गुरुवार, 16 जुलाई 2009

तर-ब-तर मुम्बई, दर-ब-दर मन

लो मुम्बई में भी बारिश हो गई। जम के हुई। पानी-पानी हो गया। वैसे यह सच है कि मुम्बई का मानसून किसी भी हिस्से से अनोखा होता है। यहां मानसून का अलग ही मज़ा है। अब यह भी अलग बात है कि कितने लोग इसका मज़ा लेते है? क्योंकि मुम्बई मे मज़ा कम सज़ा ज्यादा है। बादलो से बरस रही बरखा रानी भी सज़ा बन बरसती है। सज़ा कैसी? सुबह-शाम दफ्तर जाने-आने वालों से पूछिये। सडकों पर चलने वालों से पूछिये। झोपडी-चालों में रहनेवालों से पूछिये। वाहन सवारों से लेकर वाहन मालिकों तक सबके चेहरे पर बारिश की सज़ा का भीगा-भीगा रिसाव ब-आसान देखा जा सकता है। प्रशासन चौकस, व्यवस्था मुस्तैद किंतु फिर भी समस्यायें सुरसा के मुहं की तरह मुम्बई के जीवन को लीलना चाहती हैं। हर कोई परेशानियो में भीगा-भीगा सा। बावज़ूद मुस्कान लिये। यह सब तो मुम्बई के लोगों के लिये रोज़ का काम, आदत हो गई है, लिहाज़ा मुस्कान लिये वो परिस्थितियों से लडना जानते हैं। इस बात पर मुम्बईवासियों की जितनी तारीफ की जाये कम है। इस तारीफ को भी सरकार अपना श्रेय बना कर प्रचारित कर देती है, ये उसका साहस है और मुम्बईवालों का दुर्भाग्य। राजनीति इसीका नाम है। खैर..।
मुम्बई भीग उठी। सबसे पहला असर यातायात पर पडता है, सो लोकल ट्रेनें अनियमित, सड्कों पर ज़ाम, उपर से बरसात, नीचे भरे पानी से मुश्किलें आम। मैं भी अपने दफ़्तर, जो कि अपने घर से पौने दो घंटे की दूरी पर है, चार घंटों मे पहुंचा। तरबतर वातावरण में नौकरी पर जाना सिवाय मज़बूरी के और कुछ नही होता। वैसे भी इन नौकरियों मे अब इंसानियत खत्म हो चुकी है। कौन कैसे आ रहा है? कितनी मुसीबतों में? क्या-क्या जतन करके? किसे फिक्र? क्या करे बोस को काम निकलवाना है, 'उपर' उसे भी बताना है। सो कर्मचारियों कि ऐसे हालात मे पूछ कर लेना उनके लिये मुसीबत बन सकती है इसलिये कोई मानवता नहीं सिर्फ नौकरीयता। यानी आप चाहे इस बारिश मे मुश्किलों मे फंसे हों या दफ्तर नही पहुंच सकते, उन्हे इससे कोई मतलब नहीं। आपको आना है तो बस आना है। बेचारा कर्मचारी॥जाता है। अब प्रशासन चेताता है, एसएमएस करता है कि आवश्यकता हो तब ही घर से निकलें...। हास्यास्पद नही लगता ये? वैसे देखा जाये तो अब मुम्बई हास्यास्पद ही ज्यादा हो गई है। यही मज़ा है। इसे आप बारिश का मज़ा कह लीजिये या मौसम की मार का, जो भी हो मुम्बई मे मानसून का अपना ही मज़ा है। सागर किनारे उसकी उत्ताल लहरों से भीगना, गरमागरम भुट्टों पर नमक-नींबू लगवा कर खाना, कभी चाय की चुस्की तो कभी वडा पाव का मज़ा। कुछ आवारा हो जाने का मन करता है। कभी तो लगता है पानी भरी सडक पर दौड लगा दूं, जोर से चिल्लाते हुए भागूं। हो हो ..$$$$$,,,,,,। आते जाते लोगों को छेड्ते हुए निकल जाऊं..बस आज़ाद पंछी की तरह ..कोई तनाव ना हो, कोई काम ना हो...बस हो तो ये बरसता हुआ आसमान और मैं....। किंतु....मुश्किल है अब। खासतौर पर मेरे लिये, या मुझ जैसे इंसानों के लिये जिसे पद-प्रतिष्ठा के फेरे मे फंसे छटपटाते ही रहना है। आह, कैसी बनावटी जिन्दगी? खैर..। पर मन तो चौकडी भरता ही है। बारिश के साथ भीगता ही है। बंजर सी हो चली स्म्रतियों की ज़मीन को खाद पानी मिल ही जाता है। फिर कोपलें फूट पडती हैं, फिर एक एक कर यादें बाहर निकल आतीं हैं। तन-मन सब तर हो जाता है। ऐसे में शब्द किसी गीत की रचना करते हैं या कोई कविता की। कुछ इसी तरह के आलम में चंद पंक्तियां रचा गई।

