शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

उधडन

सुना था,
कोई कमीज़ थी एक
शानदार कलप लगी
इस्त्री से सज्ज
दमकती हुई।
समय के कांटे में
उलझ वो
कहीं से उधडी तो
धीरे-धीरे उधड्ती चली गई।
उसकी बाहें अलग-अलग हो
कहीं बह गई,
जेब कहीं जाकर जम गई,
कालर डालर की
आड में खडी हो गई,
बटनें टूट कर
छिटक गई,
पिछ्ला सपाट हिस्सा
पीठ दिखा दूर हो गया,
अग्र भाग के दो हिस्से
वैसे भी बटनों से
एक होते थे किंतु अब
वे सिर्फ फड्फडाते
मिलने की आस में
बस कभी-कभी टकरा जाते हैं
फूट-फूट रोते हैं।
मैं सोचता हूं
सब को एकत्र कर
तुरपई कर दूं,
उसे फिर कमीज़ का
आकार दे दूं।
किंतु
न तो मेरे पास
मज़बूत धागा है
न वो सुई
जिसकी चुभन को
सहते हुए भी
एक होने का भाव
इस कमीज़ को कभी
गर्व महसूस कराता था।
अब तो यह
उधड गई है,
बिखर गई है,
बदली हवा के झौकों में
बह कर उसके भाग
इतनी दूर हो गये हैं
कि ढूंढना मुश्किल,
एक करना मुश्किल।
और
मज़ा देखो कि
बिखरे, उधडे,
फटे,चिथडे होने के बावज़ूद
जिस पर अब वो
'टुकडे' गर्व करते हैं
21 वीं सदी ने उसे
एक ब्रांड नाम भी दे दिया-
"न्यूक्लियर फैमेली"

25 टिप्‍पणियां:

‘नज़र’ ने कहा…

अत्यन्त प्रभावशाली रचना है!

Udan Tashtari ने कहा…

कितना सत्य उकेर दिया है आपने आज का. वाकई, यह रचना एक अजब प्रभाव छोड़ती है मानस पर.

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर रचना .. पर मज़बूत धागा और सुई की व्‍यवस्‍था तो करनी ही होगी !!

शोभना चौरे ने कहा…

रिश्तो के बिखरने के दर्द को बडी शिद्दत से महसूस करा दिया आपकी इस भावपूर्ण रचना ने |मै जानती हूँ सुई धागा लेकर सिलाई करना कठिन है और वो भी मशीनी युग में ?ऐसे लोगो को पिछडेपन कि उपाधि देते है लोग
किन्तु सिलना तो होगा ही ,चाहे हाथ में कितनी भी चुभन हो |इए मीठी चुभन के निशान भी जल्दी ही मित जाते है |
शुभकामनाये

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

न वो सुई
जिसकी चुभन को
सहते हुए भी
एक होने का भाव
इस कमीज़ को कभी
गर्व महसूस कराता था।





मज़ा देखो कि
बिखरे, उधडे,
फटे,चिथडे होने के बावज़ूद
जिस पर अब वो
'टुकडे' गर्व करते हैं
21 वीं सदी ने उसे
एक ब्रांड नाम भी दे दिया-
"न्यूक्लियर फैमेली"


kewal itna kahoonga ki agar iska 1/2 bhi kabhi likh paaon to mera lekahn safal.
bahut badiya upma hai...
...kameez se jaise aapne parivaar ka chitr ukera hai...
...prashanshaniya !!

bahut pehle ek treveni likhi thi...


"क्या मेरे अपने अब भी होली मनाते हैं ?
मुझे कैसे पता हो , वो अपने दूर रहते हैं ....



....बगल के कमरे में झाँक कर देखूं ?"

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

AUR HAAN GULZAAR SAAB KI WO NAZM BHI YAAD HO AIE...

