर जीता है। वो विरला ही होता है। और आप......

सुधीर महाजन ने कहा…

रोज़ चढना
रोज़ उतरना।
सच है जिन्दगी के।
SARAL SHABDO ME JINDGI KE YATHARTH KO PARIBHASHIT KIYA HAI..!

anitakumar ने कहा…

भ्रम न भी रहे पर भ्रम न टूटे ये चाहत कहां जाती है,

manu ने कहा…

इस भ्रम का
दूर होना कि
हम विशेष हैं।

:)


aap sab ke liye vishesh thode hi ho.....

jinke liye ho...unke liye to ho hi.....

"अर्श" ने कहा…

कम शब्द और तीखे तेवर अमिताभ श्रीवास्तव की शख्सियत है लेखन में ... मजा आगया आज तो भाई साब ..

अर्श

अजय कुमार ने कहा…

भ्रम तो भरमाने के लिये है ।

सुनील गज्जाणी ने कहा…

amitabh jee
pranam !
behad hi sunderta se aap ne abhivyakti prastutat ki hai ,
sadhuwad.
saadar

Vivek Rastogi ने कहा…

मुंबई की सच्चाई यही है, भ्रम में जी रहे हैं सारे प्राणी

Parul ने कहा…

umda..amtitabh ji...umda!

Rajendra Swarnkar ने कहा…

प्रियवर अमिताभ श्रीवास्तव जी
ज़िंदगी के सच कितने रूपों में नित्य प्रति हमारे समक्ष आते रहते हैं …
महानगर की दिनचर्या के बिंब अच्छे उकेरते हैं आप ।
बधाई !

और, भ्रम तो दूर होने के लिए ही होते हैं …
भरम ढोते रहे पैरहन की तरह
सहते आए सितम हम करम की तरह


- राजेन्द्र स्वर्णकार

Babli ने कहा…

बहुत दिनों के बाद आपकी टिपण्णी मिलने पर बेहद ख़ुशी हुई!
बहुत सुन्दर और शानदार रचना लिखा है आपने! बहुत बढ़िया लगा ! उम्दा प्रस्तुती!

अनिल कान्त : ने कहा…

आनंद आ गया रचना पढ़कर

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

अमिताभ जी, बहुत उम्दा रचना है...
संयोग देखिए कि रश्मि प्रभा जी ने भी अपनी रचना
’मैं कहां हूं’ में ऐसे ही सवाल से रूबरू कराया है.
लिंक है-
http://lifeteacheseverything.blogspot.com/2010/08/blog-post_28.html

dimple ने कहा…

एक और भी सच है वो ये कि...
"मौत मुंसिफ है कमोबेश नहीं.
सबको आती है सबकी बारी से..."
और ये डिब्बे जिस्म ए पैराहन.
रूह कैद है जिसमें...
चाहे जनरल का डिब्बा हो या फर्स्ट क्लास .
जंजीर तो जंजीर ही है न...
सोने की हो या लोहे की.
और रूह आज़ाद हो तो चैन मिले...
मानो मंजिल मिले.

Rane (The Orchid with All Shades Pink) ने कहा…

bhaiyya,

kadwa hai ..par sach hai..


Kajal

शरद कोकास ने कहा…

लोकल के फर्स्ट्क्लास डिब्बे से .. इस बिम्ब का अलग अर्थ है ।

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH ने कहा…

!!!!!!
Ashish