" घुमड-घुमड के बादल आये
सावन बरसे, मन तरसाये।
दिल में छुपी बतिया को जगाये,
कैसे अब हम मन समझायें॥


घुमड-घुमड के .......

झूले पडे हैं डाली-डाली
रुत भी कितनी है मतवाली।
चारों ओर खिली हरियाली
फिर भी मन है खाली-खाली॥

घुमड-घुमड के..........

भीगी आंखे, भीगा तन है
लागी कैसी ये अगन है।
क्या कभी होगा मिलन है?
दूर बहुत मेरे सजन हैं॥

घुमड-घुमड के.......

तेरे लिये मैं रूप संवारूं
टक-टकी बांधे राह निहारूं।
ओ निर्मोही तूझे पुकारूं
मादक पल ये कैसे गुजारूं?

घुमड-घुमड के बादल आये
सावन बरसे, मन तरसाये॥

26 टिप्‍पणियां:

mehek ने कहा…

भीगी आंखे, भीगा तन है
लागी कैसी ये अगन है।
क्या कभी होगा मिलन है?
दूर बहुत मेरे सजन हैं॥

घुमड-घुमड के.......
sunder bhav ke saath sunde rahcana

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... सुन्दर रचना !!!

Vivek Rastogi ने कहा…

अच्छी रचना।

Udan Tashtari ने कहा…

गंभीर हालात मगर सुन्दर रचना..

शोभना चौरे ने कहा…

हर कोई परेशानियो में भीगा-भीगा सा। बावज़ूद मुस्कान लिये। यह सब तो मुम्बई के लोगों के लिये रोज़ का काम, आदत हो गई
bhut sunsrta se mumbai vasiyo ki bhigi vytha ko rach diya hai .ha mubai vasi ki jaeevtta hi hi unhe aur shhro ki apeksha alag btati hai .
झूले पडे हैं डाली-डाली
रुत भी कितनी है मतवाली।
चारों ओर खिली हरियाली
फिर भी मन है खाली-खाली॥
ye bhi vha ka saty hai jise sirf geeto me hi mhsus kar skte hai .
achhi post .
shubhkamnaye

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

अमिताभ जी जब तक लोगो के चेहरों पर मुस्कान है। तब तक उम्मीद भी है लोगो की जिदंगी भी बेहतर होगी। सच आजकल हास्यापद ही घटने लगा है। अमिताभ जी काहे आवारा होने की याद दिलाते हो मन फिर से उदास हो जाऐगा। जिदंगी की मजबूरियाँ आवारा नही होने देती।
घुमड-घुमड के बादल आये
सावन बरसे, मन तरसाये।
दिल में छुपी बतिया को जगाये,
कैसे अब हम मन समझायें॥
सुन्दर शब्द।

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

अमिताभ जी,

तेरे लिये मैं रूप संवारूं
टक-टकी बांधे राह निहारूं।
ओ निर्मोही तूझे पुकारूं
मादक पल ये कैसे गुजारूं?


पंक्तियाँ विशेष रूप से पसंद आई, क्योंकि सावन में विरहदग्ध मन की व्यथा को खूब लिखा है। शायद मिलन का इंतजार हि जीवन है?

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

‘नज़र’ ने कहा…

अपनेपन सी बात् है कुछ इसमें
----
गुलाबी कोंपलें · चाँद, बादल और शाम

दिगम्बर नासवा ने कहा…

भीगी आंखे, भीगा तन है
लागी कैसी ये अगन है

Amitaabh ji.........
Barkhaa, saawan ka maheena, umadti gumadti ghataayen ....... baarish se bheegti sadken, baad mein doobta shaher.....par jo bhi ho......... boonden dil mein pyaar ka dariyaa nikaal hi deti hain....

man mein prem ke panchee gane lagte hain aur itni sundar rachnaa ko jaman dete hain.....