"Mujhko bhi tarkeeb sikha koi yaar julahe"

"अर्श" ने कहा…

amit ji is kaamyaab rachanaa ke liye dil se jitni badhaayee dun kam hai , kya nazar rakhi hai aapne saahan... har shabd dil ko chhute huye rahe hain... bahot bahot badhaayee huzur,,,...




arsh

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

सुना था,
कोई कमीज़ थी एक
.............

कहीं से उधडी तो
धीरे-धीरे उधड्ती चली गई
..............

अग्र भाग के दो हिस्से
वैसे भी बटनों से
एक होते थे किंतु अब
..............
मिलने की आस में
बस कभी-कभी टकरा जाते हैं
फूट-फूट रोते हैं
............

मैं सोचता हूं
..............

तुरपई कर दूं,
उसे फिर कमीज़ का
आकार दे दूं
..............

किंतु
न तो मेरे पास
मज़बूत धागा है
न वो सुई
..........
मज़ा देखो कि
बिखरे, उधडे,
फटे,चिथडे होने के बावज़ूद
जिस पर अब वो
'टुकडे' गर्व करते हैं
21 वीं सदी ने उसे
एक ब्रांड नाम भी दे दिया-
"न्यूक्लियर फैमेली"

क्या कहूँ इन गहरी बातों में मेरे शब्द तुतला गए है। किस खूबी से आपने अपनी बात कही है। सच मुँह से वाह वाह निकल रही है। कई बार पढने के बाद फिर बारिके पढा। जितनी बार पढा दर्द बढता ही गया। एक कमीज को सामने रखकर एक ऐसे दर्द को बयान कर दिया जिस पर लोग बात करना नही चाह्ते। एक चमकते हुए भ्रम में जी रहे है। और क्या कहूँ मेरे पास शब्दों कमी हो जाती है।

अनिल कान्त : ने कहा…

बेहद प्रभावशाली रचना ...बहुत गहरी बातें हैं

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

hem pandey ने कहा…

अद्भुत रचना. साधुवाद.

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

वाह | बेमिशाल लिखा है |

'अदा' ने कहा…

आपकी कविता ने हमें वास्तविकता का दर्पण दिखाया है, सच-मुच हम कमीज़ से उधडे हुए टुकड़े ही बन कर रह गए हैं...

raj ने कहा…

न्यूक्लियर फैमेली" pe boht achhi or sachi baat khoobsurat shabdo me band ke kahi aapne....

MUFLIS ने कहा…

बहुत ही मननीय और सार्थक रचना से
साक्षात्कार करवाया आपने ....
गुज़रे लम्हों और गुज़रे मूल्यों की छटपटाहट
साफ़ सुनाई दे रही है

"...किंतु अब
वे सिर्फ फड्फडाते
मिलने की आस में
बस कभी-कभी टकरा जाते हैं
फूट-फूट रोते हैं।..."

इस ओट में जो कहा है ,,,
पहुंचना चाहिए सब तक

आपकी चिंता व्यर्थ नहीं है .....
लेकिन पराई सस्कृति के प्रभावाधीन
हमारा समाज ...
मaaनो कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है ...

खैर . . . .
बहुत सुन्दर रचना पर अभिवादन स्वीकारें ...
और....
हौसला-अफजाई का बहुत-बहुत शुक्रिया
---मुफलिस---

गौतम राजरिशी ने कहा…

क्या कहूँ अमिताभ जी.....चुप हूँ शब्दों की तीव्रता, रचना की सशक्त अभिव्यक्ति पर...

और ऊपर से दरपण की त्रिवेणी सोने पे सुहागा का काम करती हुई

Babli ने कहा…

बहुत ही ख़ूबसूरत और प्रभावशाली रचना है! अमिताभ जी बहुत बढ़िया लगा! आपकी लेखनी को सलाम!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सुना था,
कोई कमीज़ थी एक
शानदार कलप लगी
इस्त्री से सज्ज
दमकती हुई।
समय के कांटे में
उलझ वो
कहीं से उधडी तो
धीरे-धीरे उधड्ती चली गई

