मंगलवार, 11 अगस्त 2009

हाज़िर हूँ जनाब

मित्रवर की आवाज़ हो और हम ना आयें ऐसा कैसे हो सकता है। वैसे यकीन मानिये इन दिनो मैं इस हाल में नही हूं कि कुछ स्वस्थ लेखन हो सके, पिछले दिनो ऐसी व्यस्तता रही कि लिखने का समय नही मिला, समय मिलता कि वायरल फीवर ने जकड लिया { शुक्र है कि स्वाईन फ्लु ने नही जकडा} पिछली लगातार भागादौडी की थकान और फीवर की वजह से आई कमजोरी ने लगभग शरीर को तोड कर रख दिया। रोज़ सोचता रहा कि कुछ लिखूं, पढता तो रहा मगर लिखने का कीडा बस कुलबुलाता ही रहा. अभी जब अपने मित्र (दर्पणजी) का बुलावा देखा तो खुद को रोक नही सका। सच कहूं तो इस ब्लोगिंग ने मुझे तर दिया है. कुछ ऐसे मित्र मुझे मिल गये जिनकी कल्पना ही मैं कभी किया करता था. ईश्वर की किरपा।
बीमार मन आखिर क्या लिख सकता है? किंतु हां, इस अवस्था का भी अपना अनुभव होता है और जो सबसे अलग होता है। मुझे लगता है ये अवस्था खुद को देखने के लिये सबसे बेहतर अवस्था है। हम कम से कम ये तो जान लेते हैं कि हमारा 'शरीर' भी है। अन्यथा इतने व्यस्त जीवन मे इस शरीर का भान रह ही कहां पाता है? वैसे शरीर है तो रोग भी हैं। पर ईश्वर से यही दुआ करता हूं कि किसी को भी रोगी न होने दे। आदमी की सारी रचनात्मकता रोग की वजह से रुक जाती है। कैसा भी रोग हो, आदमी तो भुगतता ही है साथ ही साथ उससे जुडे लोगों को भी वो परेशान कर देता है। मुझ जैसा व्यक्ति कुछ ज्यादा सोचता है,पर यह भी उतना ही सच है कि बीमारी में आदमी जीवन के कुछ ज्यादा करीब चला जाता है। तब उसे नज़र आता है अपने आसपास का माहौल। कभी कभी वो स्वयं को बहुत बौना समझने लगता है और दुनिया उसे बहुत बडी दिखाई देने लगती है। उसे लगता है..जिस दुनिया को उसने अपने तलवो के नीचे दबाये रखने का घमन्ड पाला हुआ था ऐसा यथार्थ में है नही। सारे लोग उसे अपने से लम्बे..आदमकद जान पडते है। आकाश ऐसा प्रतीत होता है मानो उसे बस निगलने ही वाला है। धरती पर पैर रखने मे घबराने लगता है। वो खुद एक बौना, असहाय सा जान पडता है। यानी बीमारी में आदमी अपनी अस्लियत को बहुत करीब से देखता है। मैं तो सम्भल जाता हूं..इसलिये कि कुछ याद आ जाता है जो दिल को तसल्ली दे जाता है, अब देखिये न, जौक़ साहेब ने शायद मुझ जैसों के लिये ही तो यह लिखा होगा कि-
'देख छोटों को है अल्लाह बडाई देता
आस्मां, आंख के तिल में है दिखाई देता'

खैर.. ठीक हो रहा हूं, जल्दी ही अपने छूटे हुए खास ब्लोग्स पर भ्रमण करुंगा। इन दिनो मगर मज़ा भी रहा, अपनी कुछ यादों में सफर कर आया, तो बहुत कुछ आत्मिक अनुभव भी प्राप्त किये। ये समय खुद के लिये बना होता है शायद, खुद को पहचानने के लिये। जब आप अपने कामकाज से दूर, बस अपने बारे में सोचते होते हैं। लगता तो ये है कि डोक्टर कहता भी इसीलिये है कि- कम्प्लीट्ली रेस्ट लो। जो भी हो, इस अज़ीब से रेस्ट' का मज़ा भी है। हालांकि ये मेरे मानने से थोडा परे हट कर है ,मेरा मानना है कि व्यस्त रहना ज्यादा सुखकर है। आप अकेले पडे नहीं कि तमाम तरहो की बातों मे दिमाग उलझने लगता है। व्यस्तता बान्ध कर रखती है, अच्छी नींद देती है और आपको अपने उद्देश्य की और हमेशा अग्रसर रखती है। पर बीमारी में? उफ्फ, इंसान की फितरत भी क्या चीज़ बना दी। खैर.. वो शायर 'मुश्फिक' का शे'र है न कि-
' इंसा भी मसीयत का अनमोल खिलौना है
हर खेल का आखिर है और खेल भी होना है'

जनाब मुश्फिक़ से शायद आपका परिचय नहीं होगा, इनके बारे में कभी लिखुंगा जरूर, कमाल के शायर थे, फिलहाल इस अनमने लेखन को झेलिये, दरपणजी का बुलावा मैं टाल नहीं सकता था इस्लिये जो मन में आया वो लिख दिया। उन्हीं को समर्पित-

"लो सूरज भी डूब गया
बेचारा दिन ऊब गया
मटमैली सी ये
शाम का पल्लू झट उलट गया।
'साथी' की मुस्कुराहट लिये
लो खिल आई चांदनी
रात की गोद मे बैठ
'उसके' लिये मैं कुछ लिख गया।

12 टिप्‍पणियां:

'अदा' ने कहा…

accha laga jaan kar ki aap theek ho gaye hain...bas jut jaaiye blogging mein aur bloggers ke saath..
swaagatam...