Bahoot hi sundar abhvyakti......padhte huve lagta hai jaise man mayoor matwaala ho ke gaa raha ho....

anil ने कहा…

सुन्दर ! बड़ी ही सुंदर प्रस्तुति आभार !

Shobhana ने कहा…

amitabhji
aapki phli tippni march mhine me aai thi isiliye apko abhi kafi peeche jakar pdhna hoga samy nikalkar.hahahh

mark rai ने कहा…

भीगी आंखे, भीगा तन है
लागी कैसी ये अगन है।
क्या कभी होगा मिलन है?
दूर बहुत मेरे सजन हैं......
khub maja liya hoga aapne baarish ka badhaai ho....

गौतम राजरिशी ने कहा…

बारिश में भीगा मुम्बई और एक प्यारी-सी रचना.....

ज्योति सिंह ने कहा…

" घुमड-घुमड के बादल आये
सावन बरसे, मन तरसाये।
दिल में छुपी बतिया को जगाये,
कैसे अब हम मन समझायें॥
ati sundar rachana .

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

भाई क्या खूब भिगोया आपने नौकरियता के उमड़े - घुमड़े मानवताबिहीन काले बादलों की अम्लीय बरसातों से.
जहाँ भूमिका चुस्त-दुरुस्त थी, वहीँ कविता भी मनमोहक लगी.

बधाई सुन्दर, प्रभावी प्रस्तुति पर.

चन्द्र मोहन गुप्त

Harkirat Haqeer ने कहा…

कभी तो लगता है पानी भरी सडक पर दौड लगा दूं, जोर से चिल्लाते हुए भागूं। हो हो ..$$$$$,,,,,,। आते जाते लोगों को छेड्ते हुए निकल जाऊं..बस आज़ाद पंछी की तरह ..कोई तनाव ना हो, कोई काम ना हो...बस हो तो ये बरसता हुआ आसमान और मैं....। किंतु....मुश्किल है अब। खासतौर पर मेरे लिये, या मुझ जैसे इंसानों के लिये जिसे पद-प्रतिष्ठा के फेरे मे फंसे छटपटाते ही रहना है। आह, कैसी बनावटी जिन्दगी? खैर..। पर मन तो चौकडी भरता ही है। बारिश के साथ भीगता ही है। बंजर सी हो चली स्म्रतियों की ज़मीन को खाद पानी मिल ही जाता है। फिर कोपलें फूट पडती हैं, फिर एक एक कर यादें बाहर निकल आतीं हैं। तन-मन सब तर हो जाता है....

वाह...........!!
आपकी कविता से बेहतर तो आपके संवाद लगे अगर इन्हें ही कविता का रूप दिया जाता तो ज्यादा रस आता ...!!

Babli ने कहा…

वाह अमिताभ जी मज़ा आ गया! बहुत ही ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो प्रशंग्सनीय है! आपकी रचना की हर एक पंक्ति बहुत सुंदर है! मुंबई में लोग इतने व्यस्त रहते हैं और हमेशा दौरते रहते हैं पर चेहरे पे मुस्कान रहती है! मुंबई में ज़िन्दगी बहुत तेज़ चलती है!

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

"क्योंकि मुम्बई मे मज़ा कम सज़ा ज्यादा है। बादलो से बरस रही बरखा रानी भी सज़ा बन बरसती है। सज़ा कैसी? सुबह-शाम दफ्तर जाने-आने वालों से पूछिये। सडकों पर चलने वालों से पूछिये। झोपडी-चालों में रहनेवालों से पूछिये। वाहन सवारों से लेकर वाहन मालिकों तक सबके चेहरे पर बारिश की सज़ा का भीगा-भीगा रिसाव ब-आसान देखा जा सकता है।"

Bahut accha aur samayik !!

BARSAAT MAIN: paani jama ho jaane ka dar...

GARMI MAIN: loo aur umas ka dar.

THAND MAIN: Sheet lehar ka dar.

BASANT MAIN: Shiv sena ka dar.

RAAT MAIN: Chor ka dar.

DIN MAIN: Police ka dar.

