मंगलवार, 20 जुलाई 2010

बस यूं ही

1-
विचारों का तीर सीधे
खोपडी की किसी हड्डी में
धंस जाता है।
उसका नुकीला कोना
मजबूत कोशिकाओं के बने
किसी ज्ञान खंड से टकराता है,
और एक दर्द का रैला उठता है
जो फेफडों से बहता हुआ
एक कोने में दुबके
हृदय के स्पन्दन को भी भिगो देता है।
खून की गति
अचानक तेज़ हो जाती है
जो कंपकपा देती है
इरादों को,
कि
बस बहुत हो चुका
इस बेशर्म दुनिया में
भावनाओं के तट पर
कुम्भ का आयोजन।


2-
आंखों की गीली पुतलियां
दृष्य ओझल कराती हैं,
और गाल पर बहती
अश्रूधार का नमकीन स्वाद
होठों से टकराता है तो
बरबस फूट पडता है स्वर
ओह क्या प्रेम ऐसा होता है?
इसीलिये कहता हूं
दिमाग के कामकाज में
दिल के लिये
'वेकेंसी' नहीं होती।

14 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

दोनों रचनाएँ बहुत सुन्दर..

.अश्रूधार का नमकीन स्वाद
होठों से टकराता है तो
बरबस फूट पडता है स्वर
ओह क्या प्रेम ऐसा होता है?

सुन्दर पंक्तियाँ

Parul ने कहा…

'bas yun hi' mein kitna kuch keh diya hai..antarman ka sundar pravaah ..shbdon ka mayajaal barbas hi faans raha hai!

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी कविताएं।

शोभना चौरे ने कहा…

बस बहुत हो चुका
इस बेशर्म दुनिया में
भावनाओं के तट पर
कुम्भ का आयोजन
vah
naya bimb .
jo kuchh hai hmare bhitar kvita bankr samne aa gya .
abhivykti bahut dino se injar me hai .

अल्पना वर्मा ने कहा…

pahali kavita mein vedna hai,niraasha hai...hataash hridy ke bhaavon ki abhivyakti hai.
samaaj ke prati akrosh dikhaayee deta hai.
--bahut achchee kavita.

dusri kavita mein bhi bhaavon ki khubsurat abhivyakti hui hai.
practicle duniya mein dil par dimaag haavi hota hi hai.

सुधीर महाजन ने कहा…

दिमाग के कामकाज में
दिल के लिये
'वेकेंसी' नहीं होती।
Aaj ke professionalism ke daur me Dil ko darkinar kar Dimag se kam karne wala iss mayavi duniya me practical mana jata hai.
Dil,Sanvednae,Bhawnae Bikte hue gili putliyo se bhi ojhal nhi ho pate..!
Bawon ki abhiyakti Aapki sanvedanshilta ko prakat karti hai.

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

दिल की गहराईयों से निकली रचनाएं। एक एक शब्द जोर जोर से धडकता हुए।

बस बहुत हो चुका
इस बेशर्म दुनिया में
भावनाओं के तट पर
कुम्भ का आयोजन।

हम भी अब ऐसा ही ऐलान करते है
। और पहली रचना में पसंद की लाईन।


इसीलिये कहता हूं
दिमाग के कामकाज में
दिल के लिये
'वेकेंसी' नहीं होती।

वाह। पर क्या करें" दिल है कि मानता नहीं"

कविता रावत ने कहा…

बस बहुत हो चुका
इस बेशर्म दुनिया में
भावनाओं के तट पर
कुम्भ का आयोजन।
...bebaak rachna... katu yatharth

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

जी किया तो फिर से पढने आ गया.....

अपूर्व ने कहा…

’खतरनाक’ क्षणिकाएँ..वैसे देखें को विचारों की जन्म-प्रक्रिया बहुत यातनादेह ही होती है...और अक्सर दुनिया के महानतम विचार किसी विचारक की ’अनचाही संतान’ ही होते हैं..मगर खून की यह तेज गति और हृदय के भीगे हुए स्पंदन ही जीवन को एक दिशा देते हैं..लक्ष्य देते हैं..
मेरे ख्याल से तो दिल और दिमाग का रिश्ता भी पति-पत्नी सा होता है..ख्वाहिशों की इस बेचैनी के दुनियादारी के रगड़े ही हमारी जिंदगी की ’गृहस्थी’ का भवितव्य होते हैं..
सुंदर तीखी कविताएँ..

दिगम्बर नासवा ने कहा…

दिमाग के कामकाज में
दिल के लिये
'वेकेंसी' नहीं होती ...

कमाल का लिखा है अमिताभ जी आपने ... दोनो रचनाएँ .... विचार सच में ख़तरनाक होते हैं ... ये विचार ही है जो मार्क्स को जनम देते हैं या फ्रायड को .... इनका सत्य की दुनिया से कोई संबंध नही होता ... यथार्थ की दुनिया का दिल से संबंध नही होता ...

सुनील गज्जाणी ने कहा…

amitabha jee ,
namaskar !
namkeen aansu prem ka ahsaas karadete hai .
aap ki dono kavitae achchi lagi.
sadhuwad.

निपुण पाण्डेय ने कहा…

वाह अमिताभ जी !
आपकी कुछ रचनाएँ तो थोड़ी देर के लिए घुमा ही देती हैं !
फिर से बहुत कुछ कह डाला चन्द पंक्तियों में और हमने थोडा समझा थोडा समझ रहे हैं ! :):)

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

नो वेकेंसी का विज्ञापन
और
विचारों का तार
जो सुखाता नहीं है विचारों को
जगाता है विचारों को
पर बेचारे जाग कर भी
जाग नहीं पाते हैं
पर आप जाग कर
जगाने का प्रयास
सदा करते नजर आते हैं।