सोमवार, 24 सितंबर 2012

द्वैत है और अद्वैत भी

चारो और है 
कणिका जगत /

ऊर्जा के अबेध कण /

कई कई ..,

मगर 

सब आपस में 
लथ-पथ/

आश्चर्य ...

कि
द्वैत है और अद्वैत भी /








(जैसे - 'मै' -'तुम' द्वैत 
मगर 'हम' अद्वैत ) 

4 टिप्‍पणियां:

Vinay Prajapati ने कहा…

बहुत ही मोहक

Vinay Prajapati ने कहा…

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ... आशा है नया वर्ष न्याय वर्ष नव युग के रूप में जाना जायेगा।

ब्लॉग: गुलाबी कोंपलें - जाते रहना...

कविता रावत ने कहा…

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!!

Blogvarta ने कहा…

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