अमिताभ जी
गहरे एहसास में डूब कर लिखी रचना है...........सच मुच रिश्ते टूटने का दर्द..........उनको दुबारा सॅंजो कर रख न पाने की त्रासदी, आप ने हर एहसास, हर लम्हे को, दिल में छिपी वेदना को लाजवाब और प्रभावी रूप से उतारा है इस शिल्प में......
आप का लिखना हमेशा ही दिल को छू जाता है....... रिश्तों की नाज़ुक खूशबू से भरी होती है आपकी हर रचना ..........

pankaj shrivastava ने कहा…

प्रिय अमिताभजी,

मज़ा देखो कि
बिखरे, उधडे,
फटे,चिथडे होने के बावज़ूद
जिस पर अब वो
'टुकडे' गर्व करते हैं
21 वीं सदी ने उसे
एक ब्रांड नाम भी दे दिया-
"न्यूक्लियर फैमेली"

इतनी गहराई और वेदना आपकी रचना मैं है, मैंने तो इक बार पढ़ी तो तीन चार बार पढता ही गया, हर चिथड़े पर अपना नाम लिखत ही गया सोचता रहा कहाँ से किस हिस्से को जोडूं और फिर से सिल कर देखूं | शायद वक़्त ने कुछ ज्यादा ही टुकड़े कर दिए और बहुत दूर दूर फ़ेंक दिए | बिखरे हुए परिवार की वेदना को कुरेद दिया है आपने, इन रचनाओं के लिए आपको साधुवाद

Nirmla Kapila ने कहा…

मज़ा देखो कि
बिखरे, उधडे,
फटे,चिथडे होने के बावज़ूद
जिस पर अब वो
'टुकडे' गर्व करते हैं
21 वीं सदी ने उसे
एक ब्रांड नाम भी दे दिया-
"न्यूक्लियर फैमेली"
आज जितनी भी रचनायें पढी हैं शायद ये उनमे सब से अद्भुत सुन्दर और लाजवाब रचना है इतनी गहरी संवेदनाओं को शब्द देने का हुनर लाजवाब है बहुत बहुत बधाई

Nirmla Kapila ने कहा…

मज़ा देखो कि
बिखरे, उधडे,
फटे,चिथडे होने के बावज़ूद
जिस पर अब वो
'टुकडे' गर्व करते हैं
21 वीं सदी ने उसे
एक ब्रांड नाम भी दे दिया-
"न्यूक्लियर फैमेली"
आज जितनी भी रचनायें पढी हैं शायद ये उनमे सब से अद्भुत सुन्दर और लाजवाब रचना है इतनी गहरी संवेदनाओं को शब्द देने का हुनर लाजवाब है बहुत बहुत बधाई

BrijmohanShrivastava ने कहा…

शुरू से आखिर तक सत्य ही सत्य और वह भी कड़वा | बिखरे हुए को सिलने का प्रयास ,द्विअर्थी रचना परिवार पर भी और देश पर भी

Harkirat Haqeer ने कहा…

मज़ा देखो कि
बिखरे, उधडे,
फटे,चिथडे होने के बावज़ूद
जिस पर अब वो
'टुकडे' गर्व करते हैं
21 वीं सदी ने उसे
एक ब्रांड नाम भी दे दिया-
"न्यूक्लियर फैमेली"

क्या कहूँ .....लाजवाब रचना...!!

manu ने कहा…

जिस पर अब वो
'टुकडे' गर्व करते हैं
21 वीं सदी ने उसे
एक ब्रांड नाम भी दे दिया-
"न्यूक्लियर फैमेली"


इस आखिरी पंक्ति ने बुरी तरह हिला के रख दिया है अमित भाई...
कहाँ से कहाँ ले आये आप ....
गजब कर दिया...

deepakchaubey ने कहा…

Bahut sundar aur prabhavshali rachana hai. jitani badhayian doon kam hai

shikha varshney ने कहा…

बहुत ही डूब कर लिखते हैं आप.बहुत ही प्रभावी अभिव्यक्ति.