बुधवार, 2 नवंबर 2011

प्रेम

न्याय, वैशेषिक, सांख्य हो
या योग मीमांसा
वेदांत जैसे वैदिक दर्शन
घुस टटोला।

इन्हें नकारने वाले...
चार्वाक, जैन, वैभाषिक
सौत्रांतिक, योगाचार और
माध्यमिक जैसे
अवैदिक दर्शन की पनाह भी ली
किंतु मिला नही
उसका ओर न छोर।

खपा दिया खुद को
सिर खुजाखुजा..,

पट्ठा मिला भी तो कहां
कबीर की झोपडी में
गुनगुनाता हुआ-
पोथी पढ-पढ जग मुआ.......।

9 टिप्‍पणियां:

sushma 'आहुति' ने कहा…

गहरी अभिवयक्ति.....

kshama ने कहा…

पट्ठा मिला भी तो कहां
कबीर की झोपडी में
गुनगुनाता हुआ-
पोथी पढ-पढ जग मुआ.......।
Wah!

रचना दीक्षित ने कहा…

इन्हें नकारने वाले...
चार्वाक, जैन, वैभाषिक
सौत्रांतिक, योगाचार और
माध्यमिक जैसे
अवैदिक दर्शन की पनाह भी ली
किंतु मिला नही
उसका ओर न छोर।

टिपण्णी लिखने के लिए मुझे भी सर खुजाना पड रहा है कि इतनी गहरी बातों पर क्या प्रतिक्रिया करूँ
बस लाजवाब सोचने को मजबूर करती पोस्ट

अल्पना वर्मा ने कहा…

'प्रेम 'को खोजना भी अद्भुत रहा...जब मिल गया तो कठिन मार्ग की सब तकलीफें भी भूल जाते हैं.
गहन अभिव्यक्ति..

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

बेहद सुन्दर शब्द

सोनू उपाध्‍याय ने कहा…

जाको जेता निरभया ताको तेता होय, रत्‍ती घटे न तिल बढे जो सिरकूटे होए...

Ajmer Hotels ने कहा…

nice click.............

hotels in Nainital ने कहा…

this is good lines for shear it to everyone...........

Andaman Holidays ने कहा…

its touch my heart when i m read.....