मंगलवार, 16 नवंबर 2010

घोटालों के बीच गुम हो रहा सुदर्शन चक्र

पूर्व संघ सरसंचालक सुदर्शन के बयान के बाद मचा बवाल इस पूरे पखवाडे में घोटालो की भेंट चढ गया। वैसे भी सुदर्शन कह कर चुप थे और उधर सोनिया गान्धी ने तो अपना मुंह खोला ही नहीं था। सुदर्शन नहीं जानते थे कि संघ और भारतीय जनता पार्टी उनके बयान पर मुंह फेर लेगी। मगर सोनिया जानती थी कि उन्हें चुप रहना है क्योंकि उनके चाटुकार सैनिकों की फौज काफी है इस बयान, बवाल से निपटने के लिये। यह देश की विडंबना है कि जिसे सुदर्शन का साथ देना चाहिये था उसने अपना हित साधने के लिये होंठ सिल लिये। सुदर्शन का बयान झूठा या सच्चा जो भी हो..किंतु यह जांच का विषय होना ही चाहिये था। आपको क्या लगता है कि सुदर्शन कोई नासमझ व्यक्ति है जिन्होंने किसी पागलपन के दौरे में बयान दिया? क्या वे इस देश को सोनिया से कम जानते हैं या सिर्फ सोनिया ही त्याग की मूर्ति हैं सुदर्शन नहीं? सुदर्शन पढे-लिखे, बेहद सुलझे विचारों वाले और तमाम ऊंच-नीच को जानने-समझने वाले व्यक्ति हैं, सोनिया से ज्यादा...। लिहाज़ा उनके बयान को घोटालों की इस बाढ में बहने नहीं देना चाहिये था। यह भी तो हो सकता है कि घोटालों की सनसनीखेज खबरें, सुदर्शन के आग उगलते बयान पर पानी का छींटा डालने का बेहतर षडयंत्र हो? आप कहेंगे अपने बयान के बाद सुदर्शन क्यों चुप हैं? आप यह क्यों नहीं कहते कि सोनिया क्यों चुप रही? वैसे उनको सलाम ठोंकने वाले सैनिकों का उत्तर होगा कि सोनिया फिज़ूल के आरोपों पर अपना मुंह क्यों खोलेगी। तो भाई आप सैनिक क्यों बक बक करते है? जब फिजुल है तो चुप ही रहा जाये न.., मामला अपने आप निपट जायेगा। किंतु इसके पीछे का खेल भी न्यारा है। यह ऐसे मुद्दे होते हैं जब सोनिया की नज़रों में आया जा सकता है। आप अपनी वफादारी अच्छी तरह से व्यक्त कर सकते हैं। लिहाज़ा सुदर्शन का बोलना हुआ नहीं था कि चारों ओर से उन्हें घेरने, उन्हें घसीटने, उन्हें खींचने का कांग्रेसी कॉमनवेल्थ शुरू हो गया था। इधर सुदर्शन चाहते तो होंगे कि संघ उनका साथ दे। यह ताज्जुब की बात है कि संघ ने उन्हें उनके निजी विचार बता कर उनसे किनारा कर लिया। भाजपा से वैसे भी कोई ज्यादा उम्मीद उन्हें नहीं थी क्योंकि भाजपाई सोच का और मुद्दों पर संघर्ष करने का ढंग बदल चुका है। हालांकि इस मुद्दे पर वो अगर अड जाती और बगैर किसी दबाव, बगैर किसी गलत प्रक्रिया के शुद्ध जांच की मांग करके, एक बार हो ही जाये वाली शैली में आ जाती तो उसे राजनैतिक फायदा जरूर होता साथ ही देश का भी फायदा हो जाता, और दूध का दूध पानी का पानी सामने आ जाता। मगर हर बार की तरह अफसोस कि इतने संवेदनशील बयान के बावज़ूद कोई सार्थक जांच नहीं हुई। आप सोच रहे होंगे कि मैं इतना उतावला क्यों हो रहा हूं इस बयान की तह में जाने के लिये? तो आपको बता दूं कि सोनिया के लिये सुदर्शन द्वारा व्यक्त किया गया बयान कोई नया नहीं था। इसके पहले भी इस तरह की बातें राजनीतिक चक्र में घूमी थीं, और घूम कर कहीं किसी दरार में छिप गई थीं। सुदर्शन ने उसे बाहर निकालने का साहस किया। आप बता सकते हैं सुदर्शन के इस साहस की पुनरावृत्ति कोई और कर सकता है क्या? वो कांग्रेसी नेता खुद भी नहीं जिसके वज़ूद पर सुदर्शन ने अपनी बात कही थी। वैसे कांग्रेसी नेताओं में वो जिगर है ही नहीं कि सोनिया के खिलाफ कुछ सोच भी सकें। यह उनकी अपनी मज़बूरी है। मेरा तो महज़ यह मानना है कि सुदर्शन जैसा व्यक्तित्व जिसने संघ जैसी विशाल राष्ट्रीय, राष्ट्रवादी संस्था को संभाला वो कोई नीचता जनक कार्य तो कभी नहीं कर सकता है, जिससे उनका मानमर्दन हो। तब उनका बयान सिवाय सुर्खियों तक सीमित रह जाये, या सिर्फ थोडे से बवाल में नष्ट हो जाये, देश की एक उच्च पदस्थ पार्टी की उच्च पदासीन अधिकारी के लिये भी ठीक नहीं। आखिर यह उनके अपने जमीर, ईमानदारी पर उठा सवाल है। और वह भी बहुत ज्यादा घातक। जवाब मिलना चाहिये था।
खैर..। घोटालों की बाढ में इन दिनों कांग्रेस क्या और भाजपा क्या..सब के सब बह रहे हैं। एक दूसरे पर कीचड उछाल-उछाल राजनैतिक होली खेली जा रही है। जांच भी अवश्य होगी। किंतु कांग्रेस के लिये यह सुखद भी है क्योंकि अगर इन घोटालों की बाग़ड (खेत के किनारे खडी की जाने वाली घासफूस से बनी दीवार) तैयार नहीं की गई तो सोनिया पर उठे सवालों की लहलहाती फसल पर सबकी नज़र चली जा सकती है। इसलिये चाहे वो अशोक चव्हाण के आदर्श घोटाले की बात हो या रतन टाटा के बयान से उठे विवाद या फिर कॉमनवेल्थ के घोटालों की फेहरिस्त हो, सबकी सब मीडिया में अव्वल स्थान पर हो और सुदर्शन के बयान किसी रद्दी की टोकरी में पडे पुराने अखबार की तरह खत्म हो जाये..कांग्रेस की यह चाहत अवश्य रहेगी। खुदा जाने उसकी चाहतों में और क्या-क्या है? किंतु यह जरूर है कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति पर प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा उठाई गई उंगली के लिये तीसरे अंपायर का निर्णय अगर दिया जाता तो मैच का रंग ज्यादा निखरता, उसका रोमांच बढता और सच्ची जीत सामने आती।

