सोमवार, 15 जून 2015

आमंत्रण

मुझे बुलाता है कैलाश मानसरोवर
और मैं आमंत्रण को हाथ में धरे खड़ा हूँ ,
कहाँ से शुरू करू यात्रा ?
रास्तो के तमाम नक़्शे हैं
यात्रा वृत्तांतों के टेके हैं 
लुभाती तस्वीरें हैं
और सारी सुविधाएं हैं
किन्तु सबकुछ होने के बाद भी
जरूरी नहीं होता कि सब कुछ हो जाए।
जो होता है , वो होने देना चाहिए
जैसे नहीं जा पाना
कभी जा पाना भी होगा।
ये 'होगा ' भी होना है।
शुक्र है
आमंत्रण सदा है। जैसे शिव।
( फिर एक यात्रा वृत्तांत , ढेर-ढेर वृत्तांत पढ़ लेना... … किताबो के हर पन्ने एक एक आमंत्रण बन जाते हैं )

2 टिप्‍पणियां:

रचना दीक्षित ने कहा…

अभी ना जा पाना संदेश ही तो है कभी फिर सही जाना तो है

Digamber Naswa ने कहा…

उसकी मर्जी के बिना तो कुछ भी हो पाना मुश्किल है ... फिर उसके दर्शन ... शिव ही बुलाएगा ...