दर्पण साह "दर्शन" ने कहा…

हम कम से कम ये तो जान लेते हैं कि हमारा 'शरीर' भी है।

bilkul yahi vichar mere bhi hai, kewal sharir ke baare main hi nahi, kisi choti si cheez, even ki match box.
wo bhi tab jab 'nicotene kick' ki talab lagi ho...

swine flu ke lakshan to yaha bhi dikh rahe hai huzoor...

...par mujhe apne immune system ke uppar pata nahi itna yakeen kyun hai ?

wo bhi tab jabki meri aisi koi bhi aadat nahi jo mujhe swasth rakhne main sahayak ho.


dhanyavaad ki aapne is nacheez dost ka khyal rakhte hue antatogatwa ek post daal hi di.

huzoor mitr bhi kehte hein aur darpanji bhi?
ye bataien mitr aur 'ji' main se kya hatana pasand kareinge?

post ke baare main aake vistar se comment deta hoon, abhi to apke swasth labh aur apki bahupratikshit nai post ki badhai.

apke zaldi swasth ho jaane ki hardik dua ke saath,
aapka Mitr.

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएँ

दिगम्बर नासवा ने कहा…

AMITABH JI....JAN KAR ACHHA LAGA AAPKE SWASTH KE BAARE MEIN, AAP JALDI HI POORI TARAH SE SWASTH HO KAR AAYEN AISI SHUBHKAAMNA HAI MERI....AAPKI KAMI BLOG MEIN BAHOOT AKARTI HAI....AAPKA LIKKHA HAMESHAA SAMVEDANSHEEL AUR SOCHNE KO MAJBOOR KARTA HAI..........

AAPNE SACH KAHA HAI AGAR MAN THEEK NAHI HO, SHAREER THEEK NAHI TO TO KISI BHI RACHNAATMAK KAAM KARNE KI ICHHA NAHI HOTI....
DARPAN JI BAHOOT HI BHAGYSHAALI HAIN AAP JAISAA MITR PAA KAR..... DARASAL VO KHUB BHI BAHOOT ACHHE INSAAN HAIN....
AAPKI LIKKHI CHAND PANKTIYAAN BAHOOT KUCH KAH GAYEE, LAJAWAAB

ajay saxena ने कहा…

अमिताभ भाई ..प्रणाम ..आपके ब्लॉग को देखा तो पता चला की आपका स्वस्थ्य ख़राब है ..क्या हुआ ???
मुझे फ़ोन पर या मेल पर बताइयेगा ...आपका ही अजय

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

वाह। थोडे से ठीक हुए नही कि मारी चादर फैंक के। कौन कहता है कि मैं बीमार हूँ। ये तो बस यूँ ही थोडी सी थकान मिटा रहा था। जो दोस्त रोज बात नही करते है उनसे बात करना चाह रहा था। मुझे पता था ऐसे तो ये रोज बात करेगे नही इस बहाने ही सही। लगता है एक आध गिलास जूस पी लिया है। खैर ये तो रही मजाक की बात। और सुनाए अब तबीयत कैसी है। वैसे पोस्ट पढकर तो सारा अंदाजा हो रहा है। वो जरा टीवी टावर को भागकर छूकर तो आईए जरा। मैं इधर बैठा हूँ जूस का गिलास लेकर:) और हाँ दो चार दिन में एक सरप्राईज मिलने वाला है आपको सोचो जरा सोचो। तब तक एक ब्रेक ले लेता हूँ मैं।

Rane (The Orchid with All Shades Pink) ने कहा…

apni sehat ka khayal rakhiye bhaiyya..

अजय कुमार झा ने कहा…

अजी पूछिए मत ...,मौसम की मेहरबानी है, हर तरफ परेशानी है.....
अच्छे स्वास्थय के लिए हमारी भी शुभकामनायें

pankaj shrivastava ने कहा…

प्रिय अमिताभजी,
हम इश्वर से आपके शुभ स्वस्थ की कामनाएं करते हैं, इसी बात पर मुझे गोस्वामी तुलसीदास जी की कुछ पंक्तियाँ सहज ही याद आ गयी

ईश्वर अंस जीव अविनासी।
चेतन अमल सहज सुख रासी।।

इश्वर का अंश आप अविनाशी हैं। आप निर्मल हैं, निर्दोष हैं। आप अपार सुख का भण्डार हैं।
अपना सृजन हिंदी के विकास के लिए करते रहे यही कामनाएं हैं.

sudhir ने कहा…

Bandhu,
Marz ke darmiyan li gayi Karwat hi KAYA aur MAYA ke fer se hame sakshatkar karati hai.

शोभना चौरे ने कहा…

chalo aapka svasth to theek ho rha hai jankar acha lga .aap jaldi se svsth ho jaiye aur apni rchnao ke madhym se sabhi pdhne valo ko kshudha shant kijiye .
shubhkamnaye

Babli ने कहा…

काफी दिनों बाद आपका पोस्ट पड़कर अच्छा लगा! अब आपकी तबियत कैसी है? आप जल्द से जल्द स्वस्थ हो जाइये यही मेरी भगवान से प्रार्थना है!