3 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

यह सोचने वाली बात है कि सुर्दशन जी कह कर चुप हो गए और सोनिया जी सुनकर भी चुप हैं। एक सोचने वाली बात ये भी है कि सुर्दशन जी की उस बात का स्त्रोत कौन हैं उनकी बात मानने तो वो एक काग्रेसी ही है वो शायद अब भी काग्रेंस में है और उसी काग्रेंस के गुण भी गा रहा होगा। तो ऐसे आदमी का क्या विशवास किया जाए जो एक चेहरे पर कई चेहरे लगा कर घूम रहा है और दूसरा यही बात सुर्दशन जी ने तब क्यों नही कही जब स्वामी जी यही आरोप लगाएथे और अब क्यों कह रहे है? ये बातें भी गौर कर ने लायक है या नहीं? और साथ ही ये बात भी है अगर एक तबका ऐसी बातें कर रहा है तो जवाब भी आना चाहिए। ये सही है सुर्दशन जी नासमझ नही है पर सुनी सुनाई बातों पर अपनी राय देना भी समझदारी नहीं हैं। और संघ और भाजपा ने इस मुद्दे से किनारा क्यों कर लिया उसका जवाब ये है कि संघ और भाजपा अलग अलग नहीं है और ये अपने को कांग्रेस से अलग मानती है पर है न्हीं। बहुत सारी बातों में एक से ही विचार रखती है। चाहे वो उदारीकरण का हो या डिस्इंवेस्ट का हो या फिर अमेरिका से दोस्ती या बैशक वो भ्रष्टाचार का ही मामला हो। ये भी भोले लोगों को राजनितिक जुमलों से ठगते है और वो भी। बस हम जैसे लोगो को बहकाने के लिए अपनी कमीज को ज्यादा सफेद बताते रहते है। और सत्ता पाने पर लोगो के सरोकारों को भूल अपने सरोकारों में लग जाते है। बस ........

शरद कोकास ने कहा…

हमे तो वही पुराना मुहावरा याद आता है जैसे सापनाथ वैसे नागनाथ

दिगम्बर नासवा ने कहा…

AAPKI BAAT VICHAARNIY HAI .....