GHAR MAIN: Biwi ka dar.

OFFICE MAIN: Boss ka dar.

RASTE MAIN: Traffic ka dar.

Par dar ke aage....

...SHAYAD Jeet hai...

...Ya Beer Bar?

Saala wahaqn bhi bouncer ka dar.

hem pandey ने कहा…

घुमड़ घुमड़ के बादल आये
सावन बरसे मन तरसाये ||

- वर्षा के मौसम में कुछ ऐसा ही आलम होता है.

अल्पना वर्मा ने कहा…

'कभी तो लगता है पानी भरी सडक पर दौड लगा दूं, जोर से चिल्लाते हुए भागूं। हो हो !!!!!!!!'
सच बारिशें न जाने कैसे कैसे भाव मन में ले आती हैं.कभी बचपन में लौटा ले जाती हैं तो कभी कुछ भूली हुई यादों को कुरेद जाती हैं.बारिशों में न जाने कैसे मन का आईना धुल जाता है की बीती बातें अपना अक्स दिखाने लगाती हैं..
कविता बारिशों का आनंद देती है ...सावन की झूले देखे अरसा हो गया..तीज त्यौहार सब सावन के साथ शुरू हो जाते हैं..
हमारे लिए तो बरखा रानी एक स्वप्न की तरह है साल में कभी एक आध बार सच होती है तो मिनटों के लिए..

आप आनंद लिजीये बरसातों का !

pankaj shrivastava ने कहा…

प्रिय अमिताभजी,
तेरे लिये मैं रूप संवारूं
टक-टकी बांधे राह निहारूं।
ओ निर्मोही तूझे पुकारूं
मादक पल ये कैसे गुजारूं?
यह परम अदभुत अनुभव की व्याख्या आपने की है बारिश के साथ साथ मन की भावनाएं और यादें भी बूँद बूँद बरसती रहती हैं और यादें तरसती रहती हैं, आपने हमेशा से ही सौन्दर्य रस का ऋतू अनुसार मिश्रण करके मन की भावनाओं को कुरेदा है उसके लिए बहुत बहुत साधुवाद, हमारी आशाएं आप से नयी रचनाओं की बनी रहती है : आप सृजन करते रहे इसी कामना के साथ - अनुज -- पंकज श्रीवास्तव

sudhir ने कहा…

तेरे लिये मैं रूप संवारूं
टक-टकी बांधे राह निहारूं।
ओ निर्मोही तूझे पुकारूं
मादक पल ये कैसे गुजारूं?
Bahut sundar Rachna !
Sachmuch man ko bhigone wale shabd!

BrijmohanShrivastava ने कहा…

नौकरियों में इंसानियत ख़त्म हो चुकी है ठीक है मगर इसके अलावा भी कहीं दिखी आपको |मानवता नहीं नौकरियता बहुत प्यारा शब्द |उत्ताल लहरों से भीगना और गरम भुट्टे खाना ,आवारा होने मन क्यों न करेगा |आपका घर से पौने दो घंटे के रस्ते को चार घंटे में पूरा करने की बात पर आश्चर्य यह हुआ की चार घंटा प्रतिदिन यात्रा में व्यतीत करते हुए भी इतना अच्छा लिखना यह तो तय है की रस्ते में नहीं लिख पते होंगे |आलेख बहुत अच्छा लगा शब्द प्यारे "व्यवस्था मुस्तैद प्रशासन चौकस " अच्छा लगा

Jayant Chaudhary ने कहा…

Ab kyaa likhun!!!
Aapke aage to likh bhi nahin sakataa!!!!

Waah waah waah...

~Jayant

sandhyagupta ने कहा…

Samay ke sath vartalap karti aapki yah rachna achchi lagi.

अल्पना वर्मा ने कहा…

आवश्यकता हो तब ही घर से निकलें...। हास्यास्पद नही लगता ये?--

बिलकुल लगता है अमिताभ जी..अभी दिल्ली सरकार ने भी ऐसी ही घोषणा की...
बताईये!
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देर से टिपण्णी लिख पा रही हूँ --
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आप की रचना ने उस गीत की याद दिला दी--तेरी दो टकियाँ दी नौकरी मेरा लाखों का सावन जाये.--हा हा हा!

--अच्छा गीत लिखा है आप ने..धन्यवाद.