सोमवार, 1 दिसंबर 2008

पीड़ा

सागर के किनारे
उन पत्थरो की पीड़ा
कौन जाने ?
जो लहरों के थपेडो से
ठीक उसी तरह दो हाथ करते हे
जेसे गरीब
दो जून की रोटी के लिए

1 टिप्पणी:

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

बहुत बेहतरीन। सागर से गहरे अर्थ लिए हुई रचना।